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जापानी लोक कथा ‘अमरता के इच्छुक सेंटारो की कथा’

अपने पहले ही कहानी संकलन ‘जापानी सराय’ से प्रभावित करने वाली युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय ने इस जापानी लोककथा का बहुत ही पठनीय और प्रवाहपूर्ण अनुवाद किया है- मॉडरेटर

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तो साहिबान, ये कहानी है पुराने जापान की, इसमें बातें हैं ज़मीन आसमान की, ज़िंदगी और मौत के सामान की।
जी, क्या कहा? बढ़ा-चढ़ा कर कहती हूँ? तो जाने दीजिए, चुप रहती हूँ। वो कहानी ही क्या जो सच की मनौती ले और ना कल्पना को कुछ भी चुनौती दे?
नहीं, बुरा नहीं माना, आप कहते हैं तो सुनाती हूँ। शब्दों के चूल्हे पर अर्थ की रोटी पकाती हूँ। ये क़िस्सा कब घटा, कौन जाने? फिर भी सुनिए, शायद जान पाएँ इसके माने –

समय के उस छोर पर, निप्पोन देश, यानि पुराने जापान में, जहाँ किंवदंतियों के अनुसार सूर्य का जन्म हुआ था, सेंटारो नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसके नाम का अर्थ था ‘अरबपति’। यद्यपि धन-कुबेर नहीं था वह, लेकिन सुदामा भी नहीं था। पिता से विरसे में अच्छी ख़ासी सम्पत्ति मिली थी। उसी पर ठाठ से जीवन बिताता था। काम-धाम कुछ नहीं करता था। जाने कैसे दिन काटता होगा, शायद  वसंत में चैरी वृक्ष के फूलों का पाँखुर- पाँखुर खिलना देखता, पतझर से रंगीन हुए वनों में घूमता हो और शीत ऋतु में बर्फ़ से ढँके गर्वीले फ़ूजी पर्वत की एक झलक के लिए आशी-ताल पर हफ़्तों डेरा जमाता हो। या गिंज़ा और आसिया के विलास-मंदिरों में गेशा-बालाओं के लोध्र-रेणु से श्वेत मुख निरखता, उनके हाथों भरे साके शराब के जाम पीता, उनकी कलात्मक बातों का आनंद लेता हो। हाइकू रचने या चाय की परिपाटी सीखने या क़लमकारी की कला में मेहनत लगती है, सो आलसी सेंटारो मुश्किल है कि इन ललित कलाओं का अभ्यास करता हो।

ख़ैर जब सेंटारो बत्तीस वर्षों का हुआ उसे एकबारगी ही बुढ़ापे और मृत्यु का भय सताने लगा। मानव-जीवन इतना छोटा क्यों? मैं क्यों न पाँच या छः सौ वर्ष, रोग- जरा से मुक्त, जीता  रहूँ? आख़िर फ़लाँ रानी ने पाँच सौ साल की आयु पाई ही थी। और भी जाने कितने दीर्घ काल जिए थे। सेंटारो के मन में ऐसे ख़याल घूमते रहते । फिर उसने चीन देश की महाभित्ति के निर्माता राजा शिन-नो-शिको की कहानी भी सुनी थी। राजा शिन-नो-शिको को भी मृत्यु कु अटलता का प्रश्न दिन-रात सताता था।इसीलिए उसने अपने पुराने दरबारी जोफुकु को सात समंदर पार होराईज़ान नाम के देश से जीवनामृत लाने के लिए पठाया था। कहा जाता था कि होराईज़ान के पहाड़ों में ऐसे यति रहते हैं जिनके पास मृत्यु-निवारक रसायन था। जब राजा ने यह सुना तो उसने न आव देखा न ताव, शायद बेचारे बूढ़े जोफुकु से पूछा भी नहीं, और अपना सबसे ऐश्वर्यशाली पोत उसके लिए तैयार करवा दिया, उसमें तरह तरह के ख़ज़ाने भरवा दिए और जोफुकु को अमृत से भरी शीशी लाने के निर्देश के साथ रवाना कर दिया। बेचारा जोफुकु जो अमृत के संधान को गया, सो कभी नहीं लौटा । लेकिन जापान में प्रचलित हो गया कि होराईज़ान दरअसल फ़ूजी पर्वत है और उसकी सुरम्य ऊँचाइयों  में कहीं जोफुकु अब भी बस रहे हैं और अमृत के रहस्य के जानकार यतियों के देव बन बैठे हैं। बूढ़े दरबारी से देव का सफ़र उन्होंने कैसे तय किया इसके बारे में भले कोई जानकारी न हो, लेकिन जोफुकु अमरत्व के अधिष्ठाता देव के रूप में जनमानस में जम गए।सेंटारो ने तय किया कि वह सभी ऊँचे पर्वत शिखरों पर जाएगा और अमृत के रक्षक यतियों को ढूँढने की कोशिश करेगा ।

बहुत दिन भटकने के बाद सेंटारो को यति नहीं मिले, मिला एक शिकारी। पूछने पर बोला, यति-सती का मुझे पता नहीं लेकिन यहाँ एक डकैत रहता है जिसके दो सौ साथी हैं। सेंटारो यह उत्तर सुन कर खीझा, या शायद मन ही  मन डरा लेकिन अपनी मर्यादा बचाने के लिए जताया नहीं। फिर भी  उसने सोचा- इस तरह भटकने से क्या लाभ? क्यों न जोफुकु के मंदिर में जा कर साधना की जाए। वे ठहरे यतियों के देव, उनके एक इशारे पर यति दौड़े आएँगे और मिन्नतें करके अमृत दे जाएँगे। ऐसा विचार आते ही सेंटारो जोफुकु के मंदिर पहुँच गया । सात दिनों तक अखंड प्रार्थना करते रहने पर सातवीं रात को जोफुकु सचमुच प्रकट हुए। वे एक चमकीले उजले बादल में लिपटे थे और बड़े शांत-मनोहर दीख रहे थे। सेंटारो को पास बुला वे समझाने लगे – देखो जी सेंटारो, यति बनना तुम्हारे बस का नहीं। बड़ी मशक़्क़त लगती है, बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं।सिर्फ़ फल और चीड़ की छाल पर तुम जी नहीं पाओगे, संसार के सुखों को तुम छोड़ नहीं पाओगे। तुम तो बढ़े-चढ़े आलसी हो, और नाज़ुक इतने कि ठंड और गर्मी तुमको औरों के मुक़ाबले ज़्यादा सताती है। तुममें कहाँ यति-व्रत लेने का धीरज और साहस?
इतनी लानत- मलामत से जब सेंटारो का मुँह उतर गया और आशा छूट गई तो जोफुकु बोले – लेकिन चलो तुमने जो ये पूजा-प्रार्थना की है उसके एवज़ कुछ करना बनता है सो मैं तुमको ऐसे देश भेज देता हूँ जहाँ कोई नहीं मरता , चिरंतन जीवन का देश! यह कह कर चीनी-दरबारी-उर्फ़-अमृतदेव ने सेंटारो के हाथ में एक काग़ज़ी बक थमाया और उसकी पीठ पर सवार होने का आदेश देकर मय अपने चमकीले बादल के अंतर्ध्यान हो गए।

सेंटारो अचकचाया। आप भी अचकचाएँगे अगर आपको कोई बित्ते भर के काग़ज़ के बगुले पर बैठने को कहे। लेकिन जापानी सेंटारो निर्देश का पालन और बुज़ुर्गों की मर्यादा रखने की परम्परा के चलते बुद्धि ताक पर रख बक पर बैठ गया। बैठते ही, वही हुआ जो होना चाहिए था – काग़ज़ का बगुला बढ़ने लगा। बढ़ते बढ़ते महाकाय हो गया। अपने शक्तिशाली डैने खोले उड़ने लगा। स्वाभाविक है कि सेंटारो पहले डरा लेकिन बाद में उसे उड़ान में आनंद आने लगा। वह बगुला कई दिनों तक उड़ता रहा, न दाने के लिए रुका न पानी के लिए। ख़ैर, काग़ज़ की चिड़िया को दाने-पानी की क्या दरकार लेकिन सेंटारो को भी भूख प्यास नहीं लगी। शायद कभी न मरने की इच्छा पूरी होने से ही उसका पेट भर गया था।

कई दिन के सफ़र के बाद सेंटारो चिरंतन जीवन के देश पहुँचा। वह देश सेंटारो को बड़ा विलक्षण लगा। वहाँ के किसी निवासी की याददाश्त में कोई कभी नहीं मरा था और रोग वग़ैरह तो सुनने में भी नहीं आते थे। लेकिन कुछ कमी वहाँ भी थी। चीन और भारत के ज्ञानी संत उस देश में आते और निवासियों को बताते कि एक बड़ी मनोरम जगह है जहाँ सब तरह की संतुष्टि और आनंद है। वह स्थान है स्वर्ग और वहाँ मरने पर ही पहुँचा जा सकता है। सो चिरंतन जीवन के देश के निवासियों की एक ही इच्छा है – मरने की। अमीर श्रेष्ठि और ग़रीब गुर्बे सभी जीते जीते थक चुके थे और बस मृत्यु की शांत स्थिरता चाहते थे। चुनाँचे वे तरह तरह के विष फाँकते, अति-विषाक्त पफ़र मछली खाते और स्पेन देश की ज़हरी मक्खियों से बनी चटनी चाटते,  रसायन जो बालों को सफ़ेद और हाजमे को मंद करे आज़माते। लेकिन मृत्यु उनके पास नहीं फटकती। वाक़ई हमारे विष उनको अन्न हो जाते।

सेंटारो उस अमर देश में बस गया। कुछ काम-धंधा जमाया, घर वग़ैरह बनाया। लेकिन जैसे जैसे समय बीता, वह असंतुष्ट रहने लगा। अनंत काल तक ऐसे ही रहते जाना, यूँ ही खाते-पीते-सोते-जागते अनवरत अनिवार चक्र में युक्त रहना उसे सालने लगा। शायद चिरंतन जीवन की व्यर्थता और मृत्यु की सार्थकता का भी उसे कुछ कुछ भान होने लगा हो। या अपने समरस सम्भावना हीन जीवन से वह ऊबने लगा हो।
जो भी कारण हो, सेंटारो अब अपने उसी मर्त्य लोक लौटने के लिए छटपटाने लगा जहाँ से बचने की उसे ऐसी तीखी लालसा रही थी। यदि उसकी असम्भव की लालसा और फिर पा जाने पर खो देने की अकुलाहट पर आपको आश्चर्य हो रहा हो तो ज़रा अपने मन में झाँक कर देखें।

ख़ैर सेंटारो की घर लौटने की इच्छा असहनीय हो उठी तो उसे फिर जोफुकु देव का ध्यान आया। अपने स्वार्थ में उसने यह भी नहीं सोचा कि दो सौ- तीन सौ वर्ष भूले रहने के बाद जोफुकु क्यों उसकी सहायता करेंगे। लेकिन जोफुकु तो बड़े दयावान निकले। इधर सेंटारो ने प्रार्थना की, उधर काग़ज़ का बगुला फिर नमूदार हुआ। इतने बरसों वह सेंटारो के उसी पुराने किमोनो की आस्तीन में पड़ा रहा था। जैसे ही सेंटारो बगुले पर सवार हुआ और बगुला समुद्र पार उड़ चला, तो सेंटारो को पीछे छूटे अमरत्य देश का खेद सताने लगा। सेंटारो का ढुलमुलपन आपको या मुझे शायद जाना- पहचाना लगे लेकिन जोफुकु देव को उस पर खीझ हो आई। बस समुद्र में बड़ा भारी तूफ़ान उठा और जादुई बगुले का काग़ज़ी पैरहन भीग कर मुचड़ गया। नतीजतन सेंटारो समुद्र की उद्दाम लहरों में गिर पड़ा और डूबने लगा। एक भयंकर मत्स्य उसे ग्रसने को उसकी ओर बढ़ने लगा। सागर के खारे पानी से घुटते गले से उसने जोफुकु देव को गुहारा। सहसा सारा समा बदल गया। सेंटारो ने पाया कि वह जोफुकु देव के मंदिर में ही है। चिरंतन जीवन के देश में बिताए पिछले शतक आध घड़ी का स्वप्न मात्र निकले। फिर कथा परम्परा के अनुसार देव का एक दूत आया। उसने सेंटारो को अमरता की इच्छा त्यागने और जीवन को कर्म से समृद्ध करने की सीख दी। एक ग्रंथ दिया जिसमें पुरुषार्थ और धर्म कर्म की महत्ता थी। फिर पूर्वजों और संततियों को कभी न भूलने का निर्देश दे दूत अदृश्य हो गया। तीन सौ वर्षों के उबाऊ स्वप्न-जीवन, और शायद उतने ही उबाऊ उपदेश के बाद, सेंटारो भरपाया और अपने घर लौट संसार के नियमों के अनुसार रहने लगा।

अब इस कहानी को पढ़ कर आप कोई प्रश्न न कीजिए। और यदि प्रश्न उठें, तो स्वयं से पूछिए या जोफुकु देव से। वरना अपने मिट्टी के चोले में मगन रहिए!

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