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प्रेम और कुमाऊँनी समाज के प्रेम का उपन्यास ‘कसप’

साहित्यिक कृतियों पर जब ऐसे लोग लिखते हैं जिनकी पृष्ठभूमि अलग होती है तो उस कृति की व्याप्ति का भी पता चलता है और बनी बनाई शब्दावली से अलग हटकर पढ़ने में ताज़गी का भी अहसास होता है। मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ पर चन्द्रमौलि सिंह की इस टिप्पणी को पढ़ते हुए ऐसा ही अहसास हुआ। हिंदू कॉलेज में मेरे पुराने सहपाठी चन्द्रमौलि भारत सरकार में आला अफ़सर हैं लेकिन साहित्य से अनुराग गहरा है। ख़ूब पढ़ते हैं, अब आग्रह है कि इस तरह किताबों पर लिखा करें- प्रभात रंजन

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अब इस कालजयी रचना की रिव्यू क्या लिखूँ में? हिंदी साहित्य में जिसकी भी ज़रा भी अभिरुचि होगी, क्या नहीं पढ़ी होगी उसने ये किताब? क्या नहीं जानते होंगे लोग इसके कथानक को? क्या नहीं आयी होगी एक साथ उनके चेहरे पे मुस्कान और आँखों में नमी, इस उपन्यास को पढ़कर? सो ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा, बस इतना ही की, क्या उपन्यास है यार!

वैसे तो इसे आसान लफ़्ज़ों में संज्ञातीत करना हो तो यही कहेंगे के एक असफल प्रेम कहानी है, पर मेरे हिसाब से ये पुस्तक उससे कहीं ज़्यादा है, कई चीज़ों को इंगित करती हुई..प्रेम तो पुस्तक के सेंटर में रचा बसा है ही, और आपका इस प्रेम सम्बंध को देखने का अपना अपना नज़रिया हो सकता है..वो कहते हें ना, ‘इश्क़ की दास्तान है प्यारे, अपनी अपनी ज़ुबान है प्यारे..’! सो आप इसको अपने परिष्कृत नज़रिये से देखिए या फिर भदेस से, आपकी मर्ज़ी..सो जिन लोगों ने नहीं पढ़ी, उनको बताता चलूँ के ये कहानी है अनाथ, सुशील, सहित्यनिषट्, कथाकार, उपन्यासकार, देवदत्त उर्फ़ डीडी की जो बॉम्बे फ़िल्म जगत में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है, और अल्हड़, खिलंदर, मस्तमौला बेबी उर्फ़ मैत्रेयी की, उनके असफल प्रेम की…दोनो की मुलाक़ात होती है एक शादी के ज़नवासे में, और फिर नायक को एकदम से और नायिका को धीरे धीरे से, हँसी मज़ाक़ और खिलंदरी करते करते प्यार हो जाता है नायक से। जैसा अमूमन होता है, बेबी के परिवारवालों, ख़ास कर उसके भाई और भावज को बिलकुल ही नहीं भाता ये प्यार। लड़का अनाथ, कुछ ख़ास करता नहीं, खास आमदनी भी नहीं, भला ऐसे में कोई परिवारजनों पसंद करे भी तो कैसे? पर प्रेमी प्रेमिका कहाँ मानने वाले थे..उनकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा बेबी के माता पिता को और तय हो गयी दोनो की शादी। पर फिर नायक पे सवार होती है धुन अमेरिका जा कर कुछ बनने की, और उसको अमेरिकी विश्वविद्यालय में दाख़िला ले कर आगे फ़िल्म बनाने की पढ़ाई करने को उत्प्रेरित करती है फ़्रांसीसी प्रोड्यूसर गुलनार, जिसके साथ वो एक प्रोजेक्ट में काम कर चुका था। बेबी को उसके अमेरिका जाने की बात समझ में आती नहीं, खास कर के जब उसने उसे पा लिया है, उनकी ज़िन्दगी अब साथ गुजरने वाली है, एक हो कर! वो उसे रोकने की कोशिश करती है, पर असफल होने पर ख़त्म कर देती है उस से रिश्ता ! बेबी जिसने आपने आप को डीडी का व्याहता मान लिया था, अब अपने आप को विधवा मान बेबी से मैत्रेय, विदुषी मैत्रेयी, बनने की राह पर अग्रसर हो जाती है, खो देती है अपने आप को किताबों और पठन पाठन में। मेरे हिसाब से कई रिश्ते इस अमेरिका जाने, कुछ नया बन जाने की बलि चढ़ गए हैं, और जब इंसान उस रिश्ते के ख़त्म होने के झंझावात से गुज़र रहा हो, वो रिश्ते जो उसने अटल और अमर मान लिए हों, जिसपर उसका यकीन से ज़्यादा विश्वास हो चला हो, ऐसे रिश्तों के खात्मे पे, किताबों और पठन पाठन में डूब जाना इस चित्त चिता की अग्नि को शमन करने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा होता है…. एक तो किताबें एक नयी दुनिया खोल देती हैं, और समय भी अच्छा खासा खा जाती हैं आपका ….

वैसे, क्या जो भी फैसले उन दोनों ने लिए, वो सुख दे पाए दोनों को, इसका जवाब ही है उपन्यास का शीर्षक, ‘कपस’….एक कुमाऊनी शब्द, जिसका अर्थ है, ‘क्या मालूम ‘!मनोहर श्याम जोशी जी ने इस उपन्यास के शीर्षक के बारे में लिखा था, ‘.. पर इस कथा के जो भी सूझे मुझे विचित्र शीर्षक सूझे। कदाचित इसलिए कि इस सीधी-सादी कहानी के पात्र सीधा-सपाट सोचने में असमर्थ रहे।”

वैसे यह किताब सिर्फ बेबी और डी डी की प्रेम कहानी ही नहीं है, यह कुमाऊनी समाज, उसके रहन सहन का एक आईना भी है.. उपन्यास की भाषा मूलतः कुमाऊनी ही है, और यह कहते मुझे कोई झिझक नहीं हो रही की रेणु के मैला आँचल के बाद यह आंचलिक बोली की सबसे बेहतरीन रचना है. कुमाऊनी सामाजिक परिप्रेक्ष को लेखक ने जैसे कागज़ पे उकेर कर जीवंत कर दिया है. उदहारण के तौर पर ये देखिये किसी नव अवंतुक के परिचय का तरीक़ा, “कौन हुए’ का सपाट सा जवाब परिष्कृत नागर समाज में सर्वथा अपर्याप्त माना जाता है। यह बदतमीजी की हद है कि आप कह दें कि मैं डीडी हुआ। आपको कहना होगा, न कहिएगा तो कहलवा दिया जाएगा, मैं डीडी हुआ दुर्गादत्त तिवारी, बगड़गाँव का, मेरे पिताजी मथुरादत्त तो बहुत पहले गुजर गए थे, उन्हें आप क्या जानते होंगे, बट परहैप्स यू माइट भी नोइंग बी.डी तिवारी,वह मेरे एक अंकल ठहरे…..वे मेरे दूसरे अंकल ठहरे। उम्मीद करनी होगी कि इतने भर से जिज्ञासु समझ जाएगा। ना समझा तो आपको ननिहाल की वंशावली बतानी होगी।’ वैसे उपन्यास इस बात से भी पाठकों को इंगित कराती है की भाषा चाहे कोई भी हो, भावनाओं के सम्प्रेषण में कभी बाधक नहीं बनतीं.. उपन्यास में वह प्रसंग जहाँ नायक नायिका को पत्र लिखता है, पर नायिका उनको इतना गूढ़ पाती है की वो पत्र अपने पिता को दे देती है, की पढ़ें और उसे समझाएं की उसके प्रेमी ने आखिर लिखा क्या है! अब ऐसे प्रसंगों से आपके चेहरे पे मुस्कान आएगी ही.. और जब उसके पिता उसे नायक के पत्र समझते हैं, तो नायिका जवाब में लिखती है, ‘तू बहुत पडा लिखा है। तेरी बुद्धी बड़ी है। मैं मूरख हूँ। अब मैं सोच रही होसियार बनूँ करके। तेरा पत्र समझ सकूँ करके। मुसकिल ही हुआ पर कोसीस करनी ठहरी। मैंने बाबू से कहा है मुझे पडाओ।….हम कुछ करना चाहें, तो कर ही सकनेवाले हुए, नहीं? वैसे अभी हुई मैं पूरी भ्यास (फूहड़)। किसी भी बात का सीप (शऊर) नहीं हुआ। सूई में धागा भी नहीं डाल सकने वाली हुई। लेकिन बनूँगी। मन में ठान लेने की बात हुई। ठान लूँ करके सोच रही।’ वैसे ही जैसे की नायक नायिका अपने प्रेम के इज़हार करते हैं, ‘जिलेम्बू’ कहकर! कई शब्द सिर्फ शब्द न होकर प्रतीक हो गए हैं इस कहानी में, ‘मरगाठ’ क्या सिर्फ शब्द है, या एक मानसिक दशा?

जोशी जी की अन्य रचनाओं की तरह एक बात जो इस रचना में भी उभर कर आती है वो है मजबूत नारी चरित्र और लुंज पुंज पुरुष करैक्टर. बेबी भले ही खिलंदड़ हो, अल्हड़ हो, उसमे एक स्थिरता है. जब एक बार उसने ठान लिया की डी डी से ही करेगी व्याह, स्वीकार करेगी उसको उसकी हर कमी के साथ, तो फिर उसका इरादा टस से मस नहीं हुआ. नायक को दे दिया जनेऊ, और मान लिया पति गणानाथ के सामने, वो भी तब जब उसका विवाह किसी और से तै हो चुका था. सारे समाज से भिड़ गयी वो और करा ली अपनी बदनामी …. नायक जब परिवार की दुहाई देता है तो फूट पड़ते हैं ये बोल उसके मुख से, ‘झे मुझसे सादी करनी थी कि मेरे घरवालों से? मुझसे करनी थी तो मैं कह रही हो गई सादी। मेरी सादी के मामले में मुझसे ज्यादा कह सकने वाला कौन हो सकने वाला हुआ? मैंने अपनी दादी की सादी वाला घाघरा-आँगड़ा पहनकर माँग में गणानाथ का सिंदूर भरकर अपने इजा-बाबू, ददाओं-बोज्यूओं सारे रिश्तेदारों के सामने कह दिया उसी दिन गरजकर : मेरी हो गई उस लाटे से सादी। कोई उस पर हाथ झन उठाना। कोई उसे गाली झन देना। तब उन्होंने कहा ठहरा : बच्चों का खेल समझ रखा सादी? अब तू भी वही पूछ रहा ठहरा।’ इसके बरक्श नायक हर समय दुविधा में ही दीखता है, आत्म प्रवंचना और आत्म संदेह से ग्रसित. कई बार उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगा की उसे झगझोरूँ और पूछूं की अबे तू चाहता क्या है बे? किस चीज़ की तलाश में अकारण बजे चला जा रहा है, भागे जा रहा है. ज़िन्दगी तुझे ठहराओ देना चाह रही है, और तू है के.. मुक़म्मल जहाँ मिलता नहीं है किसी को, उन्ही कमियों में मुक़म्मलता तलाशनी पड़ती है!

एक और चीज़ जो उभर कर सामने आती है वो है १९५० के दशक का भारतीय समाज. आज़ादी के बाद होती तब्दीलियां. आधुनिकता धीरे धीरे पैर पसार रही थी, सामाजिक परिवर्तन धीरे धीरे हो रहा था. एक और चीज़ जो उभर कर सामने आती है वह है, सामाजिक परिप्रेक्ष में सफलता का मयार … आईएएस अधिकारी बनना भारत में उस समय शायद सफलता और कुलीन होने का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता था….नेहरुवियन भारत में अर्थ पैदा करने वालों की शायद उतनी पूछ नहीं थी, जितनी की अर्थ को व्यवस्थित और रेगुलेट करने वालों की. बेबी की जुबां में कहें तो ‘घोड़े की जीन’ (इसका कॉन्टेक्स्ट तो पाठक समझ ही गए होंगे) पर चाबुक चलनेवालों की पूछ घोड़े से कहीं ज़्यादा थी.

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One comment

  1. A. Charumati Ramdas

    बढ़िया!

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