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अनिल अनलहातु का कविता संग्रह ‘बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ’: कुछ नोट्स

‘बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ’ पर कुछ नोट्स लिखे हैं कवि यतीश कुमार ने- मॉडरेटर

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जब कभी भी इस कविता संग्रह को पढ़ा, दिल ने कहा कि एक बार और पढ़ लूँ फिर लिखूंगा।लगभग एक साल की जद्दोजहद के बाद बहुत हिम्मत जुटा कर पर आज सोचा सका कि अब इन कविताओं पर  लिख ही दूं।

उदय प्रकाश जी आपको मुक्तिबोध की पंक्ति का मानते हैं तो अवधेश प्रीत आप में धूमिल की आक्राकमकता देखते हैं ।डॉ. विनय कुमार भी कहते हैं कि पूर्वज कवियों की परछाई होने के बावजूद आप अपनी कविताओं को अलग से चिन्हित कराने में सफल रहे हैं पर मुझमें इतना अधिक ज्ञान नहीं कि मैं यह सब कह सकूं, अपितु मैंने वही लिखा जो मेरी समझ में आया।

आपकी कवितायें पढ़ते वक़्त आप अपने पाठक को कविताओं के बाहर भी ले जाते हैं, नए-नए विषयों पर उनके साथ विचरते हैं और फिर पुनः अपनी कविताओं पर उसे लौटा लाते हैं ।

संग्रह की आरंभिक पंक्तियों में ही आप अपने ईमानदार लेखन का परिचय देते हुए लिखते हैं —

‘मैं वर्षों आईना नहीं देखता….

बुद्ध होना सोचना भी
एक बड़ी उपलब्धि है।
भिक्खु और राजा एक ही
आईना के दो पहलू हैं
और
नीग्रो उसकी पहली सीढ़ी।’

आप ‘वे’ के माध्यम से पूरे विश्व को अपनी कविताओं में समेट लेते हैं और हर ‘वह’ की उसकी खुद की बात को रखते हैं जो हाशिये पर खड़ा द्वंद्व में संलिप्त है।

‘जिंदगी पहाड़ पर टंगी लालटेन नहीं है
यहाँ एक ही मोहन -जो-दड़ो काफी है।’

आप के स्केच का विस्तार समझना किसी पाठकीय उपलब्धि से कतई कम नहीं ।

लिखते-लिखते आप कई बार खुद के विरोध में खड़े हो जाते हैं ,अपनी केंचुल उतार कर बतियाते हैं।
कभी “गोरख”तो कभी “क्यू” में अपने आप को ढूंढते हैं
फिर समाज की उपलब्धि का ब्यौरा आपकी कविताओं में कुछ इस तरह से मिलता है जहाँ लिखा जा रहा है “सामान्य आदमी को असामान्य बनाकर मार डालना अब  उपलब्धि है”।

आप सदियों से चांद को छूने के मुंतज़िर लोगों को निहारते है और फिर उनके अस्त होने का जिक्र अपने तरीके से यूँ करते हैं कि इंका और माओरी में वो जीर्ण घास के तिनके युगों-युगों से उनके साथ हिमाकत  का मुलम्मा चढ़ाए घूम रहे हैं और जिनका हस्र भी
वही होता आ रहा है जो बाबरी मस्जिद का हुआ है।

कविताओं का सफ़र वहां भी बढ़ता है जहां —
चांद का सफर जारी है
जैसे पहाड़ से उतरने पर
पहाड़ का सफर जारी है ।

इसी सफ़र में शरीक़ कवि न केवल धनबाद स्टेशन को देखता है बल्कि वहां से पूरी दुनिया को देखता है।
वो आजादी के पहले वाली दुनिया को देखता है
फिर वो देखता है आज भी है गांधी
और आज भी है उनकी लड़ाई जिंदा ।
और यह देखकर वो फिर से
सोने की कोशिश करने लगता है

‘जिगुरत’ को मेटाफर बनाने का साहस हर किसी के बस का नहीं है यहाँ तो बस चेहरे की परतों की उम्र नापनी है। कविता द्वारा मानवीय पीड़ा पर चढ़ी परतों का हिसाब करने का दुस्साहस तो अनिल जी ही कर सकते हैं मुझे तो विश्लेषण के चार शब्द कहने का साहस जुगाड़ने में साल लग गया।

कवि का यह कहना कि वो सारे जानते हैं कि वो क्या कर रहे हैं और वो सारे बच्चों की मुस्कराहट को जज्ब करने की हिम्मत भी रखते हैं।

आगे चलकर कविता प्रश्न करने लगती है कि
खजूर का पेड़ बना आदमी कितने  हैं आज ?
और कवि कहता है
जनाब हैं और रहेंगे
देते रहेंगे रेगिस्तान को चुनौती
और मुसाफिर को छाँव

कोहासे से भरे धुंधलके में
कवि पारभासक शीशे में कैद
देखता है पूरी कायनात को
वह यह देखने में सक्षम है कि
नज़रें ‘नुनेज’ की मिल गई हैं सबको
और आज इस माहौल में उजाला
एक बेतुका शब्द है।

कमाल करते हैं भाई, आप
कहाँ से लाते हैं ऐसी पैनी नज़र
जो ईशा की हत्या को खींच कर
लाता है उस जबह किये जाने वाले
बकरे के पास
जिसकी आंखे
उस गुलाम नीग्रो से मिलती जुलती है
जहां लिंचिंग करते समूह के बीच
भाषा की हत्या हो रही है- सरेआम
और राजा अपने संवाद में इसका जिक्र भी कर रहा है।

कहाँ मिलेगा मुझे वो आदमी जो दो शून्य को जोड़ कर अनंत की सृष्टि करता है ?
मेरे अंदर ही दफ्न हो गया है क्या ?
कहाँ से लाऊंगा इस सराब को तोड़ने की कला
जबकि जानता हूँ अमृत कलश फूट गया है?

आपकी पंक्तियां मुझे आपकी कविताओं से आगे लकीर खींचने को उकसाती है और मैं रुक नहीं पा रहा हूँ। लिखता जा रहा हूँ ।
हाँ बस डर इस बात का है कि ये गली बड़ी तंग है और इस तारीक से गुजरने में कहीं धड़ाम से गिर न पडूँ।

‘किस-किस से फरागत होंगे रकीब
यहां तो जिंदगी में होना ही फरागत है’
क्योंकि जिंदगी तो मुझे छोड़
ऐशगाह में लेटी जनतंत्र और समाजवाद
के ख्वाब देख रही है और मैं बस ‘फरागत।’

इतिहास में अपने बाप को ढूंढ रहा हूँ
ताकि वो मुझे मेरी लाश तक तो पहुँचा दे। ‘कहानी यहां भी खत्म नहीं होती जैसे खत्म नहीं होती है कोई कविता’ – ये मेरा नहीं अनिल जी का मानना है।

अब प्रश्न ये है कि घोड़ों की संख्या कम तो हो रही है फिर भी घोड़ों की टाप के साथ खून के छींटे कम नहीं हो रहे । हरिकिशुना क्या साफ करता रहेगा सारे दाग और कहेगा दाग अच्छे हैं क्योंकि मुझे इसे साफ करने की तनख्वाह मिलती है या ये कहेगा अब इंसान और गाय दोनो के साफ करूंगा तो ज्यादा मिलेगी ।

मेरी बायीं आंख नम क्यों है अनिल भाई और दायीं निश्चल,अपलक,अविनोद,असंवाद ।
निरस्त करनी है मुझे दायीं आंख में जमीं परतों को और बहाना है दोनो आंखों से समान आँसू कि मैं भी एक आदम रहना चाहता हूँ बस ।
चुप क्यूँ हो
अनिल भाई कुछ तो कहो।

let me die natural death
क्या सच में मार्क्स के पन्नों से जिंदगी तक पसर गया है यह कसैला सच………

मैंने आपकी गुमनाम चिट्ठी में विनोद कुमार शुक्ल की लिखी “गोष्ठी” पढ़ ली तो अब बताइये ये जुर्म है क्या?

डोडो बन जाएंगे हमारे अल्फाज भी एक दिन
पर डोडो मूर्ख नहीं था
हां उसने जब अहिंसा को अपनाया तो उसके आंख पर ऐनक और हाथ में लाठी थी ।
डोडो आज भी जिंदा है मर नहीं सकता
अगर डोडो न हो तो राजा हुंकार कैसे भरेगा
राजा को राजा कौन कहेगा
पर क्या पता मेरे जैसे डोडो के कब पंजे नुकीले हो जाये
कई बार “आम आदमी”का नाम लिए समूह अपने चोंच बाहर कर ले, पर उसके पंजों में अभी भी शक्ति नहीं है ।

डोडो के बाज बनने का सफर अभी बाकी है…..

मनुष्य को समय के कालचक्र में जकड़कर
अशोक स्तम्भ में चिपकवा दिया और सभ्यता को उसके चारों ओर घूमने का आदेश देकर आप चिल्लाते रहे कि आदमी नामक जंतु को भी भूख लगती है और फिर
ये कहते -कहते आप क्यों अश्वमेघ के धुएँ में गुम हो गए ।
अब धुआँ से सिर्फ टप-टप की आवाज आती है तुम नहीं आते!
कवि तुम नहीं आते!

कभी ये भी सोचता हूँ प्रभु कि अगरचे को गरचे कहने का हुनर मुझे क्यूं नहीं आया।

आप कहते हैं कि विश्व का सबसे बड़ा उल्कापात साइबेरिया में हुआ था और मैं कहता हूँ कि यह कवि के हृदय में घटित हुआ था।हमारे बीच अब ये द्वंद जिंदा है और रहेगा ।
यह इसलिए भी लिख रहा हूँ कि जब एक कण में निमित्त शक्ति पृथ्वी का उपहास कर रही होती है तब उसी समय कवि का लिखा एक-एक शब्द ग्रंथों पर भारी पड़ रहा होता है और ऐसा होना जारी रहेगा और जारी रहना भी चाहिए।
इन सब घटित घटनाओं के बावजूद कल जो कम्युनिस्ट था वह आज भी कहीं पनप रहा होगा क्यूँकि दावानल के बाद भी राख में ही सृजन होना प्रकृति है।
नाम बदलेगा पर काम नहीं आदम नहीं ।
यही घटनाएँ आप जैसे कवि को बार-बार छोटे बच्चे के पास ले जाती हैंऔर लिखने को मजबूर करती हैं कि ऊर्जा का सम्पूर्ण  विनाश असंभव है। यह आपने ही लिखा है कि वे एक स्मृति से निकल दूसरी स्मृति में जा ठहरते हैं ।

आप हिंदुस्तान को ट्रेकर और ठेले पर चढ़ते देखते हैं
मैं उसे पहाड़ से ….उतरते और चढ़ते देखता हूँ।

अगर सिबिल कहती है i want to die  तो उसके गोद में बैठा बच्चा मौत से कौन सा सवाल पूछेगा, क्या यह पूछेगा कि मेरी मुस्कुराहट में गर जिंदगी लिखी है तो तुम मौत क्यों मांग रही हो।

शब्दों की बाजीगरी में भाषा एक कीप की तरह प्रयुक्त हो रही है, या आप शब्द को विद्रोही बना किसी मंचासीन दलाल के मुंह पर पिच्च से थूक देते हैं।
आपकी कविताओं में भाषा, शब्द ,कविता अपने-अपने रूप तो बदल रहे हैं पर अर्थ नहीं ।अर्थ वहीं टिका है जहाँ टिका है बुद्ध के साथ बौद्ध और रुद्र के साथ अर्ध चंद्र।

आप यह भी लिखते है कि हँस लो थोड़ा ही सही क्योंकि हँसी  के खोखलेपन का सीधा जुड़ाव भीतर के खोखलेपन से है और वो अभी और गहरायेगा ….

आप लिखते हैं
सजे -सजाए ड्राइंग रूम में लटका रखा है
अपने गाँव को झाड़-फानूस की तरह …..

आपकी कविताओं के प्रतीक हमेशा गाँव से शहर की ओर भागते प्रतीत होते हैं चाहे वो श्रमशील-शोषित औरत हो या हरिकिशुना या फिर यह नृशंस समय, सब की एक ही गति, दिशा और दस्तूर जिन्हें टहलाकर आप अपनी कविता की अंतिम दिशा निर्धारित करते हैं ।मुझे लगता है आप गाँव और बड़े शहर के बीच कहीं फँस गए हैं और विचलित हैं इन दोनों के बीच – हरिकिशुना की तरह और लिख देते हैं कि दरअसल वे बड़े शहर के बड़े होने से नहीं ,अपने छोटे होने पर खफा हैं।और फिर आप हमेशा लौट कर ढूंढते हैं बाघ बहादुर को खुद के अवचेतन में ताकि उनके जैसा सैकड़ों और पैदा हो सके जो जीवन को बचाने का अथक प्रयास करेगा और एक दिन पाटेगा शहर और गाँव की दूरियां।

आप को चुनना था मेनिन्जाइटिस,ब्रेन ट्यूमर या पागलपन में से कोई एक, पर आपने धूमिल,मुक्तिबोध और गोरख के शब्दों को दुःस्वप्न मानते हुए भी चुनना पसंद किया ।

आप अपने आप से अक्सर दुःस्वप्न में मिलते हैं।आपको हरबार किसी सद्यजात बच्चे की पहली रुलाई क्यों सुनाई देती है? फिर आप  चिल्लाते हैं और अपनी दब चुकी चीख को गूँगे हरिकुशना की चीख बताते हैं ।
जब हड़बड़ाकर उठते हैं तो कोहरा आपकी आंखों के भीतर होता है जिसे आप भाप के इंजन का नाम दे देते हैं पर वो उभरता भाप आपकी सोच की ऊष्मा का असर बस है।
उस ऊष्मा के दाब से अंतस के आंतरिक प्रकोष्ठ में तेज रोशनी का पुंज फूटेगा ,अंतःकरण खरोंचेगा और फिर उस भाँप की सीटी की आवाज़ इस संग्रह के माध्यम से संसार सुनेगा और सुनता रहेगा।

यतीश कुमार

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3 comments

  1. शहंशाह आलम

    भाई यतीश कुमार ने पूरी गहराई से यह नोट्स लिखा है।

  2. कुमार विजय गुप्त

    अनिल अनलहातु जी के काव्य संग्रह पर यतीश कुमार जी ने बहुत गहन और बारीक अध्ययन के बाद यह समीक्षा लिखी है , जो कविताओं को काफी खोलती हैं और पाठक के करीब लाती हैं ! बेशक अनिल जी वर्तमान समय के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं , जो पाठकों को कविता के साथ साथ कई विषय के रोचक और ज्ञानवर्द्धक घटनाओं से भी परिचय कराते हैं .इसलिए वे ठहर ठहर कर पढ़े जानेवाले कवि हैं . यतीश कुमार जी ने बिना लाग लपेट के निष्पक्ष भाव से कविताओं के पक्ष को रखा है .आपदोनों को हमारी शुभकामनायें !

  3. प्रभात मिलिंद

    ‘बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ’ मेरा प्रिय कविता-संग्रह है और अनिल अनलहातु मेरे समकालिक प्रिय कवियों में एक हैं. उनकी कविताओं में वैश्विक मानवीय पीड़ा की एक अन्तःसलिला के आनुभूतिक दर्शन होते हैं जिनको पकड़ पाना ‘रीडिंग फ़ॉर प्लेजर’ वाले पाठकों के लिए असंभव काम है. आपने उसे निर्दिष्ट करने का बहुत सफल प्रयास किया है. यह एक गैरपारंपरिक समीक्षा है जो समीक्षा लेखन की चिरंतन परिपाटी और पाठकीय दृष्टिकोण के बीच बहुत बारीक और तकरीबन अदृश्य सी लकीर पर लिखी गई है. इस दृष्टि से यह एक भिन्न बल्कि विशिष्ट समीक्षा है. पाठकीय जिज्ञासाएं और स्वयं उनका समाधान तलाशने का व्यग्र आग्रह इंगित करता है कि समीक्षक ने इसका एकाधिक अन्तरपाठ किया है. इस प्रायोगिक और निष्कलुष विश्लेषण के लिए बहुत बधाई यतीश जी.

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