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यायावारी का शौक़ है तुम्हें?

यह युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय की स्पेन यात्रा के छोटे छोटे टुकड़े हैं। हर अंश में एक कहानी है। यात्राओं पर लिखने का अनुकृति उपाध्याय का अन्दाज़ मुझे सबसे जुदा लगता है। इन अंशों को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा महसूस होगा। लेखिका का एक कहानी संग्रह ‘जापानी सराय’ प्रकाशित हो चुका है-

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मालागा से हेरेज़ दि ला फ़्रोंतेरा – १

मालागा से हेरेज़ दि ला फ़्रोंतेरा की रेल-यात्रा में पेदरेरा में व्यवधान आया।

‘रेल पटरियों की मरम्मत चल रही है। पेदरेरा से बस से ओशुना जाना होगा। वहाँ से सिविया के लिए फिर से रेल।’ कंडक्टर ने स्पैनिश, अंग्रेज़ी और हस्त मुद्राओं के मिश्रण से समझाया।

‘मरम्मत-मशक़्क़त,’ बग़ल की सीट में बैठी महिला  ने कंधे उचकाए। ‘साल भर पहले कोन्फ़्रेस में आई थी, तब भी काम चल रहा था।’

‘साल भर बाद भी चलता रहेगा। ये रैनफ़े है।’ पुरुष सहयात्री बोला। ‘ मैं पाँच साल बाद आया हूँ और कुछ नहीं बदला है!’

रैनफ़े स्पेन की सरकारी रेल कम्पनी है। स्थानीय, अंतरप्रदेशीय, द्रुतगामी सब रेलें रैनफ़े चलाता है। सरकारी उपक्रम है लेकिन लाभ कमाता है।

‘लाभ,’ महिला भर्त्सना में सिर हिलाती है, ‘लाइन मरम्मत नहीं करवाने का कारण ये लाभ ही है, इस लाइन पर ज़्यादा आवाजाही नहीं इसीलिए।’

‘कभी होगी भी नहीं,ख़राब पड़ी रहती है, लोग गाड़ियों से आते जाते हैं। मेरा पिता मुझे लेने आ रहा है पेदरेरा।’

‘और मेरा पति। रेल लाइन ख़राब होने के कारण उसे गाड़ी किराए पर लेनी पड़ी है वरना हम सिविया में मिलने वाले थे।’

दोनों का बोलने का अन्दाज़ अनूठा है। एक की बात पूरी हो उससे पहले दूसरा बोलने लगता है और स्वरों के जाल में शब्द मछलियों से उलझ जाते हैं। महिला डॉक्टर है। ‘ हम सब सुरक्षित हैं, एक पूरी क्वालिफ़ायड डॉक्टर हमारे साथ है!’ पुरुष हँसता है। वे एक सहज बेतकल्लुफ़ी से आपस में बात करते हैं जैसेएक-दूसरे को पहले से जानते हों हालाँकि वे पहली बार ट्रेन में ही मिले हैं। दोस्ताना अकुंठित खुलापन स्पैनिश लोगों के स्वभाव का हिस्सा लगता है। स्त्री-पुरुषों के सामान्य सामाजिक व्यवहार में कहीं निषेध-जन्य झिझक नहीं दिखती।

‘मैं पाँच सालों बाद लौट रहा हूँ…’ पुरुष दोहराता है। रेल पाइरनीज़ के चित्र-लिखे से पहाड़ पार कर मैदान में आ चुकी है। सूखी सुनहरी-कत्थई घास के बीच नाटकीय रीति से सहसा उठते भूरे- पीताभ, स्तम्भों-से चट्टानी उभार और उन पर मँडराते बाजों की जगह अब

ज़ैतून के बाग़ान हैं। पेड़ों के तने लोहे  रंग  हैं और पत्तियाँ गहरी काही-हरी। हवा से पत्तियाँ उलट जाती हैं और उनके हल्के श्वेत पिछले हिस्से झलकते हैं। पेड़ झिलमिलियों में बदल जाते हैं। ‘ऑलिव के ये नाटे पेड़ पहले नहीं देखे…’ वह कहता है।वह पिछले कई सालों से नोर्वे में रहता है। उसकी गर्ल-फ़्रेंड नोर्वे की है।‘नोर्वे अच्छा है, मेरा काम भी वहाँ ठीक-ठाक है। अगले साल शायद शादी करें…’ हमारी बधाइयाँ वह हँस कर स्वीकारता है। यूरोपियन यूनियन ने देशों की सरहदें झीनी कर दी हैं, यात्राएँ सहल और अंतर्देशीय प्यार संभव। वे स्पेन की क़र्ज़-दबी अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी के बारे में बात करते हैं।स्पेन की राजनीति उलझी हुई है। राजशाही के झगड़े और दशकों एक झूठमूठ का गणतंत्र, स्पेन का आंतरिक युद्ध, फ़्रेंको की तानाशाही, प्रदेशों के आपसी तनाव और केटालेन और बास्क़ विद्रोह, रोमन कैथोलिक चर्च का समाज और राजनीति में अंतर्ग्रन्थन – सूची लम्बी और जटिल है।  महिला बार्सीलोना से है, केटेलान प्रदेश से।‘सारा झगड़ा पैसे है,’ वह तर्जनी और अँगूठे को मसलती है। ‘कास्तिले और केटालेन का बस यही मसला है।’

पुरुष कंधे झटकता है, ‘पोलिटिक्स…’

रेल छोटे स्टेशनों से गुज़र रही है – अल जाइमा, पिज़्ज़ारो, आलोरा। पिज़ारो के स्टेशन पर एक कोने में दीवार पर छोटे हाथों के छापे हैं। काले छापे जिन पर सफ़ेद अक्षरों में लिखा है ‘लूसिया’ । उनके पास खिलौने, काग़ज़ के फूल और बुझी मोमबत्तियाँ एक क़तार में रखे हैं लूसिया नाम की किसी बच्ची की याद में।हेरेज़ का प्राचीन नगर अभी दूर है।

एनरीको का पिज़्ज़ेरिया

‘मैं यहाँ एक गर्मी बिताने आया था। ये बीस साल पहले की बात है!’ एनरीको ठठा कर हँसता है। उसके लाल लाल गाल और उभर आते हैं, गुलनार चेहरे में रक्त और तेज़ी से दौड़ता है।

हेरेज़ दि ला फ़्रोंतेरा छोटा सा शहर है। कादीस सा पुरातन नहीं, न आरकोस सा बीते समय में रुका हुआ। हेरेज़ का अपना विशिष्ट आकर्षण है, अपनी मंथर सुंदरता जहाँ जीवन की गति किसी धीमी, भूली रागिनी पर बहती है। हेरेज़ दि ला फ़्रोंतेरा यानि सरहद वाला हेरेज़, यूरोप में मुस्लिम और ईसाई प्रभावों कीसीमा पर बसा। एंडालूसिया प्रोविंस के कई अन्य शहरों की तरह सात सौ शताब्दियों चलने वाले ऐश्वर्यशाली मुस्लिम शासन में बना- पनपा और ईसाइयों द्वारा बारहवीं शताब्दी में जीता गया। एंडालूसिया के शौर्य और पुरुषार्थ का गढ़, फ़्लेमेंको के अद्भुत नृत्य के इतिहास का हिस्सा, शैरी-वाइन और घुड़सवारी कीकला के लिए प्रसिद्ध – हेरेज़।

हम हेरेज़ में शाम-पड़े पहुँचे। इमारतों के प्राचीन पत्थरों, ओस्ट्रेलियन बरगद, नारंगी और नील-अमलतास के पेड़ों, प्लाज़ा और गलियों में दिन तब भी पीली आभा में दमक रहा था। ग्रीष्म-मध्य का लम्बा दिन, रात दस बजे ढलने वाला। कथीड्रल के प्लाज़ा में ख़ुशनुमा रेस्तराँ में शाकाहारी खाना नहीं मिला लेकिनमददगार दोस्ताना लोग मिल गए। शाम और तापास व्यंजनों का लुत्फ़ उठाने आए एक परिवार ने एक स्त्री को आगे किया। उसने सिर, कंधों, बाँहों को हिला कर जताया गया कि उसे अंग्रेज़ी आती है । हमने भी अपने भिक्षु-कोष से इनी-गिनी स्पैनिश निकाली और ‘सोमोस वेजितारिआनोस’ का नारा बुलंद किया।गर्दनें ज़ोर-शोर से हिलने लगीं, हाथों के इशारों और बातों की झड़ी लग गई। अंत में वह स्त्री हमें बाँह पकड़ कर गली के छोर पर ले गई और इंगित से एनरीको के पिज़्ज़ेरिया की ओर जाने वाला रास्ता दिखाया।

एक सँकरी, पीली दीवारों वाली गली में पूरा कोना छेंके, दो द्वारों वाला पिज़्ज़ेरिया। पके सूरज की मद्धिम ऊष्मा वाली नर्म धूप में गली की दीवारें और एनरीको के भोजनालय का नीला दरवाज़ा जैसे वॉन गोह की किसी तस्वीर से निकला था। स्पेन में रात्रि-भोजन के लिए अभी देर थी। यह शैरी की चुस्कियों के साथ[तापस] खाने और मित्रों-परिजनों से बतियाने का समय था और हम एनरीको के पहले ग्राहक थे। ‘ग्राहक नहीं, मेहमान! तुम्हारे लिए कुछ ख़ास बनाऊँगा। तुम मेरी एक दोस्त सी दिखती हो! तुम्हें सचमुच स्पैनिश नहीं आती?’

एनरीको इतालवी है। वह और उसकी पत्नी मिल कर पित्ज़ेरिया चलाते हैं। एनरीको स्वयं ख़ास व्यंजन बनाता है।उसकी पीत्ज़ा लोकप्रिय हैं और शाम को रेस्तराँ भर जाता है। एक साथ तीसेक लोग और एनरीको और उसकी पत्नी के अतिरिक्त एक सहायक, एक बार-टेंडर मद-वितरण के लिए और दो वेटर, कुलइतने कर्मी। लेकिन कहीं भौंहें नहीं चढ़तीं, आवाज़ें तुर्श नहीं पड़तीं। हेरेज़ में किसी को खाना परसे जाने की जल्दी नहीं। लोग वाइन और बातों में तृप्त, एंतीपास्ती के लघु-व्यंजनों और मुख्य व्यंजन के लिए धीरज से प्रतीक्षा करते हैं।

‘मैं इटली में जन्मा और मेरी बीवी ब्राज़ील में बुएनोस आयर्स में। हम इटली में मिले, नेपल्स के जादुई समुद्र-किनारे।वहाँ समुद्र की रेत को लहरों से प्यार है तो हमें प्यार कैसे नहीं होता?’ वह हँसा। एप्रन बाँधती उसकी पत्नी भी।

‘इटली में रेस्तराँ चलाना मुश्क़िल काम है। तरह तरह की अनुमतियाँ, सिटी म्यूनिसिपैलिटी से, दूसरे विभागों से भी। बहुत महँगा है, सबको कुछ न कुछ चाहिए,’ वह मध्यमा और अँगूठा मसलता है। ‘यहाँ आया तो यहीं बस गया। लेकिन पकाने का सामान इटली से मंगवाता हूँ, मेरे गाँव के टमाटर!’ वह अंगुलियाँ कागुच्छा बना, उनके पोर चूमता है। ‘और आज ही ताज़ा बुर्राटा चीज़ आया है। केवल हफ़्ता भर टिकता है, तुम्हारे लिए पीत्ज़ा बनाऊँगा। तुम वाइन नहीं पीतीं? कोई बात नहीं, ख़ास नींबू पानी, ख़ालिस अमृत।’ वह अपनी पत्नी की तरफ़ मुड़ता है। वह जग में बर्फ़ डाल रही है और नींबू और नारंगी की लम्बी तराशें। ‘अबये सब सीख गई है, सारी गुप्त रेसिपीज़। मुझे इसके भाग जाने का अब जवानी के दिनों से ज़्यादा डर है!’ उन दोनों के ठहाकों से कमरा गूँज उठता है। बाहर सीगल्स पुकार रही हैं और शाम के रंग उभरने लगे हैं।

पलॉसीओ देल विर्रे लसेरना 

सादा सफ़ेद दीवार में पीले पुराने पत्थर का गृह-मुख और बंदनवारों की नक़्क़ाशी वाला चौखट है। भारी काष्ठ-द्वार खुला है और भीतर पुराने संगमरमर का फ़र्श उतरती मध्याह्न में एक मृदु दीप्ति से चमक रहा है।हेरेज़ के महिमाशाली कथीड्रल, इग्लेसियस दि सैन मिगेल और सैंटीआगो के विशाल चर्च, पुराने क़िले केभव्य खंडहरों के बाद ये अग्रभाग साधारण लगता है लेकिन तोरण के ऊपर सामंती चिन्ह लगा है और गली का नाम है कॉनडे दे ऐंडीज़, ऐंडीज़ के सामंत की गली।

ये पलॉसीओ देल विर्रे लसेरना है, पेरू के अंतिम स्पैनिश वाइसरॉय लासेरना और एंडीज़ के काउंट का महल।

स्वागत कक्ष में मेज़ के पीछे बैठी लड़की झबरे बाल झटक कर मुस्कुराती है, ‘तुम लोग ठीक समय पर आए हो, महल का अगला टूर कुछ ही मिनटों में है।’

स्वागत कक्ष काँच के विभाजक से दो भागों में बँटा है। दूसरा हिस्सा लम्बे गलियारे जैसा है जिसकी भिक्षुणी के चोग़े सी श्वेत दीवारें तक किसी भी सजावट से रहित हैं। गलियारे के रीते श्वेत अंतराल में एक अत्याधुनिक डिज़ाइन की पारदर्शी प्लास्टिक की मेज़ धरी है जिस पर रखे लैपटॉप पर एक आदमी काम कररहा है। हमारे अलावा स्वागत कक्ष में कोई और दर्शनार्थी नहीं है। ‘सुबह के टूर में कई लोग थे। स्पेन अनूठा है, सैलानी भी स्पैनिश सीएस्ता लेना सीख जाते हैं!’ झबरे बालों वाली युवती हँसती है, ‘विश्वास करो, स्पेन सा कोई देश नहीं। मैं हेरेज़ में पली-बढ़ी हूँ मगर दुनिया देखी है,  पूरा यूरोप और साल भर यू.एस.मेंभी रही हूँ लेकिन स्पेन बस स्पेन है…’ वह कंधे हिलाती है।

यायावारी का  शौक़ है तुम्हें?

वह फिर हँसती है। ‘शायद। नौ महीनों से फ़िनलैंड में थी, इसी महीने लौटी हूँ।’

नौ महीने? क्या नौकरी के लिए या कोई और कारण?

‘न, बस यूँ ही!’

ठीक कहा, कहीं भी जाने के लिए कोई कारण क्यों हो? कारण तो लौटने के लिए चाहिए, नहीं?

वह हाथ में थमी क़लम घुमाती है। ‘शायद। लेकिन मैं क्यों लौटी, यह कह नहीं सकती। एक दिन मैंने बिल्कुल साफ़ ढंग से महसूस किया कि अब लौटना चाहिए।’

तुम यहाँ से जाने के लिए गईं और लौट आने के लिए लौट आईं, ये अपने आप में समुचित कारण हैं।

वह मुझे ग़ौर से देखती है। कहीं घड़ी के घंटे बजने लगते हैं। ‘ओह… चार बज गए, टूर का समय… बड़ी दिलचस्प बात बीच में रह गई…’

लैपटॉप पर काम करता व्यक्ति उठ आता है। वह घर का भीतरी द्वार खोलता है और बाँह लहरा कर हमें भीतर आमंत्रित करता है।

‘मेरे घर में तुम लोगों का स्वागत है।’ हमें महल दिखाने वाला एंडीज़ का नवाँ काउंट है, हेरेज़ के एक बड़े पुराने पुख़्ता ख़ानदान का उत्तराधिकारी। वह लम्बे क़द का है और उसके रक्तहीन संपुट होठों पर शालीन मुस्कान है। उसकी हरी टी शर्ट घिसी-पुरानी लगती है और उसके जूतों के तले अलग हो रहे हैं।इसकेबावजूद वह किसी मध्यकालीन तस्वीर में अँके स्पैनिश ग्रैंडी सा दिखता है – पीछे को सँवारे भूरे बाल, आँवले-सी हरी आँखें और उभरी हड्डियों वाले गाल। कल्पना की जा सकती है कि उसका कोई पूर्वज, गहरा लाल लबादा पहने स्पेन के कुख्यात धार्मिक न्यायालय की पीठिका पर बैठ वाद निबटाता होगा और कोईश्वेत कंठ-वस्त्र और काले कसे कोट, तंग ब्रीचेज़ और चमड़े के चमकते बूटों में घोड़ा दौड़ाता होगा। बाद को हमने घर के भीतर इस कुलीन वंश के सबसे विख्यात पुरुष,एंडीज़ के पहले काउंट और पेरू के आख़िरी वाइसरॉय, की तस्वीर देखी, क्रवाट, काले कोट और रंग-बिरंगे तमग़ों समेत। उसकी दर्प-तिरछी आँखोंऔर पीत मुख पर अनुशासित दमन और क्रूरता की झाईं थी। ‘एंडीज़ के पहले काउंट को पेरू छोड़ना पड़ा था, दुर्भाग्य से पेरु और अमेरिका  के दूसरे देश स्वतंत्र होने लगे थे।’ वह निर्व्याज भाव से कहता है।

‘हमारा यह घर तेरहवीं शताब्दी से हमारे परिवार के पास है। उससे पहले यह किसी मुस्लिम सामंत का रहा होगा। दसवें ऐल्फ़ॉन्सो, जिसे उसकी प्रज्ञा के कारण सेज कहा जाता था,  ने हेरेज़ की विजय के बाद यह हमारे पूर्वजों को दे दिया।’ उसका चेहरा निर्विकार है।’घर में अब भी अरब शिल्प के चिन्ह हैं। दीवारों मेंये पुराने कुंड मिले हैं,’ वह इंगित से ख़ूब पकाई मिट्टी का रंग-उड़ा, बड़ा कलसा दिखाता है, ‘इन्हें दीवारों में उल्टा चिना जाता था और इनके भीतर क़ैद हवा दीवारों को ठंडा रखती थी। यह शायद ज़नाना आँगन था, ऊपर से खुला हुआ, मेरे पूर्वजों ने इसे काँच से ढाँक दिया। वह देखो, काँच पर मेरे वंश का कोट ऑफ़आर्म्स। इधर दीवार पर लगा यह लाल-नीला पैनल अरबकालीन है, हमने जब महल का विस्तार और मरम्मत की तो ये दीवारों पर से हटा दिए गए।’

इतिहास हालाँकि विजेताओं का होता है लेकिन शताब्दियों पहले लूटे गए इस घर में विजित जाति की अपूर्व प्रतिभा झलक रही है। चौड़ी दीवारों में चिने कुंड, महल के बीचोंबीच धूप और हवा न्यौतता खुला दालान और पत्थर तराश कर बनाई गईं ख़ूबसूरत लाल-नीली जालियाँ विजित अरबों की अर्हता दिखाते हैं।काँच पर अँके स्पेन के राजा द्वारा स्वीकृत वंश-चिन्ह के रंग बुझे से लग रहे थे और कमरों में सीलन और धूल की उदास गंध है।

‘यह रोज़ रूम है, यह बैठक,’ वह एक के बाद एक कमरों की बत्तियाँ जलाता है। कमरों में नफ़ीस साजो-सामान है – चीन की पौट्री, इंग्लिश घड़ियाँ, फ़्रेंच कुर्सियाँ, टर्की और ईरान की टेपेस्ट्री, चित्र, मूर्तियाँ, इतिहास। ‘यह मेरी दादी की तस्वीर है, यह मेरी माँ की। यहाँ मेरे पिता राजा से हाथ मिला रहे हैं और यहाँ मैं, दोनों अपनी अपनी पीढ़ी के राजाओं के साथ। यह महल का सबसे पुराना बारगेनिया है।’ जगह जगह हाथीदाँत और सीपियों की पच्चीकारी के काम वाली ये नाज़ुक, छोटी बारगेनिया अलमारियाँ धरीं हैं। हर बारगेनिया में एक गुप्त कोष्ठक होता है। ‘इसमें भी है लेकिन हमारे परिवार में से कोई उसे नहीं ढूँढ पाया है।यह चित्र देखो, एक विख्यात पेंटर ने बनाया है। वह सिर्फ़ खंडहरों के चित्र ही बनाता था, उसके बनाए सारे खंडहर काल्पनिक हैं, एक भी सच्चा नहीं।’ धूमिल, गहरे रंगों वाला चित्र विगत वैभव और क्षय की छायाओं से घिरे कमरे की दीवार पर टँका है। चित्र में गिरती दीवारें हैं और पृष्ठभूमि में रोम का ध्वस्तकोलोसियम।

हम एक छोटे उद्यान में निकल आते हैं। घर की ही तरह उद्यान में भी पूर्व और पश्चिम की मिली-जुली सौंदर्य-चेतना है – बेहिसाब बढ़ते नारंगी और नींबू के वृक्ष और चमेली की अनफूलती लतरें। लॉन में जँगली घासें उगी हैं और पैर-बाग़ के पत्थरों में दरारें हैं। हर ओर वनस्पतियों और नारंज वृक्षों की हरी-नारंगी, धूप-पगी गंध है। ये उद्यान बीते कालों में देखे गए सपने की स्मृति सा है। ‘यहाँ सितम्बर माह में  नाटक रचे जाते हैं, शेक्सपियर के सभी नाटक, रोमियो जूलियट के अलावा,’ वह किफ़ायत से मुस्कुराता है, ‘रोमियो जूलियट वहाँ होता है, नए  विंग में।बालकोनी में जूलियट और नीचे रोमियो।’

नया विंग माने चौरानवे वर्षों पहले बनाया गया दुमंज़िला। ‘स्पेन का हर राजा हमारे महल में आ कर ठहरा है। नए भाग में तेरहवाँ ऐल्फ़ॉन्सो अपने राज-समाज के साथ ठहरा था। तुम भी ठहर सकते हो। वे कमरे किराए पर उपलब्ध हैं।’ सीढ़ियों पर अलाबास्टर के प्रतिमाएँ धूप पी रही हैं। ‘ये मेरी दादी की मूर्ति है जबवह एक छोटी लड़की थी…’ टूर समाप्त हो गया है। हम वापस स्वागत कक्ष में हैं। ‘ये चुंबकीय टायल हेरेज़ का एक कलाकार बनाता है। मैं स्थानीय कलाकारों की तस्वीरें भी दिखा सकता हूँ यदि तुम ख़रीदना चाहो।’ दो सौ साल के कुलीन वंश के इतिहास का कुलाधार सात सौ वर्ष पुराने घर के अग्रहार में स्पेन कीदरबारी रीतिनुसार मेरे हाथ को अपने दोनों हाथों में ले कर झुकता है।

हेरेज़ का स्टेशन

हेरेज़ के ट्रेन स्टेशन पर बंदूक़ों की आवाज़ गूँज रही है। सेमी ओटोमैटिक हथियार की भट-भट और स्नाइपर राइफ़ल की पुट-पुट। दोनों योद्धा पैंतरे बदलते हैं और प्रतीक्षा-गृह के मोज़ाइक वाले फ़र्श पर उनके दौड़ते पैरों की आवाज़ गूँजती है। एक पस्त है, रुक कर दम लेता है और पानी पीता है। दूसरा घुटने के बलज़मीन पर गिर अपनी राइफ़ल साधता है। पुट-पुट की अनुगूँज और पहला योद्धा भहरा कर गिर पड़ता है। पहले अस्फुट और फिर खुल कर किलकारियाँ लहराती हैं। घुटनों के बल झुका योद्धा कूद कर खड़ा हो जाता है और हाथ में थमा काल्पनिक हथियार कमर में खोंस लेता है। गिरा हुआ योद्धा उठता है और अपनीकाल्पनिक मशीन गन फेंक देता है। विजेता योद्धा का पिता टिकट ख़रीद चुका है। वह अपना नीला बस्ता उठाता है और अपने पिता के पीछे चल देता है। प्रतीक्षा गृह के द्वार पर पीछे मुड़ वह अपने कुछ पल के साथी को हाथ हिला विदा कहता है। दोनों बच्चे हँसते हैं। मुझे  अपनी ओर देखता पा पराजित योद्धा झेंपजाता है और अपनी माँ के बाँह में मुँह छुपा लेता है। प्रतीक्षा गृह में खिलखिलाहटों के बाद की ख़ुशनुमा शांति छा जाती है।

स्टेशन की दीवारों पर एक विशाल चित्र है – स्पेन के राज घराने के शाही चिन्ह, ग्रीवाएँ मोड़े ग्रीक निम्फ़्स और चारों तरफ़ बलखाते बेल-बूटे, पीली रंग-संयोजना वाले। ये चीनी-मिट्टी के टाइल्स से बना हैं या भित्ति-चित्र है? गर्दन बढ़ा और आँखें गड़ा कर ताकने के बावजूद जानना कठिन है। कहीं जोड़ नज़र नहीं आते।शायद दीवार पर चित्र ही बने हैं।

‘न, टाइल्स हैं।’

मैं मुड़ कर देखती हूँ। छोटी, चमकती आँखें, जबड़े की तीखी कटी रेखा से ज़रा नीचे आते काले-श्वेत बाल, सफ़ेद ब्लाउज़ और बिस्कुटी रंग की पतलून और कंधे पर ओवर-नाइट बैग। वह मुस्कुरा रही है। लाल रँगे होंठों में से दंत-पंक्ति और चेहरे की झुर्रियों में से एक उत्सुक भोलापन झाँक रहा है।

‘माफ़ करना तुम दोनों की बात सुनने और बीच में पड़ने के लिए!  ये एंडालूसिया के प्रसिद्ध टाइल्स हैं, अजूलेहोस टाइल्स। एक विशेष विधि से बनते हैं। ये वाले बहुत पुराने हैं। हेरेज़ का रेलवे स्टेशन एंडालूसिया में सबसे पुराना है। 1854 में बना था शैरी वाइन के काष्ठ-पात्र स्पेन भर में ले जाने के लिए।’

उनका नाम लूसिया है। कादीस जा रही हैं सप्ताहांत के लिए। कोलम्बिया से हैं।

‘अब तो यहीं से समझो। बीस साल से हेरेज़ में हूँ। सब छोड़-छाड़ कर आई थी कार्तागेना दि इंदीयास से।’

घर-परिवार छोड़ कर उतनी दूर दक्षिणी अमेरिका से यहाँ स्पेन में? कोलम्बिया अरसे तक स्पेन का उपनिवेश था । भाषा और संस्कृति के साम्य के कारण शायद?

‘अँह, शायद। मेरे शहर की दीवारें, समुद्र की खारी गंध और पोर्ट की ओर खुलती सब गलियाँ बिल्कुल कादीस जैसी हैं। लेकिन उस समय यह नहीं सोचा था। उस समय तो बस कोलम्बिया से दूर निकल जाना चाहती थी। एक बेहद कठिन डाइवोर्स से गुज़री थी…’

ट्रेन लगभग बेआवाज़ आती है। उन्होंने हमारे लिए सीटें रोक ली हैं। खिड़की से सुनहरी-कत्थई सूखती घास और नमक के छिछले जलकर दिखाई देते हैं।

‘एक लगभग अविश्वसनीय बात बताना चाहूँगी… तलाक़ के बाद मैं एक महीने अस्पताल में थी। नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था… बेहद कठिन समय… तब एक दोस्त ने ध्यान और योग के बारे में बताया। उसके घर एक गुरु आए थे, आनंदमार्ग के।मैं उस पंथ के बारे मैं कुछ नहीं जानती…’ उनकी आँखें कुछ झँपी, ‘लेकिन उस मुश्क़िल वक़्त में मेडिटेशन मेरे लिए जीवनी-शक्ति बन कर आया। मैंने कोलम्बिया छोड़ने का तय किया। स्पेन रवाना होने के एक दिन पहले मेरे घर की घंटी बजी और दरवाज़े पर एक आनंदमार्गी भगवा कपड़ों में। बोला – तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ, तुम्हारी यात्रा सहल बनाने के लिए। मैंने पूछा तुम्हें कैसे पता मैंयात्रा पर निकल रही हूँ तो बस हँस दिया। बोला इस चीज़ को हमेशा अपने साथ रखना…’ उन्होंने हमारी ओर ग़ौर से देखा। ‘तुम सोचते होंगे – सिरफिरी औरत है…’

मैं गर्दन हिलाती हूँ। क़तई नहीं।

‘वह एक तस्वीर दे गया, आनंदमूर्ति की। मेरे पास है, हर दिन ध्यान करती हूँ। लेकिन आज तक जान नहीं पाई कि उसे कैसे पता चला की मैं कहीं जा रही हूँ… ‘

मैं नहीं कहती कि शायद तुम्हारी दोस्त ने बता दिया हो या यात्रा वाली बात उस व्यक्ति ने  जीवन के लिए घिसे-पुराने चलताऊ मुहावरे के रूप में प्रयोग की हो। दुःख में कोई संबल चाहिए, असहनीय को कुछ सह्य बनाने के लिए। गिरने वाला कुछ भी थाम लेना चाहता है, चंदन-काष्ठ की लाठी हो या काँटों वालीझाड़ी। लेकिन आनंदमार्ग? उन लोगों पर अपने ही अनुयायियों को मारने का आरोप साबित हुआ था।

‘ख़ैर मैं उस बारे में कुछ नहीं जानती। आनंदमार्ग से कोई सम्पर्क नहीं अब। देखो, कादीस का समुद्र-तट! अटलांटिक यहाँ उछल-कूद करता, शोर मचाता सागर नहीं है। आसपास द्वीप हैं और तट यहाँ मुड़ता है, सो इसकी चाल मद्धम है।’

बाहर अटलांटिक का शांत-मधुर, छोटी-छोटी लहरियों से लचकता विस्तार है। नील-हरित, धूपालोकित। मालागा में देखे मेडिटरेनियन सागर के नीलमणि-नील, नगाड़े बजाती लहरों वाले ज़ोर-शोर समुद्र से भिन्न।

‘मैं बीच पर ध्यान करने आऊँगी…’ वे कहती हैं। ट्रेन रूकती है और वे हमें बाहुओं में भर कर चूमती हैं। ‘संयोग कुछ नहीं होता। हम फिर मिलेंगे। मेरा घर तुम्हारा घर है, इस राह आओ तो कहना।’

मालागा से हेरेज़ दि ला फ़्रोंतेरा – २

सिविया का स्टेशन नया है और पहचान-रहित, रूखा-फीका, यूरोप के किसी भी मध्यम आकार के शहर के स्टेशन सा – चमकता फ़र्श, खान-पान-कपड़ों-सामान की दुकानें, ओटोमैटिक दरवाज़े।इलेक्ट्रॉनिक सूचनापट्ट पर ट्रेन के समय और प्लेटफ़ार्म जुगनू से जल-बुझ रहे हैं। एक कपासी बालों वाले चुस्त-दुरुस्त वृद्धचमड़े का छोटा बैग लिए क़दम-ताल से चले आ रहे हैं। हैट और छड़ी से लैस एक अन्य फ़ुर्तीले वृद्ध ने उन्हें हेला दिया। बैग वाले वृद्ध ने क़दम रोके और छड़ी वाले वृद्ध ने बढ़ कर उनके हाथ थाम लिए। दोनों खुल कर हँस पड़े। दो पुरुष प्लेटफ़ार्म की ओर जाते-जाते रुक गए। चारों जन स्टेशन की भीड़ में रास्ता छेकेहँसने-बतियाने और एक साथ तस्वीरें खींचने लगे। आते-जाते लोग मुस्कुरा कर बग़ल से बच कर निकलने लगे। सहसा इस दूरस्थ, विदेशी स्टेशन में एक परिचित ऊष्मा प्रकट हुई।

ट्रेन में बग़ल की सीटों पर तीन लड़कियाँऔर उनकी माँ बैठे हैं। तीनों लड़कियों  उम्र पाँच से दस सालों के बीच है। सबसे छोटी लड़की ऊँची-पतली आवाज़ में बार-बार माँ को सम्बोधित करती है। बीच वाली लड़की होंठ गोल कर खिड़की के काँच में अपने प्रतिबिंब की ओर चुम्बन उछाल हँसती है। सबसे बड़ी लड़की चुपचाप किताब पढ़ रही है। किताब स्पैनिश भाषा में है। अंतिम पन्ने हैं। उसका समूचा सत्व आँखों में केंद्रित है। आस-पास बिला गया है। वह उस ट्रेन में नहीं है, काग़ज़ के सरसराते पन्नों में सबसे भिन्न यात्रा पर निकली है। आख़िरी पृष्ठ पर वह कुछ देर ठिठकी रहती है। फिर किताब बंद कर गहरी साँस लेती है।उसकी आँखें धीरे-धीरे दूर से लौटतीं हैं। वह बीच वाली लड़की पर एक उड़ती नज़र डालती है। उसके हाथ में एक लकड़ी की पहेली है – फ़्रेम में लकड़ी के टुकड़े हिला-डुला कर अलग-अलग शब्द बनाने वाली। बड़ी लड़की की भौंहें सिकुड़ती हैं और वह पहेली छीन लेती है। बीच वाली लड़की की अँगुली पहेली के दोटुकड़ों में फँस गई है। वह फूट कर रो उठती है। छोटी लड़की  के साथ चित्र में रंग भरती माँ आँखें उठाती है और बड़ी लड़की के हाथ से पहेली ले लेती है। बीच वाली लड़की अपनी अँगुली सहलाती, भीगी पलकें झपकाती है। छोटी लड़की का स्वर नई ऊँचाई चढ़ता है। उनकी माँ और मेरी दृष्टि मिलती है। हम मुस्कुराते हैं। बड़ी लड़की फिर खो गई है। उसके बिसूरे होंठ नर्म पड़ गए हैं और आँखें अदीखते दृश्यों में खो गई हैं। अगला स्टेशन हेरेज़ है।

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2 comments

  1. अनुकृति ने यात्रा संस्मरण को ताजगी और ऊँचाई दी है। बधाई अनुकृति, प्रभाय रंजन तथा जानकीपुल।

  2. anukrti upadhyay

    बहुत आभार 🙏🏽🌸

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