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राजेंद्र राव के कहानी संग्रह ‘कोयला भई न राख’ पर यतीश कुमार के नोट्स

वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव के कहानी संग्रह ‘कोयला भई न राख’ पर कवि यतीश कुमार के कुछ नोट्स अपने आपमें कहानियों की रीडिंग भी और एक मुकम्मल कविता भी। उनके अपने ही अन्दाज़ में- मॉडरेटर
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कहानियाँ मुसलसल चलती हैं
मुकम्मल होना इनका कभी भी तय नहीं था।
ये कवितायें नहीं थीं।
ये कहानियाँ जलने और बुझने के बीच भटक रही हैं जिसकी टीस आपको बेचैन कर देगी। पढ़कर लगेगा
प्रेम अपनी यात्रा में हमेशा के लिए निकल पड़ा है और वह जितनी यात्रा  तय करता है उसकी मंजिल उससे दो कदम और ज्यादा  और यूँ ही मुसलसल चलती जा रही है।
कहानियों में
सफेद कबूतरों के जोड़े सा
 दो उजले पाँव दिखते है उन्हें शफ्फाक और
आसमान में धुले बादल भी ,
दरअसल वो प्रेम में बेचैन लेखक की नज़र है जिन्हें
मीरा की बेचैनी
अनवरत इंतजार में बदलती दिखती है।
 विशद प्रश्न यह है कि मानो प्रेम का
 होना उसका “ना होना”-सा हो गया है।
कहानी लिखने के क्रम में लेखक कुछ सिरों को खुला छोड़ देतें  हैं और कहानी अपने आप बढ़ती रहती है ।आप को कुछ पलों के लिए अपने अनसुलझे प्रश्नों के साथ रहना पड़ता है।
इस यात्रा में वो सिरा कब अचानक अपनी सही जगह पर आ मिलता है पता भी नहीं चलता। ये है लेखक की जादूगरी और फिर आपको कथाकार की सृजनात्मकता का आभास विस्मय से भर देता है।
अजीब समस्या है कि
बत्ती बुझ गयी
मन अनबुझा रह गया है
शरीर जल रहा है
बुझ जाने की आकांक्षा लिए।
कहानियाँ कहती हैं
चुनना है तुम्हें
तिल-तिल जलने का सुख
और एक दम जल जाने के बीच
समझना ये भी है कि
एक रात में दो तारीख का मसला क्यों है
ये कभी दिन में नहीं होता
मसला तो कमबख्त रातों के संग ही होता रहा है
कहानियाँ रात में कत्थई से गाढ़ी काली क्यूँ हो जाती हैं?
उनकी कहानियों में पढ़ते वक्त मन पिराता है
और वह  लिखते हैं
क्षणांश में लिया निर्णय
उम्र भर कचोटता रहेगा
और पढ़कर लगा
उफ्फ पानी भी जलकर बादल ही बनेगा
बस खौलते पानी को
एक जगह मिलने की देरी है।
कहानियों के टुकड़े मुझसे बातें करने लगते हैं और लकीर बनने लगती है ।लकीर परिधि का घेरा बनाने की कोशिश करते हैं। जो सब कुछ से,न कुछ होकर ,फिर कुछ की ओर जा मिलती है और फिर अर्ध वक्र बन कर खुला निमंत्रण बन यूँ ही कटी फाँक बनी रह जाती है।जहाँ पर खारे जल जमाव के लिए  रिक्त स्थान अभी भी बाकी है।बरसों तलक भरते और बादल बनते रहना  भी एक परिधि चक्र ही तो है….
और वो रिक्त सिरा जहां से खारा रिसता है
वहाँ लिखा है
मैं वहीं हमेशा की तरह
सुने घर वाली सुहागन बनी रहती हूँ
और वृत्त में अभी भी इंतजार का कोण
 कटा हुआ है और शायद चित्त में भी।
राजेन्द्र जी
यह सब आपकी कहानियों ने मुझसे लिखवाया है।सायास नहीं अनायास हुआ सब कुछ।
आप लिखते हैं
स्प्रिंग डोर न होते हुए भी
 कुछ दरवाजे हमेशा
बंद रहने वाले दरवाजे होते हैं।
और मैं कहता हूँ
कुछ दरवाजों का महज खुले रह जाना
किसी के आने की संभावना के
 संकेत भी हो सकते हैं।
साज का क्या है
धुन की बात होती है
और उसके लिए खुद की धुन पहले होनी चाहिए।ऐसी धुन जो आपको मलंग बना दे ।
कितनी आसानी से आप कहते हैं
कि उसे हज़ारों लतीफे आते थे
और मुझे हँसना
पंक्तियाँ इतनी खूबसूरत हैं कि खुद ही बात करती हैं कहती हैं
तुम्हें छोड़ हर नए ने
पुराने जैसा वर्ताव किया
इन बड़े- बड़े सीपियों में
दो काले आबदार मोती
बस ऐसे कि अभी  ढलक जाए!
सफेद त्वचा पर फैली नीली नसें
मानो स्याही से आँका गया नक्शा
बारिश में धुल कर हल्का हो गया पर
तुम्हारे काले मोती के आब कम न हो सकें
सचमुच निरापद पुस्तकों में कितने विचलित करते हुए शब्द बसते हैं।
अपनी नहीं आपकी छटपटाहट को गतिमान करने के लिए ।
लिखते हैं
राशन अब थैलों और बोरों में नहीं आता
कागज के लिफाफों या पुड़ियों में आता है।
वह मुर्दा गोश्त के बदले जिंदा गोश्त मांगता था
वह मुस्कुराता बहुत है पर खुलता कम है
जरूरी नहीं कि हर कहानी अपना निष्कर्ष भी तय कर सके । जैसा कि इस संग्रह के शीर्षक में ही निहित है और सारी कहानियाँ मूलतः इस पर खड़ी भी उतरती हैं।जलने और राख होने के बीच विचरित करती हैं ये कहानियाँ।पागल और नीम-पागलपन के बीच की व्यथा ।
कुछ कहानियों में जीवन का दर्शन रूप भी बदल जाता है ।जैसे खिड़की के दराज से राह बाहर की दिखती है
और भीतर की छुपती है
यूँ दराज अच्छे हैं
पर अगर सही नज़र हों तो वही दराज बाइस्कोप का नज़ारा दिखाते हैं जिसे लेखक की कलम घुमाती रहती  है।
ये कहानी संग्रह ऐसी ही कहानियों का गुलदस्ता है जिसमें रह-रह कर कांटे भी  उभरे हुए सिमटे पड़े हैं और जिन्हें खुली खिड़की नहीं खिड़की के दराज से देखना ज्यादा संभव है ।
लिखते हैं राह देखते- देखते तो वह एक दिन पथरा गई
पिघलाया गया तो गल गई।फिर बन न सकी।
उसके पास कर्म के नाम पर बस मूक देखना है
सर्कस पर केंद्रित अलग अलग किरदारों को केंद्र में रखकर पाँच कहानियाँ बुनी गई है।सभी कहानियाँ सर्कस के अंदर की मनोस्तिथि और भावनाओं की उधेड़बुन से गुजरती हुई साफगोई से अपनी बात रखी है।
इनसे हटकर एक कहानी को पढ़ कर लगा
घर के अंदर भी जमी हुई झील होती है
ठंडी छिछली झील।
रात वीराने में आंधी और झील का युद्ध एक निर्वात रचता है।जहाँ अंत में सिर्फ सुबकियाँ तैरती हैं
सुबुक -सुबुक की आवाज
प्रथम चाँदना के साथ डुबुक -डुबुक करने लगता है।
सुबुक और डुबुक का चक्र किसी व्यक्ति विशेष के अंत पर निर्भर नहीं
इसकी चाल आदि काल से चल कर
अनंत काल की ओर चल रही है।
इस अथक चाल में दुःख, संवेदनाएं और सिहरन देह की अंतर्यात्रा पर निकलते हैं और यह सफर जारी है।
असंलग्नता में भी नवीनता का अहसास लिए।
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पुस्तक का प्रकाशन राजपाल एंड संज प्रकाशन ने किया है। 
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11 comments

  1. यतीश जी शब्दों से संवेदना का अद्भुत चित्रांकन करते हैं , वाकई शानदार लेखन हुआ ।

  2. लता कुमारी

    एक कहानी संग्रह की कवितात्मक समीक्षा अनूठा प्रयोग है और कहानी पर पाठकों को वापस लाने का सुहृदय प्रयास।

    मैंने दो बार इस कविता को पढ़ा और पाया कि कहानी संग्रह से ज्यादा जोरदार उसकी समीक्षा ही है। व्यावसायिक पत्रिकाएं एक पैराग्राफ में पूरी आलोचना समेट देती हैं और सीमित शब्दों की चौहद्दी में ही रहती हैं। लेखन का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता।

    यहां कवि यतीश कुमार ने भावपूर्ण समीक्षा कर के अपनी तरफ से भी कुछ जान डाल दी है रचना में, कुछ रंगों को अपनी कूची चलाकर प्रगाढ़ कर दिया है।

    हर लेखक को इस तरह के समीक्षक मिलने चाहिए।

  3. शहंशाह आलम

    अच्छी तस्वीर खैंची है भाई ने।

  4. रौनक़ अफ़रोज़

    सबसे पहले राजेंद्र जी को उनके कहानी संग्रह “कोयला भई न राख” के लिए हार्दिक बधाई..
    यतीश कुमार जी की लेखनी से मैं प्रभावित होती रही हूं..
    आपका समीक्षा लिखने का अंदाज़ थोड़ा अलग है.. सरल शब्दों में कवि या लेखक की बातों को ,उनके जज़्बों को अपने क़लम के माध्यम से पाठकों के दिलों में उतार देने का फ़न आपको आता है..
    आपको बधाई!
    इसी तरह आप लिखें और लिखें. ख़ूब लिखें..
    धन्यवाद!

  5. किसी कहानी की काव्यात्मक समीक्षा निश्चित ही अनूठा प्रयोग है।

    मैंने इस कविता को दो बार पढ़ा और पाया कि कवि ने इतनी जानदार समीक्षा की है कि कहानी संग्रह से ज्यादा जोरदार तो लग रहा है कि उसकी समीक्षा है। व्यावसायिकपत्रिकाएं एक पैराग्राफ में पूरी आलोचना समेट देती हैं और सीमित शब्दों की चौहद्दी में हर प्रकार के लेखन को बांधना चाहती हैं पर यहां कवि ने शब्दों को साहित्य के महासागर से चुन चुन कर निकाला है।

    कवि यतीश कुमार ने राजेंद्र राव के कहानी संग्रह की भावपूर्ण समीक्षा कर के अपनी तरफ से भी कुछ जान डाल दी है रचना में, अपनी कूची चलाकर कुछ रंगों को चटकीला कर दिया है।

  6. जयश्री पुरवार

    राजेंद्र राव जी का “कोयला भई न राख “ जैसे जीवंत कहानी संग्रह का इतना प्रवाहमान और जीवंत विवेचन पढ़कर मन मुग्ध हो उठा । सच में कहानियाँ जलने और बुझने के बीच भटक रही है , न तो कोयला रह गए और न राख बन पायी ।यह तिल तिल कर जलने का सुख हैऔर यही कहानियोंका निकष है । कविता में कहानियों का विवेचन पहलीबार पढ़ा ।बधाई !

  7. प्रभात भाई ने सही कहा है कि यतीश जी के, राजेन्द्र राव के कहानी संग्रह पर लिखे नोट्स ,अपने आप में कहानियों की रीडिंग भी और एक मुकम्मल कविता भी है। यतीश भाई के लिखे इस समीक्षात्मक कृति से गुजरते हुए मुझे कादम्बिनी के संपादक राजेन्द्र माथुर और उनका सम्पादकीय “काल-प्रवाह”( अगर मेरी स्मृति सही है तो ) लगातार याद आता रहा। राजेन्द्र माथुर के लिखने का भी यही अंदाज़ था। एक सतत वेगवती नदी के प्रवाह सा। मुझे यह stream of subconscious लगता है। यतीश भाई किसी रचना को चेतना के धरातल के समानांतर अवचेतन के सूक्ष्म डायमेंशन में भी पकड़ते हैं। राजेन्द्र राव की कहानियों के पात्र और उनकी मानसिक अवस्थितियाँ यतीश भाई के चेतन तथा अवचेतन दोनों संसार से जुड़ जाती हैं। भौतिक और दृश्यमान संसार के बरक्स चेतना के अधिभौतिक धरातल पर वे इन पात्रों , उनके दुख दर्द और पीड़ा से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं, यही कारण है कि उनकी समीक्षा भी काव्यतात्मक हो जाती है, क्योंकि कविता अवचेतन की स्मृतियों के गहरे दबाव से ही सृजित होती हैं। यह अकारण नहीं है कि यतीश भाई की समीक्षाएं अपने आप में एक काव्यात्मक कृति भी होती हैं, जिनसे गुज़रना अपनी स्मृतियों से अपने भीतरी संसार से साक्षात के समान होता है।

    अनिल अनलहातु
    धनबाद

  8. मो. नसीम अख्तर

    वाह 👌 बहुत ही खूबसूरत अंदाज में समीक्षा लिखी आपने। मैं तो आपकी लेखनी का क़ायल हो गया। बहुत खूब 👌

  9. आनिला राखेचा

    राजेंद्र राव जी के कहानी संग्रह ‘कोयला भई न राख’ पर लिखे गए यतीश जी के नोट्स पढ़ कर यूँँ लगा जैसे कोई तीव्र गति से बहती मीठी नदी चली आ रही हो, जो पढ़ने वालों को किताब में निहित कहानियों से कुछ इस तरह रूबरू कराती है जैसे किसी लिफाफे पर लिखा पता पढ़ हम जान जाए के अंदर क्या लिखा होगा।
    किसी भी किताब के बारे में अपनी राय इस तरह से देने का यह अनोखा और लाजवाब तरीका लगा हमें। शब्द-शब्द कवितामय। शब्दों को पीते-पीते यूँँ लगा मानो अचानक नदी के बीच एक खूबसूरत टापू आ गया है कुछ देर रुक आगे बढ़ी शब्दों का स्वाद चखने।
    हार्दिक बधाई राजेंद्र जी व यतीश जी आप दोनों को। यतीश जी आप द्वारा किसी भी किताब के बारे में आपकी अपनी लिखी राय किताब के महत्व व उसके प्रति पढ़ने की जिज्ञासा को तीव्रता से जागरूक करती है। यूँँ ही परिचय कराते रहें हम सभी को अच्छे साहित्य से🙏😊

  10. इत्तेफ़ाक़न यह संग्रह पढ़ने का अवसर अभी तक मुझे नहीं मिल पाया है लेकिन यतीश जी के इस पोएटिक रिव्यू के परिप्रेक्ष्य में उसे पढ़ने की जिज्ञासा का उत्पन्न होना वाजिब है. यतीश जी की इस समीक्षा से होकर गुजरने के बाद यह अहसास होना बहुत स्वाभाविक है कि कि वे किसी भी विधा में क्यों नहीं लिखें, मूलतः वे कवि ही हैं. अन्य विधाओं की तरह समीक्षा लेखन की रूढ़ परिपाटी को ध्वस्त किए जाने की बेतरह ज़रूरत ही, उसे भी परंपरागत खांचों से मुक्त करके नए प्रतिमानों से लैस करना होगा. यतीश जी अलनी पाठकीय दृष्टि से संग्रह की अंतर्वस्तु तक पहुँचने की जो चेष्टा करते हैं, वह एक सराहनीय और प्रयोगपूर्ण पहल है. बहरहाल पुस्तक को पढ़ने की इच्छावती हो गई है.

  11. नीलिमा सिंह

    ठीक है

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