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मोमबत्ती दिलवाली रात भर जलती रही

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपनी आत्मकथा के दूसरे खंड ‘हम नहीं चंगे बुरा न कोय’ में अमृता प्रीतम से मुलाक़ात का ज़िक्र किया। आत्मकथा के पहले खंड में उन्होंने इंद्रजीत यानी इमरोज़ के बारे में लिखा था, दूसरे खंड में भी उन्होंने लिखा है कि एक कलाकार के रूप में उनका जलवा कितना था। अमृता प्रीतम की जन्मशताब्दी के साल पढ़िए वरिष्ठ लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक का यह लेख- मॉडरेटर

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अपने जीवन काल में अमृता प्रीतम पंजाबी की आइकॉनिक लेखिका थीं लेकिन हिंदी में ज्यादा पढ़ी और पसंद की जाती थीं, यहाँ तक कि वर्तमान पीढ़ी के कितने ही पाठक हैं जो जानते ही नहीं कि अमृता जी वस्तुत: पंजाबी की लेखिका थीं. नज्में और अफसाने दोनों लिखती थी और दोनों विधाओं पर ही उन की पकड़ और महारत काबिलेरश्क थी. यहाँ उन की रची सिर्फ दो लाइन उद्धृत हैं और ये दो ही पाठकों पर जादू कर देंगी:

आईयाँ सी यादां तेरियां, महफ़िल सजा के बैठी आँ;

मोमबत्ती दिलवाली रात भर जलती रही.

अफसानानिगारी में भी वो बेमिसाल थीं, इस के लिये ‘पिंजर’ का ही जिक्र काफी है जिस का कई भारतीय और यूरोपियन भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है और जिस पर बॉलीवुड में एक निहायत कामयाब और मानीखेज फिल्म भी बन चुकी है.

अमृता जी को समय-समय पर कई सरकारी और गैरसरकारी इनामों से नवाजा गया था जिन में प्रमुख हैं: पद्मविभूषण, पंजाब रतन और ज्ञानपीठ पुरुस्कार. उनकी लिखी लगभग सौ किताबें प्रकाशित हुई थीं और वो अपनी ज़िन्दगी के आखिरी लम्हे तक लिखने में मशगूल रहीं थी. उस दौरान उन्हों ने अपनी आत्मकथा भी लिखी थी लेकिन जैसा अजीमोश्शान उन का किरदार था उसके मुकाबले में बायो उतनी वसीह नहीं थी जितनी होने की उनके मुरीद पढने वालों को उम्मीद थी. लेकिन कलेवर में कदरन मुख़्तसर होने के बावजूद भी दिलचस्प, मानीखेज मालूमात से भरपूर थी और ऐन दुरुस्त और माकूल नाम ‘रसीदी टिकट’ (Revenue Stamp) से नवाजी गयी थी.

आत्मकथा में इस गैरमामूली नाम के पीछे ही एक कहानी है:

एक बार खुशवंत सिंह ने अमृता जी से इसरार किया था कि वो अपनी बायो लिखें. उन का जवाब था कि उनकी ज़िन्दगी तो बस इतनी इवेंटफुल थी कि उसको एक डाक टिकट पर दर्ज किया जा सकता था. लिहाज़ा आखिर जब अमृता जी ने आत्मकथा लिखी तो उसे ‘रसीदी टिकट’ ही नाम दिया. यहाँ ये बात भी गौरतलब है कि रसीदी टिकट में एक ऐसी खासियत होती है जो बाकी डाक टिकटों में नहीं होती; बाकी डाक टिकटों के साइज़ बदलते रहते हैं, छोटे बड़े होते रहते हैं लेकिन रसीदी टिकट का साइज़ कभी नहीं बदलता; जब से डाक का महकमा है, तभी से रसीदी टिकट का एक ही साइज़ मुक़र्रर है जो कि आज तक भी चला आ रहा है, कभी नहीं बदला – और लगता है न कभी आइन्दा बदलेगा. ‘रसीदी टिकट’ उनवान के एक सिंबॉलिक मायने हैं जो इस बात की तरफ इशारा हैं कि लेखिका ने बतौर बायो जो कुछ लिखा है वो वाकेई इतना मुख़्तसर लेकिन मानीखेज  है कि रसीदी टिकट पर मुकाम पा सकता है.

कोई बड़ी बात नहीं कि ‘रसीदी टिकट’ से ज्यादा मुख़्तसर लेकिन मुखर आत्मकथा भारत में किसी दूसरे सेलिब्रिटी की हो ही नहीं.

दो मर्तबा मुझे अमृता जी के रूबरू होने का इत्तफाक हुआ था. दोनों बार मैं बस उन के दर्शन ही पा सका था.

ओम प्रकाश शर्मा जी की मुसाहिबी महफ़िल में शरीक होने के लिए मेरठ गया था तो वापिसी में शर्मा जी ने इमरोज़ का बनाया एक टाइटल मुझे थमा दिया था और हुक्म फ़रमाया था कि दिल्ली लौटने के बाद इमरोज़ से संपर्क करूँ और उसे टाइटल के बारे में बताऊँ कि शर्मा जी उसमें क्या क्या करेक्शन चाहते थे. हासिल हुए टेलीफोन नम्बर पर मैंने इमरोज़ को फोन किया और शर्मा जी की दरख्वास्त के बारे में बताया तो जवाब मिला कि शाम को अमृता जी की एक रेडियो वार्ता की रिकॉर्डिंग थी, मैं सवा छ: बजे पार्लियामेंट स्ट्रीट स्थित रेडियो स्टेशन के एंट्री गेट पर मिलूं.

मुक़र्रर वक़्त पर मैं गेट पर मौजूद था तो इमरोज़ ने अमृता जी के साथ वहां कदम रखा. इमरोज़ को मैं पहले से पहचानता था लेकिन अमृता जी के रूबरू मैं पहली बार हुआ था – बस, रूबरू ही हुआ था, ये भी स्वाभाविक  तौर पर सोचा था कि जब उस घड़ी रेडियो स्टेशन पर थीं, रेगुलर एस्कॉर्ट इमरोज के साथ थीं तो अमृता जी ही हो सकती थीं. मैंने उन्हें सादर प्रणाम किया लेकिन शायद शाम के नीमअँधेरे में मैं तो उन्हें दिखाई दिया, मेरा प्रणाम न दिखाई दिया. मैं मामूली, बेहैसिअत शख्स था, रेसिप्रोकल कर्टसी पर मेरा कोई दावा तो बनता नहीं था! बहरहाल, मैंने इमरोज़ को टाइटल सौंपा और शर्मा जी का संदेशा दोहराया.

“शर्मा जी को बोलना” – इमरोज बोला – “चार-पांच दिन में टाइटल पहुँच जायेगा.”

और टाइटल के चार टुकड़े कर के करीबी डस्टबिन डाल दिए.

मैं भोंचक्का सा उसका मुंह देखने लगा.

उसने शायद मेरे मनोभावों को समझा, बोला – “पुराने टाइटल में शर्मा जी के बताये बदलाव करने से नया टाइटल बनाना आसान है . . .”

और अमृता जी के साथ ये जा वो जा.

ऐसी मुलाक़ात का दूसरा इत्तफाक अंसारी रोड पर स्थित इंडिया पेपरबैक्स के ऑफिस में हुआ जहाँ कि बतौर संपादक, अनुवादक, लेखक मेरा दोस्त सुरेश कोहली भी पाया जाता था और वहीँ ऑफिस में उसे एक केबिन उपलब्ध था. बगल में प्रकाशक का केबिन था जो कि साइज़ में कोहली के केबिन से बहुत बड़ा था. क्योंकि खुद मेरा सरकारी ऑफिस वहां से बस दो फर्लांग ही दूर था इसलिए तक़रीबन रोज ही मैं कोहली से मिलने इंडिया पेपरबैक्स में ऑफिस में पहुँचा होता था. ऐसी एक दोपहरबाद अपनी वहां हाजिरी के दौरान जब मैं कोहली के केबिन में उसके सामने बैठा हुआ था तो एकाएक वहां अमृता जी और इमरोज़ के कदम पड़े. कोहली उन्हें देखते ही स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह उछल कर खड़ा हुआ और मुझे पूरी तरह से नज़रअंदाज करते उस ने उन खासुलखास मेहमानों का इस्तकबाल किया. तीनो तत्काल आपस में बतियाने लगे. मैं तो जैसे वहां मौजूद ही नहीं था. उनका मेरे से तआरूफ तो दूर, मैं तो इंतज़ार कर रहा था कि अभी कोहली मुझे कहीं बाहर जा कर बैठने को कहेगा लेकिन ऐसा न हुआ. खुद उठ के बाहर जाने की मैंने कोशिश न की क्योंकि मैं तो अपने इतने करीब इतनी बड़ी लेखिका की मौजदगी से ही मुग्ध था और जैसे ट्रांस में था.

पौना घंटा उन लोगों ने वहां हाजिरी भरी जिस के दौरान अमृता जी ने लगातार डनहिल के सिगरेट पिए. वस्तुत: जब वो आयीं थीं तब भी सुलगा हुआ सिगरेट उनके हाथ में था और रुखसती के वक़्त भी ऐसा ही था.

उस वार्तालाप के दौरान मेरी समझ में आया कि अमृता जी का कोई उपन्यास इंगलिश में अनुवाद हो कर छप रहा था और अनुवादक खुद सुरेश कोहली था जिस से दोनों की पुरानी वाकफियत थी और जिस के मुलाहजे में वो दोनों वहां पधारे थे. बगल में प्रकाशक-प्रोप्राइटर कृष्ण गोपाल आबिद का केबिन था जो खुद को उर्दू का बड़ा  अदीब बताते थे और खुद अक्सर कहते थे कृशन चंदर को उन्हों ने कलम पकडनी सिखाई थी. बड़े अदीब साहब  अपने ऑफिस में मौजूद थे लेकिन अमृता जी ने उनसे मिलने में कोई दिलचस्पी न दिखाई – सुरेश ने भी ऐसी  कोई पेशकश न की. फिर मेहमानों में और मेजबानों में टा टा बाई बाई हुआ और उन्हों ने रुखसत पाई.

बिना मेरे पर एक बार भी निगाह डाले.

ऑफिस के किसी डोरमेंट पीस ऑफ़ फर्नीचर पर कौन निगाह डालता है!

मैं फिर भी खुश था कि पौना घंटा मैं इतनी बड़ी लेखिका के इतने करीब बैठा.

अमृता जी की पंजाबी पोएट्री शायद इसलिए भी वाह वाह थी क्योंकि इस फील्ड में उनके कद का कोई कम्पीटीटर नहीं था. उनको निर्विवाद रूप से पंजाबी की पहली कवियत्री का दर्जा हासिल था. मुल्क के बंटवारे के दौरान व्यापक मार काट और दुनिया के सब से बड़े विस्थापन के दौरान उन्हों ने इसी विषय पर एक बाकमाल कविता लिखी जो रहती दुनिया तक याद की जाएगी. ‘हीर’ और उसके मुंसिफ वारिस शाह से मुखातिब उस कविता की कुछ लाइने यहाँ उद्धृत है:

इक रोई धी पंजाब दी, ते तु लिख लिख मारे वैन;

अज लक्खां धियाँ रोंदियाँ, तैनू वारिस शाह नू कहन.

आ दर्द वंडा जा दर्दिया, कितों कब्रां विच्चों बोल;

ते अज किताबेइश्क दा, कोई अगला वरका फोल. 

 

( धी : बेटी    वैन : प्रलाप, रुदन    वंडा : शेयर, बंटा    दर्दिया : दुःखभंजन    फोल : स्कैन, खंगाल )

(When wept a daughter of Punjab

You wrote and wrote odes about her,

Now millions of daughters are wailing

Imploring to you, O Waris Shah.

Come share my pathos, O my saviour

Come speak from the graves of dead,

And of the book of love this day

Scan yet another page.)

अमृता प्रीतम को उनकी जन्म शताब्दी पर सादर नमन.

सुरेन्द्र मोहन पाठक

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