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आज़ादी को ज्यादातर लोग पाप समझते हैं.  

पूनम दुबे को  पढ़ते हुए कई बार लगता है कि वह यात्राओं पर लिखने के लिए ही बनी हैं। इस बार उन्होंन एम्सटर्डम शहर पर लिखा है- मॉडरेटर

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एम्सटर्डम  में एक पूरा दिन ऐसे बिता जैसे कि कुछ पल हों. जाने से पहले तय किया था कि एम्सटर्डम में रेड लाइट एरिया के दर्शन के अलावा (जिसके लिए वह इतना पॉपुलर है) विन्सेंट वैन गो म्यूजियम और ऐनी फ्रैंक हाउस जरूर जाऊंगी.  दोनों ही मुझे बेहद पसंद है. करीब तेरह घंटों की लंबी बस यात्रा कर ढलती शाम के साथ मैं पहुंची एम्सटर्डम. बीच में दो घंटे जर्मनी में ब्रेक लिया था लेकिन लम्बी यात्रा के बाद थक गई थी इसलिए सोचा दूसरे दिन सवेरे ही निकलूंगी इस अनोखे शहर की खोज खबर लेने.

जिस हास्टल में मेरा बसेरा था वह ट्रेन स्टेशन के पास था. और उस स्टेशन को क्रॉस करता एक इंद्रधनुषी रंग का ब्रिज था जिसके सामने एक बोर्ड पर लिखा था- इन रिस्पेक्ट ऑफ़ इक्वलिटी एंड फ्रीडम ऑफ़ लेज़बियन, गे एंड ट्रांसजेंडर कम्युनिटी.

दूसरे दिन मौसम सुहावना था. डर लगा था कही बारिश न हो जाए लेकिन सूरज ने अपनी कृपा बरसा ही दी. 48 घंटे का लोकल ट्रांसपोर्टेशन पास लिया और ट्रैम लेकर निकल पड़ी म्यूजियम डिस्ट्रिक्ट की ओर.  ट्रैम में खिड़की के पास बैठे-बैठे मैं इस खूबसूरत शहर को निहारती जा रही थी.

एम्सटर्डम मुझे एक ऐसी मन मोहिनी अप्सरा सी लगी कि जिसकी तारीफ़ में जितने भी अल्फाज़ कहें जाये वह कम हैं. शहर के बीचोबीच पानी के कनाल का जाल सा बिखरा हुआ था. कनाल्स और जमीन को जोड़ती अनगिनत फूलों के क्यारियों से सजे खूबसूरत छोटे-छोटे पुल मन को मंत्रमुग्ध कर देते हैं. ऊपर नीले आसमान के तले कनाल के कुछ हरे से रंग के पानी पर तैरती खूबसूरत किश्तियाँ और उन किश्तियों पर सवार लोगों के चेहरे पर बिखरी मुस्कान खुशी का रंग बिखेर रही थी हवाओं में. सड़कों पर ट्रैम लाइन बिछी हुई थी. सायकिल और गाड़ी चालानें वालों की अलग लेन थी. लोग साइकिल पर सवार निकल पड़े थे दिन की शुरुआत के लिए. आस-पास सब कुछ इतने रिदम में हो रहा था जैसे कोई संगीत बज रहा हो.

म्यूजियम डिस्ट्रिक्ट पहुंचकर मैंने विन्सेंट वैन गो म्यूजियम की टिकट ली. लोगों की खूब भीड़ थी, मेरा नंबर ग्यारह बजे आने वाला था. जिसमें अभी समय था. हल्की धूप हर-भरे पेड़ और घासों से आती खुशबू पिकनिक के लिए बेस्ट दिन था.  मैंने अपना बैग सर के नीचे रखा और लेट गई नरम घास पर.

एम्सटर्डम में गाँजा-चरस पीना अलाउड है, जो कि आसानी से कॉफ़ी शॉप में मिल जाता है. इसलिए लोग बेझिझक कश लगाते हुए दिख जाएंगे. गार्डन में मेरे सामने एक लड़का बैठा कागज़ के टुकड़े पर अपना कश बना रहा था. बाल उसके लंबे-लंबे और साधुओं की तरह चोटी में गुँथे हुए थे. उत्सुकतावश मैं दूर से उसे देख रही थी. उसने कश जलाई और मेरी तरफ इशारा करते हुए ऑफर किया. मन ही मन सोचा क्यों न ट्राय कर लूँ लेकिन फिर म्यूजियम भी जाने का समय हो रहा था. मैंने मुसकुराकर मना कर दिया. वह बेल्जिम से आया था और करीब एक महीनों से एम्सटर्डम में ही रह रहा था. कहने लगा आर्टिस्ट बनना चाहता हूँ. वह पेंटिंग करना चाहता था. यह सुनते ही मुझे अपने डच दोस्त डैफने की याद आ गई. वह भी पिछले पांच सालों से इसी कोशिश में है. उसे अमेरिका में मिली थी. आजकल वह यूरोप के अलग-अलग हिस्सों में रहती है आर्गेनिक खेती करती है. और पेंटिंग करने की कोशिश करती है. हम दोनों ने साथ में एक बार मेंहदी लगाई थी. तब से जब भी वह मेंहदी लगाती है मुझे उसकी फोटो जरूर भेजती है.

“स्टारी स्टारी नाईट” के पेंटर विन्सेंट वैन गो को कौन नहीं जानता. विन्सेंट वैन गो  नीदरलैण्ड से थे. करीब चार घंटे बिता कर जब म्यूजियम से बाहर निकली तो मन भारी सा लगा. उनका जीवन बहुत ही कठिन था. उनके मृत्यु के बाद लोगों ने उनकी कला को समझा और उसे अहमियत दी. उनका मानना था कि जीवन की असल खूबसूरती प्रकृति और उनके आस-पास रहने वाले में होती है. इसलिए वह प्रकृति, किसानों और उनके जीवन से प्रेरित होकर पेंटिंग किया करते थे. उन्हें पेज़न्ट (किसानों) पेंटर भी कहा जाता है. “पोटैटो ईटर” उनकी बहुत ही प्रसिद्ध पेंटिंग है जिसमें किसान का परिवार दिन भर के काम के बाद एक साथ बैठकर आलू खाते दिखाई देते हैं. विन्सेंट वैन गो के बारे में जानते हुए मुझे हमारे देश के महान लेखक प्रेमचंद की याद आ गई. वह भी तो किसानों खेत खलिहानों और उनके जीवन से जुड़ी हुई कहानियां लिखते थे. उनके जीवन का अंत भी कितना दुखद था. यही सब सोचकर मन भारी हो गया. काश इन महान कलाकारों का इसका अंदाजा होता कि आने वाले भविष्य में वह कितने लोगों के प्रेरणा का स्रोत बनने वाले थे.

म्यूजियम से निकल कर चलते हुए मैं पहुंची ऐनी फ्रैंक हॉउस पहुंची. वहां जाकर पता चला टिकट बिक चुकी थी. थोड़ी निराशा हुई लेकिन फिर सोचा इसी बहाने एक बार फिर आऊंगी एम्सटर्डम.

प्लान के मुताबिक़ शाम को हम पहुंचे रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट. शोरूम की तरह शीशे के दीवारों के पीछे सजी-धजी लड़कियाँ ऐसे लग रही थीं जैसे मैनकिन हों. एक से एक खूबसूरत अप्सराएं बूथ पर बैठी अपने कस्टमर से मोल-भाव करती नजर आ रही थीं. एक तरह की आज़ादी ही तो थी कि वह मन मुताबिक़ खुद यह फैसला ले सकें. उत्सुकता बस मैंने भी एक लड़की से बात कर ली. वह यूक्रेन की रहने वाली थी कुछ साल पहले ही एम्सटर्डम आई थी. वह अपनी खुशी से इस व्यापार में थी. सैलानियों की भीड़ लगी थी उन्हें देखने के लिए. जगह-जगह बोर्ड पर लिखा था, “इन औरतों को इज्जत दें और कृपया इनकी तस्वीरें न खींचें.” कुछ लोग उनसे बेझिझक बातें कर रहे थे तो कुछ नजरें बचाकर बस देख भर लेते. कुछ लोगों की चेहरे पर जिज्ञासा थी तो कुछ के चेहरे पर गिल्ट की परछाई. पूरा डिस्ट्रिक स्ट्रिप क्लब, पोल डांस और पीप शो से भरा था. जैसे कि सामान्य बाजार हो, सब कुछ खुलेआम कोई छुपम-छुपाई नहीं.

“द फाल्ट इन आवर स्टार” के लेखक जॉन ग्रीन ने कहा है “कुछ यात्री सोचते हैं कि एम्स्टर्डैम सिटी ऑफ़ सिन (पाप) है, जबकि वास्तव में आज़ादी का शहर है. और आज़ादी को ज्यादातर लोग सिन (पाप) समझते हैं.

एम्सटर्डम की रेड लाइट एरिया में घूमते मुझे हुए कुछ ऐसा ही महसूस हुआ.

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One comment

  1. राम बहोर साहू

    शुक्रिया पूनम जी कहानी जो आपकी सैर की थी.

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