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एक ऐसी कहानी जिसे ब्रिटिश छुपाना चाहते थे और हिंदुस्तानी भुलाना

प्रवीण कुमार झा की चर्चित पुस्तक ‘कुली लाइंस’ पर यह टिप्पणी लिखी है कवि यतीश कुमार ने- मॉडरेटर

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अखिलेश का ‘निर्वासन’ पढ़ा था और वो मेरा  ‘गिरमिटिया’ शब्द से पहला परिचय था। जहाँ सूरीनाम,1985 में आए एक्ट का जिक्र था। गोसाईगंज से सूरीनाम तक रामअजोर पांडे के बाबा और बिहार की उनकी दादी का भारत से पलायन और सूरीनाम में पाँच साल के कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद वहीं बस जाने का और उनके  समृद्ध होने का  बहुत सुंदर चित्रण है।

पहला गिरमिटिया -गिरिराज किशोर की लिखी है ।यह उपन्यास महात्मा की नहीं बल्कि मोहनदास से महात्मा बनने की यात्रा के बारे में है । जब मोहनदास दक्षिण अफ़्रीका में दूसरे पाँच-साला गिरमिटिया को साथ लेकर मुक्ति की राह पर चल देते है। पढ़ने की इच्छा जागृत हुई पर किसी कारणवश अब तक पढ़ नहीं पाया।

इसी बीच जब ‘कुली लाइन्स’ हाथ आया पढ़ना शुरू किया तो मेरे ज़ेहन में ‘निर्वासन’ पढ़ते हुए जो प्रश्न कुलबुला रहे थे, वही चेतन में फिर से लौटने लगे।
‘कुली  लाइन्स’ पढ़ते-पढ़ते लेखक आपको वर्तमान से निकालकर फ़्लैशबैक में चल रही कहानी में आसानी से लेकर चला जाता है और तब आपको एहसास होता है कि कपोल कल्पना की दुनिया से बाहर यह कथेतर दर्द मनुष्य होने और बने रहने की जीजिविषा की अप्रतिम गाथा है।

लेखक ने बड़ी बारीकी से और गहराई में जाकर तालाश किया है, इतिहास के सबसे पड़े पलायन को, जिसे हम लगभग भूल गए थे। यह एक शोध पत्र भी है। जैसे मिट्टी में दफ्न इतिहास को कोई पुरातत्व विशेषज्ञ बड़ी सावधानी से ढूंढ निकालता है। उसके खनन की प्रक्रिया बहुत ही सधी हुई होती है उसे हमेशा डर ये भी रहता है कि ढूंढते वक़्त कुछ टूट न जाये और  जिसकी बाद में मरम्मत भी न की जा सके। इस पुस्तक में  भी बड़ी बारीकी से तथ्यों को गुना गया है। इस के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं।

बचपन में हम अपने लिखे को पेंसिल से मिटाते थे तो कागज पर शब्दों के गुम होने के निशान हमेशा के लिए छोड़ जाते थे ।पन्ना उस जगह सदा के लिए खुरदरा, दबा और स्लेटी रह जाता था।उसी दबे मिटे हुए स्लेटी इतिहास को फिर से ढूंढ निकालने और लिखकर  हम तक पहुँचाने  का भागीरथ प्रयास किया है लेखक ने और इसके लिए उन्हें  हृदय से कोटि कोटि धन्यवाद ।

नम मौसम में गरम हवा पर रेंगने से जन्मे
हलकान की यह कथा है।
मुकदमे  लड़ने के लिए जमा की गई
सामूहिक सहकारी राशि
और उससे कहीं  ज्यादा बढ़ते
अत्याचार की कहानी है यह।

स्त्रियों के मान के लिए
खुशी- खुशी फाँसी के फंदे पर
चढ़ने वालों की दास्तान है यह।

नवजन्मे बच्चों को खेतों में
गाड़ने के बाद
उस पर रखे पत्थरों से बने
मानचित्र  की कहानी है यह
“स्त्री एकता” के जीत और जातियों का जातपात से विमुख होकर मनुष्यता में विलिप्तता की कहानी है यह ।

फिजी के गांधी और वहीं के जलियाँवाला बाग की कहानी है यह
चार्ल्स एंड्रयूज का दीनबन्धु बनने की भी कहानी है यह

उनके शब्दों में
“हिंदुस्तानी गरीबी और यातना  झेल सकते हैं पर किसी महिला की इज्जत से खिलवाड़ कभी नहीं झेल सकते।”

एक ऐसी कहानी जिसे ब्रिटिश छुपाना चाहते थे
और हिंदुस्तानी भुलाना ।

पढ़ने के बाद जब भी मैं अपने आफिस के रास्ते से गुजरते समय खिदिरपुर पोर्ट ट्रस्ट एरिया से गुजरता हूँ , नज़रें किनारे लगे जहाज के साथ गिरमिटियों के पदचिन्हों को ढूंढने लगती हैं । इन्हीं जगहों में यह सब चल रहा होगा दिमाग में सवालों की झड़ी लग जाती है।

कथेतर सूत्रों से सूत्र मिलाकर कोई जादुई सूत्र बनाता है
यह तब जब लोगों की यादों में पतझड़ लगा हो बसंत नहीं और वो जितने पत्ते समेटता है उससे ज्यादा बिखर जाते हैं पर लेखक ने बहुत सलीके से यादों के पत्तों को सहेजते हुए उनकी माला बनाई है और खुद से  इस इतिहास को रच दिया है ।

वो  तब की बातों की दास्तान समेटने निकले हैं जब चूल्हा घर के बाहर जलता था और जिंदगी इंसान के भीतर।
घर के अंदर सिर्फ आँखें जलती थी फूस के छप्पर नहीं।
राम लगे लदीन,मोती माड़े जी,झुनमुन गोसाई ,शिवुधारी जमींदार,तोताराम जी फिजी के गांधी ,सोम नायडू,कुंती ,सुजारिया,रामलखन बाबू और कमला प्रसाद बिसेसर,गुरदीन भागू……

ये इन  सब की कहानी है जिन्हें शायद कभी नहीं सुना जाता  अगर कुली लाइन्स नहीं लिखी जाती।
कुली तमिल शब्द है कि यह भी मुझे पता नहीं था।

अजीबोगरीब किस्सों का संकलन है जो कभी आपको डराता है तो कभी आप आँसुओं में डूब जाते हैं ।कभी-कभी  अंग्रेज आपको अच्छे भी लगते हैं ।
कुछ बहुत रोचक घटनाओं का जिक्र है जैसे-

डॉ ऑलिवर जिसने महिला अस्मिता की रक्षा के लिए पूरे जहाज की यात्रा रोक दी ।

मेजर फेगन एक मजिस्ट्रेट होकर भी उनका कुलियों का साथ देना।

मुंशी रहमान खान जो जहाज पर उन हिंदुओं को जिन्होंने अपना जनेऊ पानी में बहा दिया उन्हें रामायण सुनाते थे।

रूजवेल्ट या कहें कुली पापा की उदारता की कहानी भी है यह ।

तोताराम जी ऐसे गांधी जिन्होंने जुरूरत पड़ने पर अहिंसा भी छोड़ी ।

जाने तेतरी जैसी साहसी मुस्लिम महिला जिसने हिन्दू बच्चे को गोद लिया और दिलेरी की मिसाल बनकर शाहिद हुईं ।उनकी कहानी है ये।

ऐसे लोगों का जिक्र है जिन्होंने गिरमिट को गिरना और मिटना नहीं समझा और वापस उभर कर भारत को भारत के बाहर स्थापित किया।

चावल और चीनी ये दो ऐसे खाद्य सामग्री है जो अकेले जिम्मेदार है इतने सारे लोगों के गिरमिटिया बन जाने के लिए ।ब्रिटेन का चीनी पर टैक्स खत्म करना क्या इतना महंगा पड़ा भारत और चीन को।

मलेशिया को छोड़ जहाँ रबर प्राथमिकता थी बाकी सभी जगह लगभग या तो गन्ने की खेती या धान के लिए इतने मजदूर विस्थापित किए गए।

कनाडा की कहानी अलग जरूर है, वैसे सिख भी बिल्कुल अलग हैं मेहनत और उनकी अपनी एकता में , बाकी की बची खुची कसर रेल की पटरियाँ बिछाने ने पूरी कर दी।  ऐसी कितनी ही विस्तृत जानकारी लगभग सभी टापुओं की जहाँ तस्करी कर गिरमिटियों को विस्थापित किया गया जिसे बहुत ही क्रमबद्ध तरीके से लिखी गई है इस किताब में ।

पढ़कर सोचता हूँ चीनी की मिठास में कितने विष घुले हैं । 8.9 प्रतिशत भारत के लोग एक शताब्दी  में विस्थापित किए गए।ये आंकड़े आपको चकित कर देंगे। गिरमिटिया में पुरुष ज्यादातर निचली जाति से और महिलाएं उच्च जाति से थी, आश्चर्यचकित तथ्य है। आश्चर्य यह भी है चाहे गुलामी हो या गिरमिटिया विस्थापन में  कोलकाता हमेशा केंद्र बिंदु रहा ।

उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोगों के नजरिया और व्यवहार का अंतर और भारत और चीन के लोगों के सहनशीलता के  अंतर को बहुत सही तरीके से रखा गया है इस किताब में।

वस्तुतः फ्रेंच लोगों ने जिस काम को तस्करी के रूप में किया  ब्रिटिश लोगो ने उसे कानून के तहत कानून में सुविधाजनक बदलाव ला कर किया, सब कुछ बिल्कुल प्लांड तरीके से।

सेशेल्स द्वीप में 6 % भारतीय हैं पर  80% लोगों  में भारतीय खून है अजीब आंकड़े हैं। इन द्वीपों में अफ्रीकी गुलाम भारतीय से पहले आयें पर भारतीयता बची हुई है अफ्रीकी संस्कृति विलुप्त हो चुकी है।यह सच आपको अपने भीतर की भारतीयता को समझने में सहायता करेगा।

गिरमिटयों के साथ  सिर्फ संस्कृति ही नहीं बल्कि आम की गुठली,इमली के पेड़ ,गांजा ,भांग और चिलम के साथ चूहों को भगाने के लिए नेवला भी गया । ऐसी किंवदंतियाँ भी गिरमिटियों के साथ संस्कृति की तरह गई और यह अप्रवास सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं था  । सतीश राय सिडनी से और नईम राय बलरामपुर ,दोनो बिछड़े हुए भाई एक ही खानदान से ताल्लुक रखते थे पर एक मुसलमान और दूसरा हिन्दू । बहुत ही रोचक संयोग आपको धर्म की परतें खरोचती मिलेंगी।

कोई ऐसा भी हो सकता है जो फिजी से 10 पाउण्ड सिर्फ इसलिए गाँव भेजता है कि गाँव में कुआँ खुद सके और जो  खुद वहीं फिजी में बंधुवागिरी करते-करते मर जाता है।

अरकाटी(दलाल या एजेंट)पतंग का वह मांझा था जिसकी डोर किसी और ने पकड़ रखी थी । मृदुभाषी और मार्केटिंग गुरुओं का जंजाल तोड़ना कितना कठिन होगा उस भुखमरी और सामंतवाद की बेचैनी भरे वातावरण में ….

सिपाही विद्रोह भी पलायन का कारण बनेगा ये ख्याल से परे है। जिस नीति या एक्ट में सरकारी ठप्पा लग जाये तो आज के पढ़े लिखे लोग भी  सरेआम बेवकूफ बनते हैं , नहीं तो सारदा, नारदा ,सहारा ,पीयरलेस जैसे स्कीमों से लाखों लोग बेवकूफ नहीं बनते।उस समय तो माहौल भी और उपयुक्त था ऐसी स्कीम लाने का।

जब आप प्रोटेक्टर ऑफ इमिग्रेंट की बात करते हैं तो लगा कि इस यूनिवर्स को बचाने वालों की बात हो रही होगी पर यहॉं तो सारे शब्द विलोम होते दिख रहे थे ।चैन ऑफ कमांड की बात हो रही थी।एग्रीमेंट के प्रोटेक्टर की बात थी न कि इमिग्रेंट के प्रोटेक्टर की।

एक स्नान से जात पात सारे मतभेद मिट सकते हैं और सब कुछ जरूरत के अनुसार सिकुड़ती और फैलती है और मिश्रण का अनुपात भी सुविधा ही निर्धारित करती है ।जनेऊ का पानी में बहा देने से मन के भीतर भी  प्रवाह बनता है और पसीने के रास्ते सब बह जाते है ।
अब सब एक समान।

हर चैप्टर  में कालक्रम और संदर्भ  बनाकर लेखक ने क्रमबद्ध  समय के बदलते चक्र को समझने में आसानी ला दी ।

1853 में भारतीय रेल की शुरुआत होने से बेरोजगारी बढ़ने का लिंक आश्चर्यचकित करता हैं ।मैं खुद रेल अधिकारी हूँ और सोच में पड़ गया कि जिस संस्था पर इतना गर्व है उसके  दुष्परिणाम की एक शक्ल गिरमटिया की बढ़ोत्तरी भी थी यह सच विस्मित करता है।

सोचता हूँ कौन सा विद्रोह बड़ा था 1857 का सिपाही विद्रोह जिसने गिरमिटयों की संख्या बढ़ाई या कुंती की लिखी  1913 की  वो चिट्ठी जिसे जिसने भारत के प्रेस मीडिया को आकर्षित किया और 1920 में फिजी में गिरमिटियों को मुक्त किया गया।

युगाण्डा के तख्ता पलट के बाद ईदी अमीन ने जिन 80 हज़ार भारतीय को देश निकाला दिया उन्होंने ब्रिटेन,कनाडा,और केन्या के विकास में भूमिका निभाई। ऊर्जा का विनाश नहीं होता बस अपनी शक्ल सूरत बदलती रहती है।

हरेक अध्याय के अंत में दिए गए संदर्भ को पढ़ने से लगता है लेखक ने कितनी मेहनत और रिसर्च की है ।कितना गंभीर अध्ययन किया है ताकि वास्तविकता मौलिकता के साथ उभर कर आए।

नारायणी की कहानी रूह पर हंटर चला जाती है।इसे एक पन्ने से निकलना होगा ,एक पूरी किताब उसका इंतजार कर रही है……

नेहरू जी का यह कहना कि थेतर लोग आ गए ।पढ़कर विश्वास नहीं हुआ ऐसा भी प्रधानमंत्री कह सकते हैं उनके लिए जो आप पर आस लगा कर वतन वापस आ रहे हैं।क्या गुजरी होगी उन पर। क्या मात्र एक बिस्कुट लेना  देह सौपने की स्वीकृति का प्रतिचिन्ह बन सकता है ।अजीब नियमों की दुनिया से गुजर कर लोग टापुओं पर पहुँचते थे।

कुछ ऐसी रोचक घटनाओं का भी जिक्र है जब चीनी हिंदी सच में भाई-भाई बनकर एकजुट होकर लड़े।मलय एन्टी जैपनीज पार्टी इसी का उदाहरण है।
मलय कम्युनिष्ट पार्टी भी।जब संकट के बादल घिरते हैं तो वर्गीकरण और ध्रुवीकरण से परे एकता जन्म लेती है जहां जातिवाद तो क्या देशवाद भी हार जाता है।

1947 में हिन्दुस्तानियों को भारत में आजादी मिलने से पहले कनाडा में आजादी मिली , उन्हें वोट देने का अधिकार मिला।

पलायन संस्कृति का विकास है ।सभ्यता का डायन,जातिवाद से मुक्ति  और एकमयता और एकता का सूत्र । किताब पढ़ते- पढ़ते इतिहास में विचरण करने लगता है पाठक ।उन सारे देशों को फिर से अलग तरह से समझने का मौका देती है यह किताब। कई अनसुलझे प्रश्नों का जवाब देती है और कई नए प्रश्न भी जन्म लेते हैं।

लेखक को अनेक बधाई उनकी यायावरी के लिए जिसके बिना इतने देशों में जाकर इतने तथ्य, इतनी बड़ी और रोचक जानकारियाँ  इकट्ठा करना संभव नहीं था।

और अंत में उन सभी  दिवंगतों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना जिनकी मौत पूर्णतः अस्वाभाविक तरीके से हुई और जिनकी रूह आज भी भटक रही है।

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पुस्तक का प्रकाशन वाणी प्रकाशन से हुआ है। 
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4 comments

  1. इतने विस्तार में गिरमिटिया प्रथा यानी कानूनी गुलाम प्रथा पर शायद किसी ने नहीं लिखा हो जैसा कि समीक्षा से पता चल रहा है।
    मेरा एक छोटा सा सुझाव है कि इस समस्या को अब हम ईसाइयत के चश्मे से देखें। क्या यूरोपीय इतने क्रूर होते यदि उन पर ईसाईयत नहीं थोपी गई होती? उपनिवेशवाद वाद और चर्च में क्या अंतर है? अगर हम इन दोनों के संबंधों पर दृष्टि डाल पाएं तो बहुत से सवालों और विस्थापन से होने वाले दर्द का जवाब मिल जाएगा। हमलोग को जब देश के अंदर विस्थापित होना पसंद नहीं है तो बाहर ले जाना कितना कष्टपूर्ण होगा। हम ब्रिटिश ईसाईयों के दुर्भावना पूर्ण व्यवहार पृ चर्चा नहीं करते, उनको ही नैरेटिव पर नियंत्रण करने देते हैं।

    ने लेखकों ने इस समस्या पर बोलना शुरू किया है तो धीरे धीरे मूल कारण पर भी बात होगी

  2. जब आप किसी पुस्तक की समीक्षा लिखते हैं तो उस पुस्तक में दिये तथ्य और साक्ष्यों को जो विस्तार देते हैं वह शानदार होता है ।
    वास्तव में आपकी समीक्षा उस पुस्तक को और समृद्ध बना देती है ।
    बहुत शुभकामनाएं !

  3. कुमार विजय गुप्त

    आपकी टिप्पणी से स्पष्ट हो रहा है कुली लाइंस में रचनाकार ने बहुत सारे ऐतिहासिक तथ्यों को उद्घाटित किया है .बेशक यह एक दस्तावेज है .आपने अच्छी टिप्पणी की जिसमें किताब को आईने की तरह साफ साफ रख दिया है . लेखक प्रवीण कुमार झा जी और आपको हार्दिक बधाई !

  4. मो. नसीम अख्तर

    वाह 👌 पुस्तक की समीक्षा एक खास अंदाज में पेश करते हैं आप, बड़े ही रोचक तरीके से। पुस्तक के लेखक के साथ – साथ आप भी बधाई के पात्र हैं।

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