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कुश वैष्णव की कहानी ‘जान में जान’

कुश वैष्णव इतने सारे काम करते हैं कि हमें ध्यान ही नहीं रहता कि वे लेखक भी हैं। पढ़िए उनकी कहानी- मॉडरेटर

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जान में जान आयी थी। मतलब हमारी जान में। मतलब कि हमारी जान ‘प्रेगनेंट’ थी और हम टेंशन में थे। सुबह जब साढ़े सात बजे फ़ोन की घंटी बजी और स्क्रीन पर जान लिखा देखा, तभी हमारी जान निकल गयी थी। हम समझ गये थे कि जो ग़लती जानबूझकर नहीं की उसने जान निकाल दी है। हमने फ़ौरन फ़ोन उठाया।

“हाँ बोलो?”

सामने से जान के रोने की आवाज़ आयी। हमने सवाल पूछने में टाइम खोटी नहीं किया और सीधे जान के होस्टल पहुँचे। जान की सहेली जान्हवी भी वहीं थी। हमको देखकर ग़ुस्से में बोली-

“साले, ठरकी इडियट, दस रुपए भी जेब में लेकर नहीं घूमते?”

हमको समझ में आ चुका था कि जान ने वो दस रुपए वाली बात बता दी। ऐसा नहीं था कि हमको ‘प्रोटेक्शन’ के बारे में मालूम नहीं था। हम तो गए भी थे मेडिकल स्टोर पर, लेकिन वह साला पेटीएम ले नहीं रहा था और पैसे हमारे पास थे नहीं। ज़िंदगी में पहली बार दस रुपए की वेल्यू समझ आ रही थी। काहे दस का नोट नहीं धरा जेब में। डिजिटल इंडिया के चक्कर मे हम अब बाप बनने वाले थे।

हम जान्हवी की गुस्साती नज़रों से बचके बस ‘पे’ बोले ही थे कि वो फिर से बोली-

“पेटीएम नहीं था उसके पास तो कहीं और चले जाते। दूसरी दुकानें नहीं थी क्या बाज़ार में?”

हम जानते थे ये सवाल दागा जाएगा, हमारी जान ने भी दागा था उस रात और आपको भी ये जानने की चुल्ल मची होगी, तो बस समझ लीजिए कि ऐसी ही कुछ चुल्ल उस वक़्त हमको मची थी। हमने अपनी जान को वहीं से फ़ोन करके पिछली डेट पूछी और आगे पीछे गणित लगा के बिना लिए चले आए। वापस आके जान को ‘पॉवर ऑफ़ पाजिटिव थिंकिंग’ समझाया। जान के ‘कुछ होगा तो नहीं’ पूछने पर हमने इतने कोनफ़िडेंस से बोला ‘कुछ नहीं होगा’ जैसे साला हम देश के फ़्यूचर की बात कर रहे हो। लेकिन इधर तो हमारा फ़्यूचर दाँव पर था। नौकरी के नाम पे हम कुछ करते नहीं थें। आने को सिर्फ़ बकैती आती थी और उसका फ़्यूचर सिर्फ़ पॉलिटिक्स में था जिसमें हमको कोई रुचि नहीं थी।

“अब बोल क्यों नहीं रहे हो।” जान की सहेली जान्हवी फिर से बोली।

हम चुप ही रहे। क्या बोलते? बकरे की तरह मिमियाने से अच्छा था चुपचाप खड़े रहो लेकिन जान की सहेली अलग ही मूड में थी। ठीक हमारी छाती के सामने आ खड़ी हुई और हाथ जोड़कर बोली-

“महाराज आपसे ही पूछ रहे है।”

हमको लगा चुल्ल वाली बात बताना तो ठीक नहीं और वैसे भी इतने सत्यवादी हम हैं  नहीं, तो हम ने कह दिया की रात बहुत हो चुकी थी और बाज़ार पूरा बंद था।” हमको लगा ये कहने से काम चल जाएगा। पर वो बोली-

“चलो! उस दिन पैसे नहीं थे। तो अगले दिन अनवांटेड ले आते। 72 घंटे में ले सकते है इतना तो जानते हो कि नहीं?”

हमने एक नज़र जान्हवी को देखा। हमको लगा नहीं था कि इसको इतनी ‘कनोलेज’ हो सकती है। जब भी जान को लेने आता, ये हमको खा जाने वाली नज़रों से देखती थी। एक बार भी हमको नहीं लगा ये इत्ती समझदार है। आज ये वाली सिचुएशन नहीं होती तो हम इसकी बलैयाँ ले लेते लेकिन अभी लेने के देने पड़ चुके थे। हमने ज़बान खोली-

“सोचा था, लेकिन फिर पॉवर ऑफ़ पोसिटिव थिंकिंग ने मरवा दिया।“

“मरो तुम साले!” जान की सहेली ने हड़काते हुए बोला।

हमने लटके हुए मुँह से जान की तरफ़ देखा। हमको लगा जान भी कोई सवाल पूछेगी लेकिन उसके चेहरे पर पूरा ‘क्वेशचन पेपर’ था। हम इग्ज़ैम की तरह इसको भी ख़ाली छोड़ देना चाहते थे मगर जानते थे यहाँ तो ‘सप्लिमेंट्री कापी’ भरनी पड़ेगी। जान ने एक लम्बी साँस ली और कुर्सी पे बैठ गयी। माथा दीवार पे टिकाया। हमको दीवार पे लगा काग़ज़ नज़र आया। जान ने अपनी पढ़ाई का टाइम टेबल बना रखा था। हम पहली बार सेंटी हो गए। हमको लगा हमने ये क्या कर डाला। हमसे ग़लती तो हुई है मगर अब क्या किया जाए। हमको सम्पट नहीं पढ़ रहा था कि क्या करे। इतने में जान की सहेली की आवाज़ आयी।

“ख़ैर कोई बात नहीं। DNC हो जाएगी। अभी भी वक़्त है। डॉक्टर के पास चलते है।”

हमने जान की सहेली को फिर से वात्सल्य भाव से देखा। हम एक मिनिट में दूसरी बार सेंटी हो गए, हमको लगा पिछले जनम में ये हमारी मय्या रही होगी। हमने “ठीक है चलो’ बोलके जान की तरफ़ हाथ बढ़ाया। हमको लगा जान ‘DDLJ’ की काजोल की तरह हमारा हाथ थाम के गाड़ी में चल पड़ेगी लेकिन जान तो ‘गुप्त’ वाली काजोल निकली। हमको एकदम किलर टाइप नज़रों से देखकर बोली-

“हमको बच्चा चाहिए, तुम बोलो तुम क्या चाहते हो?”

“बच्चा?????” हमने ‘चा’ को थोड़ा देर तक खींचा। बदले में जान ने हमको अपनी ओर खींचा, और स्टूल पे बिठाया।

“क्यों? लव नहीं करते हमसे?” जान ने हमारा हाथ अपने हाथ लेकर पूछा। माँ क़सम इस पोज़ में वो जादू है कि वर्णमाला से ‘न’ अक्षर ही ग़ायब हो जाए। हमने हाँ कहा। और ये हाँ हमने दिल से कहा। प्यार तो हमको जान से था ही बल्कि जान हमको जान से प्यारी थी।

“हर क़दम पर साथ निभाओगे। ये बोला था न तुमने?” जान की आँखे हमारी आँखो में थी।

हमने पूछा “तुम क्या चाहती हो?”

“यार बच्चा तो हम रखना चाहते है मगर हमारी पढ़ाई, परीक्षा और बिना शादी का बच्चा। ये सब बहुत सोच के टेंशन है।”

पढ़ाई और परीक्षा तो ठीक था, मगर हम शादी पर अटक गए। ये वो चीज़ थी जो हम हमेशा टालने के मूड में रहते थे। हमको याद आया कि बचपन में भी स्कूल में हम नैतिक शिक्षा वाला चैप्टर पढ़ना टाल दिए थें, जिसका शीर्षक था ‘संयम में शक्ति’। हमको लगा वो चैप्टर पढ़ लेना चाहिए था। एक ही पल में हमको शिक्षा का महत्व समझ आने लगा था। हमारी आँखे जान के हाथ पे टिकी थी। जान का मुलायम हाथ अब भी हमारे हाथो में था। हम कुछ कहते इस से पहले जान बोली-

“सुनो, तुम शादी न करना चाहो तो कोई बात नहीं। हम अकेले पाल लेंगे बच्चे को। पढ़ाई न हो पाएगी तो न सही। शायद हमारी क़िस्मत में ही नहीं होगी।”

हमारे पाँव के नीचे से दरी खिसक गयी। मार्बल का फ़्लोर था तो कई बार खिसक भी जाती है। हमने पैर से ही दरी को ठीक किया और जान की तरफ़ देखा। पहली बार जान ने क़िस्मत शब्द का वाक्य में प्रयोग किया था वरना आज से पहले जान सिर्फ़ मेहनत और हुनर की बात करती थी।

हमको बड़ा गिल्टी टाइप फ़ील हुआ। हमने उसी वक़्त ठान लिया कि अब चाहे जो भी हो, अपने सामने बैठी इस लड़की की आँख में एक आँसू न आएगा। ये जानते हुए भी कि इसी मर्दानगी के चक्कर में ये कांड हुआ, हमारे अंदर का मर्द जाग गया था। हमने मुग़लिया सल्तनत के सुल्तान की तरह फ़रमान सुना दिया।

“हम शादी करेंगे तुमसे जान, और इस नन्ही सी जान का स्वागत करेंगे।”

हमने ये बोलते ही तय कर लिया था कि अब दुनिया को दिखाने का वक़्त आ गया है कि बाप क्या होता है।

जान की आँखो में आँसू आ गए। जान ने उठ के हमको गले लगाया। हम रुके नहीं, फ़रमान कंटिन्यू किया-

“ भले ही हम अब तक कमिटमेंट से भाग रहे थे लेकिन अब हम कुछ पार्ट टाइम जॉब करेंगे, तुम बस अपनी पढ़ाई का ध्यान रखना, बच्चे को हम संभाल लेंगे। बच्चे की वजह से तुम्हारे करियर पर आँच नहीं आने देंगे।”

हमने देखा जान कि पकड़ हमारी पीठ पर और मज़बूत हो गयी थी। हिंदी पिक्चर की हैप्पी एंडिंग वाला माहौल बन चुका था। जान की सहेली जान्हवी ने तालियाँ बजानी शुरू कर दी। उसकी नज़र में अपने लिए इज़्ज़त देख के हमारी नज़र में उसके लिए इज़्ज़त बढ़ गयी। आज से हमारी नयी ज़िंदगी का स्टार्ट अप होगा। हमने फ़ैसला सुना दिया।

जान और जान की सहेली ने एक दूसरे को देखा। दोनों बहुत ख़ुश हुए। थोड़ी देर पहले वाला सेंटी माहौल अब एकदम से हल्का हो चुका था और इस हल्के हुए माहौल में हमको याद हुआ कि हम सुबह से हल्के नहीं हुए थे। हमने जान से कहा “आते है एक मिनट।”

हम बाथरूम कि तरफ़ जाने लगे। जान ने हमको रोकना चाहा। पर हम नेचर लवर थे। नेचर कॉल को रोक नहीं पाए।

“आके बात करते हैं।”

ये बोलके जैसे ही हमने बाथरूम की तरफ़ फुर्ती से क़दम बढ़ाया वो दोनों हमारे पीछे भागती हुई आयी हमको रोकने के लिए, लेकिन तब तक हम अंदर घुस के कुंडी लगा चुके थे।  और हमारी नज़र भी पड़ चुकी थी, ठीक सामने वाश बेसिन पर रखी उस स्ट्रिप पर, जिसमें आयी एक नेगेटिव लाइन हमको मुँह दिखाकर चिढ़ा रही थी।

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4 comments

  1. A. Charumati Ramdas

    अब का कहें …जान ने जान निकाल ही दी…कहीं इरादा तो नहीं बदल दिया ना, ‘नेगेटिव’ देख के?!

  2. कहानी में ग़ज़ब की रवानी है , कसी हुई चुस्त लिखी गयी है। मज़ाहिया झलक लिए इसका मेन किरदार बेहद संवेदनशील है।
    बढ़िया मेसेज दिया गया इस छोटी सी कहानी के ज़रिए। बधाई हो!

  3. बढ़िया कहानी, क्या जबदरदस्त कहानी

  4. कमलेश पाण्डेय

    वाह बाबू कुश ! ज़बर्दस्त कहानी लिखे हैं… एक्के सांस में पढ़ गये हम… व्यंग्य का तड़का एकदम कड़क झांस पैदा कर रहा है..मस्त रहिये..लिखते रहिये..

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