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लाल-हरा चूड़ा और गोल्ड्मन साक्स

अनुकृति उपाध्याय को हम उनके हिंदी कहानियों के संग्रह ‘जापानी सराय’ तथा अंग्रेज़ी में दो लघु उपन्यासों ‘दौरा’ और ‘भौंरी’ के लिए जानते हैं।जानकी पुल पर वह समय समय पर वह यात्राओं पर लिखती रही हैं और इसमें भी उनकी नई शैली है। मसलन यह पढ़िए- मॉडरेटर

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साल – २०००, स्थान – हांगकांग का पूर्व और पश्चिम के संगम वाला अपूर्व महानगर। चमचम, लक़दक़। गगनचुंबी इमारतों के काँच-आमुखों पर चीनी नव वर्ष की सजावट और रिहायशी बिल्डिंगों की लॉबी में पॉन्सेटिया के धक लाल पत्तों वाले पौधे। सड़कों पर, इमारतों को परस्पर जोड़ते एलीवेटिड गलियारों में,  बहुमंज़िला बाज़ारों में – सब कहीं  आत्म्स्थ, व्यस्ततर लोगों की द्रुत-बहती भीड़। विक्टोरिया हार्बर पर फ़ैरी से उतर कर असमंजस से दुचित्ति मैं। दाएँ जाऊँ या बाएँ? आपस में कंधे छीलती इमारतों की भीड़ में किस तरफ़ है चुंकोंग सेंटर?

‘हनी, तुमने जीवन के तीन सबसे कठिन कामों में से दो एक साथ कर डाले – शादी और नए देश में आ बसना।’ हल्के रंग की आँखें मुझ पर करुणा से डाल कर उसने  कहा। वह मेरे पति के सहकर्मी की पत्नी थी। अमरीकी, आश्वस्त और बातूनी। मुझे आश्चर्य हुआ। जीवन को कठिन और सरल भागों में बाँट कर सोचा ही नहीं था। जो करना है, सो करना है और जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है, इन आर्ष वाक्यों को बचपन से सुनते, सहल-सरल कभी खोजा नहीं। और तीसरा सबसे कठिन काम? ‘जब करोगी तब ख़ुद जान जाओगी! अब कुछ दिन नए माहौल का आनंद लो, नई जगह में पैर जमाओ। नौकरी तो मिल ही जाएगी तुम्हें।’ बिना खोजे कैसे मिलेगी? और इस अनजान देश में? ‘गो विद द फ़्लो। बहाव में, बिन हाथ-पैर मारे बहो। जीवन जहाँ ले जाए, जाओ।’ लेकिन धारा में बहना? जीवन तो प्रवाह के विरुद्ध तैरना है, हर वक़्त ख़ुद को आजमाना। हाथ पर हाथ धर कर बैठने से कभी कुछ मिला है?‘क्यों नहीं? पूरा विश्व तुम्हारी सीपी है, उसमें मोती की तरह रहो।’

मोती? समुद्री जीव की नर्म देह में गड़ा-टीसता कंकड़, पीड़ा की परत-दर-परत से बना घनीभूत आँसू। मैं समझ नहीं पाई बहाव और मोती वाला दर्शन और गहरे  आत्मविश्वास से जन्मी धारणा कि पानी में बहते किनारे ख़ुद-ब- ख़ुद मिल जाते हैं। वह कुछ दिनों बाद अमरीका लौट गई और मेरा उससे दोबारा मिलना नहीं हुआ।

’नौकरी खोजने के लिए जुटना पड़ेगा।’ वह भारतीय थी, मेरी हमउम्र। दो-तीन सालों से होंगकोंग में।एक बड़ी कम्पनी में काम करती थी। ‘लोगों से सम्पर्क करो, मिलोजुलो, उनसे और लोगों का परिचय माँगो। नेटवर्किंग बहुत ज़रूरी है। हेडहंटिंग कम्पनियों को आवेदन दो।’ हेडहंटर्स यानी सिरों के शिकारी, कम्पनियों को जन खोज कर देने वाले लोग जिनके लिए मनुष्य जिन्स हैं।‘मैं जब पहले-पहल यहाँ आई थी, तो यही सब किया था। छःआठ महीने लगे थे। तुम क्वॉलिफ़ायड हो, अनुभव भी है लेकिन फ़ाइनेंस सेक्टर में बड़ी प्रतिद्व्न्द्विता है। हर छोटी छोटी बात का महत्त्व है। जैसे तुम्हारी इन चूड़ियों को ही लो।’

मेरा लाख का लाल-हरा चूड़ा। मुझे बचपन से चूड़ियों का शौक़ था। छोटे हाथों के लिए चूड़ियाँ मिलती नहीं थीं और मुझे तो काँच की ही चाहिए थीं। अंत को माँ ने साइकिल पर घूमने वाले मनिहार से   उसका रंग- बिरंगी चूड़ियों का सजावटी लच्छा ख़रीद दिया। गर्मियों की छुट्टी में उन छोटी-बड़ी, रंगारंग चूड़ियों से कंधों तक बाँहें भरे, गिरने के डर से हाथ अधर में उठाए देख कर अड़ोसी-पड़ोसी हँसते। कभी कभी मज़ाक़ में कोई गुदगुदा देता, बाँहें नीचे ढलक जातीं, चूड़ियाँ बिखर-झर जातीं। ऐसे में मेरा रोना-बिसूरना माँ को आज भी याद है। लेकिन यह लाख का चूड़ा और चूड़ियों से विशिष्ट था।  ब्याह वाला चूड़ा, महीन, सुबुक़, ख़ास तौर पर बनवाया गया, मेरे हाथ के नाप का। जीवन में एक बार पहना जाने  वाला लाल-हरा चूड़ा।‘ये अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं। यह भी देखा जाता है कि तुम वैश्विक माहौल में ढल पाती हो या नहीं। असीमिलेशन इज़ द की। हम पंजाबी भी शादी का चूड़ा पहनते हैं। मैंने होंगकोंग आते ही उतार दिया।’

‘तुम मीडिया कम्पनी में अपलाइ करो।’ उन्होंने कहा। वे उम्र में कुछ बड़ी थीं। बहुत सालों से विदेश में बसीं। डिनर पार्टी थी उनके यहाँ। ‘देखने और बोलने में अच्छी हो, तुरंत काम मिल जाएगा। फिर चाहो तो अपने फ़ील्ड का काम ढूँढती रहना, एक बार बाहर आना-जाना तो शुरू होगा।’

मीडिया? मेरा दूर का सम्पर्क नहीं मीडिया से। अंतर्मुखी, संकोची, नईपुरानी सभी जगहों में झिझकने वाली। ’मैं स्टार टीवी में कुछ लोगों को जानती हूँ। तुम्हें कनेक्ट कर दूँगी उनसे।’ ‘किस फ़ील्ड में काम ढूँढ रही हो वैसे?’ पास खड़े एक पुरुष ने पूछा। फ़ाइनेंस सुन कर हँसा। ‘फिर ये स्टार में क्यों काम करेगी, ये तो गोल्ड्मन में काम करेगी!’ व्यंग्य से उसकी भवें टेढ़ी थीं, ‘यहाँ फ़ाइनेंस वाले सब गोल्ड्मन से नीचे सोचते ही नहीं!’

गोल्ड्मन साक्स। विश्व का सबसे विख्यात, सबसे सफल वित्त संस्थान। ‘एसपिरेशनल है गोल्ड्मन में काम करना। द ब्लुएस्ट ऑफ़ ब्लू इन्वेस्टमेंट बैंक।’ पति ने बाद में बताया। ‘ज़रूर अप्लाई करो।’

आज गोल्ड्मन में इंटरव्यू का सातवाँ दिन था। गोल्ड्मन की लम्बी, कठिन और जटिल चयन-प्रक्रिया  के बारे में सबने आगाह  किया था। ‘इतने लोग इंटरव्यू लेंगे कि सर चकरा जाएगा और हफ़्तों लग जाएँगे।’ ठीक भी था। सात दिनों में जाने कितने लोगों से साक्षात्कार। सारे दिन सेंट्रल की सबसे ऐश्वर्यशाली, व्यावसायिक इमारत में अजनबियों से मिलना, अपने  बारे में दुहराना, गोल्ड्मन की विशिष्टता और कर्म-कठिन माहौल के बारे में सुनना। एक इंटरव्यू से दूसरे  को आते-जाते, क्यूबिकल और ऑफ़िसों में काम में जुटे लोगों को देखना। सात दिनों में सातों बार रास्ता भूली। ऊँची  इमारतों से घिर कर दिग्भ्रम हो जाता और पति हँसी से दुहरे होते फ़ोन पर रास्ता बताते। ‘गोल्ड मेडलिस्ट हो लेकिन सीधा-सीधा रास्ता याद नहीं रहता!’

आज भी टोह, टोह कर पहुँची। जिस प्रभाग में काम करना था, उसका अध्यक्ष दरवाज़े पर मिला। ‘टीम के सब लोगों से मिल चुकी हो । अब विभाग की अध्यक्षा से मिलना है। एशिया में गोल्ड्मन की जेनरल काउंसिल।’ जनरल काउंसिल माने विधि और नियमन के विषय में प्रमुख सलाहकार। बड़ी प्रखर हैं, कई लोगों ने कहा था। ‘विश्व की सबसे बड़ी लॉ फ़र्म में काम कर चुकी हैं बरसों। बेहद कुशाग्र और एकदम सीधीसपाट बात करने वालीं। मुलाक़ात के बाद तुम्हें पूछना नहीं पड़ेगा कि तुम चुन ली गईं या नहीं!’ फिर मेरे चेहरे पर एक निगाह डाल कर,‘तुम्हें घबराने की क्या बात? मेधावी और कुशल हो, निडर हो कर बात करना। लो, स्पेशल कॉफ़ी, एक घूँट में चुस्त-दुरुस्त!’ काली, बिन शक्कर, बिन दूध की अमेरिकानो कॉफ़ी का प्याला मुझे थमा कर कोने वाले ऑफ़िस की ओर इंगित। मैंने सूट-जैकेट की बाँहें हल्के से नीचे खींची और आगे ढलक आए चूड़े को पीछे कर लिया। मैंने न चूड़ा उतारा था न सास के द्वारा गले में

पहनाए पितर। लाल-पीले मौली धागे में पिरोए, उनके विश्वास से पूत, चाँदी के छोटे-छोटे बारह पत्रे तोशर्ट के भीतर छुप जाते थे लेकिन हाथ मिलाते समय अक़्सर चूड़ा आगे सरक आता। इतने साक्षात्कारों में कुछ लोगों ने उसे दबी जिज्ञासा से देखा था लेकिन कहा कुछ नहीं था।

द्वार  खोलते ही चमकती  टेबल के उस ओर  बैठी महिला उठ पड़ी। छोटे क़द की, छरहरी, सीधी-सतर। चेहरे और गर्दन की काग़ज़-सी पतली त्वचा पर महीन लक़ीरें जो मुस्कुराते ही किरणों सी खिल जातीं, प्रज्ञा से चमकती नीली आँखें। कोने में रखे सोफ़े की ओर इशारा किया। ‘मेज़ पर आमने-सामने बैठ कर मुद्दों पर बात हो सकती है, किसी को जाना-परखा नहीं जा सकता। पढ़ाई, अनुभव, गोल्ड्मन का वर्ककल्चर, कैरियर पर बात करते करते परिवार और विवाह का ज़िक्र आया। ‘शादी को बस चार महीने! कैसे मिलीं अपने पति से?’

माता-पिता ने मिलवाया सुन कर बारीक़ भवें उठीं। ‘अरेंज्ड मैरिज? इतनी पढ़ी-लिखी, होशियार हो कर भी?’

माता- पिता ने मिलवाया भर, पसंद तो हमारी ही थी, किसी की ओर से कोई ज़ोरज़बरदस्ती नहीं।

फिर  भी  दक़ियानूसी पद्धति है। एकाध बार मिलने से कैसी जान-पहचान? अनजान  व्यक्ति  के साथ जीवन बिताने का निर्णय कहाँ की समझदारी  है?’

मेरा चेहरा तमतमा गया। फिर कैसे किसी के बारे में जाना जाता है? कोर्टशिप के आकर्षण-काल में क्या आप सचमुच किसी को जान सकते हैं? और यदि मिलने और बात करने से कोई जानकारी नहीं होती तो मसलन इन इंटरव्यूज़ की ही क्या तुक? मेरी डिग्रियों से या मुझसे मिल कर

आप मेरे बारे में क्या जान पाएँगी? अपरिचय मिलने या साथ रहने से नहीं मिटते, सच में एक-दूसरे को समझने-जानने की कोशिश करने से मिटते हैं।

वे मुस्कुराईं। ‘बहुत बढ़िया! अच्छे तर्क! मुझे क़रीब-क़रीब लाजवाब कर दिया! एक वक़ील इससे ज़्यादा क्या प्रशंसा कर सकती है!’ वे उठ खड़ी हुईं। ‘अपोईंटमेंट लेटर वग़ैरह की औपचारिकता होती रहेगी, कल से आ जाओ।’  उन्होंने हाथ बढ़ाया। मेरा चूड़ा खड़का। ‘ये क्या हैं?’

 एक और दक़ियानूसी रीति, मैंने कहा।

वे ठठा कर हँसी। ‘ दैट्स चैकमेट आई गैस! लेकिन ये चूड़ियाँ वाक़ई ख़ूबसूरत हैं!’

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