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मिखाइल बुल्गाकोव के लघु उपन्यास का अनूदित अंश ‘ज़िंदा पॉरिज’

रशियन भाषा के प्रसिद्ध लेखक मिखाइल बुल्गाकोव को ‘मास्टर एंड मार्गरीटा’ के लेखक के रूप में जाना जाता है, उनके एक लघु उपन्यास का अनुवाद  आ. चारुमति रामदास जी ने मूल भाषा से हिन्दी में किया है, जो आजकाल के माहौल के अनुकूल लगता है। उसी अनुवाद से एक अंश पढ़िए-

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ज़िन्दा पॉरिज

 

दुगीनो स्टेशन की शासकीय सुरक्षा एजेंसी (गेपेऊ) का एजेंट शूकिन एक बहुत बहादुर इन्सान था. उसने कुछ सोचते हुए अपने लाल बालों वाले साथी पोलाइतिस से कहा:

“तो फिर, जाएँगे. हाँ? मोटरसाइकल निकाल…” फिर कुछ देर चुप रहने के बाद उस आदमी से मुख़ातिब होते हुए, जो बेंच पर बैठा था, वह आगे बोला, “आप बन्सी तो रख दीजिए.”

मगर दुगीनो की गेपेऊ की इमारत में बेंच पर बैठे सफ़ेद बालों वाले, थरथर काँपते उस आदमी ने बन्सी नहीं रखी, बल्कि रोने और बुदबुदाने लगा. तब शूकिन और पोलाइतिस समझ गए कि बन्सी को उसके हाथों से खींचकर अलग करना पड़ेगा. उँगलियाँ उससे चिपक गई थीं. शूकिन ने, जो बेहद ताक़तवर था, एक एक करके सारी उँगलियाँ मोड़-मोड़ कर दूर हटाईं. तब बन्सी को मेज़ पर रख दिया गया.

ये हो रहा था मान्या की मौत के दूसरे दिन तेज़ धूप वाली सुबह को.

 “आप हमारे साथ जाएँगे,” शूकिन ने अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच से मुख़ातिब होते हुए कहा, “हमें दिखाएँगे कि कहाँ और क्या-क्या हुआ था.” मगर रोक्क डर के मारे उससे दूर हट गया और उसने हाथों से स्वयँ को यूँ ढाँक लिया जैसे किसी भयानक दृश्य से अपने आप को बचा रहा हो.

 “मगर, दिखाना तो पड़ेगा,” संजीदगी से पोलाइतिस ने जोड़ा.

 “नहीं, छोड़ो उसे. देख रहे हो न, कि आदमी अपने बस में नहीं है.”

 “ मुझे मॉस्को भेज दीजिए,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने रोते हुए विनती की.

 “क्या आप कभी सोव्खोज़ वापस नहीं लौटेंगे?”

मगर रोक्क ने जवाब के बदले फिर से स्वयँ को हाथों से ढाँक लिया, और उसकी आँखों से भय टपकने लगा.

 “ठीक है, कोई बात नहीं,” शूकिन ने फ़ैसला कर लिया, “आप वाक़ई में सही हालत में नहीं हैं…मैं देख रहा हूँ. अभी थोड़ी देर में एक्स्प्रेस ट्रेन जाने वाली है, उसमें बैठ कर आप चले जाईये.”

इस बीच, जब तक स्टेशन के गार्ड ने अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच को पानी पिलाया, जिसे उसने नीले बदरंग मग पर दाँत किटकिटाते हुए पी लिया, शूकिन और पोलाइतिस ने कुछ सलाह-मशविरा कर लिया. पोलाइतिस का कहना था कि असल में कुछ भी नहीं हुआ है, सिर्फ रोक्क एक मानसिक रोगी है और उसे कोई भ्रम हुआ है. जबकि शूकिन का विचार था कि ग्राचेव्का शहर से, जहाँ आजकल सर्कस आई हुई है, कोई अजगर भाग निकला है. उनकी संदेहास्पद फुसफुसाहट को सुनकर, रोक्क उठ खड़ा हुआ. वह कुछ संभल चुका था, और उसने बाइबल के किसी प्रवर्तक की तरह हाथ फैलाते हुए कहा:

 “मेरी बात सुनिए. सुनिए. आप मेरी बात पर यक़ीन क्यों नहीं कर रहे हैं? वो थी. कहाँ है मेरी बीबी?”

शूकिन ख़ामोश और संजीदा हो गया और उसने फ़ौरन ग्राचेव्का को कोई टेलिग्राम भेज दिया. तीसरे एजेंट को शूकिन के निर्देशों के अनुसार, लगातार अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच के पास बने रहना था और उसके साथ मॉस्को जाना था. ख़ुद शूकिन और पोलाइतिस अभियान पर जाने की तैयारी करने लगे.

उनके पास सिर्फ एक ही इलेक्ट्रिक रिवॉल्वर था, मगर यह भी पर्याप्त सुरक्षा प्रदान कर सकता था. पचास गोलियों की क्षमता वाला सन् ’27 का मॉडेल, नज़दीकी रेंज के लिए फ्रेंच टेक्नोलॉजी का बेहतरीन नमूना, सिर्फ सौ कदम की दूरी से मार गिराता था, मगर दो मीटर के व्यास की रेंज का था, और इस घेरे के भीतर हर ज़िन्दा चीज़ का ख़ात्मा कर सकता था. निशाना चूक जाना बेहद मुश्किल था. शूकिन ने यह शानदार इलेक्ट्रिक खिलौना पहन लिया, जबकि पोलाइतिस 25 गोलियों वाली कमर में लटकाने वाली साधारण मशीन-गन से लैस हो गया, गोलियों का चार्जर ले लिया, और वे एक मोटरसाइकल पर, सुबह की ओस और ठण्डक में राजमार्ग से सोव्खोज़ की ओर निकल पड़े. स्टेशन और सोव्खोज़ के बीच की दूरी को, जो 20 मील थी, मोटरसाइकल ने पन्द्रह मिनट में पार कर लिया (रोक्क पूरी रात चलता रहा था, मौत के डर से रास्ते के किनारे वाली घास में बार-बार छुपते हुए), और जब सूरज काफ़ी तपने लगा, तो पहाड़ी पर, जिसे घेरते हुए तोप नदी बह रही थी, हरियाली में स्तम्भों वाला शक्करनुमा महल दिखाई दिया. चारों और मृतप्राय सन्नाटा था. सोव्खोज़ के ठीक प्रवेश-द्वार पर एजेंट्स ने गाड़ी पर जाते हुए एक किसान को पीछे छोड़ दिया. किन्हीं बोरों से लदा-फंदा, वह धीरे धीरे जा रहा था और जल्दी ही पीछे छूट गया. मोटरसाइकल ने पुल पार किया, और पोलाइतिस ने भोंपू बजाया ताकि किसी को बुला सके. मगर दूर, कोन्त्सोव्का के पागल कुत्तों के सिवाय कहीं से भी, किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया. अपनी गति को कम करते हुए मोटरसाइकल जंग लगे सिंहों के गेट की ओर आई. धूल धूसरित, पीले गेटर्स पहने एजेंट्स उछल कर नीचे उतरे, मोटरसाइकल को जंगले के पास खड़ा करके चेन वाला ताला लगाया और कम्पाऊण्ड में घुसे. सन्नाटे ने उन्हें चौंका दिया.

 “ऐ, कोई है!” शूकिन ज़ोर से चिल्लाया.

मगर उसकी दमदार आवाज़ का किसी ने जवाब नहीं दिया. अधिकाधिक चौंकन्ने होते हुए एजेंट्स ने कम्पाऊण्ड का चक्कर लगाया. पोलाइतिस ने त्यौरियाँ चढ़ा ली. शूकिन बड़ी गंभीरता से, अपनी सफ़ेद भौंहे चढ़ाए निरीक्षण करने लगा. किचन की बन्द खिड़की से झाँका तो पाया कि वहाँ पर कोई नहीं है, मगर पूरा फर्श पर प्लेटों के सफ़ेद टुकड़ों से अटा पड़ा था.

“तू समझ रहा है ना, उनके यहाँ कुछ तो ज़रूर हुआ है. अब मैं देख सकता हूँ. भयानक हादसा,” पोलाइतिस बुदबुदाया.

 “ऐ, वहाँ कौन है! ऐ!,” शूकिन चिल्लाया, मगर किचन के गुम्बज़ से टकराकर उसकी आवाज़ लौट आई.

”शैतान ही जाने!” शूकिन बड़बड़ाया. “वो एकदम सबको तो निगल नहीं ना सकता था. या फिर भाग गए हैं. घर के अन्दर चलते हैं.”

महल के स्तम्भों वाले बरामदे का दरवाज़ा पूरी तरह खुला हुआ था, और उसमें निपट ख़ामोशी थी. एजेंट्स अटारी पर भी गए, सारे दरवाज़े खटखटाए और खोले, मगर कोई ख़ास बात नहीं मिली और वे मृतप्राय पोर्च से निकल कर फिर से कम्पाऊण्ड में आ गए.

 “चारों ओर एक चक्कर लगाते हैं. ग्रीन-हाऊस की ओर,” शूकिन ने कहा, “सब कुछ ठीक से देख लेंगे, और वहाँ से फोन भी कर सकते हैं.”

क्यारियों को पार करके, ईंटोंवाले रास्ते से होते हुए एजेंट्स पिछले आँगन में पहुँचे, उसे पार किया और उन्हें ग्रीन-हाऊस के दमकते शीशे दिखाई दिए.

 “थोड़ा रुक,” शूकिन ने फुसफुसाकर कहा और कमर से रिवॉल्वर निकाल लिया. पोलाइतिस सतर्क हो गया और उसने मशीनगन निकाल ली. ग्रीन हाऊस में और कहीं उसके पीछे से एक विचित्र और गरजती हुई आवाज़ आ रही थी. ऐसा लग रहा था कि कहीं कोई इंजिन फुफकार रहा है. ज़ऊ-ज़ऊ…ज़उ-ज़ऊ…स्-स्-स्-स्… ग्रीन हाऊस फुफकार रहा था.

 “देख, सावधानी से,” शूकिन फुसफुसाया, और, एड़ियों की आवाज़ न करने की कोशिश करते हुए, एजेंट्स शीशों के बिल्कुल पास आ गए और उन्होंने ग्रीन हाऊस में झाँका.

पोलाइतिस फ़ौरन पीछे हटा, और उसका चेहरा विवर्ण हो गया. शूकिन का मुँह खुल गया और वह हाथ में रिवॉल्वर समेत जम गया.

पूरा ग्रीन हाऊस कीड़ों के पॉरिज जैसा खदखदा रहा था. छल्ले बनाते हुए और बिगाड़ते हुए, फुफकारते हुए और पलटते हुए, गोल-गोल घूमते हुए और सिरों को हिलाते हुए, ग्रीन हाऊस के फर्श पर विशालकाय साँप रेंग रहे थे. अंडों के टूटे हुए छिलके फर्श पर बिखरे थे और उनके शरीरों के नीचे चूर-चूर हो रहे थे. ऊपर काफ़ी पॉवरफुल इलेक्ट्रिक बल्ब जल रहा था, और इसके कारण ग्रीन हाऊस का भीतरी भाग एक अजीब डरावने प्रकाश से चमक रहा था. फर्श पर फोटोग्राफिक कैमेरों जैसे काले तीन बड़े बडे डिब्बे झाँक रहे थे, जिनमें से दो जो टेढ़े हो गए थे और सरका दिए गए थे, बुझ चुके थे, मगर तीसरे में प्रकाश का एक छोटा सा गहरा लाल धब्बा चमक रहा था. सभी आकारों के साँप तारों पर रेंग रहे थे, फ्रेम्स से लिपट रहे थे, रेंगते हुए छत पर बने छेदों से बाहर निकल रहे थे. ख़ुद इलेक्ट्रिक बल्ब पर एक बिल्कुल काला, धब्बों वाला, कई हाथ लम्बा साँप लटक रहा था, और उसका सिर बल्ब से पेंडुलम की भाँति झूल रहा था. इस फुफकार में कुछ झुनझुने जैसी आवाज़ भी थी, ग्रीन हाऊस से विचित्र, सड़ी हुई, तालाब जैसी दुर्गन्ध आ रही थी. और एजेंट्स ने देखे धूल भरे कोनों में बिखरे, धुंधले-से सफ़ेद अण्डों के ढेर, और एक विचित्र जलचर पक्षी, जो डिब्बों के पास निश्चल पड़ा था, और देखा दरवाज़े के पास भूरे कपड़ों में एक आदमी का मृत शरीर, जो संगीन के पास पड़ा था.

 “पीछे,” दाएँ हाथ से पोलाइतिस को पीछे दबाते हुए और बाएँ हाथ में रिवॉल्वर ऊपर को उठाए शूकिन चीख़ा और पीछे हटने लगा. ग्रीन हाऊस में सनसनाती बिजली की हरी लकीर फेंकते हुए उसने नौ बार फ़ायर किए. आवाज़ भयानक रूप से गूंजी, और शूकिन की गोलीबारी के जवाब में पूरे ग्रीन हाऊस में बदहवास हलचल होने लगी, और सभी छेदों से चपटे सिर झाँकने लगे. ये गड़गड़ाहट फ़ौरन ही पूरे सोव्खोज़ में फैल गई और दीवारों पर बिजलियों की चमक नाचने लगी. ‘चाख्-चाख्-चाख्-चाख् – पोलाइतिस पीछे हटते हुए फ़ायर किए जा रहा था. पीठ के पीछे एक अजीब चार पैरों वाली सरसराहट सुनाई दी, और पीठ के बल गिरते हुए पोलाइतिस अचानक भय से चिल्लाया. मुड़ी हुई टाँगों वाला, भूरे-हरे रंग का, भारी-भरकम नुकीले थोबड़े वाला, दाँतेदार पूँछ वाला, भयानक आकार की छिपकली जैसा प्राणी गोदाम के कोने से बाहर आया और, तैश में पोलाइतिस का पैर काट कर, उसे ज़मीन पर गिरा दिया.

 “बचाओ,” पोलाइतिस चीखा, और तभी उसका दायाँ हाथ उस प्राणी के जबड़े में जा गिरा और चूर-चूर हो गया, बाएँ हाथ को मज़बूती से उठाने की कोशिश करते हुए वह रिवॉल्वर को ज़मीन पर घुमाने लगा. शूकिन पलटा और हरकत में आ गया. एक बार उसने फ़ायर किया मगर गोली किनारे से निकल गई क्योंकि उसे डर था कि कहीं अपने साथी को ही न मार दे. दूसरी बार उसने ग्रीन हाऊस की दिशा में गोली चलाई, क्योंकि वहाँ से, साँपों के छोटे-छोटे सिरों के बीच से एक विशालकाय, ज़ैतूनी सिर बाहर निकला, जिसका धड़ सीधे उसकी ओर उछला. इस फ़ायर से उसने इस महाकाय साँप को मार डाला और फिर से, पोलाइतिस के नज़दीक उछलते हुए और घूमते हुए, जो मगरमच्छ के जबड़े में अधमरा हो गया था, एक जगह चुनी, जहाँ गोली चलाई जा सके, जिससे एजेंट को धक्का पहुँचाए बिना ख़तरनाक सरपट प्राणी को मार डाले. आख़िरकार उसे इसमें सफ़लता मिल ही गई. चारों ओर हरा प्रकाश बिखेरते हुए इलेक्ट्रिक रिवॉल्वर से दो बार फ़ायर हुए, और मगरमच्छ, उछलकर सीधा तन गया, पत्थर की तरह निश्चल हो गया और उसने पोलाइतिस को छोड़ दिया.

उसकी बाँह से खून बह रहा था, मुँह से खून बह रहा था, और उसने, बाएँ, तन्दुरुस्त हाथ पर मुड़कर टूटे हुए पैर को सीधा किया. उसकी आँखें बुझ रही थीं.

 “शूकिन…भाग…” वह हिचकियाँ लेते हुए बुदबुदाया.

शूकिन ने ग्रीन हाऊस की दिशा में कुछ और फ़ायर किए, उसके कई शीशे टूट कर बिखर गए. मगर तभी पीछे से, गोदाम की खिड़की से एक भयानक, ज़ैतूनी और लचीली कुण्डली, उछल कर बाहर आई, अपने पाँच हाथ के शरीर से कम्पाऊण्ड को पूरा घेरते हुए उसे पार किया, और पल भर में शूकिन के पैरों से लिपट गई. वह ज़मीन पर गिर पड़ा, और शानदार रिवॉल्वर उछल कर एक ओर को जा गिरा. शूकिन पूरी ताक़त से चीख़ा, फिर उसका दम घुट गया, फिर कुण्डली के छल्लों ने सिर्फ सिर को छोड़कर उसे पूरी तरह से ढाँक लिया. छल्ला एक बार सिर के ऊपर से गुज़रा उसकी खोपड़ी फाड़ते हुए, और तब, सिर चटक गया. इसके बाद सोव्खोज़ में एक भी फ़ायर की आवाज़ नहीं सुनाई दी. चारों ओर व्याप्त फुफकारती आवाज़ हर चीज़ निगल गई. और दूर कोन्त्सोव्का से हवा पे सवार एक विलाप ने उसे जवाब दिया, मगर अब यह समझना भी मुश्किल था कि ये किसका विलाप है, कुत्तों का या इन्सान का.

*****

अध्याय 12    

हिम-देवता गाड़ी पर

 

19 से 20 अगस्त, 1928 की रात को ऐसी अभूतपूर्व बर्फबारी हुई जिसके बारे में बूढ़े लोगों ने कभी देखा या सुना भी नहीं था. बर्फ गिरने लगा और पूरे दो दिनों तक लगातार गिरता रहा, तापमान को शून्य से 18 डिग्री नीचे ले गया. किंकर्तव्यविमूढ मॉस्को ने सारी खिड़कियाँ , सारे दरवाज़े बन्द कर लिए. सिर्फ तीसरे दिन के अंत में जनता समझ पाई कि इस बर्फबारी ने मॉस्को और उसके अंतर्गत उन असीम प्रदेशों को बचा लिया है, जिन पर सन् 1928 का महान संकट आया था. मोझाइस्क के निकट का घुड़सवार दस्ता, जो अपनी तीन चौथाई हिस्सा खो चुका था, पूरी तरह थक चुका था, ज़हरीली गैस के हवाई दस्ते रेंगते हुए घृणित जीवों को आगे बढ़ने से न रोक सके, जो अर्धगोल बनाते हुए पश्चिम, दक्षिण –पश्चिम और दक्षिण दिशाओं से मॉस्को की ओर बढ़े चले आ रहे थे.

मगर बर्फ ने उन्हें दबा कर मार डाला. घृणित जीव दो दिनों तक -18 डिग्री तापमान बर्दाश्त न कर पाए, और अगस्त की बीस तारीख़ आते-आते जब बर्फ़ ग़ायब हो गया, सिर्फ नमी और गीलापन छोड़कर, हवा में नमी छोड़ते हुए, वृक्षों पर अप्रत्याशित ठण्ड से मर चुकी हरियाली को छोड़ते हुए, तो युद्ध जारी रखने के लिए कोई बचा ही नहीं था. दुर्भाग्य समाप्त हो गया था. जंगल, खेत, और असीम दलदल अभी तक रंगबिरंगे अण्डों से अटे पड़े थे, कभी-कभार विचित्र, विदेशी, अनदेखे चित्रों से ढँके, जिसे लापता रोक्क गन्दगी समझ बैठा था, मगर ये अण्डे अब पूरी तरह नुक्सान-रहित थे. वे मृत थे, उनके भीतर के भ्रूण ख़त्म हो चुके थे.

धरती के विस्तीर्ण प्रदेश काफ़ी समय तक सड़ते रहे मगरमच्छों और साँपों के मृत शरीरों के कारण, जिन्हें जन्म दिया था एक रहस्यमय, गेर्त्सेन स्ट्रीट पर वैज्ञानिक आँखों के नीचे उत्पन्न हुई किरण ने, मगर अब वे बिल्कुल भी ख़तरनाक नहीं थे, दुर्गन्धयुक्त, उश्णप्रदेशीय दलदल के ये ख़तरनाक जीव तीनों प्रदेशों की ज़मीन पर भयानक दुर्गन्ध और सड़ान छोड़कर दो दिनों में ही मर गए.

लम्बी महामारियाँ फैलीं, लोगों और साँपों के मृत शरीरों के कारण कई तरह की संसर्गजन्य बीमारियाँ फैलीं, और सेना काफ़ी समय तक कार्यरत रही, मगर अब ज़हरीली गैस छिड़कने के लिए नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग उपकरणों से, कैरोसीन के कनस्तरों से और होज़ पाईप से लैस, वह ज़मीन की सफ़ाई कर रही थी. सफ़ाई कर दी गई, और सन् ’29 के बसंत तक सब ख़त्म हो गया.

और सन् ’29 के बसंत में मॉस्को फिर से रोशनियों से थिरकने लगा, गर्मी बिखेरने लगा, घूमने लगा, और फिर से पहले ही की तरह यांत्रिक गाड़ियों की घर-घर सुनाई देने लगी, और क्राईस्ट-चर्च के गुम्बद के ऊपर मानो धागे से लटकता, चाँद का हंसिया नज़र आने लगा, और अगस्त ’28 में पूरी तरह जल चुकी दो मंज़िला इन्स्टिट्यूट की जगह पर एक नया प्राणि-विज्ञान महल बनाया गया, और उसका डाइरेक्टर बना असिस्टेंट-प्रोफेसर इवानोव, मगर अब पेर्सिकोव नहीं था. लोगों की आँखों के सामने फिर कभी ऊँगली का मुड़ा हुआ, यक़ीन दिलाता, हुक नहीं प्रकट हुआ और फिर कभी किसी ने कर्कश टर्राहट नहीं सुनी. किरण के बारे में और सन् ’28 के विनाश के बारे में पूरी दुनिया लम्बे समय तक बहस करती रही, लिखती रही, मगर फिर प्रोफेसर व्लादीमिर इपातिच पेर्सिकोव का नाम कोहरे में ढँक गया, बुझ गया वैसे ही जैसे अप्रैल की रात में उसके द्वारा खोजी गई लाल किरण बुझ गई थी. इस किरण को फिर से प्राप्त करना संभव न हो सका, हाँलाकि कभी कभी बेहद सज्जन, और अब प्रोफेसर बन चुके प्योत्र स्तेपानोविच इवानोव ने कोशिश तो की थी. पहले चैम्बर को तो पेर्सिकोव की मौत की रात को उत्तेजित भीड़ ने नष्ट कर दिया था. तीन अन्य चैम्बर्स ज़हरीली गैस के स्क्वाड्रन की साँपों के साथ पहली लड़ाई में निकोल्स्कोए के सोव्खोज़ ‘लाल-किरण’ में जल गए थे, और उन्हें फिर से बनाना संभव नहीं हुआ. शीशों और लैन्सों की संरचना एवम् उनका संयोग चाहे कितना ही सरल क्यों न रहा हो, इवानोव की लाख कोशिशों के बावजूद उनका पुनर्निमाण नहीं कर सके. ज़ाहिर है, ज्ञान के अलावा, इसके लिए किसी विशेष चीज़ की ज़रूरत थी, जो पूरी दुनिया में सिर्फ एक व्यक्ति के पास थी – स्वर्गीय प्रोफेसर व्लादीमिर इपातिच पेर्सिकोव के पास.

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One comment

  1. A. Charumati Ramdas

    इस लघु उपन्यास का शीर्षक है – “विनाशकारी अंडे” और यह सन् 1925 में प्रकाशित हुआ था…

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