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सीरज सक्सेना की पुस्तक ‘कला की जगहें’ का अंश

सीरज सक्सेना उन गिने चुने कलाकारों में हैं जो नियमित रूप से लेखन भी करते हैं। दुनिया भर में कला के संदर्भ में यात्राएँ करने वाले सीरज की किताब आई है ‘कला की जगहें‘, जो रजा पुस्तकमाला के अंतर्गत संभावना प्रकाशन हापुड़ से प्रकाशित हुई है। उसी पुस्तक का एक अंश- मॉडरेटर

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लिखना पहले शुरू हुआ या देखना? अगर यह मैं स्वयं से पूछूँ तो इसका उत्तर हैकृ देखना। देखना यात्राओं से शुरू हुआ। पिता मध्य प्रदेश राज्य परिवहन में कार्यरत थे। अतः बचपन से ही बस में सुदूर यात्रायें शुरू हुई। मेरे देखने को विस्तार इन्हीं यात्राओं से मिला है। घूमने का यह सिलसिला पढ़ाई के साथ-साथ बढ़ता रहा और कब आदत में शामिल हो गया पता ही नहीं चला। कला अध्ययन पूरा होते ही १९९७ में जापान के अन्तरराष्ट्रीय सिरेमिक कला समागम में चयन हुआ। दो महीने जापान के टोकोनामे, क्योतो में रहकर, ओसाका कला संग्रहालय, शिगाराकी सिरेमिक पार्क, हौण्डा सिटी नागोया और टोक्यो देखा। वरिष्ठ कलाकार व गुरु तुल्य श्री शोईची ईदा के साथ रहकर विभिन्न माध्यमों में उनके कलाकर्म व कला-दृष्टि व परिपक्व सौन्दर्य बोध को नज़दीक से देखा। यह यात्रा कई मायने में मेरे लिये बहुत बड़ी सीख की तरह है। उस वक़्त कम ही लिखना हुआ पर श्री ईदा के साथ उनके स्टूडियो में काग़ज़, रंग व मिट्टी के प्रति उनके लगाव व कला माध्यम की तरह बर्ताव को देखना मेरे लिये उच्च कला अध्ययन की तरह ही रहा।

जापानी कला की सरलता में बसे घने सौन्दर्य की सादगी के महत्त्व व उसमें छिपी अध्यात्म की ख़ुशबू को महसूस करना एक दिव्य अनुभव है और जहाँ भी जाता हूँ इस सौन्दर्य के अन्तरराष्ट्रीय स्वीकार्य को महसूस करता हूँ। महीन हस्तनिर्मित काग़ज़ की परतों पर उन्हें कई तरह के औज़ारों के साथ काम करते हुए देखना काग़ज़ की एक नयी कलात्मक परिभाषा को देखने की तरह रहा। काग़ज़ मानो हमारी मानवीय संवेदना को समेटे हुए इस संसार व इस पृथ्वी का एक पतला, महीन व नज़रअंदाज़ न किये जा सकने वाला एक छिलका हो।

श्रीलंका में ‘पराक्रम समुद्र’ नामक एक बड़े तालाब के किनारे देर तक ठहरना व जंगल में से होकर गुज़री सड़क के किनारे घनी झाड़ियों में हाथी के एक झुण्ड को देखना एक प्राकृतिक अनुभव रहा है।

अपनी प्रथम लम्बी साइकिल यात्रा के दौरान मध्य प्रदेश के लोक व आदिवासी क्षेत्रों का दौरा करते समय भी डायरी में तमाम मानुषिक व प्राकृतिक व रोमांचक अनुभव क़ैद किये हैं, पर वह डायरी अब न जाने कहाँ गुम हो गयी है।

कलाकार मित्रों को आज भी जब पत्रा लिखता हूँ तो वह भी हृदय की ही डायरी की तरह है जिसे मैं सांझा करता हूँ, कैनवास पर रंग लगाता हूँ वह भी एक तरह का लिखना ही है।

अपने आलसी स्वभाव के कारण मैं कई महत्त्वपूर्ण यात्राओं के बारे में अब भी नहीं लिख पाया हूँ पर पोलैण्ड में देखें ‘मृत्यु शिविर’ के बारे में चाहते हुए भी नहीं लिख पा रहा हूँ। ओश्वित्सि (ओशविण्च) में पारदर्शी शीशे के बॉक्स में रखे इतने बालों को मैंने एक साथ कभी नहीं देखा था। अनगिनत छोटे-बड़े चश्मों को भी और छोटे-बड़े जूते-चप्पलों का भी इतना बड़ा ढेर पहले कभी नहीं देखा था। यहाँ यह सब देखकर अवसाद की जो सिरहन पूरी देह में बही उसका प्रभाव अब तक बना है और इस अनुभव के बारे में सोच कर ही अवसाद गहरा जाता है। इतना मायूस कर देने वाला दृश्य पहले कभी नहीं देखा। कितने हज़ारों-लाखों लोगों को, एक ज़िद के आक्रोश ने, मृत्यु-द्वार तक अमानवीय ढंग से पहुँचाया इसका हिसाब कोई गणितज्ञ ही लगा सकता है। तकनीक का प्रयोग भी इस नृशंस हत्या में किया गया है। डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों ने भी इस काम में अपने-अपने हुनर का इस्तेमाल किया है जबकि काम यह है कि तकनीक, विज्ञान और विद्या मानव की भलाई के लिये हैं पर विज्ञान ही है जो बन्दूक, तोप और मिसाइलें भी बनाता है। आत्म-सुरक्षा से हटकर यह असला, बारूद, दम्भ या खिलौना बन जाते हैं और पूरी मानव-जाति को शर्मसार करते हैं।

ताइवान में अपने सिरेमिक रेज़िडेंसी प्रवास के दौरान लिखना, साइकिल चलाना व ताओती सीखना नियमित जारी रख सका और आज जब वह वर्णन पढ़ता हूँ तब आश्चर्य होता है कि मैं इतना कुछ कैसे लिख सका। इतने देशों की यात्रा करने के बाद यह लगता है कि हमें अपने आकार पर अब ध्यान देने व अपने देश के बड़े भूगोल का गुणगान करने के बजाय समाजशास्त्रा व ज़रूरी सेवाओं के बेहतर उपयोग के बारे में कुछ प्रचार-प्रसार के अलावा गम्भीर काम भी करना चाहिये। दूसरे देशों की नगर पालिकायें भी अपने बजट में अन्तरराष्ट्रीय स्तर के महत्त्वपूर्ण कला आयोजन करती हैं। उनके महापौर व अधिकारी यूँ सहज आम नागरिक की तरह सत्ता के आडम्बर से दूर रहते हुए अपना काम करते हैं। यह बात हमें अपनानी चाहिये। छोटे देशों में क़ानून, सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवाएँ कैसे अच्छे से काम कर पाती हैं। अपने लालच व भ्रष्ट व्यवस्था से मुक्ति पानी चाहिये। श्रीलंका, नेपाल, थाईलैण्ड, लातविया, इण्डोनेशिया व भूटान आदि हमारे पड़ोसी देशों से हमें सीखना चाहिये। इन देशों में स्कूली शिक्षा के स्तर बेहतर और सस्ते हैं। हमारे देश में शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था नागरिक को स्वयं अपनी जेब के मुताबिक ख़रीदनी पड़ रही है। शासन की न दूरसंचार सेवा में लोगों का विश्वास रह गया है न ही सरकारी स्कूलों और अस्पतालों पर यक़ीन है। शायद जब तक सरकारी अधिकारी व नेता स्वयं शासकीय स्कूलों में अपने बच्चों को नहीं पढ़ायेंगे तथा ख़ुद का इलाज सरकारी अस्पतालों में नहीं करायेंगे या जब तक वह तथा अन्य सेलिब्रिटी पब्लिक यातायात साधनों का इस्तेमाल नहीं करेंगे तब तक परिवर्तन नहीं आ सकेगा।

आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारा देश प्रगतिशील है जबकि कई छोटे देश बर्बाद होने के बावजूद भी अपने पैरों पर स्वयं खड़े हुए हैं और अब विकसित देशों की सूची में सम्माननीय जगह ले चुके हैं पर हमारे यहाँ अब भी शौचालय, सड़कें व बिजली ही अभी घर-घर तक पहुँचायी जा रही है।

कुम्हार कुम्हला चुके हैं। ठठेरा अपना ठिया उठा चुका है। हाथ का हुनर उड़न-छू हो रहा है और इनको पोसने व बढ़ाने वाली संस्थाओं की संख्या व उनके बजट बढ़ रहे हैं। कभी मौक़ा नहीं आया पर मैं परिवार नियोजन मन्त्रालय से यह पूछना चाहूँगा कि जब से यह विभाग जनकल्याण के लिये बना है तब से जनसंख्या वृद्धि की दर कम हुई है या अधिक? जैसा अभी हुआ इस तरह का विषयान्तर भी होता रहता है।

अपनी दूसरी काठमाण्डू और पोखरा यात्रा के बारे में भी नहीं लिख पाया हूँ। पोखरा में हिमालय की ‘फिश टेल’ माउण्टेन पोखरा प्रवास के समय लगभग हर दिन देखी। पहले दिन बादलों के पीछे छिपी इस पहाड़ी को हम अपने चित्राकला शिविर के आकाश में नहीं देख सके पर ज्यूँ ही बादल छटे और ‘फिश टेल’ माउण्टेन की बर्फ़ीली चोटियाँ देखीं तो मन रोमांच से भर गया था।

काठमाण्डू में भागमती नदी के तट पर पशुपतिनाथ मन्दिर के प्रांगण में सुबह पूजा-अर्चना व भक्ति भरे माहौल में रहस्य भी महसूस होता रहा। महादेव का महाकाल रूप व पशुपतिनाथ का यह चहुँमुखी दर्शन रहस्यमयी है; यहाँ पुनः आने का मन है। पोखरा में अपने इण्डोनेशियाई कलाकार हादी के साथ गोलगप्पे खाना भी मैं कभी नहीं भूलता हूँ। पोखरा वादियों की नगरी है। यहाँ युवा कहानीकार व कवियों के साथ दो यादगार शामें बीतीं। तीर्थ श्रेष्ठ यहाँ के वरिष्ठ और प्रसिद्ध कवि हैं। उनसे कविता और चित्रा के सम्बन्ध में कुछ रोचक बातें हुईं। युवा कवि दीपक समीप, सरस्वती प्रतीक्षा के साथ देर रात तक बैठकें हुईं। नेपाली भाषा में भी नया लिखने वाले हैं और पढ़ने वाले भी। भाषा का यह प्रभाव शुभ है। यहाँ के मन्दिरों को भूकम्प ने बहुत बड़ा झटका दिया है पर उसका पुनरुद्धार देख यहाँ के काम की प्रशंसा करना लाज़मी है। लकड़ी पर यहाँ की महीन कारीगरी शिल्प में एक नयी आत्मा व ऊर्जा भरती है। हर शाम भोजन के वक़्त नेपाली लोक नृत्य का भी अनुभव आनन्ददायी रहा है। नेपाल में पारम्परिक नेवारी भोजन का ज़मीन पर बैठकर आनन्द भी अद्भुत रहा। कलाकार मित्रा एरिना के पिता की बर्तनों की दुकान पर हम कलाकारों का समूह देर तक ठहरा रहा। वहाँ से सभी ने ख़ूब ख़रीदारी की। पीतल, ताम्बे और कांसे के बर्तन यहाँ सुन्दर हैं। लोटे और घड़ों की लम्बी गर्दननुमा डिज़ाइन आकर्षक है।

भागमती नदी के किनारे हिन्दू रीति-रिवाज़ से मृत देह का अन्तिम संस्कार देखना बनारस के मणिकर्णिका घाट के दृश्य-अनुभव के समान है। नेपाली कलाकार मित्रों की मित्राता भी अब गहरी और पुरानी हो चली है। नेपाली कलाकार मित्रों के बीच आपस में भी घनिष्ठता, पारदर्शिता व मित्राता देख बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

श्रीलंका के शान्तिप्रिय समाज को देख मैं लगभग दंग ही रह गया। वहाँ बसों के कण्डक्टर यात्रियों को बड़ी शालीनता व बिना शोर किये या चिल्लाये बुलाते हैं। न ही बसों में सीमा से अधिक यात्रा बैठाये जाते हैं। जीवन स्तर भी यहाँ से बेहतर है।

जीवन एक सुन्दर भेंट है और हमें हक़ है कि हम सभी अच्छे से जियें व अपने पर्यावरण व प्रकृति का भी ध्यान रखें। हमारी बढ़ती आबादी व गिरती शिक्षा-प्रणाली ही हमें बेहतर जीवन-शैली जीने का सपना देखने में बनाया गया एक रोड़ा है। सिर्फ़ टाई और कोट पहनने से हमारी जीवन-शैली नहीं सुधरने वाली इसके लिये हमें अन्य समाजों के भी क़रीब से दर्शन करने चाहिये।

ताइवान, जर्मनी, पोलैण्ड, सरबिया, थाईलैण्ड, नेपाल, श्रीलंका, लिथुआनिया, लातविया और चीन आदि की अपनी कला-यात्राओं में मैंने वहाँ गाँधी जी के विचारों की साक्षात् उपस्थिति देखी है। इन देशों में नागरिक सुरक्षित हैं। अपनी सुरक्षा के प्रति उन्हें अपनी इतनी ऊर्जा व समय नहीं लगाना पड़ता है जितना कि हम लगाते हैं। सहजता, सरलता व सादगी पसन्द समाजों में गाँधी दर्शन सुखद अनुभव है। वहाँ समाज में अनावश्यक आडम्बर व झूठ का बोलबाला नहीं है। हमारे समाज में जात-पात व दिखावा मानो एक अहम् गुण है।

अब सोचता हूँ तो गाँधीजी की दूरदर्शिता पर आश्चर्य होता है। शायद गाँधीजी जानते थे कि आज़ादी के बाद भारतीय समाज में हिंसा, असत्य, घृणा व गन्दगी का परचम लहरायेगा। अतः अपने पूरे जीवन में वे प्रेम, अहिंसा और सत्य को हम भारतीयों के लिये दुहराते रहे। हमने उन्हें बापू और महात्मा तो बना दिया पर उनकी बातें स्वीकार नहीं की। अब तो युवा पीढ़ी उन पर चुटकुले गढ़ती है और शिक्षाविदों ने उन्हें महज़ एक खानापूर्ति बतौर किताबों में शामिल किया है। गाँधी और टैगोर अपनी हर विदेश यात्रा में भारत के सुपरमैन की तरह मैंने देखे हैं। टैगोर की कविता भारत को सम्मान दिलाती है तथा गाँधी की सादगी विदेशियों को चौंकाती है। हमारे पाखण्ड पर कभी मुझे हैरानी होती है। रक्षाबन्धन जैसा अनूठा व महत्त्वपूर्ण त्यौहार हमारे यहाँ है। शक्ति, धन, कला, प्रकृति, बल, विद्या आदि सभी महत्त्वपूर्ण स्त्रोत देवी या माँ के रूप में हम मानते हैं फिर भी स्त्रियों के प्रति सम्मानीय दृष्टिकोण का हमारे समाज में गहरा लोप है। मेरी यात्राएँ सिर्फ़ बाहरी भूगोल की नहीं हैं अपितु भीतरी विस्तार, समृद्धि व दृश्य परिपक्वता का एक सुन्दर बहाना है। मेरे कवि-मित्रा व पड़ोसी पीयूष दईया ने जब मेरी ये हस्तलिखित डायरियाँ देखीं तो वे इसे किताब का रूप देने में तल्लीन हो गये। उन्होंने ही ख़ुद कला व साहित्य जगत् के महत्त्वपूर्ण रज़ा न्यास के अन्तर्गत ‘‘रज़ा पुस्तक माला’’ के लिए इस पुस्तक का छपना तय किया है। इस पुस्तक के प्रकाशन का श्रेय उन्हीं को जाता है। मेरे लेखन के नैरन्तर्य में वे एक अच्छे पड़ोसी की तरह उत्साहवर्धन करते व ढाढस बाँधते रहते हैं। उम्मीद करता हूँ कि मेरा लिखा युवा कलाकारों व पाठकों को और बेहतर लिखने के लिये उकसायेगा

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 दक्षिण अफ्रीका की यात्रा

मैक्स समूह के मालिक श्री अनलजीत सिंह के निमन्त्रण पर दक्षिण अफ्रीका की मेरी कला-यात्रा तय हुई। दुबई की मरुभूमि से उड़ कर अन्तहीन रेगिस्तान को पार कर नौ घण्टे की लम्बी और थकाऊ (व कुछ उबाऊ भी) हवाई यात्रा के दौरान अपनी खिड़की से बादलों के गुच्छे देखना एक रोमांचकारी अनुभव रहा। रेगिस्तान में रेत से बने छोटे-बड़े टीले और पहाड़ व उनसे निकलती, उनसे गुज़रती पगडण्डियाँ एक अमूर्त चित्रा रचती हैं। प्रकृति को सूक्ष्मता से देखना ही अमूर्तन देखना व रचना है। बतौर चित्रकार अपनी इन यात्राओं से अपने इस विचार पर यक़ीन और पुख़्ता होता है।

केपटाउन में मेरे सिरेमिक कलाकार मित्रा इण्डिले रहते हैं। ताइवान के सिरेमिक संग्रहालय द्वारा आयोजित कला रेज़िडेंसी कार्यक्रम में वहाँ से मेरे लौटने के बाद वे तीन महीने रहे थे और उन्होंने मिट्टी में अपने शिल्प रचे थे। ईमेल व सोशल मीडिया पर ही उनसे मित्राता हुई है।

जोहन्सबर्ग में उनके कुछ कलाकार मित्रा हैं और मेरे यहाँ दो दिन के प्रवास में वे चाहते हैं कि मैं भी उन कलाकारों से मिलूँ। कोलिन मूलतः यहीं की रहने वाली हैं और उन्हें मैंने संदेश में अपने आने व अपनी होटल (जहाँ मैं ठहरा हूँ) के बारे में बता दिया था। कोलिन से मिलने का सुबह का वक़्त तय हुआ। वे शहर की एक वरिष्ठ सिरेमिक कलाकार हैं। तय समय पर वे होटल की लॉबी में पहुँची। उनसे व किसी दक्षिण अफ्रीका के कलाकार से मेरी यह पहली मुलाक़ात है। उनके साथ उनकी छात्रा हरगुन कौर भी हैं। हरगुन भारतीय हैं और कुछ समय से यहाँ रह रही हैं और कोलिन से उनके स्टूडियो में चीनी मिट्टी की कला सीख रही हैं। चण्डीगढ़ कला विद्यालय से हरगुन ने कला शिक्षा पूर्ण की है।

औपचारिक परिचय के बाद कोलिन के साथ शहर भ्रमण का कार्यक्रम बना। वह मुझे शहर की कुछ प्रमुख कला वीथिकाएँ व कला स्टोर्स ले गयीं। किसी कलाकार के साथ उसका शहर देखना तथा शहर में उनके प्रिय स्थानों को देखना व उनके बारे में जानना एक महत्त्वपूर्ण अनुभव है।

ऐवेरार्ड रीड शहर की पुरानी कला वीथिका है। विथिका के बाहर कुछ शिल्प प्रदर्शित हैं। गैलरी की बाहरी दीवार पर हरे पत्तों की बेल बिछी है। छोटी-छोटी पत्तियों से पूरी दीवार हरी हो गयी है। घोड़े पर एक स्त्रा बैठी है। यह घोड़ा किसी स्वप्न का घोड़ा है और स्त्रा एक परी की तरह है। सड़क से आते-जाते हुए राहगीर इस बड़े शिल्प को देखते हुए अपने यथार्थ लोक में अपनी-अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं और हम गैलरी के भीतर प्रवेश कर रहे हैं। गैलरी के मुख्य द्वार की एक बड़ी दीवार के सामने, पत्थरों की महीन कतरनों से बना, एक शिल्प रखा है। यह एक आदमकद भीमकाय चेहरा है। पीछे सफ़ेद दीवार पर हरी बेल अनगिनत पत्तियों को सहेजे दीवार से लिपटी है। दीवार पर कुछ हरे आकार और हरी रेखाएँ बन रही हैं। इस मुखाकृति शिल्प को देख वरिष्ठ कवि (मेरे प्रिय कवि) की एक कविता पंक्ति ‘‘हर चेहरा विदा है’’ सहज ही याद आयी।

गैलरी के भीतर धातु में बनी कुछ कृतियाँ, कुछ चित्रा और कुछ कला संस्थापन प्रदर्शित हैं। यहाँ प्रदर्शित हर कलाकृति समकालीन और गम्भीर है। इस गैलरी में कलाकारों व कलाकृतियों का चयन सूझबूझ और परिपक्व दृष्टि से किया गया है। इस गैलरी ने २0१३ में अपने १00 साल पूर्ण किये हैं और यह प्रदर्शनी इन्हीं १00 साल के उत्सव के बतौर लगायी गयी है।

कोलिन और हरगुन साथ हैं पर हम तीनों अपने-अपने एकान्त में ही अपनी-अपनी रुचि और पसन्द की कलाकृतियों के सामने खड़े हैं। गैलरी के बाहर क़रीब आठ बड़े शिल्प प्रदर्शित हैं, जो गैलरी के बाहरी वातावरण को कलामयी बना रहे हैं। यह गैलरी अपनी कला का प्रसार बाहर भी कर रही है।

सड़क के दोनों ओर, दो-दो हिस्सों में, यह गैलरी फैली हुई है। सीढ़ियों और गलियारों से होकर इस गली के दोनों तलों को देखा जा सकता है। हम गैलरी के ऊपरी तल पर हैं और यहाँ से शहर का भूगोल दूर तक देख रहे हैं। एक सुन्दर शहरी भूदृश्यांकन इस गैलरी की छत से खड़े होकर देर तक हम लोगों ने देखा व मोबाइल क़ैमरे से सेल्फ़ी तस्वीरें भी लीं।

यहाँ भी भारत की तरह राइट हैण्ड ड्राइविंग है। यहाँ हर वाहन, ट्रैफिक नियम का, बख़ूबी पालन करता है। एक विकसित देश के लिये यह आदत लाज़मी है। कार चलाते हुए कोलिन इस शहर की कला और कलाकारों के बारे में बताती रहीं। अब कोलिन हमें एक अन्य कला और क्राफ़्ट गैलरी ‘किम सेक्स’ में ले जाती हैं। किम सेक्स एक दो मंज़िलों वाला स्टोर है। यहाँ कपड़ो से बनी कलाकृतियाँ, चीनी मिट्टी और धागों से बने अनूठे पात्रा, छोटे-बड़े सुन्दर झूले आदि अनेकों छोटी-बड़ी कला वस्तुएँ देखी। दक्षिण अफ्रीका के कौशल को यहाँ बख़ूबी प्रदर्शित किया गया है। हाथ की कढ़ाई, बुनाई और कपड़े पर छपे प्रिन्ट यहाँ देखने लायक हैं। हर छोटी-बड़ी कलाकृति को यहाँ सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रदर्शित किया गया है। इमारत की बाहरी सज्जा पारम्परिक दक्षिण अफ्रीका शैली में चित्रित की हुई है।

बातों-बातों में मैंने कोलिन से इस शहर में बने गाँधी स्क्वायर (चौक) का भी उल्लेख किया। इस चौक के बारे में मुझे मेरे वरिष्ठ कथाकार मित्रा व पड़ोसी उदय प्रकाश ने विस्तार से बताया था, पर अचरज की कोलिन और हरगुन को इस चौक के बारे में नहीं मालूम था। उदय प्रकाश जी जब विश्व कवि सम्मेलन में यहाँ आये थे तब उन्होंने यह चौक देखा था। गाँधी चौक के बारे में मेरे उत्साह को देख तुरन्त ही कोलिन ने अपने मोबाइल फ़ोन में गूगल सर्च किया और गाँधी स्क्वायर ढूँढ निकाला। उन्होंने बड़े हर्ष से कहा कि यह चौक मण्डेला चौक से क़रीब ही है। स्टोर से निकलकर अब कोलिन की कार मण्डेला और गाँधी चौक की ओर चल पड़ी। मोबाइल का जी.पी.एस उन्हें रास्ता बता रहा था। मण्डेला सेतु पार कर हम गाँधी स्क्वायर पहुँचे। यह शहर का पुराना, व्यस्त और जीवन्त हिस्सा है। गाड़ी पार्क करने के लिये कोलिन को थोड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी। कार से उतर कर थोड़ा ही पैदल चल हम तुरन्त ही गाँधी चौक पर हैं। यह शहर का मेट्रो बस स्टैण्ड है। शहर के न्यायालय के पास इस चौक का नाम पहले शासकीय चौक था। १९0३ से १९१0 तक गाँधीजी का बतौर वकील दफ़्तर यही था, पर धीरे-धीरे गाँधी जी ने अपनी वकालत को परे रख कर मानव सेवा व मानव अधिकार के लिये अपना समय, ऊर्जा और जीवन अर्पित यहीं से किया है। यहीं से ही गाँधीजी का मानव समानता के लिये आन्दोलन शुरू हुआ था। उनकी वकालत को सत्याग्रह का रूप इसी शहर से मिला है। पूरे इक्कीस साल यहाँ बिताने के बाद गाँधीजी भारत लौटे और देश की आज़ादी के लिये अहिंसा और सत्य के बल पर भारत को स्वतन्त्र कराया और महात्मा कहलाये। गाँधीजी की सत्य की खोज का आरम्भ यहीं दक्षिण अफ्रीका से ही हुआ था। इस मायने में यह किसी भी भारतीय के लिये एक तीर्थ से कम नहीं है।

गाँधी चौक में युवा गाँधी पैंट और शर्ट पहने, लम्बा काला वकीलों वाला कोट धारण किये, हाथ में, किताब लिये खड़े हैं। चौक में इस वक़्त धूप खिली है, चहल-पहल है। कुछ बसें खड़ी हैं, कुछ आ-जा रही हैं। अपनी बस के इंतज़ार में लोग खड़े हैं। चौक के चारों ओर दुकाने हैं। एक माँ अपने नन्हे बच्चे के साथ गाँधी शिल्प के ठीक नीचे बनी बेंच पर बैठी है। बच्चा युवा गाँधीजी के शिल्प के नीचे खेल रहा है। यह शिल्प मूर्तिकार तिनका क्रिस्टोफर ने बनाया है।

दो अक्टूबर २00३ में गाँधीजी के जन्मदिन के अवसर पर इस मूर्ति का अनावरण हुआ है। मुझे ख़ुशी हुई कि कोलिन और हरगुन आज गाँधी चौक देख पाये। हालाँकि यह उनके लिये कितना महत्त्वपूर्ण है यह मैं नहीं जानता। यहाँ से अब कोलिन हमें मण्डेला स्क्वायर ले जाती हैं। यह एक बड़ा-सा मॉल है। चौक के चारों ओर बहुमंज़िला व्यावसायिक इमारते हैं। कुछ दफ़्तर हैं और शोरूम भी। ज़मीन पर बने फव्वारे से पानी की बौछारें ऊपर उठ रही हैं। आस-पास रखी बेंचों पर युवा महिलायें और पुरुष यहाँ बैठे बतिया रहे हैं। शर्ट-पैंट पहने नेल्सन मण्डेला की भीमकाय प्रतिमा है। मण्डेला चल रहे हैं। युवा हैं। हम तीनों ने इस प्रतिमा की छाया में खड़े होकर एक समूह तस्वीर भी ली। मण्डेला का यह सान्निध्य सुखद और संतोषजनक है। मण्डेला के देश में मण्डेला के साथ होना गौरवान्वित करता है। मण्डेला चौक में इस प्रतिमा का लोकार्पण ३१ मार्च २00४ में उनकी परपोती द्वारा किया गया है।

मण्डेला स्क्वायर में पर्याप्त समय बिताने के बाद अब कोलिन हमें उनके सिरेमिक स्टूडियो ले जाती हैं। ख़ासा बड़ा घर और घर के आँगन के पास एक बड़ा स्टूडियो है। कोलिन के यहाँ सिरेमिक माध्यम में काम करने के लिये सभी उपकरण व सामग्री है। कोलिन के अलावा भी यहाँ उनकी कलाकार सहेलियाँ क्लासेज़ लेती हैं। इस स्टूडियो की अपनी एक छोटी और सुन्दर कला विथिका भी है। यहाँ इस समय कोलिन की छात्रा गिना फोर्समेन के बनाये चीनी मिट्टी के पात्रों और छोटे शिल्पों की प्रदर्शनी चल रही है। कालीन अपने बनाये पात्रा भी दिखाती है। बाहर आँगन में पेड़ और उन पर कुछ परिन्दें और गिलहरियाँ फुदक रही हैं। मिट्टी के साथ इस माहौल में होना कलाकार को रचनात्मक और सृजनात्मक ऊर्जा से सराबोर बनाये रखने के लिये उपयुक्त है। कला, मण्डेला और गाँधी की उपस्थिति लिये इस शहर में, अपनी दो दिनी छोटी यात्रा, को कलाकार मित्रा कोलिन ने बहुत कलात्मक बनाया।

शाम होते-होते कोलिन ने पुनः मुझे अपने होटल छोड़ा। अपने कमरे में थोड़ा समय बिताने के बाद मैं होटल के आसपास बने रेस्तरां व बाज़ार में घूमा और इस तरह अपनी शाम गुज़ारी। शाकाहारी भोजन भी यहाँ ढूँढ निकाला।

रेस्तरां में युवाओं की तादाद अधिक है। संगीत भी अब यहाँ इस शाम खाने की ख़ुशबू के साथ बह रहा है।

वैसे इस यात्रा में मेरा गन्तव्य फ्रांशुक है जो केपटाउन से क़रीब एक घण्टे की दूरी पर है, पर हमारे मेज़बान सिंह साहब ने मुझे जोहान्सबर्ग, केपटाउन देखने के बाद ही फ्रांशुक आकर काम करने का आदेश दिया है, क्योंकि इस देश में मेरी यह पहली यात्रा है तो वह चाहते हैं कि मैं इन दोनों महत्त्वपूर्ण शहर को अवश्य देखूँ। फ्रांशुक में मुझे चित्रा बनाना है। वहाँ एक माइक्रो ब्रूरी खुलने वाली है, जो श्री सिंह बड़े उत्साह व व्यावसायिक तरीके से बनवा रहे हैं। इस ‘टुक टुक’ माइक्रो ब्रुरी में मुझे तीन छोटे पिलर्स (खम्भे) पर चित्रा बनाना है व कुछ चित्रा कैनवास पर भी बनाना है। इस बार रंग और कूची मैं अपने साथ ही लेकर आया हूँ। हाँ, कैनवास ज़रूर यहाँ से लेना है और सम्भवतः यह कोई मुश्किल काम नहीं है। बहरहाल! काम की बात तो होती रहेगी फ़िलहाल इस शहर जोहान्सबर्ग में इस प्रवास की अन्तिम शाम का लुत्फ़ लिया जाये। कल सुबह ही केपटाउन के लिये रवाना होना है। बैग लगभग पैक ही है। फ़िलहाल एक दो पैग का समय हुआ जा रहा है। भूतल पर रिसेप्शन के पास ही बने सुन्दर बार में अपने गिलास के साथ कुछ समय गुज़ारा। पूरे दिन हुए भ्रमण को मन ही मन दोहराया। कोलिन का मन ही मन आभार व्यक्त किया और चौथी मंज़िल पर अपने कमरे में रात्रि विश्राम के लिये इस शाम से विदा ले नींद की आगोश में ख़ुद को सौंप दिया।

सुबह दस बजे अपने सामान के साथ रिसेप्शन पर आ पहुँचाकृ टैक्सी यहाँ आ चुकी है। जोहान्सबर्ग हवाई अड्डे जाते हुए टैक्सी में ‘‘हेलो इट्स मी’’ यह गीत यहाँ के एफएम रेडियो पर सुनते हुए शहर से विदा ली। एडेले द्वारा गाया यह मधुर गीत सुनकर प्रेम के तार मन में झंकृत हुए। एक अनोखे सुकून का अहसास पूरी कार में मन और देह के भीतर संचरित हुआ। गीत के बोल कि ‘‘क्या तुम मुझे सुन सकते हो?’’ प्रेम के विरह और अवसाद और इसके अनुभव की सुखद अनुभूति के साथ अब मैं केपटाउन के लिये अपनी उड़ान में बैठा। जोहान्सबर्ग से धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ उसे ओझल होते हुए देख रहा हूँ। विमान में अफ्रीकी लोगों की संख्या अधिक है। अफ्रीकी साँवली देह सुडौल और हष्ट-पुष्ट होती है। उनकी श्यामवर्ण त्वचा में भी एक अलग चमक होती है। हर देह जैसे नृत्य भी अपने भीतर लिये रहती है। संगीत उनके साथ नैसर्गिक रूप से साथ रहता है। मनुष्य को संगीत कला में दक्ष करने में अफ्रीकी लोगों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। केपटाउन हवाई अड्डे पर प्लेकार्ड (नाम पट्टिका) लिये ड्राइवर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।

केपटाउन के जिस इलाक़े में मैं ठहरा हूँ वह वुडस्टॉक कहलाता है। यह अपने आप में एक पूर्ण छोटा शहर है। पहाड़ियों से घिरे होटल में अपने कमरे में पहुँचते ही वाईफाई की अदृश्य तरंगों के ज़रिये मेरा मोबाइल भी झंकृत हुआ। अपने सिरेमिक कलाकार मित्रा इण्डिले को संदेश के ज़रिये अपने होटल का नाम व पता भेजा। अभी ही आधे घण्टे बाद उनसे मिलना तय हुआ। हम दोनों लगभग एक ही समय पहुँचे। किसी को भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। आमतौर पर अपने आलसी स्वभाव के कारण मैं समय पर नहीं पहुँच पाता हूँ।

ख़ुशी और उत्साह के साथ इण्डिले से मिला। वो अपनी छोटी सफ़ेद कार से आये हैं। कार पर उनके सिरेमिक स्टूडियो का लोगो और नाम लिखा है। इमिकस। दूर से ही इस कलाकार की गाड़ी कोई भी चिन्हित कर सकता है। उन्होंने अपनी कार में बैठने को कहा। कार के भीतर पिछली सीट पर उनकी पत्नी एलेक्सिस बैठी थी। दोनों ने अपनी कार में मेरा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। तीनों अँग्रेज़ी में बात करते हुए वुडस्टॉक से रवाना हुए। इण्डिले बताते हैं कि यह केपटाउन उनकी पत्नी एलेक्सिस का शहर है और इण्डिले का पुश्तैनी घर महान् नेता नेल्सन मण्डेला के गाँव के पास ही है। शाम है पर इस समय भी दिन के मध्य का कोई समय मालूम हो रहा है।

वे मुझे स्लेव लॉज ले जाती हैं। कार कुछ दूर खड़ी कर हम पैदल ही स्लेव लॉज की ओर चले। सड़क के बीच डिवाइडर पर एक छोटी तख़्ती की ओर इशारा कर इण्डिले मुझे केपटाउन में गुलामों के बारे में बताने लगे। तख़्ती पर ‘‘स्लेव ऑक्शन ट्री’’ लिखा है। पेड़ तो अब नदारद है पर यहाँ कभी एक पेड़ हुआ करता था जिसके नीचे गुलामों को खड़ा कर उनकी नीलामी होती थी। १६५0 से १८३0 तक केपटाउन एक स्लेव सोसायटी था। इस इलाक़े का नाम चर्च स्क्वायर है। शहर के बीचो-बीच हम हैं और चारों ओर बहुमंज़िला इमारतें हैं। काफ़ी चहल-पहल है। अब हम ‘स्लेव लॉज’ (गुलामों की सराय) में दाख़िल हुए। इमारत में प्रवेश करते ही कई बड़े-बड़े पोस्टरों को प्रदर्शित किया गया है। आप साउथ अफ्रीका की सबसे पुरानी और बची हुई स्लेव इमारत में है। १६४९ में इस इमारत का निर्माण हुआ, जहाँ ‘डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ के लिये गुलामों को रखा जाता था। ये गुलाम, कम्पनी की बाहरी पोस्ट और लोक निर्माण के लिये, काम आते थे।

एक स्थायी प्रदर्शनी के माध्यम से यहाँ उस समय के सुन्दर रंग-बिरंगे परिधान, पात्रा आदि के साथ नेलसन मण्डेला की रिहाई के पोस्टरों और उससे सम्बन्धित स्लोगनों (नारों) को भी दिखाया गया है। यह एक संग्रहालय है यहाँ की अधिकारी हम लोगों की प्रतीक्षा कर रही थीं। उन्होंने हमें इस संग्रहालय की एक छोटी, संक्षिप्त और उपयोगी सैर करवायी तथा इस संग्रहालय व स्लेव लॉज (गुलाम सराय) के बारे में तफ़सील से बताया। मण्डेला के चेहरे को पोस्टरों के अलावा, कपड़ों के बैग और परिधानों पर भी अंकित किया गया है। मण्डेला उस वक़्त सभी अफ्रीकन लोगों की एक महत्त्वपूर्ण आवाज़ थे और उन्होंने अपना सारा जीवन यहाँ लोगों के समानता के अधिकार और उनकी स्वतन्त्राता के लिये ही कुर्बान किया है। कई वर्ष वे जेल में रहे। यहाँ जिस काले पानी में उन्हें बन्द किया गया था वह टापू यहाँ समुद्र से कुछ ही दूरी पर है तथा अब यहाँ एक प्रमुख पर्यटन-स्थल है।

हाल ही में यहाँ कलात्मक सिरेमिक पात्रों की एक प्रदर्शनी आयोजित हुई है। इण्डिले ने भी उस प्रदर्शनी के लिये कुछ सिरेमिक पात्रा बनाये थे। उन्हें अपने पात्रा भी यहाँ से लेने हैं, यही कारण रहा कि हम यहाँ आये और मैं यह ऐतिहासिक व महत्त्वपूर्ण जगह देख पाया। गुलामों को यहाँ कैसे रखा जाता था। उनके नहाने, पानी पीने की, भोजन व कपड़ों की व्यवस्था कैसी थी। यह सब प्रदर्शनी में देखने के बाद मेरे मन के एक बहुत बड़े हिस्से में उस पुराने व भयावह समय की तस्वीरें घूम रही थीं।

प्रदर्शनी में भाग लेने वाले हर कलाकार के पात्रा को यहाँ डाक टिकट पर अंकित किया गया है। इन लिमिटेड एडिशन डाक टिकटों का संग्रह कला संग्राहकों व कला प्रेमियों ने अविलम्ब संग्रहित कर लिया है। डाक टिकट पर छपी ये नाज़ुक मिट्टी के पात्रा अब डाक टिकट के माध्यम से यात्रा के लिये तैयार हैं। इण्डिले का बड़ा पात्रा उनकी कला समझ व दक्षता को दर्शाता है। बड़े ही प्रेम से अपने शिशु की तरह वे अपने पात्रा को सम्भाले हैं। स्लेव लॉज की एक छोटी प्रतिकृति (झांकी) भी यहाँ प्रदर्शित है। चारों ओर दो मंज़िला मकान है और मध्य में एक बड़े आँगन के बीच एक कुआँ है। सैकड़ों लोगों के लिये यही एक पानी का स्रोत था। पानी की हर ज़रूरत को यही स्रोत पूरा करता था। एक कारागृह की तरह आभास होता है यहाँ। यहाँ जीवन बंधा हुआ था। ग़रीबी और गुलामी के अलावा रंग ही इस भेद का प्रमुख कारण रहा होगा।

दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका के अलावा यहाँ भारत, श्रीलंका, इण्डोनेशिया से भी गुलामों को समुद्री मार्ग से लाया जाता था व नीलाम किया जाता था। यहाँ बनी प्रतिकृति में इन तमाम जगह से गुलामों को लाया जाना एक मानचित्रा द्वारा भी दिखाया गया है जिसे देख आसानी से इस गुलाम प्रथा और उसके भूगोल को समझना हुआ।

स्लेव लॉज से बाहर आकर भी स्लेव लॉज और उस वक़्त वहाँ रहने वालों के बारे में सोचता रहा और अब हम धीरे-धीरे इस शहर के समुद्री तट पर बने एक बड़े बाज़ार की ओर रवाना हुए। समुद्र के किनारे बना यह एक बड़ा और सुन्दर मार्केट है। यहाँ स्थानीय क्राफ़्ट और कला को विभिन्न स्टालों में देखा जा सकता है। कपड़े से बनी तरह-तरह की कलात्मक वस्तुएँ जैसे बेल्ट, पर्स, तकिया, कुशन कवर, पेन स्टैण्ड इत्यादि जिन पर नेल्सन मण्डेला के चित्रा भी बने हैं। यहीं एक स्टॉल है ‘द फारेस्ट सिरेमिक’ स्टूडियो का जिसमें तरह-तरह के रंग-बिरंगे, छोटे-बड़े चीनी मिट्टी और काली मिट्टी के सुन्दर-सुन्दर पात्रों को बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रदर्शित किया गया है। बाज़ार के एक हिस्से में खाने-पीने के लिये कई रेस्तरां है। हम सभी ने यहाँ कुछ खाया और फिर बाज़ार के बाहर समुद्र तट पर खड़ी छोटी-बड़ी आधुनिक नौकाओं को देखने लगा और सोचने लगा कि हमारे देश में भी भिन्न-भिन्न प्रकार की जल राशियाँ है और अब तक जलमार्ग या जल यातायात पर शासन का न ध्यान गया है न ही रुचि जगी है और अगले बीस सालों तक भी जल यातायात या जलमार्ग बनेंगे इसमें संदेह है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्रा आदि बड़ी नदियों पर हज़ारों शहरी व ग्रामीण लोग सैकड़ों की संख्या में प्रतिदिन इस पार से उस पार जाते हैं पर नौकाएँ हमारे यहाँ अब भी सदियों पुरानी है और सैकड़ों लोग, इन असुरक्षित नौकाओं में, नौका डूबने की वजह से प्रतिवर्ष अनचाही जल समाधि ले लेते हैं।

यहाँ अभी दुपहर के वक़्त काफ़ी लोग हैं। सप्ताहान्त होने की वजह से अधिकतर लोग अपने परिवार और मित्रों के साथ यहाँ सैर पर आये हुए हैं। बादल अब घिर आये हैं पर बारिश होगी या नहीं यह कहा नहीं जा सकता। एक चबूतरे पर चार पुरुषों की आदमकद प्रतिमा खड़ी है। मैं सिर्फ़ नेल्सन मण्डेला को ही पहचान सका। इस प्रतिमा समूह के साथ इण्डिले और मैंने कुछ तस्वीरें लीं।

एक रेस्तरां में शाकाहारी भोजन कर अब हम यहाँ से इण्डिले के स्टूडियो के लिये रवाना हुए। ‘ईमिकस’ यह उनके स्टूडियो का नाम है, जिसमें एक छोटी कला वीथिका भी है। एक हिस्से में उनके काम करने की जगह और मिट्टी के पात्रों को बनाने के लिये एक इलेक्ट्रिक व्हील (बिजली से चलने वाला चाक) तथा एक छोटी भट्टी भी है। एक दूसरे हिस्से में इण्डिले के कुछ सिरेमिक पात्रा प्रदर्शित हैं। इसी बीच इण्डिले की पत्नी एलेक्सिस के लिये भारत से जो मैं कुर्ता भेंट स्वरूप लाया था वे पहन कर आ गयी हैं। उन्हें कुर्ता जँच रहा है और वे ख़ुश हैं। पूरा स्टूडियो देखने के बाद और कुछ देर यहाँ ठहरने के बाद अब हमारे एक-दूसरे से विदा लेने की बारी है। इण्डिले ने पुनः मिलने की कामना के साथ मुझे होटल छोड़ा और इस तरह आज का दिन गुजरा।

अगली सुबह तय समय पर ठीक नौ बजे मिस असीलिया का फ़ोन आया वे एक गाइड है और श्री सिंह के ऑफ़िस से ही उन्हें मेरे लिये, आज के भ्रमण के लिये, नियुक्त किया गया है। मिस असीलिया पचास बरस की वरिष्ठ महिला हैं; उन्होंने मुझे अपना संक्षिप्त परिचय दिया। उनके पूर्वज ब्रिटेन से यहाँ आये थे और वे भी यहीं पैदा हुई है और अपने पति के साथ रहती हैं। मिस असीलिया ने केपटाउन के प्रमुख पर्यटन-स्थल के बारे में बताया। मसलन, केप माउंटेन व केप द्वीप पर जेल जहाँ नेल्सन मण्डेला ने काफ़ी बरस एक क़ैदी के रूप में बिताये हैं। कुछ समुद्री बीच आदि, पर मैंने उनसे केपटाउन की आर्ट गैलरी संग्रहालय, कला व कौशल सम्बन्धी स्टोर्स देखने की जिज्ञासा व्यक्त की।

मुझे जानकर हैरानी हुई कि उन्होंने केपटाउन की कुछ प्रमुख व्यावसायिक कला विथिकाओं के नाम तुरन्त ही बता दिये और एक प्याली चाय के दौर के बाद केप में हमारा कला भ्रमण शुरू हुआ। गुडमैन गैलरी, मिशेल स्टीवलन गैलरी, यंग ब्लड गैलरी, गैलरी एबनी, केप गैलरी, वर्ल्ड आर्ट गैलरी, मोगालाकवेना गैलरी आदि गैलरियाँ हम घूमें। समकालीन दक्षिण अफ्रीका की कला इन आधुनिक कला विथिकाओं में देख संतोष हुआ। इसी तरह ही दृश्य अनुभवों का विस्तार भी होता है। ‘द डेकल एज’ कला स्टोर व रेस्तरां में हम दुपहर के भोजन के लिये रुके वहाँ पर प्रस्तुत भोजन सामग्री से अपने लिये शाकाहारी सलाद व सुप चुने और इत्मिनान से अलिसिया और मैंने भोजन किया। रेस्तरां की साज-सज्जा काफ़ी कलात्मक है। कलात्मक पोस्टकार्ड व पोस्टर रेस्तरां की दीवार पर लगे हैं। रसोई में काम करने वाली गौरवर्णा युवती क्रिस्टेन मूलर मुझ भारतीय को देख ख़ुश है। उन्होंने मिस अलिसिया और मुझसे बात की और यह भी बताया कि वे भी एक कला छात्रा हैं। केप कला महाविद्यालय में वे इन दिनों कला अध्ययन कर रही हैं। भारत के परिधान, शृँगार, मुम्बईया फ़िल्मों की वे कायल हैं और भारत भ्रमण उनका एक सपना है। भारत आने का मैंने उन्हें निमन्त्राण दिया और अब मिस अलिसिया मुझे एक सिरेमिक स्टूडियो दिखाने ले जा रही हैं। ‘आर्ट इन द फॉरेस्ट’ नामक स्टूडियो कुछ सिरेमिक कलाकारों ने मिलकर बनाया है। शहर से दूर हरे-भरे रास्ते से होकर हम यहाँ एक छोटे से वन में बने इस स्टूडियो पहुँचे।

स्टूडियो में प्रवेश करते ही सुन्दर गैलरी में प्रदर्शित यहाँ बने पात्रों को देखा। यह एक व्यवस्थित व व्यावसायिक सिरेमिक स्टूडियो है। यहाँ मिस बिआँका ने हमारा

स्वागत किया और यह जानकर कि मैं भी सिरेमिक कलाकार हूँ उन्होंने मुझे पूरा स्टूडियो दिखाया। स्टूडियो में कुछ व्हील पर कलाकार काम कर रहे थे। कुछ पात्रा बन चुके थे, जो अब सूख रहे हैं। बिजली से पकाने वाली भट्टी भी देखी। यहाँ समय-समय पर बच्चों व बड़ों के लिये सिरेमिक कला कार्यशाला आयोजित की जाती हैं। मिट्टी के गुर सीखने लोग यहाँ दूर-दूर से आते हैं।

लगभग एक घण्टे हम इस स्टूडियो में रहे। कभी मैं भी इस स्टूडियो में काम करूँ, इसी आशा के साथ हम पुनः केप शहर के लिये रवाना हुए। लौटते हुए सड़क पर यातायात बढ़ चुका था, हमारी कार धीमी रफ़्तार से चल रही थी; आगे और पीछे भी कई वाहन पंक्तिबद्ध चल रहे थे। इतने ट्रैफ़िक में भी यहाँ किसी चालक ने न तो हार्न बजाया और न ही बेवजह अपनी कार को आगे ले जाने की कोशिश की। संयम व धैर्य के साथ ट्रैफ़िक नियमों का पालन करते हुए सभी वाहन चालक अपने-अपने वाहन, एक दूसरे से उचित व पर्याप्त दूरी बनाते हुए, आगे बढ़ रहे थे। हम ग्रीन मार्केट स्क्वायर पर अपनी कार से उतरे। कार अपने लिये उचित पार्किंग स्थल पाने रवाना हुई। पैदल-पैदल हम इस बाज़ार में घूमें। छोटी-छोटी स्टॉल पर तरह-तरह के हाथ से बने सामान बिक रहे हैं। लोहे के पतले तार से यहाँ कई तरह के खिलौने जानवर बिकने के लिये रखे हैं। तरह-तरह की टोकरियाँ, टेबल व टोपियाँ भी हैं। महिला परिधान व हाथ से चित्रित टी-शर्ट भी यहाँ मन-मोह रही हैं। दक्षिण अफ्रीका की बुनाई-कला के कौशल इस बाज़ार में देखे जा सकते हैं। बाज़ार में दुकानदार महिलाओं के वस्त्रा भी किसी सजावट की तरह ही लग रहे हैं। साँवली त्वचा पर भी एक आकर्षक चमक विद्यमान है। देह सुडौल और स्वस्थ है। चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान ही यहाँ हर शृँगार से अधिक रोचक है। रंग-बिरंगे परिधानों को बेचने वाली महिला भी रंग-बिरंगे परिधान पहने हैं। अफ्रीकी लोगों की उत्सव-धर्मिता उनके व्यवहार में, कामकाज में आसानी से देखी जा सकती है।

बाज़ार से पुनः हमने पैदल सैर करना तय किया। यहाँ की संसद से होते हुए हम कैफे़ मोज़ार्ट पहुँचे। रास्ते में झुरमुटों में कई पक्षी देखते हुए यहाँ पहुँचा। इन दिनों होने वाले संगीत समारोह की जानकारी भी यहाँ कैफे में छपे हुए पर्चों के रूप में उपलब्ध है। एक व्यस्त दिन के बाद अब देह कुछ थकान महसूस कर रही है। मिस अलिसिया को धन्यवाद कहकर उनसे विदा ली। मेरी आगे की यात्रा के लिये उन्होंने शुभकामनाएँ दीं और मुझे होटल छोड़ कर वह अपने घर को रवाना हुईं। कल सुबह नाश्ते के बाद फ्रांशुक रवाना होना है।

शाम को इण्डिले से पुनः सम्पर्क हुआ। अपने कमरे में कुछ आराम करने के बाद इण्डिले होटल आये और मुझे साथ ले वे केपटाउन शहर में चहल-पहल भरे मार्ग पर ले गये। कार कुछ दूर ही पार्क कर हम इस सड़क पर घूमने लगे। यहाँ की एक प्रमुख पब में कुछ बियर पीने की उनकी पेशकश को मैं ठुकरा न सका। युवाओं से भरे पब में सभी उत्साह से सराबोर हैं। इस सड़क का नाम लोंग स्ट्रीट है और यह एक व्यस्त सड़क है। यहाँ युवाओं की बहुतायत है। इण्डिले के एक आर्किटेक्ट मित्रा भी हमारे साथ हैं। हम बारी-बारी कुछ पब गये और देर रात तक यहाँ उत्सव मनाया।

कल सुबह फ्रांशुक के लिये रवाना होना है जहाँ सिरेमिक कलाकार डेविड वॉल्टर, बुयीसा पोतीना और उनकी पत्नी एविस पोतीना से मुलाक़ात होगी। ठीक समय पर कार होटल पहुँची और लगभग दो घण्टे के आरामदेह सफ़र के बाद फ्रांशुक पहुँचा। फ्रांशुक में कई बड़े-बड़े अंगूर के खेत (वाइन यार्ड) हैं। श्री सिंह के गेस्ट हाउस में पहुँचा और वहाँ गेस्ट हाउस कर्मी ने मेरा स्वागत किया और मुझे अपने कमरे तक पहुँचाया। गेस्ट हाउस की छोटी-सी रसोई में चाय, कॉफ़ी बनाने की व्यवस्था है। यहाँ श्री सिंह की टीम के कुछ अन्य अधिकारी भी ठहरे हैं। वे अभी यहाँ नहीं हैं, शाम को ही उनसे मुलाक़ात होगी। गिरधर (गैटी) ने मुझे अपने काम के लिये ज़रूरी सामान लाने में मदद की। वे मुझे पास ही एक बड़े क़स्बे में कला-सामग्री स्टोर में ले गये जहाँ से मैंने कुछ कैनवास और स्ट्रेचर आर्डर किये और कुछ टूल्स भी ख़रीदे।

अपने कमरे व उसकी छोटी खुली बालकनी को स्टूडियो बनाया और अपना काम शुरू किया। दो दिन में चित्रा बने और टुकटुक माइक्रो ब्रूरी में कुछ पिलर (खम्बे) भी चित्रित करने हैं। यहाँ बियर बनाने की मशीनें व अन्य उपकरण, प्रकाश-व्यवस्था, रंग-रोगन का काम भी जोर-शोर से चल रहा है। काम के इस उत्साह भरे माहौल में जब सभी को अपना-अपना काम समय पर और ढंग से पूर्ण करना है वहीं मुझमें भी एक रोमांचित कर देने वाला उत्साह भर गया और मात्रा दो ही दिन में मैंने अपना चित्रा कार्य पूर्ण किया।

यहाँ भी एक स्टोर में, जो कि एक होटल है, कुछ अतिथि यहाँ अपनी छुट्टी बिता रहे हैं। मुझे साइकिल मिली और एक दुपहर मैं मित्रा पुतीना के घर, जोकि यहाँ से पन्द्रह क़िलोमीटर दूर है, पहुँचा। पुतीना ने मुझे अचानक पाकर अपनी ख़ुशी का इज़हार किया। भाभी ने प्रेम से अपने हाथ से बनाये व्यंजन पेश किये। पुतीना के दोनों बेटे पढ़ते हैं। उनका स्टूडियो उनके घर का ही हिस्सा है जहाँ उनका बिजली से चलने वाला चाक और एक खुली भट्टी रखी है। उन्होंने अपने हाथ से बने कुछ पात्रा दिखाये।

पोतीना का गाँव एक छोटी पहाड़ी के नीचे है। यहाँ यह हाल ही में बसाया हुआ लग रहा है। किसी कॉलोनी की तरह है यह गाँवकृ सभी घर एक से पंक्तिबद्ध है। पोतीना का यह घर गाँव में प्रवेश करते ही है।

शाम अब पहाड़ी के पीछे से होती हुई गाँव की ओर ढल रही थी अतः अब मुझे अपनी प्रिय सवारी साइकिल से फ्रांशुक की ओर लौट जाना चाहिये। एक अच्छी सैर के बाद अपने गेस्ट हाउस लौटा। स्टूडियो में तब्दील हुए कमरे में चित्रों पर लगे रंग सूख चुके थे। इस वक़्त गेस्ट हाउस में बाक़ी लोग भी आ गये थे।कृकृत्रिम रोशनी में चित्रों को देखाकृ हर कलाकार अमूमन अपने चित्रों का पहला दर्शक होता है।

शुभेन्दु दिल्ली से आये हैं और मूलतः मालवा (उज्जैन) के रहने वाले हैं। उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और यहाँ उनके कमरे की बड़ी रसोई में भोजन बनता है। गैरी और सुपिन भी यहीं भोजन करते हैं। कोई सब्ज़ियाँ काटता, कोई चावल धोता, कोई कुछ अन्य काम करता। सभी मिलजुल कर भोजन बनाते और भोजन खाते। मुझे भी उन्होंने साथ ही भोजन करने के लिये आमन्त्रित किया। रसोई में मैंने भी शिरकत की। कभी सलाद काटे तो कभी दाल में तड़का लगाया तो कभी दही के आलू बनाये। रोज़ शाम यहाँ रसोई में भारतीय व्यंजनों का आनन्द लिया। हम सभी साथ ही राशन लेने जाते और सुरा भी साथ ही ले आते।

एक दुपहर छुट्टी के दिन (रविवार) हम चारों ने क्रिकेट भी खेला और हमारे गेस्ट हाउस के छोटे पुल में देर तक नहाये। धूप की गर्मी और पानी की ठण्डक के बीच पुल में सभी ने ख़ूब मस्ती की।

कल तीस जनवरी है। मेरा जन्मदिन है। इण्डिले, अलेक्सिस, पोतीना व उनकी पत्नी सैविस आ रहे हैं। वे यहीं गेस्ट हाउस आयेंगे फिर तय करेंगे कि कल शाम का उत्सव कहाँ और कैसे मनाया जायेगा। इण्डिले अपनी नयी बड़ी कार से सबको लेकर आयेकृ गेस्ट हाउस में। चाय पीने के बाद सभी ने तय किया कि हम सभी पोतीना के घर ही जन्मदिन पार्टी करेंगे। भोजन ग्रिल कर बनायेंगे। पोतीना के घर जाते हुए एक ‘पिक एण्ड पे’ नामक सुपर मार्केट गये। वहाँ से चीज़, बच्चों के लिये शीतल पेय, बड़ों के लिये वाइन और व्हिस्की, फल, ब्रेड इत्यादि भोजन सामग्री ख़रीदी। सभी ने मुझे जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। पहली बार मैं अपना जन्मदिन देश के बाहर बना रहा हूँ। इण्डिले ने ग्रील स्टैण्ड पर आग जलाना शुरू किया। हमारे साथ केप से मडोडा युवा कलाकार भी आये हैं। वे भी मिट्टी से कलात्मक पात्रा बनाते हैं और एक पुरानी हिन्दी फ़िल्म का गाना भी गाते हैं। वे बताते हैं कि जब वे छोटे थे तब उनके पिताजी के पास हिन्दी फ़िल्मी गीतों का एक रिकॉर्ड था जिसे वे अनेकों बार सुनते रहे हैं और अब उन्हें यह गाना कण्ठस्थ हो गया है। भले ही उन्हें गाने का अर्थ न आता हो पर गाने की मैलोडी व शब्दों का उच्चारण वे ठीक कर रहे हैं।

अब हमारी इस शाम में संगीत भी बहने लगा। अलेक्सिस और एविस भाभी ने भी अफ्रीकी गीत सुनाये। इण्डिले भी गीतों की ताल पर झूमे। एक हिन्दी गीत मैंने भी सुनाया। इस बीच बीफ चिकन ग्रिल हो चुका है। रसोई में कुछ शाकाहारी भोजन भी बन चुका है। वाइन के दौर चल रहे हैं। शाम अब रात में बदल चुकी है। अफ्रीकी शैली में जन्मदिन-गीत सभी ने मिलकर गाया। मेरे नाम का उच्चारण भी गीत में शामिल था। यह जन्मदिन धुन व गीत लुभाने वाला है। ‘‘हैप्पी बर्थडे टू यू’’ गीत की तरह सीधा-सीधा नहीं है। यह गीत देर तक चला। भोजन के बाद यहीं पास की बस्ती में जाने का प्रोग्राम बना। यहाँ फ्रांशुक व आसपास के छोटे कस्बों में काम करने वाले लोग रहते हैं। देखने में यह एक झुग्गी बस्ती की तरह या चाल की तरह बसा रिहायशी इलाक़ा है। इस बस्ती का अपना एक पब है जहाँ महिलायें पुरुष साथ बैठ कर खा-पी रहे हैं। सभी मस्त व ख़ुश हैं। कोई झूम रहा है तो कोई बैठा बतिया रहा है। कहीं-कहीं उच्च स्वर में संगीत भी बज रहा है। रात अधिक हो चली है पर फिर भी यहाँ बस्ती में पार्टी व जीवन जारी है। बस्ती की गलियों में घूम-घूम कर हम बस्ती में उसके रात्रि उत्सव में शामिल हुए।

यहाँ भी लोग ख़ुश हैं। बेशक ग़रीब हैं और रोज़ काम करते हैं, रोज़ कमाते हैं, रोज़ राशन ख़रीदते हैं और इसी तरह जीवन के संघर्ष के साथ ख़ुशी-ख़ुशी दिन गुज़ारते हैं। यहाँ भी जीवन स्तर में भारत की ही तरह विभन्नता है। कोई ग़रीब, कोई बेघर है, तो कोई अमीर और अरबपति है। यहाँ इस तरह की बस्तियाँ प्रायः शहर से दूर बसायी गयी हैं। प्रशासन भी इन बस्तियों में घर बनाने के लिये, निर्धनों को घर दिलाने के लिये, आर्थिक मदद करता है।

एक सुबह यहाँ पोस्ट ऑफ़िस जाना हुआ। पोस्ट ऑफ़िस का भीतरी माहौल किसी भारतीय निजी बैंक की तरह है। यहाँ से कुछ पोस्टकार्ड व टिकट ख़रीदे व कुछ पत्रा पोस्ट किये हैं। यहाँ खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि कुछ साल पहले तक यहाँ श्वेत और श्याम लोगों के लिये अलग-अलग काउंटर होते थे पर अब सभी के लिये सभी काउंटरों की समान रूप से सुविधा है। कभी-कभी रात्रि भोजन के लिये पिज्जा रेस्तरां भी जाना हुआ। वहाँ चीज़ पिज्जा के साथ लहसुन और हरी मिर्च की कतरनें ख़ूब मज़े से खायी।

इण्डिले के साथ एक दुपहर यहाँ के प्रसिद्ध सिरेमिक पोटर डेविड वाल्टर के स्टूडियो भी जाना हुआ। स्टूडियो बन्द है। इण्डिले ने कहा कि वह ऊपर रहते हैं और नीचे उनका स्टूडियो और एक छोटी गैलरी है। बेल बजाकर उनसे मिलना चाहा। ऊपर बालकनी में डेविड आये और इण्डिले से बालकनी में ही खड़े-खड़े बात की। वे कुछ व्यस्त और अस्वस्थ लगे तो हम भी उनसे विदा ले लौट आये। उनके लिये अपने सिरेमिक शिल्प का एक छोटा कैटलॉग, उनके पोस्ट बॉक्स में, छोड़ दिया। ऊपर से ही डेविड ने धन्यवाद और क्षमा माँगते हुए जल्द ही मिलने की आशा व्यक्त की।

यहाँ हर रविवार एक क्राफ़्ट बाज़ार लगता है। इस बाज़ार की जगह स्थानीय प्रशासन ने तय की है। कपड़े पर हाथ से चित्रित किये गये रंगीन रूपाकारों को देखा। कुछ सिरेमिक कलाकारों की भी स्टॉल यहाँ हैं। लकड़ी व तार से बने खिलौने भी यहाँ बिक रहे हैं। भाभी एविस भी पोतीना के पात्रों के साथ एक स्टॉल पर बैठी हैं। उन्हें देख मैं ख़ुश हुआ और उनके व अपने लिये पास ही की स्टॉल में बन रहे ताज़ा मौसम्बी जूस को लिया।

एक स्टॉल पर पुरानी वस्तुएँ मिल रही थी। चमड़े के जूते, पर्स, बैग, कपड़े, क्रोकरी, घड़ियाँ, मैग्नेट एवं अन्य सजावट की सामग्रियों के बीच एक पुरानी दूरबीन पर मेरी नज़र पड़ी। सामान बेच रही युवती ने मुझे उस दूरबीन का महत्त्व बताया। यह दूरबीन द्वितीय विश्व युद्ध में जल सेना द्वारा इस्तेमाल की गयी थी। यह दूरबीन हाथ में पकड़कर आँखों पर लगायी और दूर के ऑब्जेक्ट देखें। मन हुआ कि इसे ख़रीद लूँ, यह मेरे पक्षी दर्शन के लिये एक उपयुक्त यन्त्रा है हालाँकि मेरे पास श्री वीर द्वारा भेंट में मिली आधुनिक दूरबीन है पर फिर भी इसे ख़रीदने का मन हुआ। उसका दाम पूछाकृ क़रीब तीन या चार हज़ार भारतीय रुपये के बराबर मूल्य रहा होगा पर इतने पैसे फ़िलहाल मेरे पास नहीं थे सो मैंने उस युवती से बाद में यह दूरबीन किस तरह और कहाँ से ख़रीद सकता हूँ की संभावना के बारे में पता किया। उन्होंने सहर्ष ही कहा कि मेरी माँ यहाँ पास ही एक रेस्तरां चलाती है। कल मैं उन्हें यह दूरबीन दे दूंगी और आप वहाँ जाकर उनसे यह दूरबीन ले सकते हैं। तय समयानुसार उस रेस्तरां पहुँचा और वह दूरबीन मैंने ख़रीदी।

फ्रांशुक केपटाउन के पास स्थित एक मशहूर पर्यटन स्थल है और साथ ही यहाँ बनी वाईन पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। आज मेरा यहाँ अन्तिम दिन है। कल सुबह यहाँ से केपटाउन हवाई अड्डे के लिये रवाना होना है। दिन भर माइक्रो ब्रुरी में अपने चित्रों को देखा इसका औपचारिक उद्घाटन जल्द ही होने वाला है। यहाँ के बाज़ार में एक सैर की कुछ पोस्टकार्ड, मेग्नेट इत्यादि दोस्तों के लिये ख़रीदे।

शाम को मित्रा वुयीसा पोतीना को डिनर पर बुलाया। हम दोनों ने पिज्जा खाया और उन्हें धन्यवाद दें उनसे विदा ली। चहलकदमी करते हुए अपने गेस्ट हाउस लौटा। अपना सामान पैक किया। सुबह कार समय पर आ गयी थी। हवाई अड्डे पहुँचकर वहाँ दो घण्टे अपने विमान में बैठने की प्रतीक्षा के दौरान हवाई अड्डे पर लगा बाज़ार देखा। अफ्रीकन जिराफ़, हाथी, शेर, नेलसन मण्डेला के चित्रा यहाँ मैगनेट, पोस्टकार्ड व बैग पर छपे हैं।

हवाई अड्डा एक बाज़ार भी है।

दक्षिण अफ्रीका को नमस्कार कर मैं अब दुबई के लिये उड़ चुका हूँ। मेरी यह उड़ान अब दिल्ली में ही ख़त्म होगी। एक सृजनात्मक कला-प्रवास के बाद सकुशल मैं अपने वतन लौटा। हवाई अड्डे से घर जाते वक़्त कार का हार्न चीख़-चीख़ कर बता रहा है कि यह भारत है और मैं भारत में लौट चुका हूँ।

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