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अनघ शर्मा की कहानी सुनिए द्वारिकाधीश! ये शोक है…’

हिंदी के युवा कथाकारों में अनघ शर्मा का अपना मुहावरा है, अपना कथालोक है, जिसके रेशों को वे बहुत बारीकी से बुनते हैं। अपनी कहानियों में जितने प्रयोग वे करते हैं उतने शायद ही कोई और करता हो। यह उनकी नई कहानी है- मॉडरेटर

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सुनिए द्वारिकाधीश! ये शोक है…

1:

गवाक्ष के दोनों ओर इकत्तीस-इकत्तीस दीप वाले दीपदान जल रहे थे, पर मुझे ही जाने किस कारण हर ओर अँधेरा दीखता था| ये इतना बड़ा राज्य, इतना विशाल कि इंद्र का राज्य गौण हो जाए| युधिष्ठिर के छत्र तले ये विशाल राज्य फल-फूल रहा है| नीलकांत, मयूर, गौरैया, नीलकंठ, राजहंस, मैना जाने कितने-कितने ही पक्षी युद्ध के बाद यहाँ ला कर बसाये गए हैं, पर मुझे हर ओर गिद्ध ही गिद्ध किस कारण उड़ते दीखते हैं|

मैंने आँखें उठा कर गवाक्ष के बाहर देखा| अँधेरा हर दिशा में फैला पड़ा था| किसने डाला है ये अँधेरे का आवरण??? ………… इंद्राणी शची ने ? पर क्यों? किस लाज के कारण? अलकापुरी को क्या दुःख जो उसे अँधेरे का वितान तानना पड़े| ये वही अलकापुरी थी जिसके समान बनने के लिए राम की अयोध्या ने भी परिश्रम किया था, तब जा कर साकेत कहलायी थी| ये वही अलकापुरी थी जिसने सीता के भूमि गमन के बाद भी शोक नहीं मनाया| पर अब ये आवरण क्यों? अब किसलिए शोकाकुल है स्वर्ग? क्या युधिष्ठिर के सौभाग्य से ईर्ष्या है ? इस सौभाग्य में तो अर्जुन का भी योगदान है| अर्जुन तो मानस-पुत्र हैं इंद्र के| फिर उनके सौभाग्य से क्यों शोकाकुल है अलकापुरी?

नहीं! ये लज्जा का आवरण का है| किसकी लज्जा से दुखी हैं शची? मेरी? पर अब तो युद्ध को ही कितने वर्ष बीत गए, जैसे कि युग| एक-एक कर के दीपदान के सब दीप बुझ चुके थे| अब अंदर-बाहर चहुँ ओर बस अँधेरा था|

“ जिसके अंतस में तेज,हृदय में अग्नि है उसे भय कैसा? उसका जीवन तो प्रकाशमान है सदा|” मेरे अंतस में तो वर्षों से अन्धकार पसरा पड़ा है| उसका क्या?

“कृष्णा तुम्हारा अन्धकार स्वयं मेरा अन्धकार है|” ये किसने इस एकांत में पुकारा मुझे?

“माधव ये तुम ही हो न| मन से बार-बार तुम्हारा ही नाम निकलता है| ”

“मेरे सब लक्ष्य-अलक्ष्य, प्राप्ति-अप्राप्ति, मान-अपमान, राग-विराग, दुःख-दैन्य, सुख-स्वप्न, जन्म-मरण सब तुमसे ही तो निर्दिष्ट हैं माधव| तुम्हारे धर्म के लिए मुझे यज्ञ से जन्म ले कर समराग्नि में खुद को होम करना पड़ा| मेरा जन्म हुआ गोविन्द तुम्हारे लिए पर तुमने साधना की महत्ता के लिए मुझे वाग्दत्ता बना कर पांडवों को सौंप दिया| तुम दुःख के समय, दैन्य के समय रथ की रास साधते हो तो पार्थसारथी बन जाते हो, गीता का ज्ञान देते हो तो गीतेश बन जाते हो| मेरे लिए क्या बने तुम? जरा जीवन की पुनरावृत्ति कर के इस प्रश्न का उत्तर तो खोज लूं मैं योगेश|

2

“अनिवर्चनीय सुख के साथ अनिवर्चनीय दुःख भी आता है कृष्णा| तभी सुख को बांटने की रीत बनी है ताकि कोई दुःख का भागी न बने| जानती हो गुरुजन जन्म का सुख सबसे बांटते है क्योंकि शिशु सुख-दुःख दोनों की ही परिधि से अपरिचित होता है|” ये तुम्हीं ने तो कहा था माधव| पर मेरा क्या? जिसने अपने जन्म का सुख जाग्रत ही देखा भोगा था|

धधकता कुंड था मेरे चारों ओर पर मेरा रोम रोम मानो हिमाच्छादित था| मेरे पाँव की झलक देख कर ही ऋषि याज बोल उठे थे|

“कृष्ण के वर्ण का साम्य है इसमें सो ये कृष्णा कहलाएगी|”

कृष्ण,कृष्ण,कृष्ण कैसा अद्भुत रस था इस शब्द में और मैंने तो अभी इसे जी भर पुकारा भी नहीं था कि कुंड में से कोई बोल उठा|

“इस घर में जन्म सिर्फ़ प्रतिशोध के लिए होते हैं | तुमने भी इस घर में जन्म लिया है सो तुम्हारा जीवन सुख का नहीं प्रतिशोध का जीवन है अग्निरसा|”

“मैंने तो जन्म से पहले ही स्वयं को तुम्हें सौंप दिया था|  ये था मेरा अनिवर्चनीय सुख| पर तुम्हें सौपने के बाद भी ये जीवन प्रतिशोध का रहा| क्या ये दुःख था माधव?”

दुःख तुमने कहा इससे भी बड़ा है| तुमने कहा कि अंतर में छुपी तुम्हारी छाया को निकाल कर अर्जुन की छाया रख लूं| और कृष्ण-कृष्ण की जगह पार्थ-पार्थ रटूं|

“जिसके मन तुम माधव उसके मन कौन समाये?”

“तुम अर्जुन में ही मुझे पा जाओगी| उसके केंद्र, परिधि और जीवन का मूल मैं ही हूँ|”

“वचन|”

“वचन कल्याणी|”

“ये क्या कह दिया| जानते नहीं पार्वती के अन्य किसी और को कल्याणी नहीं कहते|”

“अब से तुम्हें भी कहेंगे|”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम समय की सबसे प्रस्तर पांच प्रतिमाओं का मेरुदंड हो| क्योंकि तुम जीवन और मृत्यु के दो अद्भुत धनु गांडीव और कालपृष्ठ की प्रत्यंचा हो|”

“मेरुदंड झुक भी जाते हैं और प्रत्यंचायें टूट भी जाती हैं गोविन्द|”

“तो निश्चित रहो ये मेरुदंड कष्ट तो सह लेगा पर झुकेगा नहीं| ये प्रत्यंचा काँप-काँप भले ही जाए पर टूटेगी नहीं| तुम तो यज्ञ से जन्मी ही बड़े उद्देश्य के लिए हो|”

“यज्ञ तो धृष्टद्युम्न के लिए हुआ था| फिर मेरा जन्म क्यों?”

“अग्निरस हैं द्रोण और अग्नि की ज्या से ही मारे जा सकते हैं, वो अग्नि तुम ही हो|”

“धृष्टद्युम्न”??

“निमित्त चाहे जो भी बने|”

“मैं अनिच्छा से डाली गयी समिधा से जन्मी हूँ माधव पता है न| अनिच्छा से डाली समिधा फल नहीं देती वरन याजी को जला देती है|”

“हम सब इस जीवन यज्ञ में समिधा ही तो हैं कल्याणी| अपने-अपने हिस्से का जलना तो निश्चित है मेरा भी और तुम्हारा भी | बिना जले कहीं कोई भी कोई भी लांछन से निकला है कभी| अच्छा हाथ आगे लाओ मैं कुछ लाया हूँ तुम्हारे लिए|”

मैंने हाथ बढ़ाया तो मेरी खुली हथेली पर पांच हरे पुष्प रख दिए|

“ये तो पारिजात से भी अद्भुत हैं गोविन्द|

“ये पारिजात से भी श्रेष्ठ हैं| कभी सूखेंगे नहीं| ये अधीरता को वश में करना सिखायेंगे तुम्हें, धैर्य सिखायेंगे तुम्हें| धैर्य यूँ भी तुम्हारे लिए बहुत आवश्यक है| जीवन के प्रतीक्षा पथ पर एक धैर्य ही तुम्हारा साथी रहेगा|”

“ पर क्या पुष्प है ये, जिन्हें देख आँखें जुड़ी जा रहीं गोविन्द?”

“ये हरित चम्पा के फूल हैं| ये पांच के महत्व को समझने में तुम्हारी सहायता करेंगे कल्याणी|”

कृष्ण लौट गए| मेरे सर के ऊपर एक वितान तान कर वापस लौट गए जिसके नीचे मेरे साथ खड़ी थीं चिंताएं, भय, अकुलाहट, अधीरता और अर्जुन की छवि|

3

पिता के यहाँ जितने भी सुख मिले मुझे उनमें सबसे बड़ा सुख नितम्बिनी का संग था| एक ही अग्नि के उदर से जन्मे थे मैं और धृष्टद्युम्न पर स्नेह,सम्मान के बाद भी अपने इस सहोदर से एक दूरी थी मेरी| राजकुमार शिखंडी उन्हें जब-जब उन्हें देखती तो लगता वो भीतर ही भीतर किसी यज्ञ की आहुति पाल रहे हैं| बन्धु-बांधवों के इस इतने बड़े घर में मेरे मन के समीप था तो वो नितम्बिनी थी| वो मित्र थी, स्वप्न- अभिलाषाओं की साक्षी| मेरे जीवन के दो अलभ्य पुरुषों को उसने कितनी सरलता से मेरे भीतर पैठा दिया था| पहले कृष्ण को और बाद में अर्जुन को|

वो जब कृष्ण के रास की कथा सुनाती तो लगता की दूर कदम्ब के नीचे खड़ी हो कर मैं राधा-कृष्ण को देख रही हूँ| वो जब जब बताती कि कैसे रणछोड़ जरासंध के भय से मथुरा छोड़ द्वारिका चले गए तो लगता कि कृष्ण के पीछे-पीछे मथुरा की कुञ्ज गलियों में मैं भी चल रही हूँ| पर कृष्ण ही तो चाहते थे कि अब मैं सांस-सांस अर्जुन का नाम रटूं| सो जब-जब नितम्बिनी सुनाती की द्रोण पूछ रहे कि बताओ अर्जुन क्या दिख रखा? और जब अर्जुन कहते कि चिड़िया की आँख तब अदृश्य में मेरी आँखें अर्जुन की आँखें देख लेतीं| जब जब अर्जुन के पिता को बंदी बनाने की कथा सुनती तब-तब नितम्बिनी मुझसे पूछती|

“अजब हो तुम कृष्णा पिता के बंदी बनने के दृश्य पर भी हँस रही हो|”

“जिसे पिता ने ही अपना लिया हो उसके लिए कैसे सुख अनुभव न करूं|”

सुख तो बहुत कम है संसार में कभी पूरी मात्रा में मिलता ही नहीं किसी को| स्वयंवर रचाया जा रहा था| हर ओर आनंद-उत्सव था| स्वयंवर का हर लक्ष्य अर्जुन के निमित्त था| इस स्वयंवर का लक्ष्य मीन भंजन था या याज्ञसेनी का भाग्य ये अभी भी छुपा हुआ था| अर्जुन के लिए मीन-भंजन का लक्ष्य निर्धारित कर के भी पिता निश्चिन्त नहीं थे| वो जानते थे की अर्जुन के अन्य कोई भी इस लक्ष्य को भेद नहीं पायेगा फिर भी वो अनिश्चिंत थे| मन की निश्चिंतता कभी किसी की टिक पायी है जो राजा द्रुपद की ही टिक पाती| कृष्ण स्वयंवर के समय से पहले ही लौट आये थे| वो सीधे पिता के पास गए मुझ से मिले भी नहीं| दिन ढलान की ओर खड़ा था पर कृष्ण कहीं नहीं थे| शंका का शंख बार बार मेरे मन में गूँज रहा था और इसकी भित्तियों में कम्पन भर रहा था| भय अपनी समूची हिंसा से मुझ पर झपटता और लौट जाता| कृष्ण नहीं आये, आये तो कुमार शिखंडी| आते ही मेरी दोनों हथेलियाँ अपने हाथों में भर लीं|

“कृष्ण एक बुरे समाचार के साथ आये हैं| स्वयंवर रद्द करने की मांग करो पिता से जा कर|”

“ऐसा क्या समाचार ले आये?”

“वारणावत के लाक्षागृह में कुंती सहित पाँचों पांडव जल के अवसान को प्राप्त हुए| और अब अर्जुन ही नहीं तो कैसा आयोजन|”

“पर आयोजन रद्द हुआ तो पिता पर लांछन लगेगा|”

“यदि तुम स्वयंवर में गयी तो तुम पर लांछन लगेगा| मन किसी को सौंपने के बाद किसी और को जयमाला डाल सकोगी| काशी की अम्बा का जीवन याद कर के देखो याज्ञसेनी, अग्निकुंड ही अंतिम सत्य रह जाता है अंत में वो धधकती अग्नि भी शांति नहीं दे पाती|”

“अर्जुन के अतिरिक्त कौन है जो इस लक्ष्य को भेद पाये, स्वयं ही रद्द हो जायेगा ये आयोजन|”

“कर्ण, अंग के राजा कर्ण भेद देंगे इस लक्ष्य को कल्याणी| अर्जुन से बड़ा धनुर्धर है ये| काल की पीठ इसका धनुष है, इसीलिए कालपृष्ठ नाम है इसके धनुष का| गांडीव एक बार लक्ष्य चूक सकता है कल्याणी पर कालपृष्ठ से निकला तीर शिव के अन्य कोई पलट नहीं सकता| है तो श्रेष्ठ पर है अधिरथी, सूत-पुत्र है|” कृष्ण ने कहा,वो जाने कब से वहां आ कर खड़े थे|

“कोई राह माधव?”

“राह सुझा तो दी अब चलना या न चलना तुम पर निर्भर|”

मुझे उदास देख कृष्ण हँस कर बोले|

“चिंता मत करो ब्राह्मण अभी भी श्रेष्ठ माने जाते हैं| कोई योग्य क्षत्रिय न हो तो ब्राह्मण को वरण करने का प्रचलन है|”

“पर कोई लांछन माधव, मुझे भय है|”

“अरे तुम क्या कोई जल हो जिसे शुचिता का भय हो, कि किसी के स्पर्श मात्र से मैले हो जाओ| तुम गंगा भी नहीं कि सबका पाप तुम्हें ही वहन करना पड़े| याद रखो कल्याणी, तुम अग्नि हो| अग्नि चाहे चिंगारी में हो, लपट में हो, ज्वाला में हो, रौरव में हो, यज्ञ में हो, चित्त में हो या चिता में हो उज्ज्वल मानी जाती है| तुम्हें किसी दिन, किसी हाल किसी लांछन का भय नहीं|”

4

आज पीछे, अंतर के पीछे झाँक कर देखती हूँ तो स्वयं को कुरुक्षेत्र के असंख्य फैले हुए शिवरों में से किसी एक में पाती हूँ| दिन ढल रहा है| शंखनाद के बाद कोलाहल थम जायेगा, फिर अगले सूर्योदय की शंखध्वनि तक केवल पीड़ा का स्वर सुनाई देगा| रोगियों की शय्या से उठने वाली कराह, कहीं किसी शिविर में मृत्यु की पदचाप|  आह! कितना पीड़ादाय है युद्ध , निश्चित करता है कि वो सब वृक्ष जो कल सुगंध से परिपूर्ण होंगे समूचे ही नष्ट कर दिए जायेंगे| युद्ध केवल समृद्धि, देह का ही नाश नहीं करते वरन मन का भी अंत कर देते हैं| इस युद्ध के बाद कितने बचेंगे जो अपने मृत हृदय का भार उठा पायेंगे| अँधेरा पसर चुका था| लोग अपने अपने शिविर में वापस लौट आये थे| सामने महाराज युधिष्ठिर का शिविर है| युधिष्ठिर अर्थात युद्ध में स्थिर पुरुष| क्या इसी दिन के लिए उनका नाम युधिष्ठिर रखा गया था| उनके शिविर से विष्णु सहस्त्रनाम की अनुगूंज उठ रही थी| भीष्म ने इन सहस्त्रनामों का पाठ किया था और इसे अनुशासन पर्व का नाम दिया था| शांत चित्त युधिष्ठिर तो इन सहस्त्रनामों से शांति पा लेंगे पर में उद्विग्नमना कहाँ जाऊं| नारायण स्वयं मेरे सखा हैं फिर भी मुझे धैर्य नहीं|

नौवें दिन का युद्ध भी बीत चुका था|  भीष्म अब शरशय्या पर थे और कल का युद्ध कर्ण के नेतृत्व में लड़ा जाना था| उसी कर्ण के नेतृत्व में जिसे मैंने पिता की सभा में ठुकराया था| जिसने अपने अपमान के डाह में मुझे वेश्या तक कह डाला था| और वो भी यही कर्ण था जिसने मुझे जमुना के अथाह जल में डूबने से उबारा था| कल यही पार्थ के सामने होगा अपने कंधे पर कालपृष्ठ धरे| रात एक दम निविड़ शांत थी| रोगी चुप थे| घायल उपचार को ले जाये जा रहे थे| मैंने शिविर के बाहर देखा दीप बुझने को आ गये थे| पाँव स्वत: ही गंगा तट की ओर उठ गए| ये रणक्षेत्र कितना अपना सा लग रहा ठीक मेरे मन जैसा घायल रक्त से सना हुआ| गंगा-पुत्र भीष्म के पाँव की ओर कुमार शिखंडी खड़े थे|

“लौट जाओ अम्बा अब| प्रण पूरे होने के बाद चित्त शांत कर लेना चाहिये| तुमने अपना भार अब तक सहा और मैं आगे सहूंगा| सब को अपना-अपना शीश,अपना-अपना भार अपने कंधे पर ही सहना पड़ता है इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं|”

कुमार शिखंडी चुपचाप अपना भार उठाये वापस लौट गए|

“मेरा भार कौन उठाएगा?”

“कौन द्रौपदी?”

“द्रौपदी तो कब की समाप्त हुई| अब तो आपके पांयते याज्ञसेनी खड़ी है|”

“तुम कुरुकुल का सूर्य भी हो|”

“ये सूर्य तो उस दिन कुरुसभा में ही ढल गया था|”

“तुम पांडवों की पत्नी भी तो हो|”

“वह साहचर्य तो उसी दिन चुक गया था जब मुझे दांव पर लगाया था|”

“तुम युधिष्टिर का धर्म भी हो|”

“ये धर्म जब कीचक ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा था तभी गिर गया था|”

गांगेय शांत हो गए वो जानते थे मेरे उद्विग्न मन को कोई थाम नहीं सकता|

“कहाँ गया आप का प्रताप कि सत्य,सत्य,सत्य, त्रिबार सत्य कह दें आप तो उस वचन को कोई भी भंग न कर पाये|”

“वो तो गंगा के अतल जल में डूब गया कल्याणी|”

“जब शांतनु पुत्र का ही धैर्य डूब गया हो तो फिर अशक्त,अधीरों को कौन संभालेगा| कौन मन में उपजे शत्रु का नाश करेगा, कौन राह दिखायेगा फिर?”

“जाओ कल्याणी आदित्यहृदय स्त्रोत का जाप करो| अंशुमाली तुम्हारे रोग,शोक, भय, शत्रु सब का नाश करेंगे| याज्ञसेनी का एक भी शत्रु न जीवित बचेगा| सत्य, सत्य, सत्य, त्रिबार सत्य!, और जब नरोत्तम कृष्ण स्वयं तुम्हारे बन्धु हैं, तुम्हारी बाँह गहे हैं तो शंका का क्या अधिकार मन पर|

“मेरी शंका का कारण तो कर्ण हैं| सूत-पुत्र कह कर आपने नौ दिन तो उस पर बंधन डाल रखा था पर अब अर्जुन पर शरसंधान से कौन रोकेगा उसे|”

“ये बंधन तो तुम भी एक बार डाल चुकी हो उस पर| और जब तक द्रोण है तब तक कर्ण भाग तो लेगा पर युद्ध का संचालन नहीं कर कर पायेगा| तुम्हारी चिंता तो द्रोण हत्या के बाद का विषय है| पर स्वयं विष्णु जिसके सारथि बने हों उसके लिए कैसा भय| निशंक जाओ कल्याणी|”

5

शिविर में लौट कर मुझे बार बार गांगेय के शब्द सुनाई पड़ते रहे|

“ये बंधन तो तुम भी एक बार डाल चुकी हो उस पर|”

मन पंचाल की सभा की ओर वापस मुड गया| कृष्ण मेरे सीधे हाथ की ओर समीप ही खड़े है| कर्ण सामने चल कर जा रहा है जहाँ चक्के पर बंधी मीन घूम रही है|

“पल भर ही में ये धनुष उठा लेगा और पल भर ही में स्वयंवर जीत जायेगा| बंधन डाल दो इस पर कल्याणी|” कृष्ण ने कहा|

“ठहरिये! अंगराज| आप इस आयोजन के योग्य नहीं| ”

कर्ण ने मुझे देखा, आँखों में लपट सी उठी और उसने पलट के मुझसे पूछा|

“क्यों राजकुमारी?

“क्योंकि अंगराज स्वयं शिव को पार्वती से विवाह के लिए कुल, गोत्र, रूप धारण करना पड़ा था| शिव से शेखरेन्दु का अवतार लेना पड़ा था| सम्मानित पिताओं की योग्य पुत्रियों के लिए तो ईश्वर तक को कुल-गोत्र का परिचय देना पड़ता है तो आप कौन हैं| पंचाल की कन्या कभी किसी अधिरथी के गले में जयमाला नहीं डालेगी| महर्षि परुशराम ने जब धरा को क्षत्रिय विहीन किया तब भी किसी राज कन्या ने कभी अधिरथी का हाथ नहीं थामा, उनने या तो ब्राह्मण का वरण किया या भिक्षाटन पर जीवन व्यतीत किया| यही नियम मेरे हेतु भी है अंगराज, किसी क्षत्रिय के आभाव में मैं या तो किसी ब्राह्मण के गले ये माला डालूंगी या जीवन भिक्षाटन पर बिता दूंगी पर आपके गले को ये माला कभी नहीं छू पायेगी|”

अंशुमाली से चमकते चेहरे पर पल भर ही में मलिनता की छाया चली आई| कर्ण ने अपना उठा हुआ हाथ वापस खींच लिया| धनुष नीचे रख कालपृष्ठ का गौरवशाली स्वामी अपने पिटे हुए गौरव को हाथों में समेटे बाहर निकाल गया| मेरे मन में बार-बार पार्वती का ब्रह्म्चारणी रूप आ रहा था| क्या अग्निसुता द्रौपदी को जीवन पिता के घर बिताना पड़ेगा| कृष्ण मेरे और समीप चले आये| जाने कैसे मन की दुविधा पढ़ ली उनने, धीमे से बोले ब्रह्म्चारणी बनो या किसी ब्राह्मण की पत्नी पर तुम्हारे ऊपर गिरिजा का हाथ है सदा कल्याणी, व्यर्थ ही मन को संशय की राह पर खड़ा कर रखा है|  वो देखो तुम्हारी त्वरा का भार उठाने वाला आ गया है|

अपने ही पिता के राज्य में पत्तों से ढंके आंगन में खड़ी थी मैं| कृष्ण मेरे सामने खड़े थे|

“देख रहे गोविन्द, इनकी माँ ने मुझे अपने पाँचों बेटों में बाँट दिया| अब बताओ किस अतल जल के तल में जा कर छुप जाऊं मैं|”

“कल्याणी अलन्करिष्णु शिव तो सदा मांगने वालों को अलंकारों से भर देते हैं| तुमने पांच अलंकार जैसे पति मांगे थे लो स्मरहर ने तुम्हारी साध पूरी कर दी|”

“पांच पति, कौन मानेगा? मेरे पिता ही इन चारों की हत्या कर देंगे| क्यों इनकी हत्या का दोष उन्हें देना चाहते| ब्रह्महत्या से तो इंद्र भी नहीं बच पाए थे|”

“कौन ब्राह्मण? ये पांडव हैं| मृत्यु जिनका भय माने उन्हें क्या असमय ही छू सकती है| कौन होगा अर्जुन के अतिरिक्त जो ये प्रण भंग कर सके| जाओ! निशंक जाओ कल्याणी|

6

“मायापति हैं कृष्ण राजकुमारी| जानती हो इन्होने अपनी योगमाया से सतमासे बलराम को रोहिणी में स्थापित कर दिया था और आज अपनी माया से आपको पांच पतियों में बाँट दिया|” नितम्बिनी ने कहा|

कृष्ण द्वार पर खड़े थे वहीं से बोले|

“मात्र मायापति ही नहीं तुम्हारा मित्र भी हूँ कल्याणी| आज तुम्हारे लिए उपहार लाया हूँ| अपनी माया ही देने आया हूँ तुम्हें|”

“माया|”

मेरे हाथ पकड़ कर वो बोले|

“मैं अपनी योगमाया का एक हिस्सा तुम्हारे भीतर सौंप रहा हूँ| मेरी अनुपस्थिति में जहाँ-जहाँ तुम्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी ये तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करेगी| और हाँ धैर्य मत छोड़ना, तुमसे असाधारण धीर की अपेक्षा है मुझे कल्याणी| ऐसे धीर धरना जैसे शिव ने कंठ में हलाहल रखा है| जीवन तुम्हें जाने कैसे-कैसे विष पीने को दे|”

कितनी बार रात के अँधेरे में मैंने बैठ कर सोचा है कि कृत्तिवास ने तो एक ही बार कालकूट पिया था पर मुझे तो न जाने कितनी बार पीना पड़ा| हर बार मात्रा पहले से अधिक| मृत्यु अचल खड़ी देखती रहती कि जीवन इस बार छटपटायेगा या नहीं| अग्नि से जन्मी याज्ञसेनी जीवन भर अग्नि में ही रही| शिव तो हलाहल पी कर कैलास चले गए| जलाभिषेक की अगणित धाराओं में डूब गए| पर मेरा ताप कौन हरे?

कैसे कैसे दुःख, दुश्चक्रों,छलना का पथ रहा मेरा जीवन| कौन कहता है समर्पण और प्रेम तुला में समान स्थान रखते हैं| मैंने समर्पण अधिक किया और प्रेम कम पाया|

कृष्ण को तो जन्म ही से सब सौंप दिया था मैंने और सबसे अधिक छलना उन्हीं ने की मेरे साथ| मेरे बांधे चीर के वो सात धागे उन्होंने उपकार में लौटा तो दिए पर उस उपकार से उऋण होने के लिए क्या क्या गंवाना पड़ा था मुझे| समृद्धि के अम्बार पर होने के बाद भी आत्मा तो रिक्त है| इस महल में जब जब परीक्षित की हँसी सुनती हूँ तो ये रिक्तता जाने क्यों बढ़ जाती है| स्मृति से कितनी कितनी छायाएं निकल कर मेरे सामने खड़ी हो जाती हैं| छाया तो छाया है| इनमें न अब रक्त है, न मज्जा, न देह, न आत्मा पर इनके पास बाहुपाश है| ये जब चाहें, जहाँ भी चाहें वहीं आ कर मुझे घेर लेते हैं|

दिन हो की रात हो, आरम्भ या अंत मैंने सदा अनगिनत प्रश्नों को सामने पाया| मैंने जब-जब स्वयं को ऐसे पाया तब तब केवल सामने कृष्ण ही दिखाई दिए जिनके पास जा कर मैं मन रिक्त कर पाऊं| पर यही कृष्ण बदल गए थे| जो कभी मेरे हर प्रश्न का उत्तर जानते थे| मेरी हर शंका का अंत कर देते थे वही मेरे अंतिम प्रश्न पर मौन थे| ये जान कर भी इन प्रश्नों के बाद वह जीवन भर मेरे किसी प्रश्न को अपने सामने पायेंगे ही नहीं| क्या समय का सुंदर चेहरा मेरे इन प्रश्नों की छाया से काला पड़ता होगा या नहीं| मेरा मन इन प्रश्नों के उत्तर के लिए छटपटाता रहा और कृष्ण का इनसे बचने के लिए|

7

“सोचो माधव! अपने अंतर में झांको और सोचो| जब राजाओं के मुकुट गिरते हैं, तब राज सिंहासन गिरते हैं,प्रतिष्ठा गिरती है| योग्य पुरुष बारम्बार उठते हैं, अपना पद, अपनी प्रतिष्ठा फिर पाते हैं, मुकुट माथे धरते हैं| पर जब जुड़े से बंधा चीर गिरता है तब मान के तटबंध,जीवन की रसना,ऊर्जा सब स्थानच्युत हो जाते हैं और वापस नहीं उठते|

सोचो, बार-बार सोचो और देखो कि ये खुले बाल बड़े पीड़ादायक हैं मेरे लिए| इसलिए नहीं कि  किसी ने छूआ था इन्हें बल्कि इस लिए की कल जब सुभद्रा मुझसे पूछेगी की जीजी तुम्हारे सफ़ेद पड़ते बालों के लिए मेरे अभिमन्यु को घेर कर मारा गया तो क्या उत्तर दूं| जब हिडिम्बा पूछेंगी कि तुम्हारे बालों ने बंधने के लिए किन किन की बलि ली है तो क्या उत्तर दूं, क्या कहूँ माधव?”

“कल्याणी ! तुम्हारे बाल कोई साधारण तो नहीं| ये तो धुरी हैं धरती की| यदि ये न बंधते तो धरती सदा पथभ्रष्ट घूमती ही रहती| ये शेषनाग के फणीबंध हैं, जब तक ये न बंधते तब तक उनके ऊपर धरी धरा कांपती ही रहती|”

“बातों का जाल न बिछाओ राधावल्लभ| तुम्हारा सखा का भाव ही छलना है मेरे लिए| तुम्हीं ने कहा था न मुझ से कि ………..

“मैं भुवनपति हूँ| सोलह कलाओं से पूर्ण विष्णु का श्याम वर्णी अवतार हूँ मैं| मैं जहाँ संसार का सार वहां|”

तो बताओ योगेश की संसार का सार जब तुम्हारे भीतर था तो अर्जुन को क्यों नहीं रोका| क्यों नहों कहा कि अर्जुन मैं भुवनपति हूँ मैं जहाँ जय वहाँ| संधि के नाम पर, आगत के नाम पर चित्रांगदा और उलूपी से बंधन क्यों| मैंने माना सुभद्रा के लिए तुम अर्जुन को चाहते होंगे पर बाकियों के लिए क्यों हामी दी तुमने केशव|

“कल्याणी|”

“कल्याणी न बुलाओ| जिस नाम का अर्थ सार्थक न हो उसे त्यागना ही उचित है| मुझे याज्ञसेनी ही बुलाओ| और तुम सच ही में मायापति हो तुमने अपनी माँ तक को भी ठगा तो मैं क्या हूँ| सुनो कमलनयन तुम्हारा सारा प्रेम बस अपनी बुआ के बेटों के लिए है और किसी के लिए इस प्रेम का पासंग भी नहीं|”

“ऐसा नहीं है|”

“ऐसा ही है गोपाल, घसीट के सभाओं में लाया जाये हमें और युग प्रणेता तुम्हारे भाई कहलायें| जुआ खेलें वो और संतान हमें छोड़नी पड़े अपनी| देखो मेरे ये हाथ देखो| रिक्त हैं दोनों| समय की तलहटी का सूखा कीचड़ लगा है इनपर और कुछ नहीं| मेरा तो सब रीत गया इस युद्ध में| मित्र थे तो एक बार कहते कि इस परिवार के द्वेष को अपने माथे मत आने दो कृष्णा| युद्ध हुआ तो तुम्हारे बेटे भी इस यज्ञ में होम हो जायेंगे|”

“ये युद्ध तो समय की गाँठ था कल्याणी|”

“समय की गाँठ,त्वरा की गाँठ से भी बड़ी होती है गर्भ की गाँठ| कहाँ हैं मेरे बेटे माधव? ………… चुप क्यों हो गोविन्द? क्या विशम्भर वासुदेव की छाया पांडवों के लिए ही थी| मैं कुंती नहीं मैंने वरदान में नहीं पाये थे ये बेटे, जन्मा था इन्हें| क्या तुम्हारी हथेली की प्राचीर कुंती-पुत्रों के लिए थी|  आज तुम मुझे शत्रु लग रहे |”

 “शत्रु! ये क्या कह दिया कल्याणी|” कृष्ण ने अवाक् हो कहा|

 “तुम्हारे पुत्रों में जीवन तो नहीं ला सकता मैं पर इसके अतिरिक्त ऐसा क्या करूँ
कि तुम्हें धीर आये, कोई भी चाहना हो बस मुझे कह भर दो कल्याणी|”

“यादवेन्द्र! जैसे मेरे मन का घाव अब सदा हरा रहेगा ऐसा ही घाव उसे भी दे आओ| कौस्तुभ है अश्वत्थामा के माथे पर जाओ उसे निकाल लाओ और आजीवन रक्त रिसने के लिए छोड़ आओ उसे|”

“लाता हूँ कल्याणी, प्रतीक्षा करना| कह कर कृष्ण उठ गए|

“ये अंतिम विदा है| आप जाइये ज्योतिरादित्य आगे भेंट नहीं होगी कभी अब| मेरे मन में नेह के जितने भी सम्बोधन थे आप के लिए वो सब आप को अर्पित कर दिए हैं मैंने| अब आप मात्र द्वारिकाधीश हैं मेरे लिए|”

कृष्ण ने मुझे देखा और चुपचाप बाहर चले गए|

इस शांति में गांगेय भीष्म के शब्द मेरे कानों में बार-बार गूंजने लगे|

“जाओ कल्याणी आदित्यहृदय स्त्रोत का जाप करो| याज्ञसेनी का एक भी शत्रु जीवित नहीं बचेगा|”

“आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्/जयावहम् जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्||”

मेरे मन से जैसे कोई बोला|

“सुनिए द्वारिकाधीश! ये शोक है| अब बस एक ही चाहना बची है कि गांधारी का तुम्हें दिया शाप निकट ही फलीभूत हो| मृत्यु पग भर की दूरी से तुम्हारे कुल के आसन्न रहे…….  आसन्न रहे!!!

Anagh Sharma

C/o Sudhanshu Sharma

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