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अनुकृति उपाध्याय का व्यंग्य ‘मेला देखन मैं गई’

‘जापानी सराय’ की लेखिका अनुकृति उपाध्याय ने इस बार व्यंग्य लिखा है। फागुन में साहित्य महोत्सवों की संस्कृति पर एक फगुआया हुआ व्यंग्य। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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मेला देखन मैं गई

भूतपूर्व अभिनेत्री सत्र शुरू होने के आधे घंटे बाद लहराती हुई आई थी और छद्म मासूमियत के साथ मंच के एक कोने पर बैठ गई थी। पैनल के अन्य सदस्य – तकनीकी विशेषज्ञ, अंतर्राष्ट्रीय संगठन के अधिकारी, नामचीन लेखक और बुनियादी काम करने वाले समाज सेवी तब तक चर्चा प्रारम्भ कर चुके थे। संचालक भूतपूर्व अभिनेत्री की ओर मुख़ातिब हुआ था, ‘आप कुछ देर से आईं हैं और हम बातचीत शुरु कर चुके हैं  … ‘

‘कुछ परम्पराओं का पालन होना चाहिए। देर से आना उनमें से एक है।’ उसने सावधानी से गर्दन हिलाई कि बालों की लटें अव्यवस्थित न हो जाएँ, ‘मैं हमेशा, हर जगह देर से आई हूँ। ‘ उसने गर्व से घोषित किया।

संचालक कुछ हतप्रभ हुआ और मंच पर बैठे लोगों के चेहरे भावविहीन हो गए।  दर्शकों में सुगबुगाहट हुई ।  ‘आप पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही हैं।  आपका योगदान… ‘

संचालक के प्रश्न पूरा पूछने से पहले ही उसके यत्न से रँगे-चुने मुख पर गहरे दुःख की रेखाएँ उग आईं और धनुषाकार होंठ बिसूरने को तत्पर हो गए । लहीम-शहीम पलकें झपका कर, कटोरे सी आँखों में दर्द भर कर उसने दर्शकों की ओर बढ़ाया। भूतपूर्व अभिनेत्री अपने भूतपूर्वपन को भूल चुकी  थी  और गंभीर चर्चा के मंच पर फ़िल्म-सेट का समां बँध गया था। ‘मेरा दिल टूटता है पर्यावरण के साथ ये बुरा बर्ताव देख कर,’ वह कुरलाई, ‘कैसे… हम कैसे अपने बच्चों के साथ ऐसा कर सकते हैं? कैसे?’ उसकी आँखों  से आँसू की एकाध बूँदें रिसीं। मंचस्थ लोगों ने एक-दूसरे की ओर कनखियों से देखा। ‘हम अपने बच्चों को मार रहे हैं… उन्हें मार रहे हैं… ‘ वह भर्राए कंठ से दहाड़ी।

अंतिम पंक्ति में बैठी ज़हीन आँखों वाली लड़की ने एक पल आश्चर्य से स्टेज की ओर देखा। ‘इसे क्या हुआ ?’

‘मुझे लो बी. पी. है, ‘ अभिनेत्री मंच पर फुसफुसाई, ‘ मैंने पूरे भारत की यात्रा की है, बच्चों को देखा है … बच्चों को… मुझसे बर्दाश्त नहीं होता … नहीं होता … ‘

‘न मुझसे,’ ज़हीन आँखों वाली लड़की उठ खड़ी हुई, ‘ये क्या बेहूदगी है !’

‘ये एक माँ है,  इसके एक मासूम, दुधमुँहा बच्चा है… ‘ अभिनेत्री ने सिसकियों के बीच मंच पर बैठी एक पैनलिस्ट की ओर इशारा किया, ‘इसका बच्चा… इसका बच्चा.. ‘

ज़हीन आँखों वाली लड़की खिलखिला पड़ी।  ‘यार, क्या मेलोड्रामा है! कोई कट बोल दो ज़रा!’

मंच पर चर्चा की जगह भूतपूर्व अभिनेत्री से सहानुभूति दिखाने और उसके जज़्बे की क़द्र करने की होड़ ने ले ली थी।

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‘तो मैंने अमुक सुपर स्टार के लिए भविष्य वाणी की थी कि तुम छा जाओगे और वो छा गया!’ अ-लेखक अपनी भविष्य-बेधिनी दृष्टि की अचूकता पर मुस्कुराए।

मंच पर बैठे छुटभैया संचालक झूम उठे जैसे अ-लेखक महोदय ने प्रसाद की कामायनी को पछाड़ने वाली रचना सुनाई हो, ‘वाह, वाह! आपके मुरीद हो गए होंगे फिर तो! साथ काम करने को कहा होगा !’

‘अं हाँ … असल में फ़ेमस होते ही उसके चारों ओर इतने परजीवी घिर आए कि बस… फिर दोबारा मौक़ा ही नहीं मिला कि बात वग़ैरह हो पाए… और मैं भी थोड़ा खुद्दार हूँ, ये एक कमी मैं अपनी मानता हूँ। मैंने भी उसके नाम का कभी कहीं इस्तेमाल नहीं किया।’ उनके मुख से आत्म-मुग्धता की आभा फूटने लगी।

छुटभैये संचालक का मुखमंडल ‘सूरज निकला, विकसा शतदल’ की शास्त्रीय तर्ज़ पर खिल गया। उनकी जिह्वा से चापलूसी परक प्रशंसा का परागण उड़ने लगा, ‘आप इस क़दर स्वाभिमानी हैं कि क्या कहें! कोई और होता तो इस रिश्ते को अच्छी तरह दोहता, हर जगह बताता फिरता!’

‘मेरी ऐसी आदत ही नहीं, नहीं तो कहीं का कहीं होता।  इस किताब में उसके बारे में लिखा है, पूरी घटना का ब्यौरा है । किताब उसे भेजी भी है। देखो, शायद पढ़ ले…’

‘कम से कम उनका सेक्रेटरी तो पढ़ेगा ही,’ छुटभैया संचालक ने सांत्वना दी, ‘एक पूरा चैप्टर उन्हीं के नाम पर है…’

‘देखो…’

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‘अलां , फलां और ढिमकाने के सेशन में ज़रूर जाएँगे।  एक लंच से पहले है और दो लंच के बाद।’ लम्बा लहँगेनुमा स्कर्ट पहने महिला ने कहा।  उनके श्वेत बालों में जड़ाऊ पिन जुगनुओं सी जगमगा रही थीं।

‘लंच के बाद कौन जाता है यार? वैसे भी क्या नई बात कहेंगे जो पहले नहीं सुनी? और ढिमकाना क्या कहता है ये न वो  ख़ुद जानता है ना ख़ुदा। ‘

‘मैंने कब कहा उन्हें सुनने जा रहे हैं ? मुँह दिखाने जा रहे हैं।  फलां हमारे सेशंस में आया था और अलां का सितारा बुलंद है।  उसकी किताब पर फ़िल्म बन रही है।’

‘यार, तुम आगे की रॉ में घसीट ले जाओगी।  झपकी भी नहीं ले पाएँगे। ‘

‘किसने कहा झपकी नहीं ले पाओगे? आँखें बंद कर सुनना, जैसे संगीत , कविता और प्रवचन सुने जाते हैं!’

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‘मैंने कविता में नया प्रयोग किया है,’ मंच पर आसीन तथाकथित कवि ने कहा, ‘जापानी हाइकू शैली में ऐसी कविताएँ किसी ने नहीं लिखी हैं।’

काले वासा तोते

उड़ गए अचानक

चुपचाप। ‘ तथाकथित कवि ने सपाट स्वर में गहन गंभीरता के साथ उचारा।

‘बादल सागर

सफेद फूल

शायद मैग्नोलिया।’ तथाकथित कवि ने खँखार कर कंठ सुधारा ।  ‘और सुनिए,’

‘नहीं। … ‘ गुमसुम चेहरे वाली लड़की ने कराह कर कनपटियों को अँगुली के पोरों से दबाया।

बग़ल में बैठे व्यक्ति ने फ़ोन पर से निगाह उठा कर उसे सहानुभूति से देखा। ‘ ये अभी कई और कवितायेँ सुनाएँगे। इनकी कविता की छः किताबें प्रकाशित हुई हैं।’

‘छः? ‘

‘हाँ, और एक बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक ने छापी हैं। अवॉर्ड भी मिले हैं कई।  ‘

गुमसुम चेहरे वाली लड़की की आँखें विस्फारित हो गईं। ‘

‘बड़े चलते पुर्ज़े  हैं ये !  लेकिन प्रकाशक भी प्रकाशनास भुँजाने वाला है। ‘

‘पानी बरसा

शाम ढली

भीगे वासा तोते ।’

‘इनकी कविता में आज कल तोते उड़ रहे हैं, इस से पहले हाथी झूमते थे! एक गीत सात देशों के संगठन पर भी लिखा है – हम सात हैं, हम सात-साथ हैं ! अभी वो भी सुनाएँगे !’

गुमसुम चेहरे वाली लड़की बच निकलने का रास्ता तलाशने लगी ।

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3 comments

  1. अनुकृति बहुत ही शानदार लिखती है ,भाषा के प्रति सजगता है ।शब्द अपने आप उभर कर आते है ।मुकम्मल ।

  2. इतनी उदार प्रशंसा के लिए बेहद आभार

  3. Durgaprasad Agrawal

    अनुकृति जी की प्रतिभा के इस अभिनव आयाम से परिचित कराने के लिए आभार.

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