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अभिषेक रामाशंकर की कहानी ‘लूट’

युवा लेखक अभिषेक रामाशंकर की कविताओं से तो मैं प्रभावित था, आज उनकी यह कहानी भी पढ़ी। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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— लूट—

सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था , पुरज़ोर सन्नाटा । दर्जनों गाड़ियां जल चुकी थीं , कई मोटरसाइकिलें , बसों और दुकानों को आग में झोंक दिया गया था । कई इलाकों से तशद्दुद और कत्ल-ओ-ग़ारत की खबरें आ रही थीं । आग की ऊंची ऊंची गरम लपटें इस क़दर उठ रही थीं मानो सारा शहर आज ही ख़ाक हो जाएगा । हवा नहीं थी राख़ और धूल की आँधियाँ थीं जिनसे नफ़रत , बदले , दहशत की बू आ रही थी । कुछ साफ़ नहीं दिख रहा था , कुछ देखने क़ाबिल बचा ही नहीं था । इंसानियत शर्मसार हो चुकी थी । सड़कों पर लाशों का ढेर लगा हुआ था , खून की छींट दीवारों पर किसी काले धब्बे की तरह जम गई थी । सरकारी रज़ाकारों की मदद से घायलों को अस्पताल भेजने का काम शुरू किया गया , मलबों से लाशों की शिनाख़्त कर उनके घर वालों के हवाले किया जा रहा था । चीख़ें थीं जिनकी गूंज बदन नोचकर कान पर ला’नत भेज रही थीं । कान चीखों-चिल्लाहटों से फटे जा रहे थें । घरों से औरतों के रोने की आवाज़ सड़कों पर मतलातुम होती जा रही थी । पुलिसकर्मियों को सख़्ती से पेश आने की हिदायत दी गई । शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया । घरों में मातम हो रहे थे , हाव-हू था । कोई अपने बच्चे के लिए रो रहा था तो कोई अपने शौहर के लिए , कोई अपने माँ-बाप के लिए । कितने बच्चे यतीम हो गएं , कितनी औरतें विधवा हो गयीं । औरतें लाशों से लिपटकर रो रही थीं , अपनी किस्मत को कोस रही थीं । अपनी बेहाल और बर्बाद ज़िंदगी अब किसके सहारे गुजारेंगी ?

हाय – हाय

घर का आंगन छाती पीटने की आवाज़ों से गूंजकर दहल उठा था ।

मार दिया कमबख्तों ने , हाय! इसने क्या बिगाड़ा था उनका…

हे राम , ये क्या हो गया…

या मौला रहम … या ख़ुदा …

कितनी औरतों की इज्ज़त लूट ली गई फिर उन्हें मार दिया गया , जो बच गईं उनमें से कितनों ने खुदकुशी कर ली और कुछ ने अपना दिमागी तवाजुन खो दिया । जैसे दंगों की रिवायतों में शुमार हो ‘लूट’ , दुकानों से मन नहीं भरता इनका । अब ये घरों की इज्ज़त लूटते हैं । औरत हमेशा ही मर्दों का शिकार होती आयी है । हमारे मुआ’शरे ने औरतों को हमेशा मफ़लूक-ए-हाल रखा और इनकी तंगहाली और बेचारगी में भी इन्हें लूटता आया है। चाहे बना लो कोई नया शहर कोई नया देश या खोज लाओ कोई दूसरी नयी धरती या फिर कोई और ज़न्नत औरतों के लिए कोई जगह महफूज़ नहीं।

शहर की अलग अलग गलियों में भीड़ इकट्ठी हो रही है।

“…. बजा फरमाया आपने अगर पुलिस ना आती तो उन हरामियों को छोड़ते नहीं , एक एक को काट डालते । यही तो दिक्कत है भाई जान हमेशा जहां भी हम भारी पड़े हैं उन इलाकों में पुलिस लगा दी जाती है । कभी भी बराबरी का मौका नहीं मिला हमें और वो साले हमारे घर की बहू, बेटियों, बच्चों को गाजर मूली की तरह काटते हैं ।

भीड़ में से किसी ने बात काटते हुए कहा , हमसे ही हमारी मुल्क़परस्ती और हुब्बल-उल-वतनी की गवाही क्यों मांगी जाती है? क्यों हमारी वफ़ादारी मशकूक करार है?

उन लोगों ने शुरुआत से ही हम पर कभी भरोसा नहीं किया । हमें हमेशा से ही गलत समझा और समझते रहेंगे । हर फ़साद की शुरुआत उन लोगों की तरफ़ से होती है और इल्ज़ाम हम पर थोप दिया जाता है… ”

उसी शहर की अपनी ही मगर कोई दूसरी गली से भी आवाज़ आ रही है…

”  …सरासर गलत इल्ज़ाम है ।

निहायती कमीने हैं ये । ये किसी के सगे नहीं होते । जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं । अगर पुलिस ना आती तो आधा शहर साफ़ कर देते आज । साले कटुये , सुअर साले । पाकिस्तान परस्त । हरामखोर । जिहादी ।

हां भाई सही कह रहे हो , आज फैसला हो ही जाता , एक एक मार डालते । उनको ना क़ब्रिस्तान में जगह मिलती ना ही अपने घरों में….”

हुकूमत हमें हमेशा से भेड़ों की तरह समझती आई है । पहले हमें एक क़तार में खड़ी करती है, गिनती करती है, हमारा अध्ययन करती है, हमारी नस्ल परखती है हमसे वोट लेती है । फिर हमें यानी हम भेड़ों को मज़हब की लैबोरेटरी में रखकर नफ़रत के इंजेक्शन्स देती है । तब तक देती है जब तक हम भेड़ से उन्मादी भीड़ नहीं बन जाते । वहशी नहीं बन जाते । हत्यारे नहीं बन जाते ।

उन्मादी भीड़ से हत्यारा बनने में कितना समय लगता है?

जन गण मन जितना लगता है ।

हुकूमत हमें हमेशा भेड़ों की तरह पालती आई है । हम सब उसकी ख़ुराक हैं ।

कुछ दिनों बाद जब कर्फ्यू हटा लिया गया ।

मंत्री की क़यादत में उनके आवास पर इक दोस्ताना बैठक हुई जिसमें दोनों तरफ़ से एक एक रहनुमा शरीक हुआ ।

अमन , शांति और भाईचारगी के पैग़ाम के साथ…

इसमें कोई एहतिमाली नहीं है कि लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हैं ।

बस उनके बीच यही दरार कभी नहीं भरनी चाहिए । उनके बीच नफ़रत और आपसी रंजिश की दीवारों को और बुलन्द करना होगा , वरना हमारा क्या होगा ?

हा-हा के ठहाकों की आवाज़ से कमरा गूंज उठा ।

सही फ़रमाया आपने । देखिए कितने मुनाफ़िक़ लोग हैं ये … पहले एक दूसरे का खून करते हैं , अपने रिश्तेदारों को कंधा देते हैं और फिर हमसे अमन और भाईचारगी की उम्मीद रखते हैं ।

यही तो सियासत है मंत्री साहब , क्या खूब । वाक़ई मानना पड़ेगा ।

अरे भाई , सियासत को ग़लीज़ ना कहें । हम तो बस फ़ायदा देखते हैं मौके भुनाते हैं इसलिए सिर्फ़ मुझे ही इसमें मुलव्विस ना करें । आप दोनों ना होते तो ये साज़िश कामयाब ना हो पाती । आप दोनों भी उतने ही बधाई के पात्र हैं जितने हम ।

अरे हम दोनों तो आपके मातहत हैं…

अब आगे क्या करना है?

करना क्या है , ये मुआमला कुछ दिनों तक ज़ेरे-बहस रहने दें । अखबारों की सुर्खियों में आने दे , रसीलों के मज़मून बनने दें । मीडिया तो वैसे भी सत्ता की ही रहती है । अपने अपने मुहल्लों से शांति और अमन का जुलूस और क्या…

ये कमअक़्ल , जाहिल लोग हैं , चार दिन तक रोयेंगे फिर वही ईद मुबारक़ और शुभ दीपावली , ज्यादा दिमाग़ न लगाएं।

बैठिये……

मंत्री मुंशी को इशारा करता है…

मुंशी दराज़ से कोई पुरानी अख़बार टेबल पर बिछा जाता है । शराब की बोतलें खुलती हैं , भूजे हुए काजू , बादाम , पिस्ता , नमकीन से टेबल पर रखा हुआ अखबार पट जाता है । दो पेग बनते हैं । शीशे की गिलास में शराब , शराब कम बेकसूरों का खून ज़ियादा लग रही थी । दोनों ग्लास खाली होते ही अखबार पर छपे गांधी की तसवीर के चश्मे पर धड़ाम से रख दिए जाते हैं…

दंगों का जश्न मनता है , चखने को बेकस अवाम की तरह लूट लिया जाता है ।

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One comment

  1. जर्सी मौजू कहानी पर अंत ओर बेहतर या यथर्डवादी होना था

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