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शहादत खान की कहानी ‘हाउस टैक्स की रसीद’

युवा लेखक शहादत खान समाज पर गहरी नजर रखते हैं और उनकी कई कहानियों में आपको कुछ नया जानने को मिलता है, इस अहसास के साथ कि हम अपने समाज के बारे में कितना कम जानते हैं- मॉडरेटर

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हाउस टैक्स की रसीद

      “ये समाजवादी शहरी वृद्धावस्था पेंशन योजना का फारम है। इसे भरकर, इसके साथ तीन आईडी की फोटोकॉपी लगानी है। राशन कार्ड, पहचान पत्र, बिजली का बिल और अगर वह न हो तो हाउस टैक्स की रसीद। यह सब लगाकर नगर पालिका में अपने वार्ड अधिकारी के पास जाकर जमा करना है। इसके जमा होने के बाद आप लोगों को सरकार की तरफ से तीन सौ रुपए महीना पेंशन मिलेगी”, अपने घर के बाहर जमा लोगों की भीड़ को समाजवादी वृद्धावस्था पेंशन योजना के फॉर्म बांटता हुआ सरफराज समझा रहा था।

      सरफराज मौहल्ले के चंद पढ़े-लिखे नौजवानों में से एक है। वह एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक है। साथ ही मौहल्ले के निरक्षर, मजदूर और कम पढ़े लिखे लोगों के सरकारी कागजात बनवाने में मदद करता है। इसी सिलसिले में उसकी तहसील और नगर पालिका के बहुत से बाबूओ, क्लर्को और अधिकारियों से जान-पहचान हो गई है। अब जब भी अधिकारियों को मौहल्ले में कोई काम करना होता, मसलन- पहचान पत्र, राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड के फॉर्म बांटने होते या किसी अन्य सरकारी योजना के संबंध में जानकारी देनी होती तो वे सरफराज की मदद लेते। इससे वे सरकारी वेतन के एवज में किए जाने वाले कार्यों की अनचाही मेहनत और मुस्लिम मोहल्लों की गंदी और बदबूदार गलियों में घूमने से बच जाते।

      सरफराज के घर के बाहर जमा लोगों की भीड़ में रमजानी भी खड़ा है। वह एक चालीस पैंतालीस साला मजदूर आदमी है। वह मामूली सा सस्ता कुर्ता और उसके नीचे मैच करता खद्दर का पायजामा पहने है। वह अपनी गर्दन ऊंची किए, एक हाथ में पेंशन का फॉर्म पकड़े पूरी तुंदई के साथ बोलते हुए सरफराज को सुन रहा है। बीच बीच में वह खाली हाथ से कभी अपने सिर की सफेदी को तो कभी बालिश्त भर लंबी काली सफेद खिचड़ी दाढ़ी को खुजलाने लगता है। जैसे जैसे सरफराज बोलता जा रहा है, वह मन ही मन हिसाब लगा रहा है, “राशन कार्ड है…। पहचान पत्र है…। बिजली का बिल? जब बिजली ही नहीं तो बिल कहां से आएंगा। चलो, वह नहीं तो हाउस टैक्स की रसीद तो है। अभी पिछले महीने ही तो जमा करके आया था। हो गई तीन आइडी पूरप चीज…।”

      सरफराज ने अपनी बात खत्म की और लोग अपने घरो की ओर पलट गए। रमजानी भी घर की ओर चल दिया। वह खुश था। उसके पास तीन आईडी थी। उसे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं थी। घर जाकर उसने अपनी बीवी से सभी कागज लाने को कहा। उसकी बीवी अंदर गई और एक टूटे संदूक में नए-पुराने कपड़ों की उल्टी-सीधी तह के नीचे से एक पुरानी सी पॉलोथीन निकाल लाई। दो कच्ची छत वाले कमरो के आगे बने छपरीले बरामदे में टूटे बानों से बुनी ढीली चारपाई पर बैठे रमजानी ने पाथली मारते हुए पॉलोथीन को एक कोने से पकड़ा और उसे अपने सामने उलट लिया। पॉलोथीन के उलटते ही उसमे से एक के ऊपर एक, आड़ी-तिरछी तहों में, एक दूसरे से चिपके मैले, पुराने और कुछेक नए कागजों का एक पुलिंदा ढ़ेर की शक्ल में उसके आगे बिखर गया।

उसने एक एक कागज को उठाना और देखना शुरु किया। कई कागजों को देखने के बाद उसे पहली काम की चीज मिली, राशन कार्ड। अपने कुर्ते के पल्लू से सीधा और साफ करके उसने उसे बाएं हाथ के तरफ संभाल कर रख लिया। राशन कार्ड मिलने के बाद उसने फिर सामने पड़े ढ़ेर में से कागजों को एक के ऊपर से दूसरे को हटाना शुरु किया। इस बार भी कई कागजों को इधर उधर करने के बाद उसे दूसरी काम की भी चीज मिल गई, पहचान पत्र। उसे भी उसने कुर्ते के पल्लू से साफ किया और पहले आईडी के ऊपर संभाल कर रख दिया। अब जो एक चीज रह गई थी, वह थी हाउस टैक्स की रसीद।

बाकी बचे कागजों में हाउस टैक्स की रसीद को ढूँढ़ते हुए वह एक एक कागज को ध्यान से देखता और एक तरफ से उठाकर दूसरी तरफ रख देता। सब कागज अपनी अपनी बारी पर एक जगह से उठकर दूसरी जगह चले गए, लेकिन रसीद नहीं मिली। उसने काग़ज़ों को फिर से पलटा, उसके बाद भी एक एक कागज को बार बार, अलग अलग करके देखा। लेकिन रसीद नहीं मिली।

      रसीद न मिलने से परेशान रमजानी अफसोस की मुद्रा में बैठ गया। उसे यूं मायूस बैठा देख उसकी बीवी ने पूछा, “क्या हुआ…?”

“हाउस टैक्स की रसीद नहीं मिल रही…”

“क्यों…? इन्हीं में तो रखी थी… ध्यान से देखो… मिल जाएंगी…”, ओर फिर वह खुद ही एक एक कागज को उठा उठाकर देखने लगी। पर उसे भी रसीद नहीं मिली।

“तो…?” उसने भी परेशान होते हुए पूछा, “क्या अब फारम जमा नहीं होगा…?”

“कैसा होगा…? आइडी चाहिए तीन… है सिर्फ दो…।”

“सरफराज से पूछा लो… शायद वह कोई हल बता दे…।”

      रमजानी अपने घर से निकला और सरफराज के यहां चला गया। सरफराज अपनी बैठक में लोगों से घिरा बैठा था। वह उन्हें फार्म भरने के बारे में बता रहा था कि किस खाने में क्या भरना है? बैठक लोगों से पूरी तरह भरी हुई थी। कई लोग, जिन्हें अंदर खड़े होने की जगह नहीं मिली थी वे अपनी बारी के इंतजार में बाहर खड़े थे। रमजानी भी उन्हीं लोगों में जाकर खड़ा हो गया। कुछ देर बाद जब अपने फॉर्म भरवाकर एक साथ कई लोग बैठक से निकले तो रमजानी बाहर खड़े लोगों में से सबसे पहले बैठक की दहलीज पार गया। अब वह उस छोटी और तंग बैठक में घिचमिच खड़े लोगों के बीच जैसे तैसे खड़ा होने के लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। काफी जद्दोजहद के बाद वह ठीक से खड़ा हो पाया। यहां भी उसे सरफराज की केवल आवाज सुनाई दे रही थी, चेहरा फिर भी दिखाई नहीं दे रहा था। लोग फॉर्म से संबंधित आपस में बातचीत कर रहे थे और जो कुछ वे थोड़ा बहुत जानते थे उसे एक दूसरे को बता रहे थे। कई लोग तो जिनके फॉर्म के एक दो कॉलम ही भरने से रह गए थे ऐसे ही एक दूसरे से पूछकर लौट जाते थे कि घर जाकर अपने स्कूल जाने वाले नाती-पोतो से भरवा लेंगे।

भीड़ में कसकमसाता रमजानी कुछ देर तो ऐसे ही खड़ा लोगों की बाते सुनता रहा। फिर जैसे ही बैठक से दो चार लोग निकले वह आगे सरक गया… और फिर ऐसे ही धीरे धीरे सरकता हुआ वह उस तख्तनुमा छोटी सी तिपाई के पास तक जा पहुंचा, जिस पर सरफारज और दो तीन लोग ओर बैठे थे। सरफराज ने हाथ में एक साथ कई फॉर्म लिए हुए थे। लेकिन उसकी पेंसिल चल एक ही पर रही थी। फिर एक एक करके जैसे ही उनसे सब फॉर्म भरे एक साथ कई ओर फॉर्म उसके आगे बढ़ गए। उसने एक एक कर बढ़े हुए सभी फॉर्म को लिया और उन्हें एक दूसरे के ऊपर रखकर भरने लगा।

दो तीन बार उसने ऐसे ही एक साथ कई कई फॉर्म लोगों के हाथो से लिए और उन्हें भरकर उनके मालिकों को लौटा दिए। लेकिन अगली बार खाली फॉर्म लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए उसने गर्दन उठाकर अपने ऊपर झुके लोगों के चेहरो को देखा तो एकाएक उसकी निगाह खुद को एकटक देखते रमजानी पर पड़ी। अपने हाथों में लिए फॉर्म को एक दूसरे के ऊपर रखते हुए उसने रमजानी से पूछा, “अरे चचा रमजानी तुम भी अपना फार्म भरवाने आए हो? तुम तो कह रहे थे कि तुम अपना फार्म फुरकान से भरवा लोगे?”

झिझकते और कुछ सकुचाते हुए रमजानी ने सरफराज को अपनी समस्या बताते हुए कहा, “हाँ फारम तो मैं उससे भरवा लूंगा, लेकिन आइडी पूरप पूरे नही है। तुम कह रहे हो तीन चाहिए… जबकि घर में है दो।”

“क्या क्या?” सरफराज ने पूछा।

“राशन कार्ड और पहचान पत्र।”

“तीसरी बिजली का बिल लगा लो”, सरफराज ने सुझाव देते हुए कहा।

“बिजली हो तो बिल आए ना”, रमजानी ने उदासी के साथ जवाब दिया।

“बिजली का बिल नहीं है तो कोई बात नहीं… हाउस टैक्स की रसीद लगा दो”, सरफराज ने दूसरा सुझाव दिया।

इस पर रमजानी की नजरे कदरे झुक गई और उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “वही तो नहीं मिल रही… लगता है खो गई है। अब सिर्फ दो ही आइडी पूरप है।”

“लेकिन दो आईडी से तो काम नहीं चलेगा…”, सरफराज ने साफ लफ्जों में उससे कहा। फिर कुछ सोचकर बोला, “तुम एक काम करो… नगर पालिका चले जाओ… वहां अपने वार्ड अधिकारी से कहना कि तुम्हारी हाउस टैक्स की रसीद खो गई है… जबकि तुम्हें उसकी फोटोकॉपी वृद्धावस्था पेंशन फार्म के साथ लगानी है। वह तुम्हें रसीद की फोटोकॉपी दे देगा…।”

      सरफराज की बात सुनकर रमजानी की उदास आँखें उम्मीद से चमक उठी। वह तुरंत ही सरफराज की बैठक से निकला और नगर पालिका की ओर चल दिया।

नगर पालिका शहर के केंद्र में स्थित है। रमजानी जब वहां पहुँचा तो सुबह के ग्यारह बजे चुके थे। पूरे कार्यालय की साफ-सफाई हो चुकी थी और लगभग सभी अधिकारी आ चुके थें। जहां नगर के सभी वार्ड अधिकारी बैठते थे, वह हॉलनुमा एक लंबा चौड़ा कमरा था। उसकी दाएं-बाएं और सामने वाली दीवारे से लगी कतारबद्ध मेजें बिछी थीं। हर मेज के पीछे तीन कुर्सी रखी थीं। मेजों के दोनों किनारों पर हरे, लाल और नीले रंग के कवर वाली भारी भरकम फाइलों के गट्ठे रखे थे। बीच के खाली हिस्से में कुछेक कागज-पत्र, पेन-पेंसिल रखने का बॉक्स, अखबार और तार वाला फोन रखा था। उन्हीं में सबसे आगे मेज के बिल्कुल बीचोबीच वार्ड अधिकारी का नाम लिखा छोटा सा कार्डनुमा बोर्ड भी रखा था। हर मेज के पीछे रखी तीन कुर्सियां का मतलब था कि हर वार्ड अधिकारी के दो सहायक अधिकारी है।

हॉल की सामने वाली दीवार में एक छोटा सा दरवाजा लगा हुआ है। दरवाजे बंद है और उसका रंग दीवार के रंग से मैच करता है। इससे पहली बार देखने से पता ही नहीं चलता कि वहां कोई दरवाजा भी हो सकता है। लेकिन दरवाजे के दोनो पल्लो के बीच की खुली दरार इस भ्रम को तोड़ती है।

रमजानी हॉल में घुसा तो लगभग सभी अधिकारी अपनी अपनी कुर्सी पर बैठ चुके थे। उनमें से कुछ फाइलों पर झुके हुए कलम घसीट रहे थे तो कुछ अपने सहयोगियों और साथियों के साथ गप्प हांक रहे थे। कोई किसी बात पर हँस रहा था, तो कोई अपने बराबर वाले के कान में कुछ फुसफुसा रहा था। एक अधिकारी अपने सामने रखी हुई भारी-भरकम फाईल पर कलम चलाता हुआ अपने बराबर वाले की बात सुनकर उसकी तरफ देखे बिना मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। इन्हीं के बीच एक कम उम्र लड़का एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कपों की ट्रे पकड़े हर मेज पर जाकर अधिकारियों को चाय दे रहा था। एक दूसरा नौजवान अधिकारियों की मेजों के आगे फाइलें रखता उठता इधर से उधर आ जा रहा था। बीच बीच में वह सामने दीवार में बने उस छोटे दरवाजे के अंदर भी जाता आता रहता।

हॉल के अंदर जाकर रमजानी दरवाजे के बगल वाली मेज पर बैठे अधिकारी के सामने जाकर खड़ा हो गया। उस वक्त वह अधिकारी अपना भारी भरकम सिर झुकाए किसी कागज पर कुछ लिख रहा था। उसने सामने आ खड़े हुए शख्स पर कोई ध्यान नहीं दिया और बदस्तूर कलम चलाता रहा। लिखाई खत्म करने चुकने के बाद जब नाक पर रखी ऐनक को ठीक करने के लिए उसने गर्दन उठाई तो अपने सामने खड़े रमजानी को देखा। सिर के पके छोटे बाल, चेहरे पर सफेदी मारती लंबी काली खिचड़ी दाढ़ी और तन पर पड़े मामूली कुर्ते पायजामा को देखकर उसने नागवारी से अपनी आँखें सिकोड़ी। फिर न चाहते हुए, बहुत जबर्दस्ती के साथ बोला, “क्या चाहिए… ?” और सामने मेज पर पड़े कागजों को इकट्ठे करने लगा।

रमजानी ने बहुत नरम और आजिज़ी भरे लहजे में कहा, “जी, मुझे अपने हाउस टैक्स की रसीद लेनी थी…।”

“हाउस टैक्स की रसीद…? कौन सा वार्ड है तेरा?” अधिकारी ने फिर उसी अंदाज में पूछा।

“जी, वार्ड नंबर दस,” रमजानी ने बताया।

“वार्ड दस किधर पड़ता है,” अधिकारी ने अपने मातहत से पूछा।

“ओह… शर्मा जी का इलाका है,” सहायक अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर रमजानी की ओर देखकर बोला, “भई वो जो चौथी नंबर की कोने वाली मेज है ना उनके पास है थारा वार्ड… वहां जाओ।”

रमजानी अधिकारी के किए हुए इशारे की ओर चल दिया। उसके पीछे पहले अधिकारी का दूसरा मातहत तेज आवाज में बोला, “शर्मा जी… संभालो… थारे चाहते आए हैं,” और हँसने लगा। साथ ही उसका अधिकारी और दूसरी मेज पर बैठा सहायक अधिकारी भी मंद मंद मुस्कुराने लगे।

“कौन है?” शर्मा जी ने चौंककर पूछा। जैसे नींद से जागे हो। फिर रमाजनी को देखकर भंवे सिकोड़ते हुए बोले, “क्या काम है तुझे?”

“जी मुझे हाउस टैक्स की रसीद लेनी थी,” रमजानी ने अपने सवाल को दोहराया।

“हाउस टैक्स की रसीद चाहिए इसे…,” शर्मा जी ने उसका मजाक बनाते हुए कहा, “हाउस का मतलब भी पता है तुझे?”

अधिकारी के इस बेमतलबी सवाल से रमजानी कुछ घबरा सा गया। वह सवाल को समझने की कोशिश कर रहा था कि पीछे से फिर वही पहले अधिकारी का मातहत दोबारा बोल पड़ा, “कैसी बात करते हो शर्मा जी… आप ही ने तो इन लोगो का यहां हाउस बनवाया है। अब इंकार मत कीजिए,” और फिर हँसने लगा। उसके इस तरह कहने और हँसने पर अभी तक जो दूसरे लोग अपनी बातों और कामों में लगे हुए थें उनकी ओर मुतवज्जा हुए और सामने खड़े रमजानी को देखने लगे।

“कहां है तेरा हाउस?” शर्मा जी ने रमजानी को घुड़ते हुए पूछा।

“जी पठानकोट में… वार्ड दस,” रमजानी ने सकुचाते हुए कहा।

“हम्म्म,” शर्मा जी ने हुंकारा भरते हुए कहा, “पठानकोट… छोटा पाकिस्तान। तो फिर पाकिस्तान में ही जाकर लेना रसीद… यहां करवा रहा है,” इस बार शर्मा जी की इस द्विअर्थी बात पर हॉल में एक जोरदार ठहाका गूंज उठा।

अपने इस बेहुदा मजाक पर जी भरकर हँसने के बाद शर्मा जी दोबारा बोले, “भई अब मैं पाकिस्तानी वार्ड का अधिकारी नहीं रहा। पिछले योजना मैंने उसके पिछवाड़े पर एक जबरदस्त लात मारी”, हॉल फिर से ठहाको से गूंज उठा। शर्मा जी हँसते हुए कहते रहे, “और वह दुम दबाकर भाग गया… भागा भी ऐसा कि अब कभी मेरे पास नहीं आएगा…” बोलते बोलते शर्मा जी रुक गए। हँसने के कारण उनके मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी। कुछ देर हँसने के बाद दोबारा बोले, “…वो जो सामने बैठे है ना… नीली शर्ट वाले” उसने अपने से पाँचवी मेज की ओर इशारा करते हुए कहा, “उनके पास है अब तुम्हारा वार्ड। वो ही देगा तुम्हें रसीद।”

      रमजानी उस नीली शर्ट वाले अधिकारी की मेज के सामने जाकर खड़ा हो गया। एक मुसलमान बूढ़े को अपने सामने खड़ा देखकर उस अधिकारी ने भी अपनी नाक-भौं सिकोडी और बोला, “भई पाकिस्तानी वार्ड का अधिकारी मैं कैसे हो गया…? मेरे पास तुम्हारा वार्ड नहीं है… न ही मुझे पता है कि वार्ड दस किसके पास है… उनसे पूछो… वे जो सफेद शर्ट पहने बैठे है…।”

उसने भी अपने से तीसरे मेज वाले अधिकारी की ओर इशारा कर दिया।

रमजानी वहां से हटकर उस सफेद शर्ट वाले अधिकारी की मेज के सामने जाकर खड़ा हो गया।

रमजानी को अपने पास आते देखकर उसने कहा, “मुझे तुम जैसे लोगों की समझ नहीं आती… जब तुमने अपना अलग मुल्क बना लिया है तो तुम यहां क्यों रहते हो? वहीं जाकर रहो ना…,” और रमजानी को घूरकर देखने लगा।

इस पर उसकी बगल वाली कुर्सी पर बैठे उसके सहायक ने जवाब दिया, “अरे सर अगर ये वहां चले गए तो धोबे की कुत्ते वाली कहावत बेमायने ना हो जाएंगी…,” उसने अपनी इस बात को ऐसे अंदाज़ और भाव-भंगिका के साथ कहा कि हॉल में एक बार फिर जबरदस्त ठहाका गूंज उठा।

अच्छी तरह हँसने के बाद अधिकारी ने दोबारा फिर रमजानी की ओर देखा और उससे कहा, “मेरे पास तुम्हारा वार्ड नहीं है… वही तुम्हारा वार्ड अधिकारी है… जिसने तुम्हें यहां भेजा है… वही देगा तुम्हें रसीद…,” और उसने फिर से नीली शर्ट वाले अधिकारी की ओर इशारा कर दिया।

रमजानी दोबारा नीली शर्ट वाले के सामने जाकर खड़ा हो गया। इस बार उस अधिकारी ने भी मजा लेते हुए कहा, “अबे धोबी के कुत्ते… तू फिर आ गया…”, उसकी इस बात पर सभी लोग एक बार फिर ठहाका मारकर हँस पड़े।  “तेरी समझ नी आता… मैं तेरे वार्ड का अधिकारी नहीं हूँ…”, फिर अगले ही पल उसने घृणा से उसे दुत्कारते हुए कहा, “किसी ओर से जाकर पता कर…।”

“अरे सक्सेना जी दे दीजिए ने रसीद… क्यों गुस्सा कर रहे है…”, नीली शर्ट वाले अधिकारी के झुंझलाहट भरे चेहरे को देखकर सफेद शर्ट वाले अधिकारी ने हँसते हुए कहा।

“मेरे पास जब ये वार्ड है ही नहीं तो कहां से दूँ…?”

“ऐसा ना कहे… बंटवारा आपका ही किया धरा है… पुराने कांग्रेसी जो ठहरे। ख़ैर दे दो रसीद।  ये बेचारा भी अपने घर चला जाएगा।” उसने रमजानी के उदास और दुखी चेहरे पर तरस खाते हुए कहा।

इस पर सक्सेना साहब ने कोई जवाब नहीं दिया। चुप बैठे सामने रखी फाईल को उलटते पलते रहे। फिर एक दूसरे अधिकारी की ओर इशारा करते मुँह चिढ़ाकर बोले, “वह तुम्हारे वार्ड के अधिकारी है उनके पास जाओ।”

रमजानी उसके पास गया तो उसने कहा, “मैं नहीं, मिश्रा जी है तुम्हारे वार्ड के अधिकारी…।”

अपना नाम सुनते ही मिश्रा जी कुर्सी पर से उछल पड़े, कहा, “भई, मुझ पर क्यों थोप रहे हो… तुम्हारे पास ही तो है इनका वार्ड… देखकर दे दो रसीद…।”

“मेरे पास होता तो मैं कब का इस कटुवे को यहां से दफा कर चुका होता है…”, उस अधिकारी ने गुस्सा से दांत भींचते हुए कहा। फिर कुछ नरम पड़कर बोला, “मेरे यहां से तो तीन योजना पहले ही चला गया था।”

उसने अपनी बात खत्म की तो बगल वाली मेज पर किसी निर्देशक की तरह खामोश बैठे, सामने हो रहे ड्रामे को देख रहे एक अधिकारी ने सामने रखी फाइलों को इधर उधर सरकाया और उनमें से एक फाइल खोलते हुए बोला, “मकान नं. क्या है तेरा…?”

रमजानी ने घूमकर उसकी तरफ देखा। वह फाईल में आँखें गड़ाए था। रमजानी ने रुआंसी आवाज में बमुश्किल थूक निगलकर कहा, “565…।”

“मकान मालिक का नाम…?”

“रमजानी वल्द अलीजान…।”

“उसकी हाउस टैक्स की रसीद तो दी जा चुकी है…।”

“हाँ,” रमजानी बोला, “पर वो… वो खो गई है। फोटोकॉपी लेनी है।”

“किसलिए…?” अधिकारी ने पूछा।

“पेंशन के फारम में लगाने के लिए,” रमजानी ने उसे रसीद की फोटोकॉपी लेने का कारण बताया।

“पैर तो तेरे कब्र में लटके हुए है… तू पेंशन लेकर क्या करेगा…?” अधिकारी ने रमजानी को ऊपर से नीचे तक घूरकर देखते हुए कहा।

“अपने मुल्क जाने के लिए भई… समझ नहीं रहे हो”, सक्सेना के बगल वाले अधिकारी ने कहा और फिर हँसने लगा।

“ठीक कहते हो कौशिक जी”, फाईल वाले अधिकारी ने इस पर मुस्कुराते हुए कहा, “कब्रिस्तान जाए या पाकिस्तान… बात तो एक ही है..,” और फिर गुस्से, नफरत और घृणा से अपना जबाड़ा कस लिया।

“इसके सिवा ये जा भी कहां सकते है… दोगले मुल्ले… सूअर…”, उसके सामने वाले अधिकारी ने इस बार साफ साफ गाली बकते हुए कहा।

“तुम्हे दोबारा रसीद नहीं दी जा सकती”, अधिकारी ने कहा, “एक बार रसीद दिए जाने के बाद उसे दोबारा नहीं दे सकते,” उसने फाईल बंद की और उसे जहां से उठाया था वहीं रख दिया।

अभी तक उन संवैधानिक पदो पर बैठे अधिकारियों की जहर भरी बातों को किसी तरह सहन करता रहा रमजानी आखिरी बात सुनकर मानो लड़खड़ा ही गया। उसने बमुश्किल खुद को संभाला और भर आई आँखों से अधिकारी को देखकर बोला, “वह तो खो गई है…?”

“तो इसमें मैं क्या करुं?” अधिकारी ने लापरवाही से कहा, “वह तुम्हारा मामला है… हमने अपना काम कर दिया है।”

“मुझे उसकी जरूरत है… बहुत ज्यादा…”, रमजानी ने गिड़गिड़ाकर कहा।

      रमजानी की सांवली शक्ल किसी मुर्दार की तरह पीली हो गई। उसकी हालत को देखकर लगता था कि वह बस अभी गिर पड़ेगा। उसकी इस तरह देखकर दूसरे कोने में बैठे एक अधिकारी को उस पर तरस आ गया। उसने उस लड़के से, जो मेजों पर फाइलें उठाता रखता घूम रहा था बुलाया और कहा, “जाओ देखो कि दोबारा रसीद दी जा सकती है या नहीं?”

“नहीं सर, एक बार रसीद दिये जाने बाद दोबारा नहीं दी जा सकती,” उसने भी मानो रटा रटाया जवाब दिया।

“देख लो फिर भी कुछ हो सकता है क्या?”

“कुछ नहीं हो सकता सर… और इन भिखमंगे पाकिस्तानियों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं”, उसने भी अधिकारियों की पैरवी करते हुए रमाजनी की ओर नफरत भरी निगाहों से देखा और वहां से चला गया।

उसके जाने के बाद अधिकारी ने रमजानी से कहा, “अब तुम यहां से जाओ। तुम्हें दोबारा रसीद नहीं दी जा सकती।”

      अधिकारी का जवाब सुनकर रमजानी अपनी जगह से हिला और दरवाजे की तरफ लरजता हुआ चल दिया। तभी एक साफ सुथरा नौजवान लड़का बड़ी तेजी से हॉल में घुसा। वह सीधा सक्सेना साहब की मेज के पास गया और बोला, “वार्ड नं. पाँच, मकान नं.- 217 की हाउस टैक्स रसीद चाहिए।”

सक्सेना साहब ने अपने सामने रखी एक फाईलों में से एक को उठाया और और देखने लगे। कई पन्ने पलटने के बाद बोले, “उसकी रसीद तो दी जा चुकी है?”

“हाँ, पर वह खो गई है। फोटोकॉपी चाहिए,” लड़के ने अधिकारपूर्वक कहा।

“आपको दोबारा रसीद नहीं दी जा सकती,” सक्सेना साहब ने जवाब में कहा।

“पर मुझे उसकी जरूरत है…”, लड़के ने जोर देते हुए कहा।

      तभी वह फाइलों वाला लड़का वहां से गुजरा। अधिकारी ने उसे बुलाया और पूछा, “क्या इन्हें दोबारा हाउस टैक्स की रसीद दी जा सकती है…?”

उसने अपने सामने खड़े लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “दी तो जा सकती है… पर…?” बात अधूरी छोड़कर वह आगे खिसक गया। लड़का उसके पीछे पीछे गया और उसकी बगल में जाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब में हाथ ड़ाला और फिर दोनों से उस लड़के के एक हाथ को अपने हाथों में थाम लिया।

फाइलों वाले लड़के ने उससे कहा, “तुम यहीं रुको… मैं अभी आता हूँ,” और उसके हाथों से छुटे अपने हाथ को जेब में डालता हुआ हॉल की सामने वाली दीवार में बने उसी छोटे दरवाजे में घुस गया।

      दो मिनट बाद ही वह दरवाजे से लौट आया। उसने हाउस टैक्स की रसीद की एक फोटोकॉपी लाकर उस लड़के को दे दी। रमजानी दरवाजे की चौखट पर खड़ा यह सब देख रहा था। रसीद लेकर लड़का जितनी तेजी से आया था उतनी ही तेजी से वापस चला गया। उसके पीछे पीछे रमजानी भी हॉल से बाहर निकला और गलियारे में से होता हुआ नगर पालिका के कार्यालय से बाहर निकल आया। वहां से वह घर की ओर चल दिया।

      घर का दरवाजा खुला था और अंदर कोई नहीं था। बरामदे में बिछी चारपाई पर कागज अभी तक ऐसे ही पड़े थे जैसे वह छोड़कर गया था। वह आकर चारपाई पर बैठ गया। उसकी निगाह पेंशन के फॉर्म पर पड़ी। उसने उसे उठा लिया। वह उसे देखने लगा और नगर पालिका के अधिकारियों की एक एक हरकत उसकी आँखों के आगे नाचने लगी। उनकी बातें, ठहाके और अपमानजनक भाव-भंगिमाएं किसी खोलते शीशे की तरह उसकी नसों में उतरने लगी। मानो स्वाभिमान की जो इंद्री उस वक्त मृतप्रायः हो गई थी अब अचानक जाग्रत हो उठी हो और अपना इंतकाम चाहती हो। उसके नथूने फड़कने लगे और हाथों की उंगलियां कसने लगी। उनमें फंसा फॉर्म का कागज मुचड़ने लगा। तभी बाहर से हँसती हुई उसकी बीवी घर में आई। अपनी बीवी को हँसते देखकर उसका सुलगता खून खौल उठा। वह उठा और बेसाख्ता अपनी बीवी पर ताल घूंसे बरसाने लगा। साथ ही वह उसे बड़ी बड़ी और गंदी गालियां बकता जाता। खुद के साथ अपने शौहर के इस जानवराना बर्ताव को पहले तो उसकी बीवी समझ न सकी। लेकिन जब उससे उसके लात घूंसों के वार बर्दाश्त न हो सके तो वह रोने लगी। उसकी चीख-पुकार और रोने की आवाज सुनकर उसके अंधाधुंध चलते हाथ पांव रुक गए। उसने सामने पड़ी रोती, सिसकती अपनी बीवी को देखा। मानो समझने की कोशिश कर रहा हो कि आखिर वह कर क्या रहा है? तभी उसका ध्यान मुट्ठी में जकड़े पेंशन फॉर्म के कागज पर गया। उसने उसे दूसरे हाथ में लिया और उसके टुकड़े टुकड़े करने लगा। वह उन टुकड़ों के तब तक टुकड़े करता रहा जब तक कि उनके और टुकड़े नहीं हो सकते थे। फिर उन चिंदी चिंदी टुकड़ों को उसने जमीन पर पटका और उन्हें अपने पैरों से रौंदता हुआ घर से निकल गया।

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संपर्क- 7065710789।

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