Home / Featured / पॉपुलर बनाम पॉपुलिस्ट: आख्यान की वापसी: चंदन पाण्डेय

पॉपुलर बनाम पॉपुलिस्ट: आख्यान की वापसी: चंदन पाण्डेय

कल राजकमल प्रकाशन का 73 वाँ स्थापना दिवस समारोह था। इस अवसर पर भविष्य के स्वर के अंतर्गत अलग अलग पृष्ठभूमियों, अलग अलग विधाओं के सात वक्ताओं को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। किसी के वक्तव्य की किसी अन्य वक्ता के वक्तव्य से तुलना नहीं की जानी चाहिए क्योंकि सभी वक्ताओं के विषय अलग अलग थे। और अपने विषय के हिसाब से सबने अच्छा बोला, लेकिन मैं ख़ासतौर पर चंदन पाण्डेय के वक्तव्य को रेखांकित करना चाहता हूँ। ‘वैधानिक गल्प’ उपन्यास के लेखक ने पॉपुलर बनाम पॉपुलिस्ट के बहाने एक ठोस वैचारिक, साहसिक और मुखर वक्तव्य दिया। युवा लेखकों में यह वैचारिकता, साहसिकता विरल होती गई है। चंदन के वक्तव्य ने बड़ी उम्मीद जगाई और सुनकर संतोष भी हुआ। यह एक बड़ी संभावना के लेखक का वक्तव्य है जो बहस की माँग करता है-

=========================

अपनी बात शुरु करते हुए सर्वप्रथम मैं उन निर्दोष लोगों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता हूँ जो पिछले दिनों दिल्ली के प्रायोजित दंगों में मार दिए गए. और साथ ही मैं उस तंत्र के पुर्जे पुर्जे की भर्त्सना करता हूँ जो जानबूझकर दंगे रोकने में नाकामयाब दिखे.

यहाँ उपस्थित सभी सुधीजनों को नमस्कार. तिहत्तरवें राजकमल दिवस की शुभकामना और बधाई. इस अवसर पर अपनी यह उम्मीद भी जतला रहा हूँ कि आगामी वक्तों में यह प्रकाशन किताबों के जरिए दूर बैठे, हर तरह से दूर बैठे: भौगोलिक दूरी, सामाजिक दूरी, आर्थिक दूरी तो हर तरह से दूर बैठे पाठकों तक पहुँचे.

पिछले दिनों सर्वाधिक मशहूर ऑनलाइन सेल्स वेबसाईट के एक अधिकारी से बात हो रही थी. उन्होंने बताया कि किताबों की बिक्री को वो लोग जानबूझकर ‘डिस्करेज’ कर रहे हैं. क्योंकि किताबें सस्ती होती हैं और भारी भरकम भी इसलिए उसमें मार्जिन कम मिलता है और पहुँचाने खर्च अधिक हो जाता है. ऐसे में राजकमल प्रकाशन समूह और इस पूरी इंडस्ट्री पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है किताबों को दूर तक पहुँचाने के अनेक उपाय किए जाएँ.

‘पॉपुलर बनाम पॉपुलिस्ट: आख्यान की वापसी’. यह विषय है. पहले मैं पॉपुलर बनाम पॉपुलिस्ट के बीच का वह फर्क बतला दूं जो मैं यहाँ समझ रहा हूँ या समझाना चाहता हूँ. व्यापक शब्दकोशीय राह पकड़ने पर हो सकता है कि दोनों शब्दों के बीच कोई फर्क न दिखे लेकिन यहाँ जो मैं कहना चाहता हूँ उसमें पॉपुलर का इस्तेमाल मैंने ‘लोकप्रिय-लेखकों’ के लिए किया है. वह लोकप्रियता जो हिन्दी तथा विश्व की अन्य भाषाओं के रचनाकारों ने, नए विचारों को लिखते हुए, नए विषयों को लिखते हुए, वैसे विषयों पर लिखते हुए जो वर्जित क्षेत्र रहे हैं, उन मुद्दों से टकराते हुए जो तथाकथित बहुमत की निर्मिति है, अर्जित की है. बेहद विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि लोकप्रियता की इस श्रेणी में वे रचनाकार नहीं है जो सामाजिक-प्रचलित मान्यताओं मसलन पाखण्ड, अंधविश्वास, पुलिस आदि का समर्थन-पोषण करने वाला गद्य लिखते हैं.

दूसरी तरफ ‘पॉपुलिस्ट’ को मैंने लुभावना या लुभावनवाद जैसे शब्द और अर्थ से जोड़ा है. वह लेखनी जो जाने अनजाने ऐसे लुभावने तत्वों का समर्थन करती है जो प्रचलित बहुमत में है. जैसे यह एक लुभावना तथ्य बन चुका है कि नव-मध्यवर्ग सुखान्त पढ़ना चाहता है. या यह एक लुभावना तथ्य है कि नई उम्र के लोग हल्का-फुल्का पढ़ना चाहते हैं. इन गढ़े हुए गड्ढों, माफ़ कीजिए तथ्यों, को ध्यान में रख कर किताब लिखी जाती है और एक बेहतरीन डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रेटजी या स्ट्रेटेजीज के तहत किताब अधिकतम लोगों या पाठकों तक पहुँचाया जाता है और फिर एक स्पाइरल शुरु होता है जिसमें आकड़ों के आधार पर मूल्यांकन होता है. यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐसे तथ्यों को ध्यान में रख कर लिखने वाले लेखकों के लिए मेरे मन में किसी भी तरह का गुबार नहीं हैं. क्यों नहीं है? क्योंकि हिन्दी में यह ट्रेंड पुराना है. मुँहदेखी लिखना यानी असल मुद्दे पर न आना यानी कमजोर मुद्दों को चुनना यानी …यह एक ट्रेंड है. यह इस पर आगे बात करते हैं.

रहा आख़िरी पद यानी ‘आख्यान की वापसी’ तो इस बाबत ज़रा विस्तार से बात करते हैं. फासीबाद के जिस नए संस्करण से हम मुब्तिला हैं उससे लड़ने के लिए सबको अपना किरदार निभाना होगा. फासीवाद की जड़े इतनी गहरी हैं कि रचनाकर्मियों को नित प्रतिदिन यह सोचना होगा, ऐसा क्या लिखा जाए जो फासीवाद को कमजोर करे. फासीवादियों को इससे कम फर्क पड़ता है कि उनकी दिखती राजनीति पर कोई गल्प या निबंध लिखा जा रहा है. वो हवा में नहीं हैं. हमें यह जान लेना होगा कि कुछ इतना बड़ा खजाना दांव पर लगा है जिससे लोग हत्याओं पर आमादा हैं. यहाँ मैं दंगा करती भीड़ की बात नहीं कर रहा, उनसे तो उनकी हरकतों को आधार बनाकर ही लिखा या लड़ा जा सकता है लेकिन इस फासीवाद के जो कर्ता-धर्ता हैं उनकी तैयारियों के कमजोर होने को लेकर हमें कोई मुगालता नहीं पालना चाहिए, वह मुगालता उससे भी अधिक घातक होगा जितना आज है.

लेकिन, इसी जहर भरे खजाने में फासीवाद की कमजोरी छुपी है. हमको यह समझ लेना चाहिए कि जिस खजाने की टोकरी या बोझ माथे पर लेकर ये लोग लड़ रहे हैं वह बोझ अगर आख्यान के निशाने पर आ जाए तब फासीवादियों का संतुलन बिगड़ सकता है. वो गिर सकते हैं. परास्त हो सकते हैं. वह बोझ क्या है? वह जानने से पहले मैं हिदी कथा साहित्य को लेकर अपनी राय आपको बताना चाहूँगा और उसी बीच में शायद वह बोझ जाहिर हो.

 हिन्दी कथा-संसार, मुझे लगता है और मैं बहुत खुश होऊँगा अगर मैं गलत साबित हुआ कि हिन्दी कथा संसार में जो सबसे बड़ी समस्या है वह गलत प्रतिनिधित्व या ‘मिसरिप्रजेंटेशन’ की है. मेरा अध्ययन इस कदर नहीं कि मैं इसे सायास बनाई गई समस्या बताऊँ लेकिन सब कुछ अनायास हुआ हो यह भी संभव नहीं लगता. और यह भी कहना चाहूँगा, एक से अधिक बार यह कहना चाहूँगा कि दो हजार बीस में बैठकर यह कहना या समझना ज़रा आसान है बनिस्बत कि १९४७ या १९९२ के. इसलिए मैं प्रवृतियों की बात करूंगा.

हिन्दी कथा साहित्य में जिस मिसरिप्रजेंटेशन की बात कर रहा हूँ उसे समझने के लिए मैं अफगानिस्तान से जुड़ी एक घटना बतौर उदाहरण पेश करता हूँ. नेशनल ज्योग्राफिक पत्रिका के वर्ष १९८५ के एक अंक में एक अफगानी शरणार्थी लडकी ‘शरबत गुला’ की तस्वीर छपी. उसकी उम्र यही कोई दस वर्ष या बारह वर्ष की रही होगी. हरी मगर डरी आँखें. उस तस्वीर का शीर्षक था: होंटेड आईज टेल ऑव ऐन अफगान रिफ्यूजी’ज फीयर. वह तस्वीर डर की परिभाषा बन गई है. शरणार्थियों के डर की परिभाषा.

 स्टीव मैकरी द्वारा उतारी गई वह तस्वीर विश्व भर के शरणार्थियों की आँखों में बसे भय, उनके जीवन के दुखों का पर्याय बन गई. आज भी आप वह तस्वीर ढूंढ सकते हैं. इसके आगे की कहानी मैं आखिर में बताऊंगा. फिलहाल पॉपुलिस्ट अप्रोच या लुभावने रवैये की बात करते हैं जो साहित्य में जाने अनजाने पसर गया है.

हंस के फरवरी अंक में एक कहानी प्रकाशित हुई है: अंगद. कहानी नैतिकता के इर्द गिर्द है. एक ईमानदार कर्मचारी है. संभवतः वह चपरासी के पद पर है. रामाश्रय सिंह. उसकी पत्नी है. उसकी एक बेटी भी है, जिसका नाम चींची है.प्यारा सा नाम. कहानी आप पढेंगे तो उसकी बारीकियों को जानेगें लेकिन एक बिंदु पर मैं रुका. वह कर्मचारी पूजा करने जा रहा है और उसकी बेटी फूल तोड़ कर ले आती है. यह दृश्य नैतिकता के उत्स को दर्शाता हुआ आया है. रामाश्रय सिंह इस कदर ईमानदार है कि वह सरकारी क्वार्टर के जमीन पर उगे फूलों को भी सरकार का हिस्सा मानता है और उनका उपयोग उसकी नजर में बेईमानी है. ऐसे कई तनाव यह कहानी पैदा करती है. सरकारी जमीन पर उगे फूलों को इस्तेमाल करने के नाम पर रामाश्रय सिंह का मन बुरी तरह खिन्न हो जाता है और वह अपनी बेटी को थप्पड़ मार देता है.

जिस ‘मिसरिप्रजेंटेशन’ का जिक्र मैंने किया वह दरअसल यहाँ दिखता है. और एक पॉपुलिस्ट अप्रोच भी.

किसी भी तरह का भ्रष्टाचार अशोभनीय है, अश्लील है लेकिन जब यह अवरोही क्रम बनने लगता है और सर्वप्रथम स्थान आर्थिक भ्रष्टाचार को मिलता है तब पॉपुलिस्ट अप्रोच देखता है. जाति के आधार पर भेदभाव रखने वाले लोग, धर्म के आधार पर ह्त्या कर देने लोग, उम्र के आधार हिंसा करने वाले लोग, स्त्री और बच्चों को संपत्ति मानने वाली सभ्यता जब आर्थिक भ्रष्टाचार पर विचलित होने का नाटक करती है तब हाले-दिल पर भी हंसी नहीं आती. और फिर क्या होता है? आर्थिक भ्रष्टाचार प्रश्न बनता है. मुद्दा बनता है. जातिप्रथा में यकीन रखने वाला बुजुर्ग धरना पर बैठता है. धार्मिक श्रेष्ठता में में यकीन रखने वाले उस बुजुर्ग के साथी बनते हैं. ‘मार खा रोई नहीं’ मुहावरे को पसंद करने वाले लोग मैं भी अन्ना तू भी अन्ना की टोपी खुद को ही पहनाते हैं और अंततः यह मुद्दा कहानी में घिर आता है.

मेरे लिए सरकारी जमीन पर उगे फूल के लिए बेटी को पीटना कहीं बड़ा अपराध है, कहीं अधिक अनैतिक है. आप अगर आर्थिक गबन या भ्रष्टाचार के पीछे मचे अन्धकार को समझने की कोशिश नहीं करते हैं और लुभावने यानी पॉपुलिस्ट अप्रोच में फंस कर उसे ही कहानी का प्लाट बनाते हैं तो दो दिक्कते हैं: एक तो कि यह गलत है. दूसरी दिक्कत यह कि आप समस्या की जड़ तक नहीं जा रहे. आर्थिक गबन क्या इतना नया है कि आप चकित हैं? ऐसा होता तो नमक का दरोगा जैसी कहानी या गबन जैसा उपन्यास कैसे लिखा जाता? दरअसल तमाम समस्याओं में एक है, पिछले कुछेक दशकों से कोर्पोरेट गवर्नेंस में ‘एथिकल कोड ऑव कंडक्ट’ की बात. भारत का बहुत बड़ा तबका उन कंपनियों में काम कर रहा हैं जहां एथिकल कोड ऑव कंडक्ट के बिना पर केवल आर्थिक-संबंधी नैतिकताओं से आगाह किया जाता है. कम्पनियां इस बात से डरती हैं कि उनके कर्मचारी एक पैसे का रिश्वत लेगा तो वह वास्तव में उनके मुनाफे से कटने वाली बात होगी. उन्हें लगता है कि हजार रुपए के गिफ्ट के बदले कर्मचारी कोई करार किसी सेकेण्ड लोवेस्ट कोट वाले वेंडर से न कर ले. एक एक पैसे पर दांत गड़ा कर रखने वाले लोग हो सकता है कोई बड़ा काम कर रहे हों लेकिन नैतिकता को केवल अर्थ से जोड़ कर देखने की जो ट्रेनिंग या शिक्षा उन्होंने कर्मचारियों को दी है वह इस तरह फलीभूत हुई है कि जनता ‘मैं भी अन्ना तू भी अन्ना’ जैसे अर्ध-हास्यास्पद नारे लगाने लगी है. वह एक लुभावना जाल है जिसके शिकार हम रचनाकार भी हो जाते हैं. समय होगा कभी तो इस ख़ास आर्थिक नैतिकता को खासमखास बनाने वाली कोशिशों पर विस्तार से लिखूंगा. खासकर उस प्रवृति पर जिसके तहत हर तरह की अनैतिकता में लिप्त लोग आर्थिक ईमानदारी दिखाकर ‘बुलीइंग’ करते हैं.

इस तरह अंगद कहानी कहीं न कहीं इसी पॉपुलिस्ट भाव को ढोती हुई लगती है. पूरी कहानी अगर आप पढ़े तो मेरी राय से सहमत होंगे कि कहानी वहाँ से आगे अच्छी हो जाती है जब वो कर्तव्यनिष्ठा पर बात करती है. कई प्रश्न मन में छोडती है. यह कहानी मुझे ठीक लगी, कहानीकार प्रशांत का अंदाज पसंद आया इसीलिए मैंने उसे यहाँ लिया है. उन्हें बधाई.

साहित्य में इस इस लुभावनावाद यानी पापुलिज्म को समझने के लिए मैं दो भिन्न दौर का जिक्र करते हुए यह बताने की कोशिश करूंगा कि आख्यान पर अगर कोई संकट दिख रहा है तो क्यों दिख रहा है? पहला दौर विभाजन का है जिसे हिन्दी में आजादी के नाम से अधिक जाना जाता है और दूसरा दौर भूमंडलीकरण के आगमन से शुरु होता है.

     वीरेन डंगवाल की कविता चप्पल पर चिपके भात की मानिंद यह बात हिन्दीदां लोगों को खिझाती है, परेशान करती है लेकिन कहना जरुरी है कि हिन्दी रचनासंसार ने आजादी का जिस तरह स्वागत किया, उसकी आलोचना कर, उसकी समीक्षा कर, उसके द्वारा दिखाए गए सपनों के टूटने के नाम पर जितनी रचनाएं लिखीं, वैसा प्रयास विभाजन के लिए देखने को नहीं मिलता. हिन्दी प्रदेश के लोग इसके राष्ट्रभाषा होने का दावा करते हैं वैसे में यह जिम्मेदारी भी उठानी थी. उस पूरे दौर की रचनाओं में एक अजीब सा सन्नाटा देखने को मिलता है. इस बात पर यकीन कर पाना मुश्किल है कि उस दौर के रचनाकार विभाजन से अवगत नहीं रहे होंगे. फिर वो कौन सी स्थितियाँ रही होंगी. कहीं आज की तरह कि स्थिति तो नहीं जिसमें लोग केजरीवाल और राहुल गाँधी की आलोचना धड़ल्ले से लिखते हैं लेकिन अमित शाह का नाम नहीं लेते. क्या बहुमत का दवाब था? आजादी को विषय बनाने का आलम कुछ यों था कि बाद की पीढ़ियों ने आजादी से मोहभंग पर भी रचनाएं लिखीं. यह एक बात समझने में ज़रा मुश्किल है कि जब अनेक बुद्धिजीवी आजादी से पहले यह कह रहे थे कि यह महज सत्ता की अदला-बदली है वैसे में किस धारा ने यह मोहभंग की बात चलाई होगी. मेरी अगर स्मृति सही है तो मैंने ऐसे नारे भी सुने या पढ़े हैं कि यह आजादी झूठी है. अगर मेरी स्मृति गलत है तो मैं यह वाक्य हटा दूंगा.

     यहाँ पर पॉपुलिस्ट रवैये का पहला उदाहरण देखने को मिलता है. लोग कहते हैं कि चूंकि जनता निराश हो रही थी और आजादी के फायदे उसे नहीं दिख रहे थे, उसका जीवन स्तर नहीं सुधर रहा था, रोजगार नहीं थे इसलिए साहित्यकारों ने मोहभंग दर्ज किया. यह कोई दोषारोपण नहीं है और उदय प्रकाश की एक कहानी ‘तरबूज’ का उदाहरण लेकर कहूँ तो कट रहे तरबूज के परात को दूर से देखने पर लाल और हरा दोनों दिखता है जबकि जो परात के पास बैठे होंगे उन्हें लाल ही लाल दिखेगा, ऐसे में २०२० में हमें यह सहूलियत उपलब्ध है कि विभाजन की त्रासदी और आजादी के उल्लास के बीच अगर चुनाव करना हो तो सही विषय चुन सकें लेकिन १९६० या ७० में शायद यह संभव न रहा हो. जो भी हो हिन्दी साहित्य का पहला मिसरिप्रजेंटेशन यही था. या इससे भी पहले अगर जाएँ तो देख सकते हैं कि अगर सबाल्टर्न इतिहास न बताता तो साहित्य और ख़ासकर हिन्दी साहित्य हमें आंबेडकर द्वारा चलाये गए आन्दोलनों के बारे में कुछ नहीं बताने वाला था. हो सकता है उस पर सोचा जा रहा हो, लिखा जा रहा हो लेकिन मेरी अल्पमति में यह बात नहीं आती कि आजादी के पहले कितना सारा साहित्य गाँधी के प्रभाव या गाँधीवाद के प्रभाव में लिखा गया. क्या यह समझने में साहित्यकार चूक गए कि गांधीवाद के समकक्ष एक दूसरी प्रबल धारा भी समाज में बह रही थी? आखिर दांडी के बरक्स महाड़ यात्रा वाले समाचार तो आते ही रहे होंगे. इन खांचों में देखने पर लगता है कि हिन्दी किसी ख़ास उद्देश्य से रची गई भाषा है. लेकिन अब यह जनसामान्य के बीच है और अतीत चाहे जो रहा हो, वर्तमान में हिन्दी बहुत बड़े तबके की भाषा हो चुकी है. इस बड़े तबके का उद्देश्य ही हिन्दी का उद्देश्य होगा.

     गलत प्रतिनिधित्व या ग्रॉस मिसरिप्रजेंटेशन का दूसरा उदाहरण मैं नब्बे के दशक से देना चाहूँगा. १९८९ से १९९२ का दौर तीन बड़े बदलावों का दौर है: मंडल कमीशन, बाबरी मस्जिद ध्वंस और भूमंडलीकरण का आगमन. क्या यह बतलाने की जरुरत है कि इन तीनों का समाज पर कैसा प्रभाव पड़ा या क्या यह बतलाने की जरुरत है कि रचनाकारों ने विषय चुनाव करते हुए इन्हें कौन सी वरीयता दी? है, बतलाने की जरुरत है. भूमंडलीकरण पर थोक भाव में कहानियां या उपन्यास लिखे गए. भूमंडलीकरण के प्रभाव या दुष्प्रभाव तो अपनी जगह हैं, उन्हें अखबार भी दिखाते हैं लेकिन क्योंकि भाग्य या दुर्भाग्यवश लेखकों की सामाजिक स्थिति भी कुछ ऐसी थी कि उन्हें भूमंडलीकरण ही रास आया. यह सोचकर भी आश्चर्य होता है कि समाज की आज जो स्थिति है उसके पीछे के मूल कारण को समझने में लेखकों से चूक हो गई होगी. क्या आप भी ऐसा मानते हैं? जिन्हें यह नहीं समझ आता कि बाहर से आये हमलावरों ने कैसे यहाँ राज कर लिया उन्हें देखना चाहिए कि प्रभु वर्ग ने भूमंडलीकरण को लेकर क्या रवैया अपनाया? यह अजब ही है कि बुद्धिजीवियों, कहना नहीं चाहिए-व्यक्तिगत हो जाएगा, लेकिन अजब ही है कि बुद्धिजीवियों के बच्चों की पढ़ाई लिखाई का कोई डाटा उपलब्ध हो तो देखा जा सकता है कि किस दौर में इंजीनियरींग और मैनेजमेंट की पढ़ाई का क्रेज कैसा रहा? जिसे आम जनता मानने की छूट मिली है उसे क्या ही कहा जाए. और आप भूमडलीकरण पर लिखी अजेंडा-कहानियों में आख्यान खोजते हैं? मतलब आप चाहते हैं कि बॉस की डांट सुनने वाले विषयों या अकेले पड़ गए नौकरीपेशा परिवारों का आख्यान जनता को पसंद आयेगा? आप कितने मासूम हैं? जिन्हें जिन्दगी की डांट पड़ गई हो उसकी तरफ से निगाह मोड़ कर आप उसकी कहानी लिखना चाहते हैं जो बॉस की डांट से, कार खरीद के कर्जे से दुखी है तो आपके आख्यान को तुक्का ही बचा सकता है. और तुक्का यों तो नियम के विरुद्ध होता है लेकिन तुक्के के साथ एक ही नियम चलता है कि वह यानी तुक्का एकाध बार ही लगता है.

     आप अपने मनबहलाव के लिए यह सोच सकते हैं कि मैं भूमंडलीकरण या बाजारवाद का बचाव कर रहा हूँ या उसके खतरों को कम आंक रहा हूँ तो मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐसा हरगिज नहीं है. भूमंडलीकरण का जो प्रभाव किसानों और गरीबों पर पड़ा उस पर भी जम कर आख्यान लिखे होते तब भी कोई बात होती. लेकिन यह भी जोड़ना चाहूँगा कि इस महान धरा पर जो वाद सदियों से चल रहा है वह अन्य किसी भी वाद-मार्क्सवाद से लेकर बाजारवाद- को लील जाता है. आप इसी लिहाज से एक निगाह अपने गाँव के युवकों पर दौड़ाइये और पता करिये कि भूमडलीकरण ने फ़ायदा किसे पहुँचाया? नौकरियाँ किसे मिली? आज इस शतप्रतिशत आरक्षण ने सुरसा का रूप ले लिया है जिसे नवमध्यवर्ग कहा जा रहा और जिसकी ताकत आप २०१४ से अब तक देखते ही आ रहे हैं. आख्यान वहाँ है. ऐसा माहौल बनाया गया कि टीवी और स्कूटर, कार लोन १९९२ के बाद की कोई बस्तु है जिस पर लिखते हुए लेखक को अकेले पड़ जाने वाले पात्र का आख्यान रचना है लेकिन इस तथ्य से मुँह मोड़ना अनुचित होगा कि इसी मुद्दे पर पंकज बिष्ट ने १९८२ या ८४ के इर्द गिर्द कहानियां लिखी थीं. बच्चे गवाह नहीं हो सकते इसका अप्रतिम उदाहरण है.

     आख्यान का मौक़ा मंडल कमीशन ने दिया जब सवर्ण तबके के भीतर एक प्रति-गुस्सा ( काउंटर एंगर ) भर गया था या भर दिया गया था. लेकिन यह मौक़ा, सायास या अनायास, जाने दिया गया. कहीं न कहीं बुद्धिजीवियों ने भांप लिया होगा कि यह प्रति-गुस्सा नकली है. इसलिए भूमंडलीकरण के बाद कुछ रचनाकारों ने बाबरी विध्वंस और उसके उपरांत उठी साम्प्रदायिकता की जहरीली लहर पर भी कहानियां और उपन्यास लिखे लेकिन आश्चर्यजनक रूप से भारत में साम्प्रदायिकता के लिए धार्मिक जिम्मेदारियां तय कर दी जाती हैं और आप वहाँ आख्यान खोजते हैं. कैसे मिलेगा? आप बुद्धिजीवी हैं, राजनेता धर्म का इस्तेमाल जाति के प्रश्नों से कतराने के लिए करते हैं और आप भी वही मान लेते हैं? फिर आख्यान भी ढूंढते हैं. कैसे मिलेगा?

     आख्यान लिखने वालों ने विषयों से खुद को इस तरह गुम रखा कि, यह कहते हुए दुःख होता है लेकिन कह लेने दीजिए, कि आख्यान लिखने वाओं ने विषयों से खुद को इस तरह दूर रखने की परम्परा बनाई कि उन्हें ‘न लिखने का कारण’ और ‘आत्म-तर्पण’ जैसे स्तम्भ लिखने पड़े. ‘न लिखने के कारण’ हर हमेशा अपनी तैयारियों और प्राथमिकताओं से जुड़े होते हैं.

     इससे पहले की मैं बात समाप्त करूँ, ‘शरबत गुला’ की कहानी पूरी कर लेते हैं, हो सकता है मिस रिप्रेजेंटेशन की बात कुछ स्पष्ट हो. हुआ यूं कि वर्ष २००२ में पत्रकारों का एक दल फिर से अफगानिस्तान गया. उसमें एक फोटो पत्रकार थे: टोनी नोर्थाप. वे लोग उस लडकी से भी मिले जो अब सयानी हो चुकी थी और उस तस्वीर के बारे में बात करना चाहा.

     ‘शरबत गुला’ ने बताया कि जब उसने अपनी प्रकाशित तस्वीर देखी तो उसे शर्म आई और अफसोस हुआ.  स्टीव मैकरी ने वह तस्वीर बिना उसकी मर्जी के उतारी थी. वह तस्वीर खिंचाने के पक्ष में नहीं थी लेकिन स्टीव ने विद्यालय की प्राध्यापिका से जबरन दवाब डलवाया और उसकी तस्वीर उतारी. तस्वीर उतारने के क्रम में वह बच्ची ‘शरबत गुला’ इतनी असहज थी कि बार बार अपना दुपट्टा चेहरे पर डाल ले रही थी. इससे आजिज आकर स्टीव ने फिर फिर प्राध्यापिका से शिकायत की और प्राध्यापिका ने फिर फिर दवाब बनाया जिससे एक तस्वीर स्टीव खींच सके जिसके बाद वह भाग गई थी, इसलिए कोई दूसरी तस्वीर नहीं उतारी जा सकी. तो जो डर सालों साल तक यह कह कर प्रचारित किया जाता रहा कि वह शरणार्थियों के आँखों में बसा डर है, दरअसल वह एक अजनबी पुरुष के अनप्रोफेशनल रवैये और तस्वीर उतारने के अनाधिकार चेष्टा से उपजी थी. यह बात भी सामने आई कि वह तस्वीर बालिका शरबत के माता पिता से अनुमति लिए बगैर उतारी आई गई थी और प्रकाशित हुई थी.

     इसलिए अब अगर आख्यान को वापसी करनी है तो उसे उस बोझ पर हमला करना होगा जो फासीवादियों के सर पर है. हमें उस बोझ को जानना होगा. उस गठरी में जाति और नफरत के दो बक्से हैं यह तो दूर से दिख रहा है लेकिन और क्या है यह जानना होगा. प्रेम. संसाधनों की हड़प. नौकरियाँ. आख्यान की वापसी अगर होनी है तो वहीं से होगी. यह समय रहते करना होगा वरना वही हाल होगा जो शरबत गुला का हुआ.

     क्या हुआ?

     शरबत गुला की वह तस्वीर स्टीव मैकरी स्टूडियों ने कई कई आकारों में शाया किया. बीस गुने चौबीस इंच की तस्वीर की कीमत बारह से पंद्रह हजार डॉलर है. यानी दस से बारह लाख रुपए. इससे कुछ बड़े आकार की शरबत की वही तस्वीर एक लाख सत्तर हजार डॉलर में बिकी है. करीबन डेढ़ करोड़ रुपए में एक तस्वीर. और इन सब प्रयासों से शरबत को दो चीजे मिली हैं.

     पहली, नेशनल ज्योग्रफिक पत्रिका का वह अंक जिसके कवर पर उनकी तस्वीर थी.

     और दूसरी, पाकिस्तान से निकाला.

     दरअसल अनेक शरणार्थियों की तरह वो पाकिस्तान में छुप कर रह रही थीं. लेकिन एक दिन इस तस्वीर के आधार पर कुछ लोगों ने पहचान लिया और अधिकारियों को सूचना दे दी. फिर अधिकारियों ने उन्हें वापस अफगानिस्तान भेज दिया.

     हमें शरणार्थी आख्यान को नागरिक बनाना है.

     धन्यवाद.

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

अलेक्सान्द्र पूश्किन की कहानी ‘डाकचौकी का चौकीदार’

अलेक्सान्द्र पूश्किन की आज जयंती है। महज़ 38 साल की आयु में दुनिया छोड़ देने …

3 comments

  1. bahut hi jimmedaar vaktavy…

  2. बेहद सटीक, टू द पॉइन्ट!

  3. Mrityunjay Prabhakar

    शानदार।

Leave a Reply

Your email address will not be published.