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भविष्य का समाज: सहजीविता के आयाम: जसिंता केरकेट्टा

 

जसिंता केरकेट्टा कवयित्री हैं, आदिवासी समाज की मुखर आवाज़ हैं। राजकमल स्थापना दिवस के आयोजन में 28 फ़रवरी को ‘भविष्य के स्वर’ के अंतर्गत उनका वक्तव्य सहजीविता के आयामों को लेकर था- मॉडरेटर

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क्यों महुए तोड़े नहीं जाते पेड़ से?
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माँ तुम सारी रात
क्यों महुए के गिरने का इंतज़ार करती हो?
क्यों नहीं पेड़ से ही
सारा महुआ तोड़ लेती हो ?

माँ कहती है
वे रात भर गर्भ में रहते हैं
जन्म का जब हो जाता है समय पूरा
ख़ुद ब ख़ुद धरती पर आ गिरते हैं
भोर, ओस में जब वे भीगते हैं धरती पर
हम घर ले आते हैं उन्हें उठाकर

पेड़ जब गुज़र रहा हो
सारी रात प्रसव पीड़ा से
बताओ, कैसे डाल हिला दें ज़ोर से?
बोलो, कैसे तोड़ लें हम
जबरन महुआ किसी पेड़ से ?

हम सिर्फ़ इंतज़ार करते हैं
इसलिए कि उनसे प्यार करते हैं ।।

आदिवासियों के लिए राष्ट्र का मतलब क्या होता है? उनके लिए राष्ट्र का मतलब जीने का तरीका है। वह जीने का यह तरीका कहां से सीखता है? वह इसे प्रकृति से सीखता है। उस जीने के तरीके में, अपना हिस्सा रख कर दूसरों का हिस्सा उस तक पहुंचाने का दायित्व ईमानदारी से निभाने की बात होती है। क्योंकि उसमें आदमी केंद्र में नहीं है। वह प्रकृति की हर चीज के साथ एक गोल घेरे में खड़ा है। प्रकृति के संतुलन में भी अपना दायित्व निभाने के लिए।
इसलिए आदिवासियों के पर्व त्यौहार किसी पर जीत के जश्न का रूप नहीं होते। वे प्रकृति को उसका हिस्सा चढ़ाने, कृतज्ञ होने, धन्यवाद देने से जुड़े होते हैं। जैसे मिट्टी से उपज प्राप्त करने पर मिट्टी की पूजा, पेड़ों से फल पाने पर पहला फल उसे चढ़ाने, फसल कटने से लेकर गाय बैलों, भैंसों तक को आभार  व्यक्त करने के पर्व होते हैं। सारे त्योहार खेती, किसानी, पेड़ पौधों और प्रकृति से जुड़े  हैं। जब गांव के लोग सामूहिक रूप से मछली मारते हैं, तब उसे हर आदमी के लिए बराबर हिस्से में बांटते हैं। यदि कुत्ता भी साथ हो और उसने साथ होने भर की भूमिका ही निभाई हो, तब भी उसका हिस्सा उसे दिया जाता है। यह उस नियम के तहत किया जाता है जिस नियम के तहत प्रकृति ईमानदारी से सबको सांस लेने के लिए हवा देती है।

सह अस्तित्व के इसी सिद्धांत के तहत आदिवासी इलाकों में जो समुदाय बाद में भी आए, लोगों ने उनको भी बसने के लिए ज़मीन दी। मुंडा आदिवासियों ने उरांव आदिवासियों को अपने  साथ बसाया। पहाड़िया आदिवासियों के आस पास संथाल आदिवासी बस सके। इसी सिद्धांत के तरह हर आदिवासी गांव में एक लोहार, रूई धुनने वाले एक जुलाहे के परिवार को भी जगह दी गई। वे साथ— साथ लंबे समय से बढ़े। यह सहजीविता का एक लंबा इतिहास है, जिसे आदिवासियों ने आज भी बचाकर रखा है।

महावीर जिस जीयो और जीने दो का मंत्र देते हैं वह आदिवासियों के जीने के सिद्धांत से मेल खाता है। महात्मा बुद्ध ने अपना दीया उठाकर चलने की बात कही, वह आत्मनिर्भरता, वह दीया उठाकर चलना आज भी आदिवासियों में दिखाई देता है। झारखंड में खुदाई के दौरान महात्मा बुद्ध की मूर्तियां मिलना, उनके होने का प्रमाण मिलना, यह बताता है कि महात्मा बुद्ध ने आदिवासी इलाकों, जंगलों में उनके बीच वक़्त गुजारा था। वे जंगलों की उपज थे। जंगल, बिरसा मुंडा पैदा करता है, जंगल बुद्ध पैदा करता है। पर शहर क्या करता है?


पहाड़ों के लिए
……………….
थोड़े से पैसे के लिए
जो अपना ईमान बेचते हैं
वे क्या समझेंगे
पहाड़ों के लिए कुछ लोग
क्यों अपनी जान देते हैं ?

ओड़िशा, छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहने वाले आदिवासी कहते हैं कि जंगल जोड़ने और दूसरों की परवाह करने की शिक्षा देता है। इसलिए कोई भी इधर आता है, हम उन्हें भोजन के साथ, रात में रुकने की जगह भी देते हैं। जंगल का हृदय विशाल है। पर जब हम शहर जाते हैं, तो क्या देखते हैं? वहां आदमी के जीवन की कद्र नहीं है। वह किसी से पानी नहीं मांग सकता, खाना नहीं मांग सकता, सड़क पर मरता भी रहे तो उसे उठाकर कोई अस्पताल नहीं पहुंचाता। वहां आदमी का पद भले ही बड़ा हो जाता है। लेकिन इनसान के रूप में उसका कद बहुत छोटा हो जाता है। इसलिए हम जंगल को खोदकर, उजाड़कर ऐसे शहरों में तब्दील किए जाने के खिलाफ लड़ते हैं, जिसमें मनुष्य जीवन की कोई गरिमा नहीं रह जाती।

इसलिए हम जंगल पहाड़ की रक्षा के लिए  पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ते हैं। पर, हमारी लड़ाई, थोड़े से पैसों के लिए अपना ईमान बेचते लोगों को, विकास के नाम पर मनुष्यता से एक कदम और नीचे गिर जाने वालों को कभी समझ में नहीं आती। वे नहीं समझते कि पैसा आज़ादी नहीं लाता। वह सबकुछ खरीद लेने की ताकत का भ्रम पैदा करता है। लेकिन जंगल में घुसते ही पैसा जेब में सड़ जाता है। जंगल बताता है कि जीवन की मूल जरूरतें, सांस लेने के लिए हवा, धरती के लिए बारिश, पेड़ पौधे, जंगल, पहाड़, मिट्टी और खाने के लिए अनाज आदमी पैसों से उगा नहीं सकता। वह धीरे धीरे बाज़ार का गुलाम होता जाता है जो उसे यह सब उपलब्ध करने का दावा करता है। पैसे उसी बाज़ार की गुलामी लेकर आती है।

आदिवासी कहते हैं ” जंगल असल अर्थ में हमें मुक्त करता है। वह हमें आज़ादी देता है । जंगल में हम अपनी तरह से कपड़े पहनने, अपने हिसाब से खाने, पीने, अपनी भाषा बोलने, घूमने, फिरने, साफ़ हवा, पानी, तरह तरह के फल फूल, जड़ी बूटी के उपयोग के लिए आज़ाद होते हैं। वह हमें स्पेस देता है, हम उनको स्पेस देते हैं। एक दूसरे की आज़ादी के लिए हम एक दूसरे को स्पेस देते हैं और इस तरह दोनों साथ बढ़ते हैं।”

वे कहते हैं कि “दुनिया को जंगल की तरह होना चाहिए। जहां हर चीज अपनी विशिष्ट पहचान, अपनी वेशभूषा, अपनी भाषा, अपने अलग जीने के तरीके के साथ जिंदा रह सके। उसे समुद्र नहीं होना चाहिए, जहां नदियों की पहचान ख़त्म हो जाती है। जब तक नदी उसमें नहीं मिलती है, जन जीवन को जिंदा रखने की, सभ्यता को बचाने की ताक़त रखती है। मगर समुद्र में मिलते ही कोई आदमी उसका पानी पी नहीं सकता। एक राष्ट्र को जंगल से जीने की कला सीखनी चाहिए। प्रकृति से जीने का तरीका सीखना चाहिए। यह तरीका सहजीविता का ही तरीका है।”

क्या उनके जीवन में कोई दुःख नहीं होता? इस पर वे कहते हैं कि ” जंगल के जीवन में भी अपने तरह के दुख होते हैं। जैसे, बीमारी से कुछ लोगों का असमय चला जाना। लेकिन पहाड़ हमें सिखाता है कि दुख को जाने देना है। जैसे पहाड़ पर पानी नहीं ठहरता है, वैसे ही हमारे जीवन में भी दुख नहीं ठहरता है। हम मृत व्यक्ति की देह को प्रकृति में मिल जाने देते हैं और उसकी आत्मा को घर वापस ले आते हैं। इस तरह उनकी ऊर्जा हमारे साथ रहती है। हम उनको वैसे ही महसूस कर पाते हैं, जैसे हम हवा को महसूस करते हैं। जीने का यह तरीका हम किसी धर्म, किसी ग्रंथ से नहीं सीखते। प्रकृति से सीखते हैं। इसलिए जिनकी संस्कृति प्रकृति से मिलती नहीं, जब हम सूंघ पाते हैं कि उनकी संस्कृति लूटने की संस्कृति है, दूसरों का हिस्सा भी हड़प लेने की संस्कृति है, तब हम उनके खिलाफ खड़े हो जाते हैं और लड़ते हैं, जैसे जंगल के जीव ख़तरा सूंघने पर हमले की तैयारी करते हैं। ”

जंगल पहाड़ के निकट रहने वाले और प्रकृति को ही अपना धर्म मानने वाले लोगों ने सहजीविता को बचाकर रखा है। हर राष्ट्र का असल भविष्य सहजिविता में ही है। यह संस्कृति अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, हर जगह के आदिवासियों की मूल संस्कृति में दिखाई पड़ती है। यही संस्कृति भारत की भी मूल संस्कृति है।

आज जब हम सहजीविता के भविष्य की बात करें, तो हमें जाति भेद, धर्म भेद, रंग भेद व शास्त्रों से बाहर निकलना होगा और देश— दुनिया की मूल संस्कृति को समझना होगा। प्रकृति को बचाने के लिए मूल लोगों के संघर्ष को समझना होगा। यह समझना होगा कि व्यवस्था इतनी भ्रष्ट क्यों और कैसे हो गई, कि उससे निकलना कठिन लगता है? बेईमानी, भ्रष्टाचार से मुक्त एक समाज की कल्पना करना क्यों मुश्किल लगता है? क्यों यह सिर्फ आदर्शवाद लगता है? इन बातों पर फिर से मंथन शुरू करने की जरूरत है।

आदिवासी जो इतिहास, वर्तमान और सहजीविता के भविष्य को जी रहे हैं, उनकी जीवन शैली और आज तक उस शैली के बचे रहने के कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। यह संस्कृति और जीवन मूल्य भारत की मूल संस्कृति है। यहां के लोग जिस तरह कृषि करते हुए खुद पर निर्भर रहते हैं, वही से अपना दीया लेकर खुद चलने का विचार बुद्ध लोगों को दे जाते हैं। यह सबकुछ इस देश की मूल संस्कृति में है जिसे हर काल में धीरे धीरे नष्ट करने, ध्वस्त करने का प्रयास होता रहा है लेकिन लोग लगातार इस प्रयास के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।

हम इन सारी बातों को समझते हुए हम सहजीविता का नया भविष्य रच सकते हैं। एक नया समाज, नया देश गढ़ सकते हैं जिसके मूल में किसी एक वर्ण, एक समुदाय की श्रेष्ठता, कट्टरता की जगह आपसी सहयोग , संवेदनशीलता और रचनात्मकता शामिल हो। इस दुनिया में आपसी सहयोग से ही मनुष्य हजारों साल तक जीवित रह सका है। इसलिए जीवित रहने के लिए हमें दूसरे लोगों का साथ चाहिए ही। इसीलिए मनुष्यों ने परिवार के बाद समाज का निर्माण किया है। इन सारी बातों को महसूस करते हुए ही हम सहजीविता का बेहतर भविष्य बना सकते हैं।

एक बहुत छोटी कविता के साथ अपनी बात खतम करूंगी।
   इंतज़ार
……………..
वे हमारे सभ्य होने के इंतजार में हैं
और हम उनके मनुष्य होने के ।।

बस इन्हीं शब्दों के साथ फिर से आप सभी को धन्यवाद। जोहार।

© जसिंता केरकेट्टा
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2 comments

  1. वरदान हाड़ा

    बहुत अच्छा लिखा है आपने जसिन्ता, जब तक ये चेतना सम्वेदनशीलता, रचनात्मकता से जुड़ी रहेगी तब तक कोई भी खतरा नहीं मुू ल संस्कृति को …

  2. बिल्कुल सही

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