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राकेश तिवारी की कहानी ‘चिट्टी जनानियाँ’

कुमाऊँ के परिवेश पर राकेश तिवारी की दो कहानियाँ ऐसी हैं जो मुझे बहुत पसंद हैं- एक तो ‘मुचि गई लड़कियाँ’, जो नैनीताल के परिवेश पर है। जानकी पुल पर उसको बहुत पहले लगाया भी था। दूसरी कहानी है ‘चिट्टी जनानियाँ’। इसी नाम से उनका संग्रह भी आया है वाणी प्रकाशन से। आप इस कहानी को पढ़िए मुग्ध हो जाएँगे- प्रभात रंजन

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 जून का आखिरी रविवार है। जिस वक्त मैं भीमताल पहुँचा, बूँदाबाँदी शुरू ही हुई थी। सवा चार बज रहे थे। चाय की तलब लगी थी। मैं बाज़ार से थोड़ा आगे निकल कर एक दुकान पर रुक गया, जहाँ गाड़ी पार्क करने की जगह थी। दुकानदार के साथ बातचीत शुरू की तो उसका लँगोटिया यार दान सिंह बीच में कूद पड़ा। वह पेशेवर और पूर्णकालिक दलाल नहीं था, लेकिन मेरे जैसे ग्राहक टकरा जाएँ तो उन्हें मंज़िल तक ले जाता था। जो मिल जाए वही मुकद्दर। वह खुद को इसी तरह तसल्ली देता है। इसमें दूसरों के लिए भी संकेत है कि वह पैसों के लिए मरने वाला आदमी नहीं। पाँच मिनट की बातचीत के बाद दान सिंह मुझे उस जगह ले जाने को तैयार हो गया, जिसकी मुझे तलाश थी।

   रवानगी से पहले वह बहुत उत्साहित लग रहा था। बोला, “चार अकेली ज़नानियाँ हैं। बहुत सीधी और भली। दिखने में एकदम गोरी-चिट्टी हैं। चूने के माफ़िक़। मन भी वैसा ही साफ़ है।” कभी तीन-चार साल दिल्ली रह चुके दान सिंह ने आश्वस्त किया। मुझे पंजाबी समझ कर इम्प्रेस करने के लिए वह महिलाओं को ‘ज़नानियाँ’ कह रहा था। यह हुनर उसे धंधे ने सिखाया। मेरे बगल में बैठते हुए उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा, “उन्हें पैसों की ज़रूरत है। काम हो जाएगा।”

   मैंने जैसे ही बेल्ट लगाई, वह हँसने लगा। यहाँ पुलिस नहीं पकड़ती। उसने हाथ नचा कर कहा। मैं मुस्कुरा कर रह गया। वह मुझे अंड-बुद्धि लग रहा था। उजबक टाइप। बारिश तेज़ हो चुकी थी। वह उस इलाक़े के बारे में बताता जा रहा था। लेकिन, कसम से, मेरा ध्यान उसकी बातों से हट गया था। मैं सड़क को कनखियों से और दाएँ-बाएँ कुछ ज़्यादा ही आँखें खोल कर देख रहा था। हालाँकि जानता था कि यह जोखिम भरी हरकत है। आधी दूरी तय करने के बाद घने दरख़्तों के बीच से गुज़रने वाला रास्ता शुरू हो गया। मुझे उस इलाक़े से एक अजीब-सी मुहब्बत होने लगी। मौसम की खुनक और हवाओं की ताज़गी रोमछिद्रों से घुस कर आत्मा में उतर रही थी। वह अपनी रौ में बोले जा रहा था और मैं अपनी ही धुन में डूब रहा था।

    “बस-बस, यहाँ से बाएँ लीजिए।”— उसने अचानक कहा। मुझे ब्रेक मार कर गाड़ी धीमी करनी पड़ी। ग़नीमत थी कि पीछे कोई वाहन नहीं आ रहा था। मुख्य मार्ग से एक पक्की लेकिन सँकरी सड़क किसी अनजान इलाक़े की ओर निकल रही थी। दान सिंह के कहने पर मैंने सीधी सड़क छोड़ कर कार बाए ले ली। वहाँ ढलान-सी थी। काली घटाए तो रुद्रपुर से ही घिरने लगी थीं। हल्द्वानी पहुँचते-पहुँचते मौसम रूठ गया। भीमताल में बारिश जो शुरू हुई तो रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इस पहाड़ी इलाक़े में तो धुध भी छा गई थी। जून के अंत में बादलों और कोहरे की जुगलबंदी देख कर खुशी से सिहरन-सी होने लगी। यहाँ सूर्यास्त जल्दी होता है और अँधेरा भी। दान सिंह ने बताया। मुझे लगा, समय पर पहुँचना चाहिए था। मौसम ख़राब होने से अँधेरा कुछ ज़्यादा ही तेज़ी से घिरने लगा। धुँधलके के कारण ऐसा लग रहा था सड़क आगे चल कर धुँध के पेट में घुस गई है। सच बताऊँ, एक क्षण के लिए कोई अज्ञात भय अपनी ओर खींचता, लेकिन मैं उसे पीछे धकेल देता और गोरी ज़नानियों के बारे में सोचने लगता। नकारात्मक विचारों के साथ मैं ऐसा ही करता हूँ।

   बारिश थोड़ा हल्की हुई थी। लाल और भूरी टिन की छत वाले घर, गदराये हुए फूल और लदे-फदे पेड़ देख कर मैं मुग्ध था। क्या ऐसी ही जगह मुझे पसंद थी ? मैं सोचता और अंदर से बार-बार सकारात्मक उत्तर मिलता। गाँव के नजदीक पहुँचने पर, सड़क के दोनों तरफ़ फलदार वृक्षों की कतार शुरू हुई तो मैं अपने ही हाथों फिसलने लगा। यह प्लम और खुवानी का मौसम था। आड़ुओं में भी लाली फूटने लगी थी। दान सिंह ने बताया, बच्चे नमक लगा कर बहुत पहले से खाने लगे हैं। हाँ, सेब अभी छोटे और एकदम हरे थे। पहाड़ी बगीचों को इतने क़रीब से देखने का यह पहला अवसर था। मुख्य सड़क से गाँव बमुश्किल आधा किलोमीटर अंदर था। इस पतली सड़क पर चारों तरफ़ घनघोर सन्नाटा था। गाँव पहुँचने तक एक भी वाहन नहीं मिला। सन्नाटा कानों में सीटी की तरह बज रहा था। लेकिन हल्के भय के बावजूद मन के अंदर बाँसुरी-सी बज रही थी। आप लोगों के लिए तो ये स्वर्ग ठैरा। दान सिंह ने मुझे मुग्ध देख कर कहा।

   “और आप लोगों के लिए?”

   “पता नहीं।…हम इस बारे में सोचते नहीं।” वह शांत और उदास स्वर में बोला। थोड़ा और कुरेदता तो शायद उसकी उदासी की तह तक जा पाता। वह सँभला तो कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद दिल्ली के अपने खट्टे-मीठे अनुभव बताने लगा।

   उन ज़नानियों के घर पहुँचने तक सब ठीकठाक था। एकदम सुखद। अंड-बुद्धि के साथ बातचीत कुल मिला कर मनोरंजक ही रही। आँगन में पहुँचे तो उसने ‘रूपा-रूपा’ कह कर ज़ोर से आवाज़ दी। रूपा कौन होगी और कैसी होगी, मैं सोचने लगा। उसने मुझे हिदायत दी कि इन लोगों के सामने हँसना नहीं। मैं चौंका। यह तो बड़ी अजीब बात है। मैंने कारण पूछा।

   “ऐसे ही कह रहा हूँ।” उसने कहा, “थोड़ा नीरस लोग हैं। उन्हें लटके हुए मुँह अच्छे लगते हैं। आपका क्या जा रहा है, लटका लेना थोड़ी देर।”

   तभी एक अधेड़ स्त्री बाहर आई, जिसके बालों में हल्की सफ़ेदी आने लगी थी। वह गदराई हुई औरत काफ़ी गोरी-चिट्टी थी। उसने दान सिंह से ‘आओ’ कहते हुए एक बार भरपूर नज़रों से मुझे देखा और बिना मुस्कुराए मेरी ओर हाथ जोड़ दिए। भीमताल से रवाना होने के पहले दान सिंह ने शायद इसी को आने की सूचना दी थी। उस स्त्री को देख कर जाने क्यों ऐसा लगा कि यह वर्षों से, हँसना तो दूर, रोई भी न होगी। वह मुड़ी और घर के अंदर चली गई। हम दोनों उसके पीछे-पीछे। बिना कोई बात किए वह अंदर के कमरे में घुस गई। दान सिंह भी अंदर वाले कमरे में चला गया। वह उनका पुराना परिचित था। उसने खुद बताया था। मैं उनके बाहरी कमरे में, जो ड्राइंग रूम जैसा क़तई नहीं लगता था, खड़ा रह गया। मुझे किसी ने बैठने तक को नहीं कहा।

  मैंने कमरे में सरसरी निगाह दौड़ाई। वहाँ एक पुरानी-सी सेंटर टेबल के चारों ओर चार लकड़ी की कुर्सियां रखी थीं, जिन पर बेरंग-सी गद्दियाँ पड़ी हुई थीं। एक दीवान था, जिस पर गलीचा बिछा था और दो गावतकिये रखे हुए थे। एक प्लास्टिक की कुर्सी दरवाज़े के पास पड़ी थी। जब कुछ देर तक कोई बाहर नहीं निकला तो मैं प्लास्टिक की कुर्सी को अंदर की तरफ़ खिसका कर उस पर बैठ गया। दलाल बात करने में इतना समय क्यों ले रहा होगा ? मैं परेशान हो रहा था। वह अंदर क्या कर रहा होगा ? यह औरत सुंदर होते हुए भी इतनी डरावनी क्यों लग रही थी ? मैं खुद से पूछ रहा था।

  लगभग दस-बारह मिनट बाद एक लड़की बाहर निकली और उसके पीछे-पीछे दान सिंह दलाल। लड़की औसत कद की और छरहरी थी। गोरे पहाड़ियों के गाल और नाक की नोक अक्सर हल्की लाल रहती है। मैंने कश्मीर में देखा था। यह लड़की भी गोरी थी। लेकिन एकदम फ़ीकी। हालाँकि नाक-नक्श बहुत आकर्षक थे। पर बुत जैसी। वह बिजली की कौंध की तरह बहुत हल्के-से मुस्कुराई और फिर अपनी पूर्व अवस्था में चली गई। उसने मुझे आगे आकर लकड़ी की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। गूँगी तो नहीं होगी। मैंने सोचा और बिना बोले आगे आकर बैठ गया। लड़की मेरे सामने बैठ गई। दलाल उसके बगल में।

   तभी देखा एक और लड़की अंदर से पर्दे की आड़ लेकर झाँक रही है। वह भी वैसी ही गोरी-चिट्टी थी जैसी मेरे सामने बैठी लड़की। वह मामूली मोटी थी। दोनों के चेहरे काफ़ी मिलते थे। साफ़ लगता था बहनें हैं। यह भी पूरी बुत की बहन ही थी। उसका देखना बहुत ही रहस्यमय लग रहा था। मानो, मेरी थाह ले रही हो। मेरी नज़र पड़ी तो वह झेंप गई। थोड़ी देर बाद वही बुत की बहन चाय लेकर आई थी।

   “हाँ, बताइए।” सामने बैठी सफ़ेद बुत ने साबित किया कि वह गूँगी नहीं है। चाय लाने वाली, जो छोटी बहन जान पड़ती थी, दीवान पर बैठ गई। उसने दीवार से पीठ टिका ली। गावतकिया गोद में रख लिया था। छोटी बहुत हल्के-से हिल रही थी और बुदबुदा रही थी। शाम का वक्त था। मुझे लगा कहीं यह छोटी लड़की प्रेतों की दुनिया में लोकप्रिय कोई मंत्र न बुदबुदा रही हो। हालाँकि दान सिंह ने बाद में बताया कि वह हमेशा मद्धम स्वर में गाती है, क्योंकि उसकी आवाज़ अच्छी नहीं है और सुर-ताल पकड़ना उसके बस की बात नहीं।

   “बताना क्या है। इनसे बात हो गई।” मैंने दलाल की ओर इशारा किया, “सब ठीक ही है, लेकिन थोड़ा पैसा ज़्यादा नहीं है ?” बोलते हुए मेरा आत्मविश्वास डगमगा रहा था। यह सोच कर घबराहट और बढ़ने लगी।

   “ऐसा नहीं है। फिर भी देख लेंगे।”

   मैंने चाय का कप उठाया ही था कि एक बूढ़ी महिला, जिसके गले में पट्टा (सरवाइकल कॉलर) और एक हाथ में प्लास्टर बँधा था, धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई पर्दे के पीछे से अवतरित हुई और नब्बे अंश पर देखती हुई आगे बढ़ती चली आई। वह सफ़ेदी की चलती-फिरती दीवार लगती थी। मेरे पास से गुज़रते हुए वह अचानक ज़ोर से चिल्लाई, “वो आ गया क्या ?”

   मैं बुरी तरह डर गया। मेरे हाथ से चाय का कप गिरते-गिरते बचा। छोटी बुत फिक्क-से हँसी। बड़ी बहन ने उसे घूर कर देखा तो वह सहम गई। हँसी ग़ायब। बूढ़ी औरत की नज़रें सीधे दरवाज़े पर टिकी थीं। वह गरदन नहीं हिला रही थी। शायद उसने मुझे देखा भी नहीं। उसके आगे के दो दाँत टूटे थे और बाल भुट्टे के बालों जैसे छितरे हुए थे। चेहरे पर इतनी झुर्रियां थीं जैसे बासी सेब हो। वे चारों ही हद से ज़्यादा गोरी थीं। लेकिन रक्तहीन। मुझे ज़रा भी अनुमान नहीं था कि उनसे मिल कर एक अजीब-सा ठंडा डर मेरे रोंगटे खड़े करने वाला है। हालाँकि दान सिंह मेरे साथ था। फिर भी आशंका होने लगी कि कहीं मैं किसी मुसीबत में तो नहीं फँस गया।

   “आपके लिए नहीं कह रही हैं,” लड़की ने बताया और उस हद दर्जे की सफ़ेद बुढ़िया का परिचय दिया, “मेरी दादी हैं।”

   मैंने बुढ़िया की ओर देखा। वह तब तक घर के बाहर निकल चुकी थी। मैंने भीतर घुसते डर को भगाने के लिए दान सिंह की तरफ़ देखा। वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। उसके दोनों होंठ बहुत चौड़े और जबड़ों की ओर खिंचे हुए थे। आँखें बाहर को निकली हुईं। यह तो एकदम मेंढक जैसा है। इस ओर मेरा ध्यान पहले क्यों नहीं गया, जबकि यह मेरे ही बगल में बैठ कर भीमताल से यहाँ तक आया? क्या मैं इसी डरावने आदमी के साथ आया था ? मैंने सोचा और नज़रें हटा लीं। लेकिन इस ख्याल ने मुझे और ज़्यादा डरा दिया। मैं मनुष्यों के बीच हूँ या कहीं और ? मेंढकमुखी दान सिंह की ओर दुबारा देखा। उसने दोनों लड़कियों की नज़रें बचा कर कनपटी पर पेचकश-सा घुमाया। यह संकेत था कि बूढ़ी औरत खिसकी हुई है। लेकिन मैंने ग़ौर नहीं किया। यह बात तो उसने बाद में बताई। मैं तो उसके होंठों और आँखों को ही देखे जा रहा था। सचमुच वह उन चार सफ़ेद और ठंडी औरतों जितना ही, बल्कि उनसे थोड़ा ज़्यादा, डरावना था।

    “बाकी बातें तो मम्मी करेंगी।” लड़की ने बताया।

    मैं चाय पी चुका था। बिस्किट सीले हुए थे, इसलिए छोड़ दिए। चाय पीने और कुछ खाने में भी डर-सा लग रहा था। मैंने लड़की से पूछा, वह क्या करती है ? उसने थोड़ा सोचा और बोली, “कुछ नहीं।”

   मेंढकमुखी बीच में कूद पड़ा, “रूपा ने एम.बी.ए किया है।” इस बात पर मैंने प्रशंसात्मक लहजे में ‘ओह’ कहा तो वह बोला, “दिल्ली में नौकरी करती थी। छोड़ कर आ गई।”

   हाँ, लड़कियों का घर से दूर नौकरी करना थोड़ा मुश्किल तो है। बल्कि, मैं तो कहूँगा, ठीक भी नहीं है। आपने सही किया। मैंने कहा। यह सुन कर लड़की के चेहरे पर मामूली असंतोष नज़र आने लगा। मेंढकमुखी ने बताया कि वह अपनी माँ और खास तौर पर दादी की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ आई। मैंने इस बात को ज़्यादा तवज्जोह नहीं दी। मेरे लिए केवल छोड़ आने का महत्व था। छोड़ने की इस फ़ालतू वजह का नहीं। तभी लड़कियों की माँ लौट आई। मुँह धोकर और थोड़ा सँवर कर आई थी शायद। इस वक्त पहले से मामूली बेहतर और तरोताज़ा लग रही थी। लेकिन चेहरा निर्जीव और निचुड़ा हुआ ही था। बिना खून का मुँह कितना ही धो लो। मैंने सोचा।

   उसने हमारी बातचीत सुन ली थी, लेकिन उसमें दखल नहीं दिया। बारिश रुक गई थी। अंधकार थोड़ा छँट गया। पर शाम का अपना अँधेरा तो था ही, जो बगीचे, घर और उस पूरे इलाक़े को धीरे-धीरे अपने आग़ोश में ले रहा था। उन्होंने एक मरा हुआ-सा बल्ब जला दिया था, जिसकी रोशनी उसी के आसपास खो गई थी। मरियल रोशनी में वह कमरा और उन लोगों के चेहरे और अधिक रहस्यमय लगने लगे। मैं मेंढकमुखी को पहले से नहीं जानता था। उस घर की महिलाओं को जानने का तो सवाल ही नहीं होता। कहीं ग़लत जगह तो नहीं फँस गया ? मेरी जेब में पचास हजार रुपए थे। मैं कसमसाया।

   “चलिए, पहले देख लीजिए। वरना अँधेरा हो जाएगा।”— रूपा की माँ ने कहा और घर से बाहर निकल गई। उसके पीछे मेंढकमुखी, मेंढकमुखी के पीछे मैं और मेरे पीछे बड़ी बुत। छोटी अंदर रह गई। बुढ़िया पहले से बाहर टहल रही थी। हवा में मामूली नमी थी, जो अच्छी लग रही थी। मुझे ठंड से झुरझुरी होने लगी। वे लोग पेड़ों के बीच से घर के बाईं ओर बढ़ने लगे। पत्तियों से कभी-कभी पानी सिर पर टपक पड़ता। इससे बचने के लिए लड़की ने सिर पर दुपट्टा ओढ़ लिया था। बुढ़िया बगीचे के आख़िरी छोर पर पहुँची हुई थी। वह अपना एक हाथ माथे पर रखे सड़क की ओर टकटकी लगाए देख रही थी। बाहर आकर मेरा भय थोड़ा कम हुआ। घर से लगभग सौ गज आगे निकल कर रूपा की माँ ने बताया, “ये है वो ज़मीन।”

   यह उनकी ज़मीन का आख़िरी हिस्सा था। इसी के अंतिम छोर पर बुढ़िया खड़ी थी, जहाँ से सड़क साफ़ दिखाई देती थी और उनके बगीचे से कई फुट नीचे थी। घर के बगल से शुरू होकर आख़िरी छोर तक उन लोगों का फलों का बगीचा था। शायद ऊपर भी हो, क्योंकि सीढ़ीदार बगीचा और उसके  पेड़ काफ़ी ऊँचाई तक नज़र आ रहे थे।

   “ये ग्रीन स्वीट है।” सेब के एक पेड़ की ओर उँगली लगाते हुए मेंढकमुखी ने कहा। मैंने अनुमान लगाया कि यह सेब की कोई प्रजाति होगी। इस जगह उतने अच्छे सेब नहीं होते, जैसे रामगढ़ में। उसने बिना पूछे ही बताया। फिर उसने उछल-उछल कर ठिगने पेड़ों से कुछ प्लम और खुवानी तोड़ीं और मुझे खाने को दीं। उन ताज़ा फलों का स्वाद अद्भुत था। ज़मीन का आख़िरी हिस्सा थोड़ा उजाड़-सा लग रहा था। शायद बेचना है यह सोच कर इन लोगों ने इसकी ठीक से देखभाल नहीं की थी। ऐसा मेरा अनुमान था। इस बारे में मेंढ़कमुखी से बात की तो सफाई देने लगा। कि जो पेड़ घर के पास होते हैं वो ज़्यादा स्वस्थ होते हैं। पेड़ भी मनुष्यों की बातचीत सुनते हैं। संगीत सुनते हैं। इसी का असर पड़ता है।

   मैंने आश्चर्य जताया कि यहाँ के पेड़ों को इन बुतों की बातचीत और संगीत सुनने को मिलता होगा ? मेंढकमुखी हँसने लगा। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मेंढ़क हँस रहा है।

  “आपको पाँच नाली चाहिए ना ?”—लड़की ने मेरे पास आकर पूछा।

  “चार काफ़ी है। पाँच भी ले सकते हैं।”

   “ठीक है, आप जैसा चाहें।”— उसने कहा। हम लोग वापस उनके घर की ओर बढ़ने लगे। तभी लड़की ने अपनी दादी को आवाज़ दी, जो अब भी खेतों के अंतिम छोर से सड़क की तरफ़ देख रही थी। उसकी आवाज़ सुन कर दादी धीरे-धीरे लौटने लगी। मेरे मन में सवाल आया कि वह क्या देख रही होगी। मैंने यह बात लड़की से पूछ ली। वह थोड़ा असहज हो गई। बोली, “’कुछ नहीं, ऐसे ही। इंतज़ार करती हैं।”

  “किसका ?”

  उसने जवाब नहीं दिया। माँ ने बात सुनी पर वह भी कुछ नहीं बोली। दान सिंह पीछे था। उसने मेरा हाथ खींच लिया। मैं ठिठक गया। लड़की और उसकी माँ आगे हो गए थे। वह फुसफुसाया— ये बुढ़िया पागल है। अपने बेटे का इंतज़ार करती है। इन लड़कियों के पिता का। उनकी दो साल पहले नदी में डूब कर मौत हो गई थी। ऋषिकेश गए थे। पता नहीं क्या हुआ, नहाने की धुन सवार हो गई। डुबकी लगाई और ग़ायब। लाश भी नहीं मिली। केवल नदी किनारे रखे कपड़े मिले। बुढ़िया को यक़ीन है कि उसका बेटा मरा नहीं। वह कपड़े किनारे पर रख कर ग़ायब हो गया। हो सकता है साधु बन गया हो। या कोई और वजह हो। बस, तभी से खिसक गई। दिन भर रास्ते पर नज़रें गड़ाए रहती है। जब रात हो जाती है और रास्ता दिखना बंद हो जाता है, तब जाकर घर के अंदर आती है। कभी-कभी रात को भी अचानक उठ खड़ी होती है और सबको जगा देती है। कहती है, टार्च लाओ, मैं सड़क तक जाऊँगी। वो आ रहा है।

   हम लोग पीछे-पीछे चलते हुए वापस आ गए। घर के अंदर बैठे ही थे कि बूढ़ी औरत ने अंदर घुसते हुए चिंतित स्वर में बहू से कहा, “बारिश हो रही है। छाता दे दे। मैं उसे ले आऊँ।”

   बारिश कुछ देर पहले बंद हो चुकी थी। मैं उसे देख कर काफ़ी सतर्क था। ऐसे लोगों का कोई भरोसा नहीं। बहू ने बूढ़ी औरत को समझाया, “आ जाएंगे। तुम आराम करो।”

   बुढ़िया का मन नहीं माना। वह घर के बाहर निकल कर आँगन में बैठ गई और रास्ते की तरफ़ टकटकी लगाए देखने लगी। लड़कियों की माँ दीवान पर बैठ गई थी। वहाँ से आँगन दिखाई नहीं देता था। लेकिन जिस कुर्सी पर बेटी बैठी थी, वहाँ से दूर तक साफ़ दिखाई देता था। माँ ने बेटी से कहा, “देखते रहना। निकल न जाएँ।”

   लड़की ने आवाज़ दी, “आमा (दादी), चाय बन रही है। कहीं जाना मत।”

   बुढ़िया मंद-मंद कुनमुनाने लगी। बीच-बीच में उसके मुँह से गुरगुराहट-सी निकलने लगती। औरत का ध्यान बार-बार उस ओर जा रहा था। मैं भी कनखियों से सुनने की कोशिश कर रहा था कि ये आवाज़ें आख़िर कहाँ से आ रही हैं। औरत ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा, “सास जो हैं, रूपा के पापा का इंतज़ार करती रहती हैं।”

   मुझे पता चल चुका था। इसलिए चौंका नहीं। उसका गला रुँध रहा था। कुछ देर सन्नाटा छा गया। उसने खुद को सँभाला और बताने लगी कि वह घर को दुमंज़िला बनाना चाहती है। इसीलिए पैसों की ज़रूरत है। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई। घर में पर्याप्त जगह थी। वह बोली, हमारे बगल में वन विभाग वाले मोहन कांडपाल जी का घर है। दुमंज़िला है। मेरी सास कई बार वहाँ घुस जाती हैं और ऊपर की मंज़िल के उस कमरे में पहुँच जाती हैं जहाँ पश्चिम की ओर एक खिड़की है। उस खिड़की से सड़क साफ़ दिखाई देती है। उनकी खिड़की पर खड़ी होकर वे घंटों सड़क की तरफ़ देखती रहती हैं। बड़ी मुश्किल से ये दोनों उन्हें लाती हैं।

   उसका गला फिर से रुँधने लगा। कुछ देर चुप होकर उसने छत की ओर देखा। अपना ध्यान बँटा कर खुद को संयत किया। बोली— यह सब अच्छा नहीं लगता। बगीचे के किनारे भी कई बार खड़े-खड़े चक्कर खाकर गिर चुकी हैं। आयेदिन चोट लगा लेती हैं। अभी हाल में हाथ तुड़वा लिया। इससे पहले पता नहीं कैसे गर्दन में झटका लग गया।

   वह उदास हो गई थी। दोनों बेटियों की आँखें डबडबा आईं। जब वह काफ़ी देर तक कुछ बोली नहीं तो दान सिंह अपनी ओर से बताने लगा। ये लोग दूसरी मंज़िल में, पश्चिम की तरफ़, एक बड़े हिस्से को खुला रखना चाहते हैं। बालकनी जैसा। जिसमें कुर्सियां पड़ी रहें, चारपाई रहे, ताकि आमा बैठ कर इत्मीनान से सड़क को ताकती रहें। जब बैठे-बैठे थक जाएँ तो लेट जाएँ।

   बड़े अजीब लोग हैं। मैं सोचता रहा। ये भी तो एक तरह का पागलपन है।

   अब तक अँधेरा पूरी तरह घिर आया था। घर में रोशनी थोड़ा तेज़ लगने लगी थी। लड़की की माँ पूछने लगी कि मुझे ज़मीन किसलिए ख़रीदनी है ? मैंने बताया, मुझे पहाड़ पसंद हैं। एक घर यहाँ बनाना चाहता हूँ। कभी-कभार आते रहेंगे। फिर बुढ़ापे में यहीं बस जाएंगे। भागमभाग से दूर सुकून से रहेंगे। यह सुन कर उसके चेहरे पर संतोष की हल्की-सी लहर दौड़ी। उसने ग़ौर से मेरी ओर देखा। शायद मेरी उम्र का अनुमान लगा रही थी। या उसे आश्चर्य हुआ हो कि चालीस की उम्र में बुढ़ापे के सुकून की चिंता करने वाला यह कैसा व्यक्ति है।

  लड़की ने बुढ़िया को फिर से आवाज़ दी, “आमा, बैठे रहना। चाय बन रही है।”

  बूढ़ी ने कोई उत्तर नहीं दिया। केवल पलट कर देखा। उसके मुँह से लार निकल रही थी। छोटी बुत, जो अब प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गई थी, झट से उठी और एक कपड़े से बुढिया का मुँह पोंछ आई। बुढ़िया फिर से चूँ-चूँ का स्वर निकालने लगी। मैं काफ़ी देर बाद समझ पाया कि यह आवाज़ कहाँ से आ रही है। मुझे अब तक छोटी बुत पर शक हो रहा था। लड़कियों की माँ ने मेंढकमुखी की ओर देखने के बाद मुझे संबोधित किया, “आप सोचेंगे, ज़मीन बेचने वाले को मन मुताबिक पैसा चाहिए। लेकिन ऐसी बात नहीं है। लोग अच्छे होने चाहिए।”

  “बहुत अच्छी सोच है आपकी। पड़ोसी का अच्छा होना ज़रूरी है। हर किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।” मैंने कहा और अपने बारे में बताने लगा। कि मेरा एक बेटा है दो साल का। तीन लोगों का परिवार है। शाकाहारी हूँ। कुछ साल पहले तक रोज़ सुबह पूजा करता था। फिर सोचा, हमें भी पाँच नहीं तो दो वक्त तो करनी ही चाहिए। अब सुबह-शाम का नियम बना लिया है। कई धार्मिक संस्थाओं से जुड़ा हूँ। हम लोग दिल्ली में रामनवमी और दुर्गापूजा का आयोजन करते हैं। सावन में कांवणियों की सेवा भी करते हैं।

  तीनों के मुँह सपाट बने रहे। केवल मेंढकमुखी के चेहरे पर प्रशंसा का भाव था। वह खुद नवरात्रि में नौ दिन के व्रत रखता था और दाढ़ी नहीं बनाता था। वह अपने इलाक़े में कुछ साल पहले बंद हुई रामलीला फिर से शुरू करवाने की तैयारी में था। यह उसने रास्ते में बताया था।

   “आप तीन ही लोगों का परिवार है ? मतलब… माता-पिता…भाई-बहन… ?”

   “दो बहनें हैं। उनकी शादी हो चुकी। एक मुंबई में है और एक चंडीगढ़ में। माता जी हमारे साथ रहती हैं।”

   लड़कियों की माँ चौंकी कि तब तीन लोगों का परिवार कैसे हुआ ? मैंने स्पष्ट किया। माता जी का कोई एक ठिकाना नहीं है। कभी हमारे यहाँ, कभी चंडीगढ़, कभी-कभार मुंबई और कभी पिताजी के पास। पिताजी का ज़िक्र होने पर वह और चौंकी। उसने पिताजी के बारे में पूछा। उसे लगा कि वे या तो होंगे नहीं या दिल्ली से बाहर नौकरी अथवा व्यवसाय करते होंगे। मैंने बताया कि पहले दिल्ली रहते थे। अब पास ही में हैं। ग्रेटर नोएडा में। वह पिताजी के अलग रहने का कारण पूछने लगी। मैंने बता दिया। उन्हें अकेले रहना अच्छा लगता है।

   उस स्त्री ने और उसकी दोनों बेटियों ने एक-दूसरे को देखा। फिर उसने पूछा, “क्यों, क्या दिक्कत है उनके साथ ?”

  “दिक्कत कुछ नहीं है। बस ऐसे ही।” मैं बेवजह मुस्कराया। लेकिन उनकी आँखों में अविश्वास था। तब मैंने झिझकते हुए सारी बातें विस्तार से बता दीं— मैं सरकारी नौकरी में हूँ। मेरी पत्नी बुटीक चलाती है। छुट्टी के दिन मैं भी उसकी मदद करता हूँ। जब ज़्यादा काम हो तो छुट्टी ले लेता हूँ। सरकारी नौकरी का यही फ़ायदा है। दिल्ली में एक आदमी की कमाई से कुछ नहीं होता। पिताजी रिटायर हो चुके। उन्होंने दिल्ली में तीन कमरों का फ्लैट बना लिया था। आप लोग जानते ही हैं कि बड़े परिवार में रहना बड़े शहर वालों के लिए कितना मुश्किल होता है। मेरी पत्नी ने कहा कि मैं पिताजी से बात करूं। मैंने उन्हें साफ़-साफ़ बता दिया। हम अलग रहना चाहते हैं। पिताजी चुप रहे। न हाँ कहा और न ना। हम चले गए।

   किराये पर हमें बड़ी दिक्कत हो रही थी। पिताजी को समझाया कि वो इस घर को बेच दें और आधा पैसा हमें दे दें। आधे पैसों से वे अपने लिए एक छोटा घर ले लें। काफ़ी हील-हुज्जत के बाद वो मान गए। उन्होंने आधे पैसों से ग्रेटर नोएडा में एक छोटा और सस्ता फ्लैट ले लिया और आधा पैसा हमें दे दिया। हमने कुछ नकद और कुछ लोन लेकर पिछले साल अपना घर ख़रीद लिया। कुछ रकम बच गई तो हम उसे यहाँ इनवेस्ट कर रहे हैं। आपको साफ़-साफ़ बताऊँ, मेरे पास भी कोई ब्लैक मनी नहीं है।

   हालाँकि मेरे दिमाग़ में एक और योजना चल रही थी। लेकिन मैंने बताया नहीं कि अगर भविष्य में इस जगह की क़ीमत बहुत ज़्यादा बढ़ गई तो मैं इसे पूरा या आधा बेच भी सकता हूँ। बता देने से वे लोग बिदक सकते थे। मेरी बात ध्यान से सुनने के बाद उन तीनों के चेहरों पर तनाव-सा दिखाई दिया। बड़ी लड़की अचानक रोने लगी और उठ कर अंदर चली गई। उसने इशारे से अपनी माँ को अंदर बुलाया। छोटी बुत बिना बुलाए उनके पीछे-पीछे चली गई। मैं हैरान था। मेंढ़कमुखी ने कंधे उचका कर संकेत दिया कि उसे नहीं पता क्या हुआ। कोई पाँच-सात मिनट बाद तीनों एक साथ बाहर निकलीं। बड़ी ने अपने आप को संभाल लिया था। वे अपनी-अपनी जगह पर बैठ गईं। बड़ी बुत ने मेंढकमुखी की ओर देख कर कहा, “ज़मीन नहीं बेचनी।”

   यह सुन कर मैं हक्का-बक्का रह गया। मेंढकमुखी की अंटा आँखें हैरानी से और बाहर को निकल आईं।

   “अभी तक तो आप लोग तैयार थे, अचानक क्या हुआ ?” मैंने पूछा। फिर हताश होकर कहने लगा कि मैंने हर बात सही-सही बता दी। मैं इसी वक्त एडवांस देने को तैयार हूँ। जिस दिन आप लोग चाहेंगे उसी दिन रजिस्ट्री के लिए आ सकता हूँ। पैसे मेरे पास तैयार हैं।

   मेरी बात सुन कर लड़की की माँ ने गहरी साँस छोड़ी, “बात पैसों की नहीं है।”

   “तो क्या है, साफ़-साफ़ कहिए।”— मेंढकमुखी बोला। माँ कुछ कहना चाहती थी, लेकिन बेटी उसे रोकती हुई खुद बोल पड़ी, “इरादा बदल गया।”

   अब तक घर के बाहर घुप्प अँधेरा छा गया था। दान सिंह बातचीत में आए इस अप्रत्याशित मोड़ से अकबकाया हुआ था। मैं अपमानित मसहूस कर रहा था और निराश हो गया था। पत्नी से कह कर आया था कि पहाड़ पर ज़मीन का सौदा करके लौटूँगा। मैंने आख़िरी बार कोशिश की, “देखिए, मैं दस-बीस हजार ज़्यादा दे सकता हूँ। इससे बाकी मेरे पास नहीं हैं। छोटी-मोटी बातों को छोड़िए और फाइनल कीजिए।”

  “हम फाइनल कर चुके। नहीं बेचनी।” छोटी बुत ने पहली बार मुँह खोला। उसकी आवाज़ मुझे बड़ी कर्कश और झल्लाई हुई लगी। दान सिंह ने अंदर के कमरे में जाकर कुछ देर उन लोगों से मंत्रणा की। पर वे नहीं माने। वह बाहर निकल आया और मुझे चलने का इशारा किया। गाड़ी स्टार्ट करते ही मैंने उससे पूछा, “इन औरतों को अचानक क्या हुआ ?”

   “ये तीनों उस बुढ़िया से ज़्यादा पागल हैं।” उसने कहा और फिर धीरे-से बोला, “जिद्दी भी हैं।”

   “लेकिन नहीं बेचने का कारण तो बताया होगा आपको ? और वो लड़की रोई क्यों ?”

    “पिताजी की याद आ गई थी।” कह कर वह चुप हो गया। फिर एक क्षण बाद बोला, “मैं कल आपको इससे अच्छी जगह दिखाता हूँ।”

   मैंने उसे बताया कि यह जगह मुझे पसंद आ गई थी। अब तो बाद में कभी देखेंगे। दान सिंह  मेरे साथ अपनापा जताने लगा, “मैं भी जिद्दी हूँ। आपको ज़मीन दिला कर रहूँगा।”

   हम लोग लौट रहे थे। आधा किलोमीटर के रास्ते में हम दोनों ही चुप रहे। मुख्य सड़क पर आते ही मैंने गाड़ी रोक दी और उतर कर सिगरेट जला ली। वह भी उतर आया। एक लंबा कश खींचने के बाद मैंने उससे फिर पूछा कि आखिर वे तीनों बिदक क्यों गईं ?

  “देखिए ऐसा है,” उसने कुछ बताते-बताते बात संभाली, “औरतों की खोपड़ी है। पलट गई।”

   मैं जानता था कि बात कुछ और है। दान सिंह ने एक बार फिर उन्हें पागल करार दिया, ताकि मुझे भरोसा हो कि बात सिर्फ़ इतनी सी है। कहने लगा, तभी तो पढ़े-लिखे होकर भी ऐसी हालत में हैं। बड़ी तो नौकरी छोड़ आई। छोटी वाली ने एम.एस-सी करने के बाद बी.एड कर रखा है और यहीं एक प्राइवेट स्कूल में चार-पाँच हजार रुपए की मास्टरनी है। शादी की चिंता न माँ को है और न बेटियों को। आप समझ सकते हैं। पागल नहीं तो और क्या हैं ?

   “ये लोग नास्तिक हैं क्या ?”

   “नहीं, ऐसी बात नहीं है। केवल छोटी बेटी पूजा-पाठ में विश्वास नहीं रखती।”

   “लेकिन आप उनके इनकार की वजह को छुपा क्यों रहे हैं ?”

   वह बगलें झाँकने लगा। साफ़ लग रहा था धर्मसंकट में पड़ गया है। बोला, “उनको लगा…उनको ठीक नहीं लगा। …देखिए ये ऐसे लोग हैं जो बुढ़िया को पागलखाने भेजने की जगह उसके लिए दुमंज़िला बनवा रहे हैं। …सोचने की बात है, आप तो ज़मीन के पूरे पैसे दे रहे हैं।”

   मैं सिरगेट के कश तेज़-तेज़ खींचने लगा। दान सिंह ने मेरा पक्ष लेते हुए फिर कहा, “अजीब बात है। ज़मीन बेच रहे हो, दान में तो नहीं दे रहे ?”

  मैं चुपचाप सुनता रहा। मेंढ़कमुखी जोश में आ गया, “एक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को चार पागल औरतें क्या समझेंगी ?… नहीं जी, ये लोग इस लायक हैं ही नहीं कि आप इनके पड़ोस में रहें। इन्हें तो सबक तब मिले जब कोई ‘पाकिस्तानी’ इनके बगल में आकर बस जाए।”

  जो वह कहना चाहता था, मैं समझ रहा था। मुझे दान सिंह से सहमत होना चाहिए था, क्योंकि अंततः वह मेरा ही पक्ष ले रहा था। लेकिन मैं चुपचाप गाड़ी में बैठ गया। वह भी अंदर आ गया। मैंने चाभी लगाई पर उसे घुमाया नहीं। स्टीयरिंग ह्वील पर हाथ रखे सोचता रहा। दान सिंह लगातार मुझे ही देख रहा था। कुछ तो गड़बड़ है। या तो मैं ग़लत हूँ या वे लोग। मैंने उसकी ओर देख कर कहा। उसे केवल धंधे की चापलूस भाषा आती थी। बोला, “आप कभी ग़लत नहीं हो सकते। सनकी और पागल लोगों के साथ आप अपनी तुलना कैसे कर सकते हैं ?”

  मुझे उनका इनकार परेशान कर रहा था। दान सिंह ने समझाया कि उन्हें भूल जाऊँ। कल इससे अच्छी ज़मीन दिखाता हूँ। मैं भूल नहीं पा रहा। मैंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए उससे कहा।

  “कहीं आपको बड़ी वाली पसंद तो नहीं आ गई ?” कह कर वह ज़ोर से हँसा, “लड़की मस्त है। बल्कि चारों से थोड़ा कम पागल है।”

   बकचोद कहीं का। मैंने मन ही मन सोचा। उसकी बात से मेरे अंदर गुदगुदी-सी नहीं हुई। उसे छोड़ने के बाद जब मैं होटल पहुँच कर बिस्तर पर गिरा तो नीम बेहोशी की हालत में या शायद नींद में बहुत दुखी था। चारों चिट्टी ज़नानियाँ सफ़ेदी की तरह मेरे अंदर फैल रही थीं। उसी सपने में या नीम बेहोशी में धीरे-धीरे मुझे लग रहा था कि यह जो उजली औरतें और उनकी सफ़ेदी मेरे अंदर पसर रही है, वह मुझे लोरी जैसा सुकून दे रही है। मुझे धीरे-धीरे चैन की नींद आने लगी है। शायद आ चुकी है। और इसी नींद में उदास और बीमार पिताजी मेरे सपने में प्रवेश कर रहे हैं।

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ए-9, इंडियन एक्सप्रेस अपार्टमेंट,

मयूर कुंज, मयूर विहार-1, दिल्ली-110096

फोन- 9811807279

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4 comments

  1. A. Charumati Ramdas

    क्या पिताजी को छोड़ दिया, यही कारण था? रहस्य को अच्छी तरह बनाए रखा है , राकेश जी आपने . अंत तक उत्सुकता बनी रही…

  2. जी। छद्म की ओर संकेत है। वह व्यक्ति धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने, कांवड़ियों की सेवा करने की बात करता है और ऐसी ही बातों से खुद को एक अच्छा व्यक्ति साबित करता है। लेकिन अपने ही पिता को अकेला कर देता है। हम आज चैरिटी या सेवा का दिखावा करते हैं। भूल जाते हैं कि यह घर से ही शुरू होती है। उन लड़कियों और मां की नज़र में बुजुर्गों की उपेक्षा और अनदेखी करने वाला व्यक्ति अच्छा व्यक्ति नहीं है, इसलिए उसे ज़मीन बेचना उन्हें मंजूर नहीं।

  3. Raj Gopal Singh Verma

    यह कहानी जब मैंने पहली बार पढ़ी थी, तभी मैं विस्मित हुआ था, और मैंने राकेश जी को फोन कर बधाई दी थी. खास बात यह भी रही कि “हंस” के उस अंक में जो अन्य कहानियां प्रकाशित हुई थी, वे इस कहानी के समक्ष कहीं नहीं टिकती थी. राकेश जी की और कहानियों को पढ़ने की उत्कंठा बनी हुई है, समय पर अपडेट अवश्य करूंगा.

  4. शुक्रिया वर्मा जी।

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