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‘स्व’ रहित स्वाभिमान और स्त्री-विमर्श के मूलभूत सिद्धांतो की जुगलबंदी की कहानी

वरिष्ठ लेखिका गीताश्री का उपन्यास ‘वाया मीडिया – एक रोमिंग रिपोर्टर की डायरी’ इस साल विश्व पुस्तक मेले में आया था। कुछ महिला पत्रकारों के कामकाज पर आधारीय यह उपन्यास बहुत अलग ज़मीन का उपन्यास है। आज इसकी समीक्षा लिखी है युवा लेखिका अणुशक्ति सिंह ने- मॉडरेटर

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लफ़्ज़ों की दस्तरस में मुकम्मल नहीं हूँ  मैं

लिक्खी हुई किताब के बाहर भी सुन मुझे…

–       अहमद शनास

गीता श्री की किताब वाया मीडिया पर लिखने के लिए कोई और पंक्ति इतनी मुफ़ीद नहीं मालूम पड़ी, जितना अहमद शनास का यह शेर.

‘वाया मीडिया – एक रोमिंग रिपोर्टर की डायरी’… किस्सों की बयानगी जिसकी शुरुआत होती है नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में, कहानी का पहला सिरा उठाती है अनुराधा – किसी पंजाबी कस्बे की बेलौस लड़की जिसे हिंदी से इश्क़ है और  पत्रकारिता जिसका जुनून है. घर आये हुए रिश्ते को ठुकरा कर वह अखबार के दफ़्तर में बेधड़क दाख़िल होती है कि उसे लिखने का सउर मालूम है, वह आत्म-विश्वास से लबरेज़ है, उसे भरोसा है कि वह जिस भी मुद्दे पर लिखेगी उसकी पूरी पड़ताल कर डालेगी. ज़िन्दगी को अपनी ठोकरों पर रखेगी लेकिन अनुराधा को नहीं मालूम है कि हर जगह पहले उसे साबित करना होगा कि वह स्त्री होने के बावजूद ‘योग्य’ है.

अनुराधा रोमिंग रिपोर्टर के तौर पर बहाल होती है और साथ ही बहाल होती है उसकी जद्दोजहद अपने आप को साबित करने की. यह साबित करना एक दिन की परीक्षा पास करने जैसा नहीं है, यहाँ तो हर रोज़ इम्तिहान हैं. हर रिपोर्ट दो दास्ताँ सुनाती है, एक जिनके क़िस्से रपट में दर्ज होते हैं दूसरा जो हमेशा ही अनकहा रह जाता है – रिपोर्टिंग करती लड़की के अपने संघर्ष, अपना डर…

वह लड़की जो बीहड़ों और सुदूर गाँवों से बिना झिझके पन्ने भर लाती थी, उसके खीझ का आलम बसता था उसके अपने आस-पास. एक शानदार रिपोर्ट पर शाबाशी की जगह हासिल होती बॉस की कामुक नज़र… वह नज़र जो संभवतः हर स्त्री का दुःख है. जिससे न किताब की लेखिका अछूती रही होंगी, न मैं.  एक मुकम्मल किताब वह होती है जो पढ़ने वाले को यह अहसास दिलवा दे कि कहीं न कहीं, यह उसकी ही कहानी है. लेखक-पाठक में मध्य इस अन्तर्निहित सम्बन्ध स्थापन में किताब लेखक को सुख के तिलिस्मी प्रभाव से तब भर देती है जब वह लेखक की सुप्त इच्छाओं को कथा के अंश के रूप में ही सही, किन्तु कार्यान्वित कर देती  है.

अनुराधा संपादक की निगाहों की ओर देखती है. अपने वक्ष को उसका लक्ष्य जानकर सिटपिटा जाती है. यहाँ वह किसी भी आम स्त्री की तरह चुप रह सकती थी लेकिन उसने अपनी नौकरी की परवाह न करते हुए अपने सम्पादक को उसकी कमज़र्फी के खरी-खोटी सुना देती है. अनुराधा की यह हिम्मत वाया मीडिया को स्त्री-विमर्श की अलग कतार में लाकर खड़ा कर देती है, उस दुनिया में जहाँ लड़कियां चुप होकर भुक्तभोगी नहीं हैं. वे पलटवार जानती हैं.

अनुराधा कुटिल पितृसत्त्ता द्वारा रचे गये कुचक्रों में उलझकर जान देने की जगह नयी उड़ान ढूँढने वाली लड़की है जो वाया शिमला दिल्ली पहुँचती है, यहीं उसकी मुलाक़ात होती है अनुपमा से. रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क में वरिष्ठ भूमिका तक पहुंची अनुपमा की अनुभवी आँखों ने भी एक पूरी यात्रा तय की है. हर यात्रा के अपने पड़ाव हैं. हर पड़ाव की एक कहानी है. इन कहानियों के पीछे छिपे अपने-अपने दुःख और सुख हैं और साथ है अपनी शर्तों पर बेहतर करने का जज्बा.

पुरुषों से भरी हुई मीडिया की दुनिया में जहाँ स्त्रियों की संख्या पहले से ही कम है, उन हालात में अनुपमा अपने आप को सहज रखते हुए बहनापे का मंत्र इस क़दर साथ लेकर चलती है कि उसके मन में उस स्त्री के लिए भी संवेदनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं जिसने हमेशा उसके रास्ते में अवरोध ही इकट्ठा किये.

‘सिस्टरहुड अर्थात बहनापा’ स्त्री-विमर्श का मूल इस मन्त्र में है और वाया-मीडिया ने इस मन्त्र को बेहद रुचिकर शब्द दिए हैं. अनुराधा का अनुपमा के साथ खड़ा होना, अनुपमा की शालिनी से बेपरवाह दोस्ती, शालिनी का अनुपमा के लिए प्यार  – यह सब बहनापे पर गठित हुए संबंधों के शानदार मज़ामीन हैं.

चालबाज़ पुरुषों के हाथ का खिलौना बनी रंजना बार-बार अपनी साथी महिला पत्रकारों को तंग करती है. अनुपमा भी उसका शिकार रही है लेकिन जैसे ही रंजना की नौकरी जाती है, अनुपमा ग्लानी से भर जाती है. दोष न होने के बाद भी वह तब तक सुकून से नहीं बैठती है जब तक रंजना को नौकरी नहीं मिल जाती है. सुमधुर स्त्रीत्व किन्तु सजग स्त्रीत्व की कितने परतें हैं अनुपमा के क़िरदार में… साथी पत्रकार जब अनुपमा के समक्ष रंजना के चरित्र पर टिप्पणी करता है तो अनुपमा क्रोध से भर उठती है. अनुपमा से किसी और प्रतिक्रिया की उम्मीद में बैठे साथी पत्रकार हतप्रभ हो जाते हैं, अनुपमा टिप्पणी करती है, “पूरा मीडिया मेल डोमिनेटिंग है राजीव जी, स्त्रियाँ इस्तेमाल की जा रही हैं. हमें ये खेल समझ में आ गया है.’

अनुपमा के ज़रिये लेखिका ने लगभग सभी पुरुष-आच्छादित  संकायों के कथित स्त्री-विमर्श और मंशा पर उचित प्रश्न-चिह्न लगाया है. अनुपमा का पात्र-विस्तार और उसकी कथा यात्रा बरबस याद दिलाते हैं कि इतना सुगढ़ किरदार केवल अनुभव के तासीरों के सहारे गढ़ा जा सकता है.  अनुपमा और अनुराधा दोनों ही पात्र अपनी समस्त मनुष्यगत कमज़ोरियों में भी दृढ़ता का अनुपम उदाहरण हैं. वे वाया मीडिया आयी हैं कि अंकित रह सकें पाठकों के मन-मस्तिष्क पर समय की धारा के पार भी…

सुंदर, सहज भाषा में रचित उपन्यास वाया मीडिया की दूसरी विशेषता प्रिय कवि द्वय अशोक वाजपेयी और आलोक धन्वा की कविताओं के अंश का मनहर समावेशन भी है. लेखिका  ने मनःस्थितियों को दर्ज करने के लिए इन पंक्तियों का जिस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया है, उसकी बस तारीफ़ ही की जा सकती है.

अंत में, वाया मीडिया ‘स्व’ रहित स्वाभिमान और स्त्री-विमर्श के मूलभूत सिद्धांतो की जुगलबंदी की वह कहानी है, जिसे पढ़ा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि इस तरह के उपन्यास हिंदी जगत को बार-बार नहीं मिलेंगे.

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उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है। 

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