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एटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड: स्मृति वन में भटकते मन की कथा-फ़िल्म

सुदीप्ति जब फ़िल्मों पर लिखती हैं तो वह इतना परिपूर्ण होता है कि अपने आपमें स्वतंत्र कलाकृति के समान लगता है। जैसे ‘एटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड’ पर लिखते हुए मानव जीवन में स्मृतियों के महत्व के ऊपर एक सुंदर टिप्पणी की है। इसको पढ़ने के बाद आपको फ़िल्म देखने का मन होने लगेगा। यह फ़िल्म अमेजन प्राइम पर उपलब्ध है। लेख पढ़ने के बाद आप भी देख सकते हैं-मॉडरेटर

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1.

‘तुमसे मिलने से पहले मैं सुंदर थी.’

‘सुंदर? वह तो अब भी हो.’

‘नहीं! मेरे मन की निर्मलता नष्ट हो गई और अब वह चेहरे पर भी झलक जाती है. अब नहीं हूँ. दिखती हूँ ये अलग बात है पर हूँ नहीं.’

‘तो फिर मुझसे दूर हो जाओ.’

‘उसके बाद भी खुद को कैसे बदलूंगी भला? मैं पहले वाली नहीं हो सकूंगी. भले ही तुमसे दूर हो जाऊ तब भी अपने तक वापसी कैसे?’

2.

‘हमारी त्रासदी यह है कि मैं तुमसे नफरत नहीं कर सका और तुम मुझसे प्यार.

मैं तुम्हें अपने ज़हन से निकाल देना चाहता हूँ क्योंकि जब भी मुड़ स्मृतियों की गलियों में चला जाता हूँ मेरा दुःख दुगुना हो जाता है.

मैं सच में तुम्हें भूल जाना चाहता हूँ क्योंकि पीड़ा का दुहराव आसन नहीं है. मेरी स्मृतियाँ तुमसे ज्यादा तबाह करती हैं. जैसे तुम चली गईं ठीक वैसे ही इन्हें क्यों नहीं ले गईं?’

‘क्योंकि मैं उन्हें ले ही नहीं जा सकती, वे “तुम्हारी” स्मृतियाँ हैं.’

ये अलग-अलग लोगों के दो किस्से हैं. इनका Eternal Sunshine of the Spotless Mind से कोई सीधा संबंध नहीं है, फिर भी, मेरे मन में इनका एकदम सीधा संबंध इसी फिल्म से जुड़ता हुआ दीखता है. हम अपनी स्मृतियों को हटा दें या बदल दें तब भी हम अपना होना नहीं बदल सकते. हम कौन हैं इससे तय होता है कि हम क्या करेंगे या किसे चुनेंगे.

सबसे पहले तो इस फिल्म को देखते हुए एक छोटे चरित्र पर मेरा ध्यान अटक गया. मेरी जो डॉक्टर हॉवर्ड के यहाँ रिसेप्शनिस्ट है. उसे डॉक्टर पर क्रश होता है. एक दृश्य में हम उसके उतावलेपन को और क्रश के आगे की बेबसी को देखते हैं जो देखने वाले के लिए बेहद हास्यास्पद है.फिर कुछ ही देर में इस रहस्य से दो-चार होते हैं कि यह पहली बार नहीं हो रहा है. मेरी ने पहली बार के बाद पीड़ा से बचने के लिए अपनी स्मृतियों को मिटवा लिया है और डॉक्टर ने अपने जीवन के  असुविधाजनक सवालों से बचने के लिए उसे मिटाने को प्रस्तुत करवाया. लेकिन, इससे उसकी स्मृतियाँ भर नष्ट हुईं उसकी प्रवृतियाँ, चाहतें नहीं बदलीं. स्मृति लेख मिटा कर एक ही दुख वह दुबारा सहने को बाध्य हुई. दरअसल उसके मन ने डॉक्टर को पसंद किया था. अगर मन को अपनी भावी स्मृतियों को चुनने की आज़ादी होती तो वह किसी ऐसे को क्यों पसंद करता, जो कभी उसका हो ही ना सके?

उस दृश्य में मैं चमत्कृत होती हूँ. हॉलीवुड का एक कमर्शियल सिनेमा मानव मन की इस तह तक पहुँच जाता है. हमारे आस-पास कितने लोग इस भाव से परिचित होंगे और इस बेबसी से? अपने दुख का कारण समझने के बाद भी उसके आगे घुटने टेकने की बेबसी से, अपने होने के मूल में अपने स्वभाव की अहमियत से और दोबारा ना पा सकने की कसक से? एक ही जीवन में किसी को दो बार खो देना कैसा लगता है ना? अपना समान समेट जाती मेरी की आँखों का सूनापन बताता है अगर ‘दुःख ही जीवन की कथा रही’ तब भी उसी से हम बनते हैं न?

फिल्म में अचरज भरा जोएल जब यह जान जाता है कि क्लेमेंटाइन ने उसे अपने जीवन से ही नहीं अपनी स्मृतियों से खारिज कर दिया है तब उसके गुस्से के पास एक ही उपाय बचता है. सीधा-सा उपाय है क्लेमेंटाइन को भी अपनी यादों से बेदखल करने का. इसके बाद उनकी प्रेम कहानी उसकी यादों में देखने को मिलती है. सब कुछ रिवर्स चल रहा होता है. कैसे अलग हुए पहले पता चलता है और कैसे मिले बाद में. कई बार कोई घटना बिना किसी क्रम के भी आ जाती है. जीवन का क्रम भले तय होता है पर स्मृतियों का तो नहीं. वे तो असंबद्ध होती हैं. सबसे प्यारी सबसे पहले आती है इसीलिए उसे मिटाना भी सबसे आसान होता है.

मुझे हैरत इसी बात पर होती है कि स्मृतियों को मिटवाने के क्रम में जोएल का अवचेतन मन स्टेन और पैट्रिक की बातें सुन अपनी ही स्मृति-वीथिकाओं में भटकने लगता है. ठीक उसी वक़्त वह तय करता है कि अब उसे उन्हें नहीं मिटाना है. लेकिन, अपनी उस शारीरिक हालत में वह कुछ भी नहीं कर सकता है. सारी ताकत लगा वह अपनी स्मृतियों की दुनिया के असल वक़्त में वापस जाता है और तय करता है कि उसे अपनी स्मृतियों के भीतर ही कुछ इस तरह छिपाना है जो खुद उसका दिमाग ही न ढूंढ सके. अपने भीतर क्लेमेंटाइन को या उसके लिए अपने प्यार को छिपा लेना है.

कितनी अचरज भरी बात है न? अपने भीतर ऐसी बात छुपाना कि कोई हमारा दिमाग पढ़े तो भी उसे वह बात न मिले. है ना मजेदार.

पर क्यों छुपाना भला? जोएल एक बंद किताब के मानिंद था, वह अपनी खुशियाँ, अपने भय बाँटता नहीं था परंतु इसका मतलब यह नहीं कि वह महसूस भी नहीं करता था. उसके जीवन की सबसे प्यारी याद बर्फ़ पर सोने वाली रही, तो क्या वह याद अगर दुहरायी जाए तो सबसे प्यारी नहीं रहेगी? क्लेमेंटाइन अगर खुद को डैमेज्ड कहती है और एक खुली किताब की तरह है फिर भी उसके मन की कोमलता जोएल को पहचान लेती है. उसका एक बार पहचान लेना दुहराने पर बदल जाएगा?

मन अपने मतलब की बात परख लेता है आप अपनी स्मृतियों को डिलीट बटन से दबायेंगे पर अपने-आप को किस बटन से बदलेंगे? जीवन अगर पेन्सिल से लिखी इबारत हो तो क्या रबर से मिटाकर जो दुबारा लिखा जाएगा वह पूरी इबारत बदल जाएगी? शायद नहीं! क्योंकि हम जो भाषा जानते हैं, जिन शब्दों से प्रेम करते हैं वे वही रहेंगे. जब हम वही रहेंगे तो हमारे निर्णय, प्रेम, वफादारियां और बेवफाइयां भी वैसी ही होंगी. इसका मतलब वेदना अगर नियत है तो वह मिलेगी ही. उसके चयन का अधिकार आपका नहीं है बस उसको सहने के तरीके का अनुसंधान आप कर सकते हैं.

फिल्म में सबसे मोहक है एक-एक करके स्मृतियों का इमारतों की तरह ध्वस्त होते जाना और जोएल-क्लेमेंटाइन का भागते जाना. अपनी ही आँख से अपनी कोई बात चुरा लेने की कोशिश करना ऐसा है मानो गुस्से में कोई ख़त फाड़ ना दिया जाए इसलिए उस ख़त को किसी बक्से में रख चाभी खो देना. लेकिन क्या स्मृतियाँ बचा सकती हैं स्मृतियों को? नहीं! यहाँ तो उन्हें कल्पना बचाती है. जहाँ मनुष्य का साहस और उसकी युक्तियाँ चुक जाती हैं वहाँ बचाती है उसकी कल्पना. शायद किसी भी मुश्किल में वही हमें थाम लेने वाली शक्ति है. कैसे? इसके लिए तो फिल्म देखिए. प्राइम पर मौजूद है.

वैसे तो केट मुझे हर हाल में प्रिय हैं लेकिन इसमें जिम ने बाज़ी मार ली है. उनका अभिनय जबरदस्त है. जोएल का चरित्र आसान नहीं. उसके सादे से जीवन में सारी उथल-पुथल क्लेमेंटाइन ने मचाई है. उसका जीवन उसकी स्मृतियों के बिना खोखला हो जाएगा और इस बात को समझना और फिर जो अपने वश में है उससे ज्यादा जो नहीं है उसे भी करने को लपकते जोएल के चरित्र को जिम कैरी ने जैसे निभाया है उससे भावात्मक रूप से बिखरे हुए मनुष्य के मन की अथाह खूबसूरती झलकती है.

और हाँ! हमारी स्मृतियाँ ही हमें वह बनाती हैं जो हम हैं. होना चाहते हों या नहीं वह तो बाद की बात है. संभव है कोई स्मृति हमारे लिए सबसे कड़वी हो, सबसे ज्यादा इम्तिहान लेती हुई भी लेकिन फिर भी उसे मुड़कर नष्ट कर देना इसलिए भी नहीं हो पाता क्योंकि उसमें हम खुद को पूरी ईमानदारी से और पूरे बिखराव में पाते हैं। स्मृतियाँ तो इतनी निजी होती हैं कि बिना अपने को जज किए किसी को याद किया जा सकता है और बिना उसपर दबाव बनाए, उसे जताए उसे याद कर रोया या हँसा जा सकता है। अपनी स्मृतियों में हम जो होते हैं वह प्रेम करते हैं बिना किसी लोभ के, रोष करते हैं बिना किसी हिंसा के और  वह अपने वजूद का हिस्सा होती हैं। माना कि यादों में कई खूबसूरत नहीं होंगी, कई मुकाम तक न पहुँची होंगी, कई शूल की तरह चुभेंगी तब भी उनमें अपना होना होता है। जिसे हम मन-निकाला दे देते हैं वह भी किसी कोने में मुस्कान के साथ होता है और हम पर उसके प्रति जवाबदेही नहीं होती। जो हैं और जो चले गए सब स्मृतियों के हमारे संसार में हमें रचते हैं। जो चले गए, जिन्होंने ने साथ नहीं दिया उनकी यादों को क्यों धो-पोंछना भला? हम खुद तो हैं न वहाँ भी।

लेखिका

 
      

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4 comments

  1. यह फिल्म अमेजन प्राइम पर नहीं. नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है. इसे ठीक कर लें.

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