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भारत का पहला दलित नेता

क्रिस्तोफ़ जाफ़्रलो द्वारा लिखित भीमराव अम्बेडकर की जीवनी भीमराव आंबेडकर एक जीवनी का अनुवाद राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। जिसका अनुवाद योगेन्द्र दत्त ने किया है। आज बाबासाहेब की जयंती है। इस अवसर पर पढ़िए इस पुस्तक का एक अंश- मॉडरेटर

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बाबासाहब के फिर अन्तिम दर्शन हुए उनके अन्त समय में ही। सुबह मैं हमेशा की तरह अपने काम पर निकला। अख़बारों के पहले पेज पर ही ख़बर छपी थी। धरती फटने-सा एहसास हुआ। इतना शोकाकुल हो गया, जैसे घर के किसी सदस्य की मृत्यु हुई हो। घर की चौखट पकड़कर रोने लगा। माँ को, पत्नी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इस तरह पेपर पढ़ते ही क्यों रोने लगा? घर के लोगों को बताते ही सब रोने लगे। बाहर निकलकर देखता हूँ कि लोग जत्थों में बातें कर रहे हैं। बाबासाहब का निधन दिल्ली में हुआ था। शाम तक विमान से उनका शव आनेवाला था। नौकरी लगे दो-तीन महीने ही हुए होंगे। छुट्टी मंज़ूर करवाने वेटरनरी कॉलेज गया। अज़ीर् का कारण देखते ही साहब झल्लाए। बोले, ”अरे, छुट्टी की अज़ीर् में यह कारण क्यों लिखता है? आंबेडकर राजनीतिक नेता थे और तू एक सरकारी नौकर है। कुछ प्राइवेट कारण लिख।’’ वैसे मैं स्वभाव से बड़ा शान्त। परन्तु उस दिन अज़ीर् का कारण नहीं बदला। उलटे साहब को कहा, ”साहब, वे हमारे घर के एक सदस्य ही थे। कितनी अँधेरी गुफ़ाओं से उन्होंने हमें बाहर निकाला, यह आपको क्यों मालूम होने लगा?’’ मेरी नौकरी का क्या होगा, छुट्टी मंज़ूर होगी या नहीं, इसकी चिन्ता किए बिना मैं राजगृह की ओर भागता हूँ। ज्यों बाढ़ आई हो, ठीक उसी तरह लोग राजगृह के मैदान में जमा हो रहे थे। इस दुर्घटना ने सारे महाराष्ट्र में खलबली मचा दी।

(दया पवार, अछूत, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 168-169)

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध दलित लेखक दया पवार के इस मर्मस्पर्शी संस्मरण से आंबेडकर के किसी निकट सहयोगी के जुड़ाव का एहसास हमें नहीं मिलता। पवार आंबेडकर के राजनीतिक आन्दोलन में तो सक्रिय थे मगर व्यक्तिगत रूप से उन्हें जानते नहीं थे। न ही उनका यह संस्मरण बम्बई के उस मुट्ठी भर सम्पन्न अस्पृश्य तब$के की भावनाओं को दर्शाता है जिसके बीच आंबेडकर का ज़्यादातर जीवन गुज़रा था।1 आंबेडकर के अन्तिम संस्कार में न केवल विशाल जनसमूह ने हिस्सा लिया—जैसा कि पवार इशारा कर रहे हैं—बल्कि उनके अन्तिम संस्कार के साथ पूरे भारत में शोक और सहानुभूति की एक लहर दौड़ गई थी। आंबेडकर का प्रभाव अब सिर्फ़ महाराष्ट्र की सीमाओं तक महदूद नहीं था। यह बात उत्तरी भारत में भी उनके द्वारा स्थापित राजनीतिक पार्टियों की चुनावी सफलताओं से स्पष्ट हो जाती थी। मराठी के अलावा कई भारतीय भाषाओं में भी उनकी ज़्यादातर रचनाओं के असंख्य संस्करण छप चुके थे। आंबेडकर सही मायनों में एक अखिल भारतीय शख्सियत बन चुके थे। वह निर्विवाद रूप से समूचे भारत में प्रभाव रखने वाले पहले अस्पृश्य नेता थे। ख्याति व प्रतिष्ठा के मामले में उनके निकटतम सहयोगी भी उनके आसपास नहीं पहुँचते थे।

दूर से देखने पर आंबेडकर का जीवन साधारण साधनों के सहारे अपने दम पर तरक्की के शिखरों को छूने वाले नायकों की परिकथा जैसा लगता है। भीम राव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को इन्दौर के पास स्थित महू नामक छावनी कस्बे में हुआ था। यह कस्बा इसी नाम की रियासत की राजधानी हुआ करता था जिसको आज़ादी के बाद मध्य भारत (वर्तमान मध्य प्रदेश प्रान्त) में शामिल कर लिया गया था। इन्दौर रियासत के बहुत सारे बाशिन्दों की तरह उनका परिवार भी महाराष्ट्र से यहाँ आया था। गौरतलब है कि इस रियासत का राजवंश भी निचली जाति से ही था। उनका गाँव अम्बावाड़े मराठा रियासत की कोंकण तटीय पट्टी में पड़ता था। लिहाज़ा आंबेडकर का मूल नाम अंबावाड़ेकर भी इसी आधार पर पड़ा था (वर्ष 1900 में उनके एक ब्राह्मण अध्यापक ने उनकी कुशाग्र बुद्धि और व्यक्तिगत गुणों को देखकर उन्हें अपना नाम दे दिया था और इस तरह वह आंबेडकर कहलाने लगे)।

आंबेडकर सालों तक अस्पृश्यों के साथ होने वाले दैनिक भेदभाव से बचे रहे क्योंकि उनके पिता एक छावनी में काम करते थे जहाँ इस तरह का भेदभाव नहीं था। उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में सिपाही थे। खैर, धीरे-धीरे उन्हें भी एक अस्पृश्य व्यक्ति के रूप में जीवन की धूप-छाँव का सामना तो करना ही था। चुनांचे, बचपन में ही उन्हें इस सवाल से जूझना पड़ा कि कोई नाई उनके बाल क्यों नहीं काटना चाहता? सबसे बढ़कर, उन्हें एक ऐसे अपमानजनक अनुभव से गुज़रना पड़ा जिसने उनकी जि़ंदगी की दिशा बदल दी और जिसे वे कभी भी भुला नहीं पाए। यह घटना यों थी : एक दिन वह अपने भाई और बहन के साथ रेल में सवार होकर पिता से मिलने के लिए रवाना हुए। वे वहाँ जा रहे थे जहाँ उनके पिता काम करते थे। जब वे मंजि़ल पर पहुँचे तो स्टेशन मास्टर ने उनको पास बुलाकर कुछ पूछताछ की। जैसे ही स्टेशन मास्टर को उनकी जाति का पता चला, वह ‘पाँच कदम पीछे हट गया!’ ताँगे वाले भी उन्हें उनके पिता के गाँव तक ले जाने को तैयार नहीं होते थे। एक ताँगेवाला तैयार तो हुआ मगर उसने शर्त रखी की ताँगा बच्चों को खुद ही हाँकना होगा। कुछ दूर जाने पर ताँगेवाला नाश्ता करने के लिए एक ढाबे के सामने रुक गया। वह तो भीतर जाकर नाश्ता करने लगा मगर बच्चों को बाहर ही इन्तज़ार करना पड़ा। उन्हें पास में बह रही एक धारा के रेतीले पानी से ही अपनी प्यास बुझानी पड़ी। आंबेडकर के दिलो-ज़हन में अपने हालात का यह भीषण एहसास शायद इसलिए भी तीखा रहा होगा क्योंकि उनके पास बहुत संवेदनशील और पैना दिमाग था।

वर्ष 1907 में इन्हीं बौद्धिक गुणों की बदौलत उन्हें बम्बई स्थित एल्फिन्स्टन हाईस्कूल से मेट्रिकुलेशन का सर्टिफिकेट मिला। कुछ साल पहले उनके पिता यहीं आकर बस गए थे। इसके बाद उन्होंने वज़ीफ़ा हासिल किया, विख्यात एल्फिन्स्टन कॉलेज में दाखिला लिया और 1912 में यहीं से बी.ए. की डिग्री ली। इसके बाद उन्हें अमेरिका जाकर आगे पढ़ाई के लिए एक और छात्रवृत्ति मिली। उनसे पहले उनकी जैसी पृष्ठभूमि के किसी व्यक्ति को ऐसा अवसर नहीं मिला था। उन्होंने न्यूयॉर्क स्थिति कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से एम.ए. की डिग्री हासिल की और फिर 1916 में वे लन्दन के लिए रवाना हो गए जहाँ उन्हें क़ानून की पढ़ाई के लिए ग्रेज़ इन में दाख़िला मिल गया था। बाद में वह लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अपनी पढ़ाई जारी रखते रहे मगर यहाँ वे ज़्यादा समय तक नहीं रह पाए। जल्दी ही उन्हें भारत लौटना पड़ा क्योंकि उनकी छात्रवृत्ति ख़त्म हो चुकी थी।

इस तरह, 1917 में वे लन्दन से भारत आ गए। उनकी इन अकादमिक उपलब्धियों के फलस्वरूप अंग्रेज़ों का ध्यान भी उनकी ओर गया। उन्हें आंबेडकर में अस्पृश्यों का एक भावी प्रतिनिधि दिखाई पड़ रहा था। 1919 में मताधिकार प्रदान करने के लिए योग्यता कसौटी में संशोधन करने के लिए साउथबॅरो कमेटी बनाई गई थी ताकि और ज़्यादा भारतीयों को विभिन्न प्रान्तों की असेम्बली में चुनाव के लिए मतदान का अधिकार मिल सके। इस कमेटी ने जिन लोगों से सलाह माँगी उनमें आंबेडकर भी एक थे। यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण क्षण था क्योंकि 1919 में ही ब्रिटिश भारत की प्रान्तीय असेम्बलियों और सरकारों को पहले से ज़्यादा अधिकार व सत्ता देने वाले सुधार शुरू किए गए थे। इसके बाद ही भारतीय मंत्रियों (लेजिस्लेटिव काउंसिल के प्रति उत्तरदायी) को भी सरकार में शामिल किया जाने लगा था। आंबेडकर ने अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल और आरक्षित सीटों की व्यवस्था की माँग उठाई थी।

साल 1920 में उन्होंने शिवाजी के वंशज, कोल्हापुर के महाराजा शाहू महाराज की आर्थिक सहायता से मूक नायक नामक एक नया जरनल शुरू किया। मगर, जब शाहू महाराज ने आंबेडकर को एक बार फिर इंग्लैंड जाने और पढ़ाई जारी रखने के लिए वज़ीफ़े की पेशकश की तो उन्होंने फ़ौरन यह प्रस्ताव मंज़ूर कर लिया। क्रमश:, 1921 में उन्होंने मास्टर ऑफ़ साइंस की डिग्री हासिल की और अगले साल

‘दि प्रॉब्लम ऑफ़ दि रुपी’ (रुपये की समस्या) शीर्षक के तहत अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया।

इसके बाद वह भारत लौटे और उन्होंने बम्बई में वकालत की दुनिया में अपने पैर जमाने की कोशिश की। अछूत होने के कारण उनके लिए ग्राहक जुटाना बहुत मुश्किल था। दिल में गहरी कड़वाहट के साथ उन्होंने संकल्प लिया कि वह अपना जीवन जाति व्यवस्था के उन्मूलन के अभियान में समर्पित कर देंगे। तत्पश्चात, जुलाई 1924 में उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया और 1928 तक इसका नेतृत्व भी सँभाला। इससे पिछले साल उन्हें अंग्रेज़ सरकार ने बॉम्बे प्रेजि़डेंसी की लेजिस्लेटिव काउंसिल में मनोनीत किया था। काउंसिल में रहते हुए आंबेडकर ने अस्पृश्यों को कुंओं से पानी निकालने (यही आगे चलकर 1927 में कोंकण तट पर महाड़ में होने वाली उनकी पहली विशाल गोलबन्दी का लक्ष्य बनने वाला था) और मन्दिरों में प्रवेश का क़ानूनी अधिकार दिलाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया। मन्दिर प्रवेश के सवाल पर आंबेडकर ने जो आन्दोलन शुरू किया वह 1935 तक रह-रह कर चलता रहा।

तीस का दशक आंबेडकर के लिए दलगत राजनीति में नए प्रयोगों का दौर रहा। उन्होंने अंग्रेज़ों से माँग की कि अस्पृश्यों को पृथक निर्वाचक मंडल का अधिकार दिया जाए। अगर उनकी यह माँग मान ली जाती तो अस्पृश्य निश्चित रूप से एक मज़बूत राजनीतिक शक्ति में रूपान्तरित हो सकते थे। अंग्रेज़ सरकार ने भी कम्युनल अवॉर्ड के सिलसिले में हुई चर्चाओं के दौरान उनके तर्कों पर आंशिक सहमति दे दी थी जिसकी घोषणा भी सरकार की ओर से 24 अगस्त, 1932 को की गई थी। मगर, चूँकि गांधीजी को भय था कि अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था हिन्दू एकता को क्षीण कर देगी इसलिए वे तत्काल ही पूना स्थित यरवदा जेल में अनशन पर बैठ गए थे। फलस्वरूप, आंबेडकर को पृथक निर्वाचन मंडल की अपनी माँग छोड़नी पड़ी और 24 सितम्बर, 1932 को पूना पैक्ट पर दस्तख़त भी करने पड़े। इस घटनाक्रम से आंबेडकर को गहरा धक्का लगा था। हालाँकि बाद में सदाशयता का भाव दिखाते हुए गांधी ने इस बात को माना था कि अस्पृश्यों को बड़ी संख्या में आरक्षित सीटें मिलनी चाहिए।

1936 में आंबेडकर ने अपनी पहली राजनीतिक पार्टी—इंडिपेंडेट लेबर पार्टी (आईपीएल)—का गठन किया। यह फ़ैसला 1937 में होने वाले चुनावों के मद्देनजर लिया गया था। 1937 के चुनाव गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ऐक्ट, 1935 के प्रावधानों के तहत कराए गए थे। यह क़ानून प्रान्तीय सरकारों और असेम्बलियों को 1919 के सुधारों से कहीं ज़्यादा शक्तियाँ व अधिकार देता था। आईएलपी ने केवल बॉम्बे प्रेजि़डेंसी और मध्य प्रान्त में ही अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे और यहाँ पार्टी को कुछ सफलता भी मिली। पार्टी के 9 अन्य सदस्यों के साथ-साथ आंबेडकर भी निर्वाचित घोषित हुए।

दूसरे विश्व युद्ध ने भारतीय राजनीति में बदलावों की गति और तेज कर दी थी। ब्रिटेन ने कांग्रेस की सलाह और सहमति के बिना भारत को भी विश्व युद्ध में घसीट लिया था। लिहाज़ा, कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने उन आठों प्रान्तीय सरकारों से इस्तीफ़ा दे दिया जिनका नेतृत्व उनके हाथ में था। बाक़ी भारतीयों को युद्ध प्रयासों के पक्ष में करने के लिए अंग्रेज़ों ने मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और आईएलपी जैसी छोटी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को अपनी और खींचना शुरू किया। इस क्रम में आंबेडकर 1941 में डिफ़ेंस एडवाइज़री कमेटी के सदस्य बने और 1942 में उन्हें श्रम मंत्री नियुक्त किया गया।

मंत्री के रूप में अपनी गतिविधियों के साथ-साथ वह अपनी पार्टी की रणनीति को भी तराशते रहे और 1942 में उन्होंने शेड्यूल्ड कास्ट्स फ़ेडरेशन (एससीएफ) के नाम से एक नए संगठन का गठन किया। ‘शेड्यूल्ड कास्ट्स’ (अनुसूचित जतियाँ) उन अस्पृश्य जातियों का समूह था जिनको सरकार द्वारा अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किया गया था। शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नौकरियों में इन जातियों को आरक्षण देने के लिए सरकार ने यह सूची तैयार की थी। सभी मजदूरों में अपना राजनीतिक जनाधार फैलाने का प्रयास करने के बाद आंबेडकर अपनी कोशिशों को सिर्फ़ अस्पृश्यों के बीच ही सीमित करते गए। कांग्रेस की विराट राजनीतिक ता$कत के सामने एससीएफ का कोई मेल नहीं बैठता था। लिहाज़ा मार्च 1946 में एससीएफ को प्रांतीय असेम्बलियों के चुनावों में भारी पराजय का सामना करना पड़ा। और तो और, ख़ुद आंबेडकर भी अपनी सीट नहीं जीत पाए।

बहरहाल, इस नाकामयाबी के बावजूद अस्पृश्यों के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में उनका राजनीतिक उभार जारी रहा। 3 अगस्त, 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी सरकार में विधि मंत्री नियुक्त किया और तीन सप्ताह बाद 29 अगस्त को उन्हें संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी (मसविदा समिति) का अध्यक्ष बना दिया गया। 1947-50 के बीच यही उनकी सारी सरगर्मियों का केन्द्र रहा।

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