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काग़ज़ पर ज़िंदगी के रंग जैसा

युवा लेखक अनघ शर्मा की डायरी के कुछ पन्ने हैं। लॉकडाउन के दौरान एक लेखक के मन में क्या कुछ उमड़ता-घुमड़ता रहता है। पढ़ने लायक़ है-

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“ये किसी डायरी के पन्ने नहीं हैं। डायरी मुझे लिखनी नहीं आती। ये चिठ्ठी भी नहीं है क्योंकि चिठ्ठी के मिजाज़ अलग हुआ करते हैं। ये कागज़ के टुकड़े पे लिखा गया कुछ ऊल-जलूल सा है… जिंदगी के रंग जैसा!!” शाहबलूत का पत्ता! इस कहानी के लिए जब ये पंक्तियाँ लिखीं थीं तब ये सोचा नहीं था की कुछ सालों बाद किसी चीज़, किसी नये टुकड़े को शुरू करने के लिए इन की तरफ़ वापस जाना होगा।  क्यूंकि ये जो लिखा जा रहा है वह किसी डायरी का हिस्सा ही नहीं है।  आज से पहले कभी डायरी जैसा कुछ लिखा नहीं और जीवन में कभी लिखा भी जाएगा उसकी आज देर रात इस वक़्त बैठ के सोचते हुए कोई गुंजाइश  नहीं लगती।  इक्कीस मार्च की शाम से तेरह अप्रैल की आधी रात के बारह बजे तक जब इसे लिख रहा हूँ तब तक;  पिछले तेईस दिन में दो ही बार घर से बाहर निकला हूँ, वह भी कुछ आधे घंटे भर के लिए।  दिनों-दिन घर में रहने में मुझे कभी कोई मुश्किल नहीं लगती पर समय के ऐसे बंधन में कि जिसमें इस तरह देर तक बंधे-बंधे रहो कि कंधे के पास गर्दन में एक अजब सा दर्द पैठ जाए, उससे ऊब होती है…

खैर वक़्त है; रो कर, गा कर कट ही जाता है… और मैं पिछले बहुत सालों से कोई लगभग तीन दशक से ज़्यादा से वक़्त को अलग-अलग चेहरों में गुज़रते देख रहा हूँ। कभी माँ के चेहरे में, बहन के चेहरे में तो कभी भाई के चेहरे में। आप समय को दूसरे के चेहरे में जगह बनाती हुई झुर्रियों में देख सकते हैं; पर अपना समय कैसे पढ़े कोई।  उस को पढ़ने के लिए बार बार मन में झांकना पड़ता है, और अपने मन की दीवार पर पड़ी धूल को झाड़ने के लिए बड़े मजबूत हाथ चाहिये जो किसी किसी के पास ही होते हैं।  तो इस लिए मुझे पता ही मैंने अपने समय को गुज़रते-बीतते कैसे देखा होगा, चेहरे पर अभी झुर्रियां दिखती नहीं और मन में मैंने झांक के कभी देखा नहीं।  मुझे पता है कि वहाँ उस दीवार पर धूल ही नहीं झाड-झंखाड़ भी होंगे, यूँ भी कुछ मन अपने भीतर नमी रखते हैं जहाँ उदासी जल्दी पनपती है।  और आने वाला समय बस अंदेशा होता है शक्ल नहीं उसे कहीं भी देखा नहीं जा सकता…

जैसे आज इस समय में बस कल का अंदेशा है, एक छाया है सब के पास जिस को देखा तो जा सकता पर उस पर हाथ नहीं धरा जा सकता।  कहीं से लौटना बहुत सारे लोगों के लिए अक्सर मुश्किल ही होता होगा; आसान होता तो लोग जाते ही क्यूँ।  और जो कहीं चले ही जाते है क्या वापस लौटने पर उस छूटे हुए समय के टुकड़े को ठीक वैसा ही पाते होंगे जैसा कि वह जाते वक़्त था।  जाने और वापस लौटने के बीच क्या हाथों को पता रहता होगा कि वह क्या समेट के ले जा रहे हैं और फिर क्या समेट के लौटेंगे।  कहीं हथेलियाँ होंगी गर्माहट लिए, कहीं ठंडी हथेलियों के दस्ताने होंगे, कहीं चिठ्ठियाँ समेटते हाथ होंगे और कहीं कुछ नहीं होगा सिवाय हवा के जिसके माथे पर बार-बार बल पड़ते होंगे और फिर मिट जाते होंगे।  नींद इधर बहुत कम आती है।  यूँ भी कई सालों से अब कम ही रह गई है नींद, इतनी कम की कुछ रातों तक लगातार जगा जा सकता है पर कोशिश कर के ज़बरदस्ती सो ही जाता हूँ; क्यूंकि लगता है कहीं मुज़फ्फ़र वारसी की बात सच ही न हो…. “सोचते-सोचते दिल डूबने लगता है मेरा/ ज़हन की तह में मुज़फ्फ़र कोई दरिया तो नहीं।” सोचने पर हर किसी को ज़हन का दरिया पार करना ही पड़ता है और फिर उसी जगह लौट कर जाना होता है जहाँ आप किसी दरवाज़े पर खड़े हो कर अपने ही आपको सब कुछ समेटते देखते हैं।  अपनी सोचूँ तो पीछे जा कर देखने पर पिता का एक सफ़ेद-काले चारखाने का कोट दीखता है जिसका काला रंग धुँधला हो कर मटमैले हरे जैसा हो गया है, एक एच.एम.टी. की हाथ घडी जिसे एक दो बार चालू करवा के बिन पहने ही रख दिया था क्यूंकि उस उमर की कलाई पर वह घड़ी बड़ी लगती थी जो अब जाने कहाँ किन चीज़ों के साथ कहाँ सहेज कर रखी हुई होगी।  कुछ अन्तर्देशीय लिफ़ाफ़े जो उनके लिखे हुए थे, जिनकी तह मुड़े-मुड़े इतनी नाज़ुक हो गयीं थीं की ज़रा ज़ोर से खोलने भर से उनके चिर जाने का डर रहे।  जिनमें से एक को शायद मैंने पढ़ा है कोई चौदह-पन्द्रह की उमर में।  उसमें क्या लिखा था याद नहीं, याद है बस कि पीले पड़ते कागज़ पे हल्की नीली सियाही के शब्द थे।  याद कैसी चीज़ है कि बाज़दफ़ा आप अपनी ही कोई चीज़ भूल जाते हैं और जाने किस-किस की लिखी किताबें याद रह जाती हैं…

आँख को जो दिख जाए वह बसा रहता है और मन जो देखे वह उतर जाता है।  अब से जो देखिये उसे बार-बार, बार-बार, बार-बार पलट पलट के देखिये, क्या पता सालों बाद बस आँख का देखा रंग ही बचा रहे।  पलट कर आज देखूं कि अगर यहाँ से लौट कर जाना पड़े क्या समेट कर ले जाऊँगा, सब किताबें शायद हाँ या नहीं, कुछ चादरें जो नए घर के लिए खरीद रखीं हैं जो बैंगनी, हरे,पेस्टल रंगों में रंगी हुई हैं और कुछ ब्लंकेटस ज़रूर जैसे भी जायें (बचपन की कुछ कम मयस्सर चीज़ों में एक थे अच्छे बिस्तर)…

यूँ भी सब के इमोशनल बैगेज, इमोशनल अटैचमेंट्स अलग-अलग होते हैं उनके लिए क्या जजमेंटल होना।  इस समय, ऐसे समय जब छूने भर ही से आने-जाने की सरहदों के पार होने का खतरा हो तो पलट कर उन लोगों की तरफ़ देख लेना चाहिये जिनका शुक्रिया कहा जा सके और मैं बार-बार माँ के चेहरे के अलावा अगर पलट के देखूंगा तो अपनी चाची और बहन की तरफ़, क्यूंकि इतने लम्बे सालों में इमोशनली ये ही तो सबसे पास रहे हैं।  यूँ भी जीवन में कुछ ही लोग, कुछ ही चीज़ें होती हैं जो आपके मन में जड़ की तरह रहते हैं और आपको ज़िन्दा रहने के लिए जिस नमी की ज़रूरत होती है उसको आपके लिए बनाये रखते हैं…

 

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One comment

  1. दीप्ति सारस्वत

    आंख जो देखे वो बसा रहता है
    दिल जो देखे उतर जाता है
    अलग सी बातें हैं
    जिन से पहचान होती है

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