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औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ: सुजाता

समकालीन लेखिकाओं में सुजाता जाना पहचाना नाम है। पिछले साल उनका एक उपन्यास भी प्रकाशित हुआ था ‘एक बटा दो’। उनका यह लेख औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ पर है, जिसे उन्होंने नेमिचंद जैन जन्मशती पर साहित्य अकादेमी में आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा था। सरस शैली में लिखा गया एक गम्भीर निबंध है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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जब भी साहित्य के संदर्भ में कल्पना और यथार्थ की बाइनरी में बात होती है मुझे एम ए हिंदी के विद्यार्थी जैसा महसूस होता है जिसे उत्तर लिखते हुए यक़ीन करना होता है कि उपन्यास रचने के लिए लेखक कल्पना और यथार्थ का इस्तेमाल करता है। सच यह है कि औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ कोई अलग चीज़ है ही नहीं। ऐसी कोई कल्पना नहीं हो सकती जिसकी जड़ें यथार्थ में न हों और ऐसा कोई यथार्थ उपन्यास में नहीं आ सकता जिसे जिसकी ‘प्रोसेसिंग’ न हुई हो। कल्पना के बिना यह प्रोसेसिंग कभी नहीं हो सकती।  मुझे अपने ही उपन्यास पर बात करनी हो तो शायद मैं कभी व्याख्या नहीं कर पाऊँ कि कहाँ-कहाँ यथार्थ है और कहाँ-कहाँ कल्पना। इस पात्र की प्रेरणा आपको कहाँ मिली या आपने क्यों और किसके लिए यह उपन्यास लिखा – जैसे बार-बार के सवालों से तंग आकर कोई कथाकार झूठ भी बोल सकती है, जैसे मैं कहना चाहूंगी कि मेरा दिमाग खराब था,  यह झूठ भी झूठ नहीं होगा क्योंकि वाकई दिमाग में खराबी तो पैदा हुई थी।

तो उपन्यासकार की यह विवशता ही समझिए कि कल्पना के बिना उसका काम नहीं चलता। सोचिए, एक ऐतिहासिक उपन्यास यथार्थ की अनेक परतें क्या कभी कल्पना के बिना उघाड़ सकता है? यशपाल का ‘दिव्या’ जिस काल खण्ड की बात करता है उसपर महज़ रिसर्च पेपर सुनने से तो पाठक की आत्मा तृप्त नहीं होगी ! इतिहास का कोई पुनर्पाठ, पुनर्रचना क्या कल्पना के बिना उपन्यास में सम्भव है? छोड़िए ऐतिहासिक उपन्यास को, सोचकर देखिए, संस्मरण तक बिना कल्पना के नहीं लिखे जा सकते। स्मृति की पुनर्रचना में एक व्यक्ति हमेशा कल्पनाशीलता से काम ले रहा होता है। संस्मरण ही क्यों, जब आत्मकथाएँ भी कल्पना के बिना नहीं लिखी जा सकती या कहूँ पत्रकारिता तक इस क्षेत्र में लोहा ले रही है तो साहित्य से तो मैं कहती हूँ उपन्यास का यथार्थ बिना कल्पना के आ सकेगा यह कल्पना करना भी अन्याय है हुज़ूर ! एक काम की बात बताती हूँ जो बेहद प्रासंगिक भी है।

अपने एक साक्षात्कार में मार्खेज़ से पूछा गया कि पत्रकारिता और उपन्यास में क्या फ़र्क़ है तो वे बोले- कुछ नहीं, इतना कि सिर्फ़ एक तथ्य जो झूठ है पूरे पत्रकारिता के काम को पक्षपातपूर्ण बना देता है और सिर्फ़ एक तथ्य जो सच है उपन्यास को न्यायसंगत।

इस बात को उद्धृत करना मुझे ज़रूरी लगा। हालांकि कितना भी कल्पना का सहारा ले पत्रकारिता से उपन्यास को कोई खतरा नहीं।

  तो वापस अपनी बात पर आते हुए, आखिर रात की जंगल सफारी पर निकलते हुए या बड़ा इमामबाड़ा घूमते हुए एक प्रशिक्षित लेकिन हद दर्जे का गप्पबाज और नाटकीय गाइड साथ न हो तो क्या मज़ा। रात के डरावने जंगल या एक विशाल संरचना की तरह उस ठस्स पड़े यथार्थ का मैं क्या करूँ!

अपने ज़ाती अनुभव से कहूँ तो लेखक को स्वयम को अभिव्यक्त करने की एक भयानक, अव्याख्येय किस्म की बैचैनी होती है। एक बच्ची उछल कर कहती है देखो उस पेड़ पर एक घोंसला है और कितने नन्हे, अभी अँडे से निकले पक्षी के बच्चे हैं और माँ उनकी चोंच में चोंच डालकर केंचुआ खुला रही है, उसकी दोस्त को नहीं दिखता जब तक कि वह उसे कंधे से पकड़ कर अपनी तर्जनी की सीध में देखने के लिए नहीं कहती। सम्भव है तब तक माँ पक्षी वहाँ से उड़ चुकी हो।

कभी कोई यथार्थ सिर्फ उसे दिखता है भूत की तरह  दिखता है, ज़्यादा सताता है, भूत-वूत नहीं होते, वहम होते हैं, लेकिन वह डरती है और तमाम तरीकों से कोशिश करती है कि कह सके। चिल्ला सके। या कभी अंधेरी रात में किसी हत्या को देख लेने जैसा हो सकता है जिसमें लेखक को लगे कि वह खुद भी हत्यारी व्यवस्था या मरने वाले का ही हिस्सा है, वह चिल्ला कर सबको बताना चाहे लेकिन इस भय से कि इतने कोरे यथार्थ पर और इस पीड़ा पर कोई भी क्यों यकीन करेगा जबकि नज़रें घुमाने पर सब घरों की बत्तियाँ उसने जलती पाईं और इस मुगालते से बाहर निकली कि वह अकेली इसकी चश्मदीद गवाह है !

इसकी वजह कभी समझ नहीं सकती न समझा सकती हूँ कि अपना उपन्यास लिखते हुए मुझे हमेशा रात क्यों दिखती थी और ऐसा क्यों होता था कि सब कुछ देखा-सुना-भोगा-अनभोगा आधी रात बीतते हुए आँख बंद करने पर चलचित्र सा क्यों आ जाता था ! बाहर एक यथार्थ है, राजनीति है, एक विराट आख्यान है दुनिया का और उपन्यास उन सबको देखने वाली लेखक की दिमाग़ी खराबी !

क्योंकि यथार्थ इकहरा नहीं होता और लेखक खुद उसमें पहले से उलझा हुआ होता है, खुद को ‘सॉर्ट आउट’ करने में लगभग असक्षम और उसमें यह लालच पैदा होता है कि वह दूसरों को भी इसमें फुसला के शामिल कर ले,  वह कल्पना का सहारा लेकर उपन्यास के यथार्थ को निर्मित करता है ताकि जो पाठक को सिर्फ एक भवन लगता था अब तक वह बड़ा इमाम-बाड़ा लग सके और वह भूल-भुलैया की गलियों में खोने के लिए आतुर हो जाए, वह बावड़ी की रचना देखकर विस्मित हो और तमाम रोमांच, उत्साह, भय, विस्मय, अपने अदना से अस्तित्व के बोध,अपने वर्तमान और अस्मिता के सवालों और खोने-पा लेने की आशंकाओं से गुज़ारते हुए, एक भरे-पूरे अनुभव के साथ बाहर के दरवाज़े तक ले आए।

मैं सोचती हूँ कि एक उपन्यासकार करती क्या है? सोचिए, आप मेरी पड़ोसन की कहानी क्यों सुनना चाहेंगे? उसकी दिनचर्या, उसके सुख-दुख और उसके इतिहास-वर्तमान से जो नाता मेरा है वह आपका नहीं हो सकता। जब तक कि वह पात्र आपको अपनी सी न लगे और उससे आपका राब्ता बढता चला जाए आप उसकी सच्ची या झूठी किसी कहानी में दिलचस्पी नहीं लेंगे। यानी उस पात्र को ‘बिलीवेबल/ विश्वसनीय ’होना होगा। इसके लिए उपन्यासकार पात्र अपने ही जीवन और आस-पास से उठाती है लेकिन वह यह ध्यान रखती है कि पात्र पाठक को अपने कितना भी क़रीब लगे और भले वह बार-बार उसमें अपना ही अक्स देखे, लेकिन लगातार वह उसकी पहुँच से बाहर रहे। पाठक उस पात्र या उसकी कहानी से जितना राब्ता महसूस करके पीछे भागे उतना ही वह उसकी पकड़ से बाहर बना रहे। यह भी कह सकते हैं कि उपन्यासकार इस तरह धीरे-धीरे पाठक को झूठ (या कहिए कल्पना) को स्वीकारने के लिए तैयार करती है।

यह झूठ यथार्थ विरोधी या विलोम नहीं होता। बल्कि कहना चाहिए उपन्यास का अपना एक यथार्थ होता है जिसे रचनाकार उसी तरह से नहीं गढता जैसा समाज में है और फिर भी वह बाहर के यथार्थ को समझने के लिए एक दृष्टि देता है। स्त्रीवाद पर किताब लिखना और एक स्त्रीवादी उपन्यास लिखना अलग चीज़ें हैं।

लेखक एक पोज़ीशन लेता है ताकि चीज़ें वैसी ही दिखा सके जैसी उसे खुद को दिखती हैं या जैसे उसके सामने ‘अपीयर’ होती हैं। उपन्यास लिखते हुए  उसे बड़ी चालाकी से काम करना होता है। वह उस सच तक जाना चाह्ता है जो पाठक के भी मन के अंधेरे कोनों में दुबका बैठा होता है। अपने पात्र को उन अंधेरे कोनों तक उपन्यासकार ले जाता है तो पाठक के लिए भी वह भयावह यात्रा से रोमांच में तब्दील हो जाता है। वर्ना ऐसे कैसे सम्भव है कि असल जीवन में वैवाहिक रिश्तों में तथाकथित अनैतिकता पर अकुँठ बात किया जाना बर्दाश्त न करने पर भी  ‘मित्रो मरजानी’ की सम्वेदना पाठक के दिल को छू जाती है!

“काहे का डर, जिस बड़े दरबारवाले का दरबार लगा होगा, वह इंसाफ़ी क्या मर्द-जना न होगा? ”

जो उपन्यास पढने चली है वह मित्रो को आँख मटका कर यह कहते सुनती है तो जैसे अपने देखे जीवन में मर्दवादी खोखली मर्यादा और आचरण के नियमों के दृष्टांत आंखों के सामने घूम जाते हैं। नसों से लेकर नालियों तक में बहती पितृसत्ता से वह जीवन में भले न टक्कर ले, उस वक़्त लेकिन आँख नचाकर , अंगूठा दिखाकर मन की करने वाली मित्रो उसके लिए अविश्वसनीय और निंदनीय नहीं रह जाती।

इस चालाकी में भाषा उसका भरपूर साथ देती है। उपन्यास पर कोई बंधन नहीं है। उसमें कविता का आना-जाना अक्सर लगा रहता है। भारतीय समाज में एक निम्न वर्गीय दमपत्ति की ज़िंदगी की तमाम सच्चाइयों के बीच रोमांस और रोमांच, विस्मय और आनंद के लिए कोई स्पेस होता होगा यह कल्पना करना जैसे ही आपको असम्भव लगेगा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ आपको विस्मित कर देगा।  टट्टी के ताले की चिंता से लेकर हाथी पर सवार होकर विश्वविद्यालय जाना और तमाम घर-दुआर के काम निपटा कर रघुवर प्रसाद और सोनसी का खिड़की के पार कूद जाना झूठ लगते हुए भी सुहाने लगते हैं कि नहीं ! “दोनो जागे थे और सब कुछ नींद में झूम रहा था। तालाब नींद में तालाब था । आकाश नींद का आकाश” गद्य और कविता की भाषा के बीच बनी दीवार में भी जैसे एक खिड़की खुल जाती है। भाषा की इस सामर्थ्य पर हालांकि नई वाली हिंदी सवाल चिपका रही है।

एक रचनाकार के नज़रिए से इस तरह की कल्पनाओं और झूठों के बारे में शायद ही कभी ठीक-ठीक बताया जा सकता हो। बहुत सम्भव है कि किसी एक पात्र को गढने में उसने अपने जीवन में देखे परिचित-अपरिचित दस-बीस पात्रों की विशेषताओं को मिला दिया हो। एक घटना जो पाठक और आलोचक को सुचिंतित लगे उसका आइडिया यूँ ही उसे मिला हो। हारूकी मुराकामी अपने साक्षात्कार में मैजिक रियलिज़्म के बारे में कहते हैं –

 “I like Gabriel Garcia Marqez very much, but I don’t think he thought of what he wrote was magic realism. It was just his realism. My style is like my eyeglasses: through those lenses , the world makes sense to me.”

अपने उपन्यास ‘काफ्का ऑन शोर’ के बारे में मुराकामी बताते हैं कि कैसे आसमान से बारिश में मछलियाँ  गिरने की बात उन्हें यूँ ही सूझी। उन्हें बस इतना लगा था कि आसमान से कुछ गिरना चाहिए। क्या? एकदम से सूझा मछलियाँ। वे कहते हैं मैं विश्लेषण और प्रतीकात्मकता खोजना बुद्धिजीवियों पर छोड़ता हूँ। मुझे अगर एकदम से मछलियाँ सूझा तो हो सकता है उसका एक गहरे सामूहिक अवचेतन से कुछ लेना-देना हो और कोई भी आम व्यक्ति शायद ऐसे ही सोचता। इस तरह एक ‘सीक्रेट मीटिंग प्लेस’ बनती है जो उनके और पाठक के बीच ।

जब तक कि पाठक हाथ थामे रहना चाहे , उपन्यासकार उसे कहीं भी ले जा सकता है। यानी, जब तक पाठक यक़ीन करने को तैयार है मैं उपन्यास में कुछ भी ला सकती हूँ। यह खेल और चालाकी लगता हुआ भी आसान नहीं है। एक उपन्यास अपनी समाप्ति पर लेखक को खालीपन से भर सकता है। सच की तलाश में निकलना आसान नहीं। अपने विशाल कलेवर और रचना-प्रक्रिया में उपन्यास जैसी छूट एक लेखक को देता है या कहिए जब कथा और पात्र स्वतंत्र होकर लेखक को बनाने लगते हैं तो यह खुशी-खुशी अपने हाथों अपनी कब्र खोदने जैसा लगता है। यह सुख कोई अन्य विधा नहीं दे सकती। यह ऐसा ही है कि आप जी-जान लगाकर पहाड़ की चोटी तक चढाई करें और फिर छलांग लगा दें। अभिव्यक्ति की छटपटाहट और  पाठक को यूँ कहीं भी साथ लिए चलने की लत कम बुरी नहीं है। उसके लिए पहाड़ी से कूदना भी मंज़ूर !

मृत्यु अगर सबसे बड़ा सच है तो उपन्यास मृत्यु की लालसा !

II

औपन्यासिक यथार्थ या कहें सच अक्सर निर्मित किया गया लग सकता है। पहले ही कह चुकी हूँ, सच और झूठ का घालमेल करके लेखक उपन्यास और उसके पात्रों को विश्वसनीय बनाता है और चालाकी से काम करता है। लेकिन यह चालाकी कितनी क़ामयाब है यह सिर्फ पाठक की नज़र में विश्वसनीय बनने से तय नहीं होगी। अपनी आत्मकथा में भीष्म साहनी ‘तमस ’ की रचना-प्रक्रिया पर बात करते हुए लिखते हैं‌  – “ उपन्यास के आरम्भ में सूअर मारने का प्रसंग काल्पनिक है। उपन्यास की सच्चाई के मानदण्ड इस बात पर निर्भर नहीं  होते कि अमुक  घटना वास्तव में घटी थी  या नहीं,  बल्कि  इस बात पर कि जीवन  के समूचे यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में  वह घटना विश्वसनीय बन पाई है कि नहीं” हम देखते हैं कि विभाजन के आख्यान  में ‘तमस’ अंतत: मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होता है। मानवता का यह महाआख्यान ही अंतत: सब तय करता है।

आलोचना में, चलते-चलते कुछ वाक्य बड़े ‘क्लीशे’ वाक्य हो जाते हैं। जैसे, जटिल यथार्थ होना। पिछले 50-60 वर्षों  से हिंदी उपन्यासों में आ रहा यथार्थ जटिल ही है। औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ के लिए मेरे हिसाब से ‘सच’ एक बेहतर शब्द है। ऐसा सच जो कई कोणों से देखा जा सकता है(इसमें कई कोण झूठ, कल्पना, अयथार्थ भी लग सकते हैं),जो अक्सर खण्डित है और जिसे अक्सर एक मेटानेरेटिव होने के लिए छोटी छोटी कहानियों या सचों से गुज़रना होता है। उदाहरण तो बहुत से हो सकते हैं लेकिन यहाँ मैं एक खास उदाहरण देती हूँ। जैसे, स्त्री की दुनिया का सच जो मैं हार गई, यही सच है, अकेली, रजनीगंधा या मजबूरी जैसी कहानियों में मन्नू भंडारी के यहाँ फैला पड़ा है, वहीं संघनित और तार्किक होकर स्त्री के सच का एक महाआख्यान ‘कठगुलाब’ में है। असिता,मारियान, नर्मदा और असीमा का सच।  एक दूसरे को काटता, सम्पूर्ण करता। विपिन मजूमदार का सच , वह  पुरुष जो इस स्त्री-सच में कभी हिस्सा है और कभी दर्शक, न हीरो है न विलेन । बलात्कार से लेकर कोख के सवाल, परम्परावादी एक आम श्रमिक औरत नर्मदा, अपने फेमिनिस्ट होने की खुद ही पड़ताल करती हुई असीमा जिसे मर्दों से नफरत है, मारियान, जो देख रही है कि प्रतिभावान पति से डिक्टेशन लेकर उसे तरतीब देना और टाइप करना ही पढी-लिखी साथी औरत का कर्तव्य है। अकादमिक काम के लिए श्रेय की वह अधिकारी नहीं। मौलिक कैसे सोच सकती है वह? आखिर स्त्री है।

हर आत्म-चेतस स्त्री आँख की किरकिरी है और समाज का यह सम्पूर्ण स्त्री-विरोधी ढाँचा स्त्रीवाद के उस महाआख्यान को तैयार करता है जो स्त्री के ऐतिहासिक यौनिक दमन की बात करता है और आत्मालोचन के एकाध सवाल भी छोड़ता है । लेकिन बहुत कुछ इस महाआख्यान में से भी छूटना लाज़िम था जिसे आने वाले उपन्यासों को , स्त्री-लेखन को उठाना था। यानी, जो अलग-अलग किस्म की पितृसत्ताओं से बनता सच है,जहाँ जेण्डर और क्लास और जाति का सवाल एक साथ आता है यानी लोकल नैरेटिव की बात करना। एक सम्पूर्ण स्त्री-सच को गढने के लिए स्त्री-लेखन को उन सबकी बात करनी होगी जो अभी तक स्त्रीवाद के मेटानैरेटिव से बाहर छूट गए। हिंदी में शहरी और पढी-लिखी नौकरीपेशा औरत के बरक्स ग्रामीण स्त्री के सच ऐसे ही छूटे हुए हिस्से थे। चाक या झूला नट या  मैत्रेयी पुष्पा के बाकी उपन्यासों में ये लोकल आख्यान जगह पाते हैं। ब्लैक फेमिनिस्म या दलित स्त्रीवाद भी यही छूटा हुआ हिस्सा है।

हम बार-बार कहते हैं सच की कई परतें हैं। जब मैं खण्ड-खण्ड सच और बहुपरतीय सच के ज़रिए एक महाआख्यान बनने की बात करती हूँ तो बात उस राजनीति की भी करनी चाहिए जिसमें लेखक के  चुनाव एक पॉपुलर सच के पक्ष में जाते हैं । कोई एक महाआख्यान यथार्थ को देखने-समझने के नज़रिए को इस कदर प्रभावित कर सकता है कि लेखक पक्षपाती दिखाई दे। जैसे , विस्थापन का जो आख्यान ‘राष्ट्रवाद’  के महाआख्यान के साथ तैयार होता है वह मनुष्यता के ‘सच’ के लिए घातक हो सकता है। एक उदाहरण कश्मीर को लेकर हिंदी में लिखे उपन्यास हो सकते हैं जिन्हें पढकर सच को पाना लगभग असम्भव है। अगर आप कश्मीर गए हों और वहाँ बहुत से लोगों से बात की हो तो इसे समझ सकते हैं। हिंदी में कश्मीर पर बहुत कम लिखा गया और यह ऐसा इलाक़ा था जिसका सच जानने की जितनी उत्कट इच्छा थी उतना ही ईमानदार साधनों का अभाव। क्षमा कौल का ‘दर्दपुर’ कश्मीरी पण्डितों के दर्द तो बयान करता है लेकिन उसके बरक्स कश्मीरी मुसलमान का दर्द गौण है जबकि कश्मीर को जानने-समझने वाले समझ सकते हैं कि कश्मीर का अगर कोई सम्पूर्ण सच बन सकता है तो इन दोनो दर्दों के पुलों से गुज़र कर ही बन सकता है। आप कश्मीरी इतिहास और वर्तमान से परिचित हैं तो मनीषा कुलश्रेष्ठ का ‘शिगाफ़’ भी निराश करता है। वह टूरिस्ट के नज़रिए से लिखा गया उपन्यास है। ऐसे ही मीरा कांत का ‘एक कोई था कहीं नहीं सा’ भी इकहरी पक्षधरताओं का उपन्यास है। एक ही कल खण्ड में होने वाले रोटी आंदोलन को वह कथावस्तु बनाता है लेकिन मुसलमानों के आंदोलन पर कोई बात नहीं करता।

ऐसे में, जब लेखक अपने सुविधाजनक यथार्थ का चुनाव करने लगे तो यथार्थ वस्तुत: कितना जटिल और राजनीतिक होगा यह समझा जा सकता है। शायद इतना जटिल और इतना राजनीतिक कि ‘सच्ची घटनाओं पर आधारित’ कहकर किसी भी झूठ को सुपाच्य बनाया का सकता है और सच इतना नाटकीय हो कि झूठ ही लगने लगे। ऐसे सत्यातीत समय में लिखना कभी कभी हायपररियल हो जाना,  जीवन की असल इमेज के साथ उसकी विरोधाभासी छवि का मिल जाना भी सम्भव है। हालाँकि हयवदन गिरीश कार्नाड का नाटक है और हम उपन्यासों पर बात करा रहे हैं ,फिर भी मैं उस देवी के मदिर का प्रसंग उद्धृत करना चाहूंगी जो वीरान पड़ा रहता है और जहाँ दोनो नायकों के सर एक-दूसरे के धड़ पर चिपका दिए जाते हैं सो भी उस स्त्री द्वारा जो एक को पति के रूप में वरती है और दूसरे को मन ही मन चाहती है। नाटक में देवी के लिए एक वाक्य आता है- वह जो मांगो उसे पूरा करती थी। अब उसपर लोगों ने विश्वास करना बंद कर दिया।

कह सकते हैं कि अपनी सारी तकनीकों के ज़रिए लेखक उपन्यास में एक मेटानैरेटिव को गढता है तो समाज में मौजूद मुख्य मेटानैरेटिव्स से टकराता भी है। राष्ट्रवाद का महाआख्यान इस समय देश का मुख्य महाआख्यान है। पुरुषोत्तम अग्रवाल के उपन्यास ‘नाकोहस’ इस नज़र से भी देखना होगा। नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटीमेण्ट्स,  एक ‘आहत भावना आयोग’ गठित हो गया है। इधर आपने कोई होश की बात की पढे-लिखों वाली और उधर किसी की भावनाएँ  आहत हुईं। अब चलिए जेल। फिज़ूल और गढे गए सचों की ऐसी अंतहीन बरसात है दर्शक पर कि मानो एक टीवी है जो प्लग उखाड़ देने पर भी बंद नहीं होता और घर से निकलने पर भी व्यक्ति के साथ लगा-लगा चलता है। सामूहिक विवेक का दिनोदिन ह्रास होते चले जाने के पीछे चौबीसों घण्टे सूचनाओं की बमबारी, सूचना और प्रसार माध्यमों का सत्ता की चाटुकारिता में पगला जाना एक बड़ी वजह है।  हो सकता है सोचने-समझने वाला व्यक्ति ऐसे ही झल्लाकर टीवी बंद करने उठता हो और बढते-बढते सूचनाओं का अतिरेक उसे अपनी ज़द में ऐसे ले लेता हो कि वह चाहकर भी घड़ी-घड़ी मोबाइल पर नज़र डाले बिना न रह सकता हो।

सच को तलाशने की बेचैनी में उपन्यासकार राष्ट्रवाद और जातीय पहचानों,साम्प्रदायिकता और मानवता, पितृसत्ता और स्त्रीवाद जैसे कई महाख्यानों  की टकराहट से गुज़रता है। वह जो भी कह पाता है उसके लिए उसकी भाषा और रचनात्मकता ही साथ देती है।

और अंत में समेटते हुए जल्दी-जल्दी कुछ बातें। राजनीति से प्रेरित होकर आज जब रोज़ नए सत्य गढे जा रहे हैं ऐसे में सच को कहने के झूठे तरीके उपन्यासकार के शायद सबसे ज़्यादा काम के हैं। आज उसका यथार्थ वास्तव में जटिल है क्योंकि अपनी पक्षधरताओं में वह ठीक-ठीक मनुष्यता को ही वरण करता रह सके यह सबसे बड़ी चुनौती है। वह कितना भी झूठ और कल्पना ले आए “व्हाट्सेप यूनिवर्सिटी”  से पाया यथार्थ उसका यथार्थ नहीं हो सकता। वह कल्पना का नाम लेकर ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकता जबकि उसके कंधों पर बहुतों का सच कहने की ज़िम्मेदारी हो, उनका भी, जो असल में उसे अपना शत्रु समझते हों। स्त्रीवादियों के लिए भी आज फिक्शन लिखना बहुत ज़रूरी है। यह लोकमंगल की साधनावस्था कहलाएगी। उपन्यासकार के पास पहले से बना बनाया कोई सच नहीं हो सकता। वह आख्यान कहते हुए भी दरअसल एक शोधार्थी है जिसे कोई भी रेफेरेंस न देने की छूट है ! आगे कभी बात कहने का फिर मौक़ा मिला तो शायद इससे बेहतर तरीके से कह पाऊंगी।

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सुजाता

Chokherbali78@gmail.com

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