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सवाल अब भी आँखे तरेरे खड़ा है- और कितने पाकिस्तान?

कमलेश्वर का उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ सन 2000 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास के अभी तक 18 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और हिंदी के आलोचकों द्वारा नज़रअन्दाज़ किए गए इस उपन्यास को पाठकों का भरपूर प्यार मिला। उपन्यास में एक अदीब है जो जैसे सभ्यता समीक्षा कर रहा है। इतिहास का मंथन कर रहा है।इसी उपन्यास पर एक काव्यात्मक टिप्पणी की है यतीश कुमार ने, जो अपनी काव्यात्मक समीक्षाओं से अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
==========
 
 
1.
समय की उल्टी दिशा में
दशकों से भटक रहा है अतीत..
और मानव-सभ्यता की तहक़ीक़ात
अभी ज़ारी है
 
सच की अदालत में
फ़ैसला होना बाक़ी है अदीब
रूहों से भी गुफ़्तगू होनी है
कितने और विस्थापनों को अभी रोकना है
 
सभ्यता बदली है, समय भी बदला है
लेकिन बदलती सभ्यता के साथ
जो नहीं बदल सका
वह अब भी इतिहास में लहू बहा रहा है
 
आने वाली सभ्यता पिछली सदी के
रक्त-बीज से जन्मती रही है
और इनके बीच
ख़ामोशी एक तवील रात है
 
सबसे बड़ा आकर्षण है ख़ामोशी
और ख़ामोश आकर्षण की दुनिया
जिन आँखों से दिखे
उन्हें ढूंढता फिर रहा हूँ …
 
2.
आँखों में समय की दूरबीन लगी है
“संजय” को बचा लेना चाहता हूँ
नज़रों के बदलते दृश्य में
आँखें अय्यार हो गई हैं
 
अबाबील की आँखों में झाँका तो
उजड़े किले, अंधे गुंबद
अधजली मशाल, सफेद आँखें
वक़्त को ताकती-झाँकती दिखीं
 
सिलाबी आँखों से देखा तो
पानी के दाग़ की तरह
वजूद की लिबास पर
सुर्ख़ छींटे नक्श से दिखे
 
निस्बत से भी देखता हूँ
तो दुनिया धुंधली
समय स्तब्ध, प्रेम निःशब्द
और मेरा देश धूल-धूसरित दीखता है
 
देखते-देखते ताजमहल के आधार में गिर पड़ा
खून से लथपथ पहली ईंट से
गुंबद की नक़्क़ाशी और आयतों तक की
उत्कीर्ण दास्तानें गूंजने लगीं
 
सुर्ख़ छींटे, खाल के आबले
फोड़ों के अँखुए
पीप से भरे पीपे
असँख्य रुण्ड .. एकस्वर कराहने लगे
 
पुतलियों की कोटर में
तहज़ीब की लौ जलती दिखी
वक़्त ने उसके टुकड़े बाज दफा किया
बस सिर कलम एक बार किया
 
3.
मोमबत्तियों की ऐसी क़ायनात दिखी
जो बुझ कर शाश्वत अंधेरा दिए जा रही थी
 
समूची धरती पर
एक जैसी अनगिन कहानियाँ दिखीं
जिनके सिरे एक-दूसरे से अछूते थे
लेकिन वे समय के साथ बस बहे जा रहे थे
 
वह कलयुग ही था
जो काले उड़ते आसमान के पर्दों के परे
झंझावत के बीच भी झांक रहा था
 
तभी कच्छ के नमकीले कछार
दलदल की गीली दीवारों से मिल कर
लहरों में बदलते दिखे
 
मौत के योगफल से
निर्धारित होता हुआ
युद्ध का फ़ैसला दिखा
 
अक्षौहिणी-चतुर्दशी विनाश के साथ दिखा
प्रश्नों से उपराम ईश्वर
 
4.
तलवार की नोक पर धर्म को देख
भकाभक कर रो पड़ा बादल
इतना कि उसकी आँखें सूज गईं
बारिश का चेहरा रेगिस्तानी हो गया
 
हज़ारों निशीथ में टहलते हुए
नक्षत्रों से दोस्ती कर ली
युगों के तल्प पर सोया
समय के शिगाफ़ से झाँका
 
 
मुग़लताओं का ज़खीरा देख लिया
यह भी देखा कि मनुष्यहन्ता का
अप्रत्याशित मौतों पर अन्वेषण का दौर
ख़त्म ही नहीं हो पा रहा.
 
इस बीच
युगों तक टहलता हुआ
लहू पर फिसलते-फिसलते
वक़्त इक्कीसवीं सदी में दाख़िल हो गया
 
तब पराशक्ति से पूछा मैंने
यह सब क्या हो रहा है ?
मौन में जवाब मिला
परशिव से पूछो
 
जब शिव के पास गया तो देखा
मेरी दस्तक से पहले
तमाम दूसरी दस्तकें वहाँ मौजूद थीं
 
5
आदमी और मनुष्य
दोनों के शाब्दिक अर्थ एक हैं
फिर क्यों इनकी आवाज़ें आपस में टकरा रही हैं
 
ये आवाज़ें ख़्वाबों के रेशों पर
शोर की किरचियाँ चला रही हैं
सबकुछ तहस-नहस हो रहा है
खेतों में बारूद और बंदूकें उग रही हैं
 
जबकि यह तो सबको पता है
कि हथियार बनेंगे तो एक दिन चलेंगे भी
 
6
आवाज़ें फ़रार हो चुकी हैं
इच्छाएँ अब बंदी नहीं हो सकतीं
 
धमनियों में रक्तकणों के साथ
आवाज़ें भी पैबस्त हो चुकी हैं
 
थके हुए लकड़बग्घे
खा-पकाकर विश्राम पर हैं
महापुरुषों का अवसान
शोकगीत के साथ हो रहा है
 
आइंस्टाइन आज भी पछता रहे हैं
गांधी अपने रास्ते पर अडिग हैं
 
पछतावे और पराजय की ग्लानि ढोते
पछता रहा है वर्तमान !
इतिहास है जो कभी भी नहीं पछताता
 
7
चलना अपनी जगह है
चल कर पहुँचना अपनी जगह
सोचना कितना आसान है
और सोचे हुए को जीना कितना मुश्किल !
 
उसने कहा बहुत ख़ूबसूरत हो तुम
तपाक से जवाब मिला
कि तक़सीम नहीं हुई होती
तो क़ायनात भी ख़ूबसूरत होती
 
उसने देश और आदेश के साथ
मुहब्बत को तक़सीम होते देखा
 
प्रेम छिपकली की पूंछ है
बिछड़ कर मरती नहीं
और ज़्यादा तड़पती है
 
पलकों की लहरें
तेजी से उठने-गिरने लगीं
होंठ तितलियों के पंख की तरह
खुलने और कांपने लगे
 
नीम की पीली पत्तियां झरने लगीं
पत्तियों का झरना अंधेरे का मौसम है
या यह अंधेरा ही है
जो पत्ती-पत्ती झर रहा है !
 
पेड़ के सारे पत्ते झर गए
बस एक ख़लिश के साथ
टँगा रह गया चाँद
 
8
यादें छोटी-बड़ी नहीं होतीं
बस घटती-बढ़ती आहटें होती हैं
 
हथेलियों पर मोती बरसे
और मोतियों के दाग़
हथेलियों पर उग आए
 
कई बरसों बाद
आंसुओं की परछाइयां दिखीं मुझे
 
आंसुओं का मर्सिया गूंज उठा …
कोख़ में सांस का भी दम घोंटा जा रहा है
सैकड़ों आंखें कफ़न की
तलब में बुझती जा रही हैं
 
बिना आग के भी पत्तियां झुलस गईं
रेहन में रख दिया गया प्रेम
 
मां बनते ही हर औरत की
शक़्ल एक जैसी हो जाती है
इच्छाओं में माँ एक संभावना है
और संभावनाएँ हमेशा ज़िंदा रहती हैं
 
9
उलझा हुआ आदमी
सबसे ज़्यादा मुस्कुराता है
उसकी मुस्कुराहट में
एक कड़वाहट घुली होती है
 
अकेले का रोना
अनगिन नदियों का समंदर होना होता है
 
वक़्त के आसपास ही
दबे पांव चलता रहता है बदवक़्त
दोनों के अदृश्य जंग में
बदलती रहती है आंसुओं की हम हिस्सेदारी
 
10
तहज़ीब अगर टूटती है
फ़िरक़ावाराना हौले से दाखिल होता है वहाँ
आदिम राग और रिश्तों में बंधने के लिए
आदम आठ-आठ आंसू रोता है !
 
जब-जब यह आवाज़ आई
“यक़ीन जानिए”तब-तब
इंसानियत का क़त्ल हुआ
और, अब इतिहास पर यक़ीन करना मुश्किल है
 
कोई मुश्किल लाइलाज़ नहीं
इंसान का दुःख एकात्म हो सकता है
लेकिन निदान देने वाला ईश्वर
तो पहले एक हो जाए !
 
11
एक आवाज़ बारहां गूंजती है
आर्य-अहंकारों से बाहर निकलो
धर्म का शरणार्थी होने से बचो
 
स्वयं का दीप बनो
मृत्यु से नहीं
उसके भय से मुक्त हो
 
निर्वाण का पुनर्जन्म नहीं होता
ज़ेहन में बुद्ध मुस्कुराते हैं …
 
सुख मन का पूरापन नहीं
उसे खाली रखना है
 
गुलदान से गोया गिर कर
फूलों की पत्तियों में लिपट गया है
उसे बीनना ही सुख है ..
 
धर्म बदल लेने से
इतिहास की जड़ें नहीं बदलती
 
दरअसल सच यही है
कि आँखें जिसकी खुल जाए
वही सूरदास है
 
12
सियासत के अलाव में
धर्म का दोगलापन
अपना जिस्म सेंक रहा है
 
वहाँ मुझे जिस्म की कब्र में
परछाइयां ज़्यादा दिखीं
सांस लेते मनुष्य कम दिखे
 
धर्म-परिवर्तन भी एक सहूलियत है
कमोबेश ठीक उसी तरह
जिस तरह जंग के दरमियान
बदल दिए जाते हैं घायल घोड़े
 
विलाप का चँदोवा और फैला
भूख और भीख को समेटे
वक़्त के हरकारे ग़ायब कर दिए गए
 
परिंदों के परवाज़ नदारत
चाँद कुम्हलाया, सूरज स्तब्ध
आसमान खाली, सीठे हुए खजूर …
 
संस्कृति की नदी सूखने लगी
उसूल आत्महत्या करने लगे
तभी बिजली कड़की, बादल गरजे
पंख उड़े और फिर बिखर गए
 
चांदी के चार पंख
धरती ने रख लिए
 
फरिश्तों के सदमे से कंपन हुआ था
उसी कंपन ने गिराए थे चार पंख
 
दारा शिकोह अब
फरिश्तों के पंख बन कर धरती पर है
 
वक़्त ने ताक़ीद की
हर सदी में दारा शिकोह के साथ-साथ
आलमगीर के पैदा होने के
दस्तूर को बदलना होगा
 
और एक स्वर हो गईं समवेत चीखें …
 
13
ग़ुलामी अगर बादशाह की हो
तब भी सिर क़लम करती है
और अगर प्रजा की हो
तो ख़ुद ही क़लम हो जाती है
 
चांदनी चौक के पीपल पर
दारा और गुरु तेग बहादुर
दोनों के सिर क़लम हुए
पर शीश नहीं झुके
 
इन हादसों के बीच
आंसुओं से पवित्र दूसरी चीज़
ढूंढने में आदम खोया रहा
 
मंदिरों की बाती
और मरघट के दिए के बीच
हम भटकते रहे
 
इन सब के बीच तिरोहित हुई आवाज़ें
सिसकियों के साथ उभरती हुई कहती हैं –
“ईश्वर के अवतरण का इंतज़ार ही
ज़िंदा रखती हैं संस्कृति और सभ्यताओं को”
 
14
नदियाँ जब ऐंठती हैं
तो गुज़रने वाले शहरों की भाषा में ऐंठन छोड़ जाती हैं
इतिहास इन्हीं भाषाओं में साँसें लेता है
 
वही इतिहास हमने जिया
जो तर्को और स्वार्थों के फावड़े से
बनाए गए पोखर भर इतिहास से लिखा गया
 
जबकि नदियों के साथ बहता रहा इतिहास
हम उस ओर गए ही नहीं ..
समय का दहकता सूरज
निगलता-सुखाता गया उन बहावों को
 
अब तलाश रहे हैं सरस्वती को चिराग़ लिए
और, यमुना मिली भी तो दामन फटा मिला
 
ताबड़तोड़ पैंतरे और बेवक़्त अंधड़ से
टपकी आज़ादी की कलाइयों पर
आज भी सिक्कड़ के दाग़ हैं..
 
कोई रबड़ नहीं मिल रही
कि उन दाग़ों के नक़्शे-पां मिटाए जा सकें
 
15.
 
1757 में कुछ चूहों ने
बिल बनाने शुरू कर दिए
छुपते-निकलते वे फैलते रहे
 
जिस दिन वे सब बाहर आए
ढहाते हुए एक साथ अपने बिलों को
पूरे सल्तनत की नींवें हिल गईं
 
साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, पूंजीवाद, बाज़ारवाद
हर एक कड़ी अपनी शक़्ल बदलती गई
और बुद्ध मुस्कुराता रहा
स्वयं से स्वतंत्र होने की बात करता रहा…
 
पूंजी की नाभिनाल से
बाज़ार का कमल खिलता रहा
तब से साम्राज्य से पूंजी
और पूंजी से बाज़ार के
चक्रवृद्धि वृत की परिधि
फैलती जा रही है
 
बाज़ार के विस्तार में
निकलता है खोजी नाविक
लिए बंदूक और धर्म प्रचारक को एक साथ
 
इनकी गंठजोड़ ही
बाज़ार में सफलता की कुंजी है
 
बाज़ार के फैलाव के साथ बदलती सभ्यता
कृत्रिम उत्सव और उल्लास के बीच
लाशों की सड़ांध पर
छिड़कती है इत्र बेशुमार
 
कपास-अनाज से ज़्यादा तस्करी है अफीम की
ज्ञान के प्यासे भिक्षुक
श्रमिक आंदोलन के बाद
भिखारी बन कर पैदा लेने लगे
 
एक समय था
आदम की परछाइयों से बातें करता था अदीब
अब आदम ख़ुद बिना परछाइयों के हैं
और ये बातें भी नहीं करते !
 
पूर्वज हमारी परछाईं हैं
इतिहास पर कलम चलाना
अपनी परछाईं को मिटाना है
 
16
1857 की कौमी एकता के बरक्स
1946 का डायरेक्ट एक्शन डे
सवाल-जवाब की तरह दर्ज़ है
 
संसार के महाभोज में
बार-बार परोसा गया है भारत
जब खाली पत्तल बचे
और नीला रंग सुर्ख हो गया
गोरे हड़बड़ाहट में भागने लगे
 
हाथ में रह गया
दीमक लगा पाकिस्तान
और लंगड़ाता हुआ हिंदुस्तान
अपने-अपने खोखलेपन में कराहता हुआ
 
सरहद के आरपार
किसानों और सिपाहियों के
मज़हब मुख़्तलिफ़ हो सकते हैं
पर मौसम और मिज़ाज नहीं.
 
 
17.
यश-अपयश का अंतर्विरोध
अब पहले सा नहीं रहा …
 
प्रमथ्यु का गिद्ध थक चुका है बेतरह
गिलगमेश बुद्ध से मिलकर ख़ुद को ढूंढ रहा है
 
अंधे अदीब को सब साफ-साफ दिखता है
कबीर पोखरण में बौद्ध वृक्ष लगा रहा है
और आदम मोक्ष की बजाए
मृत्यु के अन्वेषण में
ज़्यादा दिलचस्पी ले रहा है
 
जरायमान का फैलाव इस कदर है
कि नारा दीवारें लगा रही हैं
आज हौसलों से नहीं
इश्तेहार से लड़े जा रहे हैं युद्ध
 
युद्ध के बाहर और भीतर
पराजय और दुर्भाग्य
रेल की दो पटरियों-सी
साथ-साथ चल रही है
 
इन सभी दृश्यों के बीच
सवाल अब भी आँखे तरेरे खड़ा है
कि और कितने पाकिस्तान ???????
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यतीश कुमार
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17 comments

  1. उपन्यास मनुष्य की त्रासदी को पूँजीवादी काल में रेखांकित करती है । यही उपन्यास की प्रमुख विशेषता रही है । उपन्यास विधा की उत्पत्ति का कारण भी ।
    इतिहास वर्तमान को प्रभावित करता है , आहत भी ।
    भारत-पाकिस्तान विभाजन एक महा विपदा के रूप में निरंतर हमें प्रभावित करती है । कमलेश्वर के उपन्यास का यही विषय है ।
    उपन्यास की काव्यात्मक आलोचना निश्चित रूप से प्रभावित करती है ।

  2. हर कविता पाठक के मन में एक सवाल लेकर आ रही और साथ जवाब भी…दारा-शिकोह के दौर में आलमगीर के जन्म लेने की रवायरत बदलने की बात करते हुए कवि इतिहास के रक्त बीजो से उपजे इस वर्तमान के भविष्य से सवाल करते हुए पाठक को भी सोचने को विवश करते हुए…लगभग 10 वर्ष पहले पढ़े हुए उपन्यास को अब दुबारा पढ़ना है मुझे इन कविताओं के दृषिटकोण से…इस नए तरीके से उपन्यास को तलाशने के लिए बधाई कवि को यूँही अपने अंदाज में समीक्षा करते रहें ये शुभकामना

  3. उपन्यास मनुष्य की त्रासदी को पूँजीवादी काल में रेखांकित करती है । यही उपन्यास की प्रमुख विशेषता रही है । उपन्यास विधा की उत्पत्ति का कारण भी ।
    इतिहास वर्तमान को प्रभावित करता है , आहत भी ।
    भारत-पाकिस्तान विभाजन एक महा विपदा के रूप में निरंतर हमें प्रभावित करती है । कमलेश्वर के उपन्यास का यही विषय है ।
    उपन्यास की काव्यात्मक आलोचना निश्चित रूप से प्रभावित करती है । अदभुत शब्दों और बिम्बों का प्रयोग ।

  4. शैलजा

    किसी किताब को डूब कर पढ़ना और मूझे लग रहा है यतीश ये कमाल की समीक्षा शैली ईजाद कर लिए है ।कविताएं एक पूरे बटवारें के दर्द का लेखा जोखा जिस तरह से कविता के शक्ल में हमारे सामने आ रही हैं।कमाल है ये

  5. यतीश जी की काव्यात्मक समीक्षाओं की एक सबसे खूबसूरत बात यह है कि वह अगर किताब से इतर भी पढ़ी जाएं तो अपने आप में मुकम्मल कविताएं हैं । और जब हम उनको किताब के संदर्भ में देखते हैं तो बहुत से नए आयाम हमारी आंखों के आगे खुलते हैं कुछ ऐसी बारीकियां जो शायद हमारी नज़र किताब पढ़ते हुए नोटिस नहीं करती वह भी उनकी कविताओं में बहुत कलात्मक तरीके से उजागर की जाती हैं ।यतीश जी बहुत ही शानदार काम कर रहे हैं लगातार। शुभकामनाएं उनको।

  6. शुक्रिया इसे लिखना मेरे लिए एक चुनौती से कम नहीं था
    पढ़ने में फिर लिखने में जितना वक़्त लगा उसे देखकर लगा कि लेखक को कितना वक़्त लगा होगा लिखने में इस महत्वपूर्ण उपन्यास को

  7. मैंने उपन्यास तो नहीं पढ़ा पर उपन्यास के नाम से विषय का अनुमान कर सकती हूं। आपके द्वारा की गई समीक्षा बहुत जानदार और संवेदनशील है। शब्दों का चयन बहुत ही खूबसूरत है। इससे ज्यादा संवेदनशील तरीके से इतने कठिन विषय को नहीं उठाया जा सकता।
    जब कमलेश्वर जी ने उपन्यास लिखा था तब इंटरनेट और सोशल मीडिया नहीं थे और भारत के सिवा शेष देशों में आतंकवाद की चर्चा नहीं थी। पाकिस्तान को उन्होंने राजनीतिक समस्या समझा होगा पर अब पता चल गया है कि पाकिस्तान मजहबी समस्या है। मजहब के लोग किसी तरह की वैचारिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक विभिन्नता नहीं झेल सकते, ना ही दूसरे का अस्तित्व स्वीकार कर सकते हैं।
    इतने अप्रिय विचार को साहित्य में कैसे उठाया जाए, ये आज नहीं तो कल सोचना ही होगा।
    परंतु आपने बिना तिक्तता के सुंदर बिंब रचकर इस विषय को छुआ है, इसलिए बधाई हो।

  8. Shahanshah Alam

    यतीश भाई ने जिस खोजी निगाह से ‘कितने पाकिस्तान’ को देखा है, ऐसी निगाह सबके पास नहीं होती। मेरे पास भी नहीं है। जो अँधेरा हमारे आसपास फैलाया जा रहा है, उसी अँधेरे को चीरने की ख़ातिर हम सबके कमलेश्वर ने यह उपन्यास लिखा था। यतीश भाई ने भी आलोचना की इस कविता वाली शैली में उस अँधेरे को भेदने का सफल प्रयास किया है। साधुवाद है यतीश भाई को 💐

  9. Tejraj Gehloth

    एक अलग तरह की काव्यात्मक टिप्पणी …पहली बार ऐसा कुछ पढ़ने को मिला ..यतीश भाई को सलाम इस लेखन के लिए

  10. मुकेश कुमार सिन्हा

    यतीश जी के इस नई काव्यात्मक समीक्षा शैली का तो जवाब ही नहीं। इसको पढ़कर समझ आता है कि कैसे पूरे किताब को पहले घोंटा गया होगा। बेहतरीन

  11. Jayshree Purwar

    यतीशजी की समीक्षा की शैली लाजवाब है । अपने आप में एक काव्य रचना है !

  12. यतीश जी हर बार अपनी इस शैली से चमत्कृत कर देते हैं. साधुवाद

  13. यतीश जी हर बार इस शैली से चमत्कृत कर देते हैं. साधुवाद

  14. उपन्यास तो पहले पढ़ा था पर आज आपकी इस कमाल की कविता ने, मन के भीतर जमी परतों को खोल दिया.
    अदभुत
    जानकीपुल को साधुवाद
    आपको बधाई

  15. रचना सरन

    “कितने पाकिस्तान ” – कमलेश्वर जी के उपन्यास की यतीश कुमार जी ने बेहद ख़ूबसूरत समीक्षा की है । ये समीक्षा अपने आप में एक पूर्ण काव्य प्रतीत हो रही है ।
    शब्दों का सार्थक प्रयोग और व्यंजनाओं की स्पष्टता समीक्षा को विचारोत्तेजक और पाठन को रुचिकर कर रही है —
    ” आदमी और मनुष्य
    दोनों के शाब्दिक अर्थ एक हैं
    फिर क्यों इनकी आवाज़ें आपस में टकरा रही हैं”– आदमी और मनुष्य का बहुत सटीक प्रयोग किया है ।
    “जब-जब यह आवाज़ आई
    “यक़ीन जानिए”तब-तब
    इंसानियत का क़त्ल हुआ” – कटु सत्य ,जिसपर शायद किसी का अधिक ध्यान नहीं गया ।
    ” अकेले का रोना नदियों का समंदर होना होता है “- बहुत सुंदर चित्रण किया है ।

    ये प्रभावी काव्यात्मक समीक्षा तो स्वयं समीक्षा के योग्य है ।
    साधुवाद💐💐

  16. अद्भुत समीक्षा शैली है यतीश जी की। पढ़ी हुई किताबों को भी फिर से पढ़ने की रुचि जगा जाते। बेहतरीन चित्रण इस उपन्यास का कविता के माध्यम से। “कितने पाकिस्तान” एक कटु सत्य जिसे हमने कभी नकारा,कभी स्वीकारा है।जिस सत्य ने हमें झंझोड़ा है सदियों से फिर हम चुपचाप सो जाते हैं। लेखक कमलेश्वर भी दंग रह जाते इस काव्यात्मक समीक्षा को पढ़कर। शब्द संयोजन,भाव,शैली सब कमाल👌👌।
    कविता में कई जगहों को बार बार पढ़ा। लगता है इन्होंने किताब को सिर्फ पढ़ा नहीं बल्कि एक एक शब्दों को जीया है।
    कवि यतीश जी को एक बार फिर इस सुंदर सृजन के लिए बधाई जो खुद समीक्षा के काबिल है।

  17. ‘कितने विस्थापनों को अभी रोकना है’… आशा और संकल्प के इस बीज से शरू होती है यतीश की समीक्षा।….तहज़ीब की लौ जलती दिखी / वक़्त ने उसके टुकड़े बाज दफा किया / बस सिर कलम एक बार किया… हर पंक्ति, हर अभिव्यक्ति अपनी हथेलियों से जैसे भावना के कई टिमटिमाते दीए को बचाए चल रही हो। ‘अक्षौहिणी-चतुर्दशी विनाश के साथ दिखा / प्रश्नों से उपराम ईश्वर’ …. ‘जबकि यह तो सबको पता है / कि हथियार बनेंगे तो एक दिन चलेंगे भी’ …

    तलवार की नोक पर धर्म को देख / भकाभक कर रो पड़ा बादल …. अद्भुत बिम्ब आयोजन … ‘भकाभक’ शब्द के देशज प्रयोग ने जैसे युग की पीड़ा में एक और पीड़ा जोड़ दी हो। पछतावे और पराजय की ग्लानि ढोते पछता रहा है वर्तमान! इतिहास है जो कभी भी नहीं पछताता

    आइंस्टाइन आज भी पछता रहे हैं / गांधी अपने रास्ते पर अडिग हैं… इतिहास में लिपटी असुरक्षा की आसुरी पहचान के साथ उसके साथ लड़ते रहने का दीप्त संकल्प।

    प्रेम छिपकली की पूँछ है
    बिछड़ कर मरती नहीं
    और ज़्यादा तड़पती है …. में केवल जैविक अस्तित्व की तड़प ही नहीं बल्कि एक अतिवायवीय स्तर पर तड़प का जूझता मनोविज्ञान भी है।

    यादें छोटी-बड़ी नहीं होतीं / बस घटती-बढ़ती आहटें होती हैं …. स्मृतियों की उष्मा से खौलते मन का चित्र है यह।

    … कोई मुश्किल लाइलाज़ नहीं … लेकिन निदान देने वाला ईश्वर / तो पहले एक हो जाए! …. धार्मिक बदगुमानी में सड़ती धार्मिकता का कितना सुन्दर बिम्ब है यह। यह और भी स्पष्ट होता है आगे चल कर जब यतीश ने महसूस किया “सियासत की अलाव में / धर्म का दोगलापन / अपना जिस्म सेंक रहा है’ … ‘धर्म-परिवर्तन भी एक सहूलियत है … जिस तरह जंग के दरम्यान / बदल दिए जाते हैं घोड़े’…

    उपन्यास में वर्णित लोक-जीवन के अस्तित्व की रक्षा और उससे जनित उहापोह उभरती है जब वो कहते हैं – ‘मंदिरों की बाती /और मरघट के दीए के बीच / हम भटकते रहे …’ ‘पूँजी की नाभिनाल से / बाज़ार का कमल खिलता रहा’ … और चिर-परिचित हताशा में लिपटी एक आस उभरती है यह कहते हुए ‘ईश्वर अवतरण का इंतज़ार ही / ज़िंदा रखती है संस्कृति और सभ्यताओं को ‘ … इतिहास के बिम्ब प्रतीक-चिन्हों की तरह उभरते हैं, अपनी एक भाषा और अभिव्यक्ति लिए हुए – प्रमथ्यु, बुद्ध, गिल्गामेश, १८५७ का सिपाही विद्रोह जिसे ‘क़ौमी एकता’ की तरह देखा गया, चाहे वह स्वार्थ से जुड़े इकाईओं का ऐक्य ही क्यों न हो। ‘दीमक लगा पकिस्तान’ और ‘लंगड़ाता हुआ हिन्दुस्तान’ – दोनों ही इतिहास की सच्चाईयाँ हैं जो अभी भी अपने रिसते घावों को एक-दूसरे की जीभ से चाटते हैं। स्वाद की ग्रंथियाँ ‘इश्तेहारों से लड़े जा रहे हैं युद्ध’ की आग में जल गयीं। और अंत में ऐंठी हुई नदियों की ऐंठी हुई भाषा में सांस लेता इतिहास एक अंतहीन सवाल लिए खड़ा रहता है – ‘कि और कितने पकिस्तान??…’ इस काव्यमय समीक्षा का मैं क़ायल तो हुआ ही, यतीश के मनस में जीने वाली संवेदना भी कोई कम आकर्षक नहीं है। ऐसा लगता है जैसे सत्तरह कविताओं के रूप में सत्तरह त्रिपार्श्व रख दिये गए हों उपन्यास की कथा के सामने और हर त्रिपार्श्व से कथा का बहुरंगी, बहुआयामी चित्र उभर कर सामने आ रहा हो। अद्भभुत!!…

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