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प्रमोद द्विवेदी की कहानी  ‘पिलखुआ की जहाँआरा’

‘जनसत्ता’ के फ़ीचर एडिटर रहे प्रमोद द्विवेदी ने अपने कथाकार रूप के प्रति उदासीनता बरती नहीं तो वे अपनी पीढ़ी के सबसे चुटीले लेखक थे। मुझे याद है आरम्भिक मुलाक़ातों में एक बार शशिभूषण द्विवेदी ने उनकी दो कहानियों की चर्चा की थी, जिनमें से एक कहानी यह थी। भाषा और किरदार को बरतने का भाव देखिए। पढ़ने का आनंद आ जाता है- मॉडरेटर

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लालकिले में घूमते-घूमते शहनाज तैयबा उस हिस्से में आ गई जहां जहांआरा बेगम यानी औरगंजेब की बहन और शाहजहां की दुलारी बेटी का कढ़ाईदार लहंगा रखा हुआ था। बदरंग हो चुका कढ़ाईदार लहंगा, जिसके आकार से शहनाज अंदाज लगा रही थी कि जवानी में जहांआरा की कमर दोहरी रही होगी, जिस्म लंबा, भरा हुआ…। वह लहंगा देखकर भूल गई कि आगे भी बढ़ना है। उसका मरद खालिद चिढ़कर बोलाः ‘अरे आगे बढ़। यहीं शाम कर देगी क्या। टैम पर निकलेंगे, तभी आठ बजे तक पिलखुआ पहुंच पाएंगे। अभी किनारी बाजार से सामान भी उठाना है।’

लेकिन शहनाज तो वाकई उस बड़े से शाही लहंगे में समा गई। उसकी कल्पनाओं में अनब्याही रह गई जहांआरा की तस्वीर घूमने लगी- बड़ी-बड़ी आंखों वाला गोल चेहरा। सिर पर मलिका वाला ताज, रंग एकदम सुर्ख। गाल पर मोटा-सा तिल। नाक छोटी, मगर चेहरे पर फबती हुई। लंबे काले बाल। नाक में बड़ी नथ और कान में लासानी चमक वाले झुमके। उसे लगा जैसे सपनों में वह जहांआरा को देखते आई है। उसे बेगम से मोहब्बत हो गई। थोड़ी देर के लिए उसे लगा कि जहांआरा की रूह उसके अंदर आ गई है और दिल्ली की नई  हुकूमत को कोसते हुए कह रही है- यह लालकिला तो हमारा था। यह तख्तेताउस, ये बुलंद दरवाजे, सजी-धजी हाट और लालकिले की प्राचीर पर पहला हक हमारा है। नए दौर का कौमी परचम फहरता दिखता है तो मैं सिसकियों के साथ दौरे-मुगलिया याद करती हूं…।

वह इतना ज्यादा सोच में पड़ गई कि पीछे खड़ी एक साड़ी वाली थुलथुल औरत ने उसे धक्का देकर आगे बढ़ाया और कहाः ‘ओय बेगम साहिबा, रास्ता छेंककर क्यों खड़ी हो…।’ शहनाज को अच्छा लगा कि उसे किसी ने बेगम साहिबा कहा। हालांकि उस औरत ने उसका मुसलमानी हिजाब और सुधबिसरी हरकत देखकर ही तंज में उसे बेगम कहा था। पर शहनाज को पल भर ऐसा लगा कि सत्ररहवीं सदी की रियाया उसके पीछे चल रही है और उनमें से गुस्ताख, कनीजनुमा औरत को उसका बेगम होना रास नहीं आ रहा।

इस आवाज से थोड़ा सहमकर वह आगे बढ़ गई। लेकिन ध्यान आया कि उसका आदमी तो यहां है ही नहीं। वह घबरा गई। शादी के बाद पहली बार पिलखुआ से दिल्ली आई थी। पेट में पहले बच्चे की कुनमुनाहट शुरू हो गई थी। गनीमत थी कि अभी पेट जरा-सा भी नहीं उचका था। लेकिन घर से हिदायत मिलनी शुरू हो गई थी कि-संभल कर चलियो, भारी कुछ ना उठइयो। गरम-सरद से बच कर रहियो। बस की पीछे वाली सीट पर मत बैठियो…।

थोड़ी-सी दीनी तालीम के बाद बारहवीं तक पढ़ी होने के बावजूद वह बेपढ़ी, देहाती औरत की तरह घबराने लगी। उसने हड़बड़ा कर पर्स से मोबाइल निकाला तो वह भी गिर पड़ा। बगल में खड़ी एक गुजराती  औरत ने उसे उठाकर दिया और हंसीः बच गया। उसने कुछ भी सुने बिना मोबाइल लिया और ‘शौहर मियां’ पर अंगुली दबा दी। दस बार घंटी बजने के बाद खालिद ने जब फोन उठाया तो वह बिछुड़े बच्चे की तरह आपा खोकर बरस पड़ीः  ‘कां छोड़ के भाग गए…पहली बार दिल्ली आई हूं पता है ना…।’

उधर चिढ़ती हुई आवाज आईः ‘और तू कहां मर गई। मोबाइल में देख मेरी कितनी मिस काल हैं। मुझे जोर से पेशाब लगी थी, मैं इधर निकल आया। अभी इधर हूं जहां रात का शो होता है। तू कहां है? ’

खालिद झूठ बोल रहा था। उसे तलब लगी थी। वह पान मसाला खाने के लिए बाहर आया था।

शहनाज गुस्सा गईः ‘काए, तू पिलखुआ से पेशाब थामे बैठा था।’

खालिद चिढ़कर फोन पर कमीनी-कुत्ती करने लगा- ‘और तू कहां मर रही थी उस लहंगे में…।’

खालिद की मरदाना तल्खी से शहनाज के अंदर घुसी जहांआरा की रूह फना हो गई। वह डरते डरते हुए बोलीः ‘मैं तो वहां से हिली कहां, लैंगे के पास ही थी…तू ही दीदा गड़ाए पंजाबी औरतों के पीछे घसटा जा रहा था।’

इस इल्जाम पर खालिद और चिढ़ गया। उसने आगे-पीछे खड़ी औरतों की चिंता किए बिना कहाः ‘अबे सुन, ज्यादा हिनहिना मत…  आगे बढ़कर मैदान के पास आ जा। मुझे किनारी बाजार वाले गुप्ता अंकल के यहां भी जाना है…।’

शहनाज की जहांआरा तबीयत को एक और झटका लगा। मन ही मन कहा- हरामी फोन पर कैसी छिछोरीगीरी कर रहा है। रात में चढ़ेगा तो कूं-कूं करता बोलेगाः शहनाज मेरी जान, मेरी मलिका, मेरे ख्वाबों की शहजादी…। तेरी जबान पर इल्ली पड़े।

खालिद की गालियों से वह हताश हो गई। वह गिन रही थी कि यहां  उसके जैसी पर्दानशीं औरतें कितनी हैं। तादाद देखकर वह समझ रही थी कि यहां हिंदू मरद-औरतें और बच्चे ज्यादा हैं। एकबारगी उसका मन किया कि सारे मुसलमानी कपड़े उतार सजी हुई हिंदू लड़की की तरह घूमे। लेकिन हिम्मत ही नहीं हुई। सोचने लगी, एक बार खालिद से पूछकर देखती हूं…पर कमीना मानेगा नहीं। वैसे तो कैटरीना का फैन है, पर बीवी के लिए पूरी पर्दादारी चाहिए। जब खालिद का अच्छा मूड होता तो वह कहती भी थीः- यह बढ़िया, तुम मियां मोबाइल पर तो नंगी फोटू देखते हो, पर बीवी पूरी लुकी-मुंदी चाहिए।

खालिद को तलाशने में उसे दस मिनट लग गए। वह खार खाए कुर्सी पर अधलेटा-सा बैठा था,। बगल में उसने पान मसाला खाकर रजनीगंधा और तुलसी का पाउच फेंक रखा था। अच्छा ही हुआ मुंह भरा था, वरना उसे देखते ही दो चार गालियां और दे डालता। पर यह भी क्या कम कनकना बेगम थी। आते ही पहले पुड़िया उठाई और खुदमुख्तार टीचर की तरह बोलीः ‘ये क्या है… स्वच्छ भारत की ऐसी-तैसी करने में लग गए। क्यों मोदी का बैंड बजा रहे हो…बेचारा सफाई करे-करे मर रिया है, और तुमने ठान रखी है कि….। ’

पहले से गरमाया खालिद फिर पैजामे से बाहर हुआः ‘चल बकवास मति कर…मोदी-मोदी कर रही है…। एक दिन कोई रगड़ देगा तुझे चौड़े में…चल तुझे करावलनगर छोड़ कर आता हूं खाला के घर। अपने केजरीवाल की पत्तेचाटी करके अइयो पिलखुआ। ’ असल में कुछ दिनों से वह केजरीवील की फैन बन गई थी। उसकी बिजनौर वाली खाला का लड़का इश्तियाक केजरीवाल की पार्टी के साथ लगा रहता था और कई ईरिक्शा खरीद कर  और असम से एक बांग्लादेशी औरत लाकर   दिल्ली में मजे कर रहा था।

आपस में जोर-जोर से बात करते हुए दोनों अगल-बगल देखते भी जा रहे थे। उन्हें अंदाज था कि भले ही वे अपने पुरखे शाहजहां और औरंगजेब के लालकिले में खड़े हैं। पर आसपास की प्रजा नए साहिबे-आलम नरेंद्र मोदी की है। दो गूजर सरीखे कसदार लड़के उनकी बात सुनकर आपस में कुछ कहने लगे थेः भाव यही था कि मोदी ना होता तो ये स्साले लालकिले से मूतते।

इन लड़कों की बेआवाज हंसी समझते हुए खालिद ने अपनी शोख बीवी से कहाः ‘अबे, थोड़ा चुप्प भी रहा कर। आसपास देखकर बोला कर, टाइम ठीक नहीं है। ’

वह चौंककर बोलीः ‘ मैंने ऐसा क्या कह दिया।’

खालिद ने उसका मुंह बंद करते हुए कहाः ‘चल पराठे वाली गली चलकर पराठे खाते हैं, फिर गुप्ताजी के यहां से अपना सामान लेकर वापस मैट्रो से आनंद विहार आ जाएंगे।’ उसने बताया कि उसके अब्बा भी गुप्ता जी से सामान ले जाते थे। इसलिए घरेलू रिश्ता है। लाखों का माल उधारी में देते हैं। पिलखुआ, हापुड़ के सारे अपने लोग यहीं से माल उठाते हैं।

गुप्ताजी प्रख्यात सुखबासी लाल गुप्ता एंड संस के मालिक थे और उनके लहंगें, गोटे, झालर पूरे देश में जाते थे। खालिद अपनी दुकान के लिए यहीं से माल ले जाता था। पूरे पचास साल का पारिवारिक कारोबारी नाता था गुप्ताजी से।

शहनाज अपनी ससुराल में में गुप्ताजी का नाम अकसर सुनती थी। जिज्ञासावश उसने खालिद से पूछाः ‘इधर सारे हिंदू से ही आप सामान लेते हो। किनारी, गोटा, झालरें, मोती, लहंगे…। इस बिजनेस में अपने लोग कम हैं क्या।’

खालिद ने कहाः ‘अरे हां भई, यहां सारा काम बनियों के पास है। तू इतनी परेशान क्यों है। दुकानदार हिंदू, कस्टमर मुसलमान, वैसे ही जैसे पिलखुआ में हमारे सारे बड़े कस्टमर तो हिंदू ही हैं- बनिया, पंडत, ठाकुर। चल तुझे दिखाऊंगा कि गुप्ताजी के पास लहंगे लेने के लिए कलकत्ते और बगंलौर तक से लोग आते हैं। ये जहांआरा का सड़िल्ला लहंगा तो तू भूल जाएगी।’

अब इस सरस वार्तालाप से उनकी मोहब्बत जाग रही थी। खालिद गाली देने वाला इंसान लग ही नहीं रहा था। लहंगे का नाम सुनकर शहनाज का मन हुआ कि रोशनख्याल औरत की तरह लपक कर मरद का चुम्मा ले ले। पर भीड़ के आलम के बीच हिम्मत ही नहीं हुई। हां, इतना जरूर कहाः ‘बदतमीजी छोड़ दो, आप गाली देते हो तो घिन छूटती है, पर ये बातें करते हो लगता है कि यहीं चपका लूं।’

मेरठ से बीए पास मोहम्मद खालिद को शरारत सूझीः ‘अब ये सारी एनर्जी तू रात के लिए रख। अभी तेरा-मेरा कोई भरोसा नहीं…फिर भी यह जान ले कि जहांआरा से अच्छी तकदीर तेरी है। कम से कम तू शौहर का मजा तो ले रही है। वह तो ताज पहने, लहंगा पहने, तलबगार औरत की तरह मर गई। यह इल्जाम लेकर कि उसका बाप शाहजहां खुद ही उसके खाविंद का रोल निभाता रहा।’

थोड़ी देर तक जहांआराना खुमार में रही शहनाज के कलेजे पर पत्थर सा गिरा,  ‘ये क्या बकवास है। कोई बेटी के साथ ऐसा करता है क्या?’

खालिद शरारत पर आमादा थाः ‘आदमी बड़े कुत्ते होते हैं, तू है किस दुनिया में। किसी मुगल शहजादी की शादी हुई क्या…घर में ही सब चलता था…।’

-‘अरे चल्ल बकवास मति कर…’

– ‘बकवास नहीं, हकीकत है मेरी जान। बादशाह शाहजहां से एक बार उनके मुहंलगे दरबारियों ने पूछा था तो उनका जबाव यही था कि जो दरख्त हमने लगाया है, उसके फल खाने का हक भी हमीं को है।’ खालिद इतिहासकार की तरह बोला।

शहनाज तारीख के इस नागवार आख्यान से मायूस हो गईः ‘पर यह सब आपको कैसे मालूम ? ’

खालिद हंसाः ‘ अरे भाई, मैं तलीमयाफ्ता सेठ हूं। मैंने बीए में हिस्ट्री पढ़ी है। बचा-खुचा इस मोबाइल और गूगल ने बता दिया है। तू तो बस वाट्सअप और यूट्यूब देखकर माथा पीटती रहती है। हिंदुओं को गरियाती रहती है। तेरी तरह मदरसे से आए भाई लोग यों ही तसल्ली कर लेते हैं कि इस मुल्क में हमने बादशाहत का मजा लिया है। अब गुलामी और जिल्लत के दिन देखने पड़ रहे हैं। मेरी कही मान, लहंगे का नशा छोड़, तुझे लखनवी चिकन का बढ़िया सलवार-सूट दिलवाते हैं, अपने आलोक खत्री साहब की दुकान से। बड़े भाई हैं अपने, सस्ते में मिल जाएगा।’

अब तक वह बुरके में कसमसा गई थी। एक जिद लेकर बोली- ‘ मुझे सलवार-सूट में ही घूमना है मार्केट में। बस में बैठते ही बुर्का पहने लूंगी, अल्ला कसम।’

इस मासूम और अहानिकर जिद पर खालिद मुस्करा पड़ाः ‘ मैंने कब रोका है। तू ही जब से खुर्जा होकर आई है, अल्ला-अल्ला ज्यादा करती है। जब देखो कहती है- मदरसे के इमाम साहब ने ये तालीम दी थी। कहते थे, बदन दिखाकर चलने वाली औरतें फाहिशा होती हैं। उन्हें दोजख देखना पड़ता है। उनकी औलादें दीन से भटक जाती हैं। ’

शहनाज समझ गई कि खालिद ने उसकी राह आसान कर दी है। वहीं एक खंबे की आड़ लेकर उसने बुरका उतारा और बैग में घुसेड़ दिया।

सामने एक नई ताजातरीन शहनाज थी। अंदर की खुशबू ने हवा को भी निहाल कर दिया। जो कन्नौजी इत्र कैद था, वह बाहर आ गया। काजल के घेरे से सजी आंख पूरी तरह दिखी तो लगा मृगनयनी की उपमा ऐसी ही नहीं बनी होगी। वली दक्खनी ने शायद ऐसे ही नैन देखकर लिखा होगाः जादू हैं तेरे नैन ग़ज़ाला से कहूंगा..

इस नई शहनाज को देखकर खालिद बहक गयाः ‘ क्या बात है, मेरी कैटरीना मिक्स करीना? ’

दुबली-पतली, 20 साल की शहनाज को मैरून-सलवार सूट में देखकर वह पहली बार दिल से बोलाः ‘जानेमन, पिलखुआ की जहांआरा तो तुम लग रही हो। बस अपनी नाक के इस छेद में नथ और डाल ले।’

लखनऊ की शिया लड़कियों की तरह फक्क गोरी शहनाज की नाक बचपन में गांव के दुर्गा सुनार ने छेदी थी। पर नाक में कुछ पहनना अच्छा नहीं लगता था। अम्मी जान हमेशा कहतीं कि बिना कील-नथ के औरतों का मुंह चूतर जैसा लगता है। पर उसने नाक की कील बचपन में ही उतार कर फेंक दी थी। आज पहली बार खालिद ने कहा तो उसका मन हुआ कि चांदनी चौक से एक नथ और नग जड़ी कील ले ली जाए।

अब वह दिल्ली के इस तारीखी इलाके में हसीन खत्री लड़की की तरह घूम रही थी। खालिद उसे छेड़ता जा रहा थाः ‘सुनो, जानू, मेरी जहांआरा माथे पर कहो तो एक लाल बिंदिया लगा दूं।’

‘अरे नहीं यार मरवाओगे क्या…’ शहनाज ने ऐसे घबराकर कहा, जैसे माथे पर बिंदी लगते ही इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा।

-‘अच्छा नजर वाला टीका लगा देते हैं।‘

-‘अरे छोड़ो भी…’

-‘अच्छा एक सेल्फी लेते हैं।’

-‘नहीं-नहीं, राज फाश हो जाएगा..’

-‘कोई चोरी तो कर नहीं रहे…’

-‘हिजाब पहन कर मैट्रो में सेल्फी लेंगे।’ मजाक में बोली शहनाज

फिर दोनों हंस पड़े।

चांदनी चौक में खालिद पहली बार अपनी हसीन बीवी के साथ घूम रहा था। अपने अंदर की किस्सागोई जगाते हुए उसने शहनाज को बतायाः ‘तेरी जहांआरा बेगम के प्यारे भाई दारा शुकोह को इस सड़क पर गरम मौसम में खजहे हाथी पर बैठाकर घुमाया था आलमगीर औरंगजेब ने।… और हां एक बात और जान ले, जिस चांदनी चौक में तू आज घूम रही है वह भी जहांआरा की देन है।’

लेकिन शहनाज अब इस इतिहास को सुनना नहीं चाहती थी। झल्लाकर उसने कहा कि अरे छोड़ो पुरानी बातें, ये बताओ टिक्की कहा अच्छी मिलेगी। पेट में सारंगी बज रही है।

–‘ये ल्यो, मैं कहता हूं तो पुरानी बातें…खुद ही जहांआरा के लहंगे के पीछे पड़ गई हो।’

शहनाज खामोश थी। इसके बाद दोनों पराठे वाली गली की तरफ चले गए। अब तक गुप्ताजी तीन बार फोन कर चुके थे कि ‘ खालिद मियां तुम्हारे लिए हल्दीराम से खाने-पीने का सामान मंगाया है। अरे भाई, पहली बार अपनी बीवी यानी हमारी बहूरानी के साथ आ रहे हो।’

खालिद ने पराठे का आर्डर कैंसिल करते हुए कहाः ‘पंडिज्जी जरूरी काम आ गया है, फिर आता हूं।’

शहनाज अनमने भाव से उठी। पराठे की खुशबू ने उसकी जबान को तर कर दिया था।

तेज कदमों से वे दोनों गुप्ता जी दुकान की ओर बढ़ गए। खालिद ने जाते ही भूमिका बनाईः ‘चाचा जी, जल्दी सामान पैक करवा दो। शाम होते-होते घर पहुंचना है। ’

गुप्ताजीः ‘कौन से घर।’

खालिदः ‘पिलखुआ।’

गुप्ताजीः ‘अमां मियां पहली बार बहू को लेकर आए हो, और सिर पर पांव रखकर भाग रहे हो। हद कर दी।’

शहनाज कौतूहल से दुकान में टंगे लहंगों और शेरवानी को देख रही थी। चमकीले किनारे-गोटे देखकर उसकी आंखें चमक रही थी।

गद्दी के पास ही खानपान सज गया। गुप्ता जी ने पान से भूरी हो चुकी पूरी खीसें दिखाते हुए कहाः ‘हमारे यहां यही सब मिलेगा, कहो तो दरीबा से कुछ और मंगवाऊं…। बहू रानी जो कहेंगी, वही आएगा।’

खालिद अभिभूत था। खासतौर पर अपनी जहांआरा बेगम की आवभगत से। उसे इसकी उम्मीद ही नहीं थी। इसी बहाने शहनाज की मुगलिया खुमारी भी धीरे-धीरे उतर रही थी।

फिलहाल शहनाज इतनी भूखी थी कि उसने तय कर लिया था कि पूरा पेट भरने के बाद ही कुछ बोलेगी। खाते-खाते वह शीशे में कैद एक नायाब लहंगे की तरफ भी देख लेती थी।

गुप्ता जी का घर ऊपर था। दुकान नीचे। बगल में एक घर लेकर  गोदाम बना रखा था। शहनाज की जिज्ञासा ताड़ते हुए वे बता रहे थेः ‘रंगीले बादशाह और बहादुर शाह जफर तक इस दुकान की मशहूरी रही। शहजादियों-बेगमों के लहंगे-घाघरे इसी दुकान के कारीगर बनाते थे। जार्ज पंचम का जब दरबार लगा तो उनके साथ आई फिरंगी औरतें यहां से सामान ले गईं और आज भी सर जान वाल्टर नामक अंग्रेज हाकिम की भेजी चिट्ठी हमारे पास है।’

उन्होंने दीवार पर लगी एक फोटो भी दिखाई जिसमें राजकुमारी अमृतकौर, विजयलक्ष्मी पंडित उनकी दुकान के बाहर खड़ी हैं। सारे दुकानदार हाथ जोड़े उनके सामने खड़े हैं।

दुकान क्या, यह भी एक तारीख का पन्ना था। शहनाज ने उत्सुकता से पूछाः ‘वह जहांआरा का लहंगा कहां बना होगा।’

इस सवाल पर गुप्ताजी हंसेः ‘बेटा, शाहजहां के दौर में तो सारे कारीगर आगरे से आए थे। लालकिले में उनकी रिहायश का बंदोबस्त था। शहजादियों-बेगमों का अपना बाजार था। तब हमारे पुरखे फर्रूखाबाद से आए होंगे। अब बक्सों में पुराने कागज देखें तो पता चलेगा कि हम कब आए थे। पर इतना बताते हैं कि हमारे पूर्वज लाला गजानन प्रसाद वैश्य ने मुगल कोतवाल अदावत अली को भी उधार दिया था।’

शहनाज को इन बातों में रस तो आ रहा था, पर आत्मा लालकिले के उस लहंगे पर अटकी थी।

खालिद ने उसके हसीन खयालों पर पर कंकड़ी फेंकीः ‘चल जहांआरा की खालाजान, पिलखुआ वाली बस पकड़नी है।’

सेठजी ने फौरन उसका सामान पैक किया। खालिद ने तीन चेक काटे। यानी तीन किश्तों में।

इतने में गुप्ताजी का नौकर यासीन ऊपर से एक और पैकेट ले आया। मालिक के कान के पास जाकर बोलाः माई साहिबा ने दिया है, दरद के मारे उठके आ नहीं पा रही हैं।

खालिद समझ रहा था कि ये सेठ जी नेग-सेग वाली कुछ खानदानी  कारगुजारी करने जा रहे हैं।

समझते हुए भी उसने बहाना कियाः ‘चाचा, मैट्रो में जाना है। फिर बस पकड़नी है। इतना सामान कहां ले जा पाएंगे।’

इस बार गुप्ता जी ने दिलदार मगर कड़क ताऊ की तरह डपटते हुए कहाः ‘अमां, एक पैकेट से कौन बोझा बढ़ रहा है। यह लहंगा है बहूरानी के लिए। जहांआरा वाले जैसा तो नहीं, पर हमारे पिताजी बताते थे कि बहादुर शाह जफर की बेगमों के लिए लहंगे यहां से भी जाते थे। यह लहंगा खासतौर पर जीनत महल के लिए बना था। मगर गदर की मारामारी और कटाछान में सारा हिसाब बिगड़ गया। काफी पैसा दरबार में फंस गया। ये लहंगे पहनने वाले लोग ही नहीं रहे…।’

शहनाज तो जैसे सचमुच गदर में खो गई। जीनत महल का नाम भी उसने सुना था। जहांआरा नहीं, तो जीनत ही सही। उसका मन तो किया कि यहीं एक बार जी भरके इस लहंगे को देख ले। पर हिम्मत ही नहीं हुई।

इससे पहले कि खालिद बकबकाता, सेठ सुखबासी लाल गुप्ता ने फरमान सुना दियाः ‘बेगम जीनत महल के लहंगे को लेकर दिल्ली मैट्रो से जाना सख्त मना है। इस नायाब निशानी को लेकर हमारी इनोवा जाएगी पिलखुआ तक।’

खालिद सब समझ रहा था। शहनाज के खुशनुमा चेहरे को देख मुस्कराए जा रहा था। गाड़ी में सामान रखते हुए बोलाः ‘तेरे तो मजे हो गए पिलखुआ की जहांआरा।’

और शहनाज उस लहंगे वाले पैकेट को सीने से लगाए शर्माए जा रही थी। सचमुच नई दुल्हनिया की तरह।

 

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