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उर्मिला शिरीष की कहानी ‘बिवाइयाँ’

उर्मिला शिरीष 1980-90 के दशक की पढ़ी जाने वाली लेखिका रही हैं। मेरे मेल पर उनकी यह कहानी आई है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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दुकान पर पाँव रखने की जगह नहीं थी। शहर का पुराना बाज़ार। छोटी सँकरी सड़कें। सड़कें क्या गलियाँ कह सकते हैं। दस कदम आगे बढ़े कि एक नयी सँकरी सड़क शुरू हो जाती। पुरानी ऊँची कई मंजिला इमारतें। पुराने ज़माने की छोटी-बड़ी दुकानें इन्हीं इमारतों के नीचे जमी हैं। इनकी दरो-दीवारें बताती हैं कि पीढिय़ों से यहाँ के लोग पुश्तैनी धंधा कर रहे हैं। स्कूटर, मोटर साइकिल, ऑटो और कारों का बेरोक-टोक आना-जाना। मस्ती और बेपरवाही का आलम यह कि लोग सड़क के बीचोबीच खड़े जूस पी रहे हैं या गरमागरम कचौडिय़ाँ खा रहे हैं या ठेेले से फल सब्जी खरीद रहे हैं। ऐसी ही बेपरवाह भीड़ को चीरते हुए वह सर्राफे की उसी दुकान पर जा पहुँची, लेकिन दुकान के भीतर-बाहर का दृश्य चौंककर पड़ी… कहीं दूसरी दुकान में तो नहीं आ गयी। उसने निगाहें उठाकर बोर्ड पर लिखी इबारत पढ़ी, वही दुकान थी। बाहर जूतों और चप्पलों का ढेर लगा था। इस दुकान में जूते उतारकर ज़मीन पर बैठना पड़ता है। जाजम पर धूल-मिट्टी, पाँवों के निशान लग जाते फिर भी यह जाजम दूसरे दिन ही बदल जाती। यह दूसरा मौका था जब वह अपने जेवरात गिरवी रखने आई थी। यद्यपि सर्राफा बाज़ार में दूसरी दुकानें भी थी; पर यह उसे एक विश्वसनीय परिचित के माध्यम से मिली थी। दूसरा यहाँ बैठने वाला सेठ तथा उसके दोनों बेटे सज्जनता से बात करते थे। सेठ जो दुबला-पतला होकर भी एकदम स्वस्थ और सचेत दिखता था। उसके चेहरे पर झुँझलाहट… हँसी… आत्मीयता या विनम्रता जैसे भाव दिखाई नहीं देते थे। हाँ, उसके बेटे अलबत्ता हल्की-सी मुस्कुराहट के सार सिर हिलाकर नमस्ते कर लिया करते थे। देने वाला देने के भाव से ही अपना अव्यक्त प्रभाव सामने वाले पर डाल देता है, भले ही बदले में वह कोई वस्तु क्यों ना ले रहा हो…। यहाँ आते वक्त उसको अव्यक्त तनाव जकड़ लेता था। उसके भीतर पहचाने जाने की शर्म थी।

दुकान के करीब पहुँचते ही वह चारों तरफ देख लिया करती थी कि कहीं कोई परिचित तो नहीं देख रहा है। क्योंकि… बाहर बोर्ड पर लिखा था, ‘यहाँ जेबर गिरवी रखे जाते हैं।Ó वह जानती है कि इस दुकान पर आदमी तभी आता है जब उसके सामने कोई दूसरा विकल्प न रह जाता हो। परिचितों को बीच ‘बड़े आदमीÓ की बनी-बनाई साख को वह ध्वस्त नहीं करना चाहती थी। न जाने कितने तूफान गुज़र गए पर… कभी उसने अपनी आप बीती जगत के सामने नहीं सुनाई। इस वक्त यही अन्तिम रास्ता बचा था। इसी अन्तिम विकल्प पर चलते हुए वह यहाँ खड़ी थी। उसने साड़ी का पल्लू ढीला किया। पसीना पोंछा। तेज धूप, उमस और गर्मी के कारण उसका जी मिचला उठा था। दुकान के भीतर अपने लिए जगह तलाशती वह एक कोने में खड़ी हो गई। सामने जो लोग थे वे किसी दूसरे देश के लग रहे थे। दुबले-पतले। हड्डियों का ढाँचा मात्र। सभी के गाल पिचके हुए थे। आँखें अन्दर धँसी हुई थीं। दाँत पीले बदबूदार और टेढ़े-मेढ़े। मैली धोती। झूलता हुआ कुर्ता। किसी ने गमछा सिर पर बाँधा हुआ था तो किसी ने कंधे पर डाला हुआ था। उन सबके बाल रूखे खड़े थे जैसे सूखी घास हो। आसमान की सारी तपिश उनके चेहरों पर उतर आई थी। आँखों में ठहरा गहरा अवसाद… चिन्ता और असमर्थता उन्हें जड़वत बनाए हुए थी। वे सब खामोश थे। उनकी खामोशी के पीछे छाया निराशा का भाव था। उसने देखा आज सेठ के अतिरिक्त लड़कों को काम पर लगा रखा था। वे तेज़-तेज़ हाथों से बही-खाते उठा रख रहे थे। वह प्रतीक्षा कर रही थी कि उन तीनों में से कोई उसकी तरफ देखे तो वह बताये कि उसे भी जल्द जाना है। आधे घंटे बाद सेठ के बड़े लड़के ने उसे अन्दर आने का इशारा किया। जैसे-तैसे वह दुकान के अन्दर एक कोने में दीवार से टिककर बैठ गई। पसीने की गंध भरी थी। उनके कपड़ों से धूल, मिट्टी और पसीने की बू आ रही थी। बूढ़े जवान और प्रौढ़ किसान जो खेतों में बीज बोने के लिए पैसों की व्यवस्था करने आए थे, वे सब चुपचाप बैठे थे।  वह सोचने लगी ये यहाँ क्यों आए हैं? क्या इन्हें सरकार से मिलने वाली सहायता का पता नहीं है… या सहकारी समितियों की भूमिका से ये अनभिज्ञ हैं…? उसका मन प्रतिप्रश्र कर बैठा। अगर पता भी हो तो क्या मिलने वाला है? पचास-साठ वर्षों में तमाम योजनाएँ, घोषणाएँ और व्यवस्थाएँ किसानों को कितना समृद्ध कर पाई हैं? क्या आज भी किसान सूखा और बाढ़ से नष्ट हुई फसलों के कारण आत्महत्या नहीं कर रहे हैं…? कौन ले रहा है उनकी सुधि? जो खोज-खबर लेते हैं वे या तो फैक्ट्री के लिए ज़मीन का सौदा करते हैं या बहुमंजिला इमारतों के साथ एक बड़ा बाज़ार खड़ा कर देते हैं। सेठ ने काँच की टेबल को पीछे खिसकाया ताकि बैठने की जगह निकल सके। काँच के नीचे चाँदी के सुन्दर जेरात चमक रहे थे और बाहर उसी चाँदी के पुराने जेवरातों को ढेर लगा था…। पता नहीं इनमें से कब किसने… किन खुशियों को पूरा करने के लिए इन्हें खरीदा होगा। अपनी पत्नी और बेटी की मुस्कान देखी होगी…। वही जेवर… आज बेरौनक से पड़े थे… बिकने के लिए या गिरवी रखने के लिए।

”कितना चाहिए?’ सेठ ने सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे पर निगाहें गढ़ाकर पूछा।

”तीन हज़ार…।’

”तीन हज़ार… तीन हज़ार तो नहीं हो पाएँगे।’

”तो…ऽऽ।’

”ढाई हज़ार तक हो पाएँगे।’ सेठ ने बेलिहाज होकर कहा।

”खाद बीज लेना है… हल बखरना है। घर में भी ज़रूरत है।’ किसान बोलता जा रहा था पर सेठ को उसकी ज़रूरतों से क्या लेना-देना।

”इतना कम…’ वह बुदबुदाया।

”पच्चीस परसेंट कटता है… यह चाँदी भी मिलावटी है।’ सेठ तटस्थ होकर बोला।

”जल्दी लौटा देंगे।’ वह लगभग गिड़गिड़ाकर बोला।

”गिरवी रखने वाला हर आदमी यही कहता है।’ सेठ उसके दयनीय होते चेहरे को बिना देखे बोला।

”परके साल सूखा पड़ रहा था। बैंक वालों को भी देना था।’ वह हताश होकर बोला। उसकी आवाज़ ठीक वैसे ही डूबती जा रही थी, जैसे गहरे कुएँ में भारी बर्तन डूबता जाता है। उभरी नसों से भरे हाथों को यूँ फैलाकर वह बातें कर रहा था जैसे… सेठ को विश्वास दिलाना चाह रहा था।… या नसभरे हाथ देखकर सेठ का मन पिघल जाएगा। बगल में बैठी उसकी पत्नी सूनी-सूनी आँखों से सेठ की तरफ देखे जा रही थी। उसके जीवन भर के ‘स्त्रीधनÓ का मूल्य, मात्र तीन हज़ार रुपये भी नहीं था…। याचक का भाव उसके पति की आँखों में उतर आया था।

”बोलो क्या करना है? हमारे पास इतना टाइम नहीं है। देख रहे हो न… लोग कब से बैठे हैं?’ सेठ ने उसकी रकम नीचे रखते हुए कहा! किसान सोच में डूब गया। चिन्ता की रेखाएँ उसके माथे पर फैलती जा रही थीं। वह सेठ की दया पर था। क्या पता वह देने से मना ही न कर दे…? फिर क्या होगा? फिर क्या होगा खेत का… उसके बच्चों का… उसकी पत्नी का? भविष्य की कल्पना करके वह सिहर उठा। पिछले सालों में उसके बैल… भैंस… गाड़ी सब कुछ बिक चुका था और अब, इस बार बची-खुची रकम को बेचने की नौबत आ गई थी।

”यदि गिरवी रखते हैं तो ब्याज क्या लगेगा?’ हिम्मत करके पूछा उसने।

”अरे भाई, वही ढाई परसेंट महीने का। यहाँ सभी के लिए एक जैसा नियम है।’ सेठ झुँझला उठा।

”रेट बढ़ गए हैं सेठ जी?’ कहते-कहते उसकी आवाज़ दब गई।

”इससे अच्छा तो बेच ही दो। ब्याज-बट्टा में सब चला जाएगा।’

साथी किसान ने उसे समझाया। उसने पत्नी की तरफ देखा उसकी सहमति के लिए। वह खामोश निगाहों से रकम को देखे जा रही थी। जैसे उसकी अन्तिम आशा और ताकत वही जेवर हों।

”और क्या कुछ लाए हो?’ सेठ ने उसकी पोटली पर निगाहें गढ़ाते हुए पूछा।

”ये हैं…’ उसने टूटी-फूटी चीज़ों को सामने रखते हुए कहा।

”ये तो गिलट की है।’ सेठ ने चीज़ों को घिसकर परखने के बाद कहा।

”गिलट है…?’ अब किसान की रही सही आशा भी क्षणी होने लगी। जैसे पानी में डूबते व्यक्ति को भँवर घेर लेती है उसी तरह वह स्वयं को डूबता हुआ महसूस कर रहा था।

”पूरे तीन हज़ार दे दो सेठ जी। हमारा काम बन जाएगा। फसल पर चुकता कर देंगे। हम तो तुम्हारे पुराने ग्राहक हैं। हमारे माँ-बाप भी तुम्हारी दुकान पर आते थे। पैसा लेकर कहाँ जाएँगे।’ एक-एक शब्द को चबा-चबाकर बोल रहा था वह।

सेठ चुप रहा। उसके यहाँ इस तरह की भावुकता भरी बातों की कोई जगह न थी। और ऐसी बातों से प्रभावित होकर उसे अपना धंधा चौपट थोड़ी न करना था…।

किसान ने डबडबाई आँखों से पत्नी की तरफ देखा…। औरत ने पाँवों में पड़े लच्छों को टटोला। लच्छे मोटे-मोटे थे।  सुन्दर थे। अब भी चाँदी की चमक बरकरार थी। भाई ने दिलवाये थे। पूरे गाँव की महिलाओं ने इन लच्छों की प्रशंसा की थी, तभी से वह ऊँची साड़ी पहनती थी… ताकि लच्छों की सुन्दरता और चमक दिखाई दे। उसके पाँवों की सुन्दरता बढ़ाने वाले लच्छे भविष्य के लिए, उसके परिवार को जि़न्दा रखने के लिए किसी बड़े बुजुर्ग की तरह सहारा बनने जा रहे थे। उसने चुपचाप लच्छे निकाले और आगे बढ़ा दिए। उधर सेठ लच्छों को परख रहा था। घिस रहा था और इधर दोनों धड़कते दिल से सेठ के जवाब की प्रतीक्षा कर रहे थे।

”अब भी कम पड़ रहे हैं, पर दे देते हैं।’ सेठ ने ठण्डी आवाज़ में कहा। एहसान जताना वह नहीं भूला। पति-पत्नी के मुँह से एक साथ… धन्यवाद का भाव जताते हुए शब्द निकले- ”हे राम!’

उसने देखा…

अब जल्द से जल्द बही-खाते के पन्ने पलटे जाने लगे। हिसाब-किताब लिखा जाने लगा। लकीरें खींचीं जाने लगीं। नाम-पता रकम… की संख्या… कीमत… रसीद नम्बर सब कुछ यानी उसके अतीत… वर्तमान और भविष्य उन बही-खातों में $कैद हो गए थे। बही-खातों के पन्ने कम बचे थे। जैसे-तैसे खेत सूखते जाएँगे… फसलें नष्ट होती जाएँगी, किसानों के हाथ खाली होते जाएँगे वैसे-वैसे इन बही-खातों के पन्ने भरते जाएँगे…। उन सबकी तरह वह भी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी। कब सेठ या उसके बेटे उसको बुलायें और वह अपना सामान निकाले। बैंक की किश्त भरने के लिए आज उसका अन्तिम दिन था अन्यथा दोनों (जिस बैंक में पैसा जमा कराना था और जिस बैंक से किश्त निकाली जानी थी) बैंक बाउंसिंग चार्ज लगा लेंगे और कम्पनी वाले अपनी पैनाल्टी ले लेंगे। इस सबके बावजूद भी अगला लोन मिलने में दिक्कत आएगी सो अलग। हर पल उसका तनाव बढ़ता जा रहा था।

”थोड़ा टाइम लगेगा।’ इस बार सेठ के बेटे ने नज़र उठाकर देखते हुए कहा… ”आप चाहें तो मार्केट हो आएँ।ÓÓ

इसका मतलब उसे और इन्तज़ार करना था।

लेकिन वह वहीं बैठी रही।

भीड़ धीरे-धीरे खिसकते हुए उसके करीब होती जा रही थी।

वह किसान पैसे लेकर खड़ा हुआ तो उसने तपाक से अपनी जगह बना ली। उसने तीन हज़ार रुपये बड़े जतन से कपड़े में लपेटकर जेब में रखे फिर बचा हुआ सामान दूसरी जेब में।

”चल उठ’ उसने पत्नी से कहा जो अब और अधिक उदास और सुस्त हो गयी थी। किसान अँगूठे पर लगी स्याही को रगड़-रगड़कर पोंछ रहा था जैसे स्याही न हो… कोई गंदा धब्बा लग गया हो उसके अँगूठे पर, उसके पूरे शरीर पर! उसकी घरवाली ने दोनों हथेलियाँ ज़मीन पर टिकायीं और धीरे से खड़ी हो गई। देर तक बैठे रहने से उसके पाँव सुन्न हो गए थे… पर उससे भी ज्य़ादा निर्जीवता आ गई थी लच्छे उतारने के कारण। भारी कदमों से- पर हकीकत में भार से हल्के हुए- वह बाहर निकली। उसने देखा महिला साड़ी को खिसकाकर अपने नंगे पाँवों को ढाँप रही थी। पर उसकी निगाहों से उसके पाँव छुपे नहीं। पाँव में पड़ी बिवाइयाँ गहरी और लम्बी-लम्बी थीं। सख्त सूखी एडिय़ाँ बिवाइयों के कारण दर्द भी देती होंगी। उसके चेहरे पर ढलते हुए यौवन का फीका रंग दिखाई दे रहा था।… बेवक्त… पकी उम्र ने उसकी देह में दस्तक दे दी थी। उन सबके बीच बैठी वह हरे-भरे लहलहाते खेतों के बीच ‘गाँव की गोरी’ की कल्पना कर रही थी। हँसती… खेलती… इठलाती… झूला झूलती… गाँव की सुन्दर चपल नवयौवना… उफ्! उसके मुँह से लम्बी उच्छवास निकल पड़ी। उसने पर्स टटोला। इन भूखे-नंगे ज़रूरतमंद लोगों के बीच अपनी चीज़ जाने की आशंका बार-बार मन में मन उठी थी। उसका ध्यान पुन: उस महिला की एडिय़ों में पड़ी बिवाइयों की तरफ चला गया जिन्हें वह बार-बार सहला रही थी… इस तरह कोमलता के साथ… मानो दिलासा दे रही हो। उसे लगा औरत की बिवाइयाँ चौड़ी से चौड़ी होती जा रही हैं… इतनी चौड़ी… इतनी लम्बी इतनी गहरी कि वे बिवाइयाँ खेत में बदल गईं… दरारों में फटता खेत… रूखा-सूखा वीरान खेत… जिसे न पानी मिला था न खाद… न बीज न छाया…। जिसका सौन्दर्य, सौंधापन और हरीतिमा खत्म हो गई थी। जिसमें परिन्दों का आना ठहर गया था। जिसके बीच खड़े होकर न कोई हँसता था न गाता था न सपने देखता था। फिर उसे लगा… वह खेत एक विराट जगत में बदल गया है जिसके ऊपर तमाम तरह की पार्टियाँ ढोल-नगाड़े पीट रही थीं… जिसकी छाती पर कोई त्रिशूल गढ़ रहा था तो कोई रक्तपात मचा रहा था। तो कोई बेकसूर लोगों को मार रहा था। सब तरफ बिवाइयाँ, सब तरफ दरारें… जिनसेे खून और मवाद गिर रहा था। उफ्! उसने घबराकर चारों तरफ देखा… सामने वही सब थे… और सेठ उसे आवाज़ लगा रहा था, ”बाई साहब! लाइए… आपको दो-ढाई घंटे इन्तज़ार करना पड़ा। दो-चार महीने यही हाल रहेगा।’

”एक तो ये लोग गहने भी ऐसे लाते हैं जिन्हें जाँचने-परखने में टाइम लग जाता है। फिर घंटों सोचने-विचारने में लगा देते हैं।’ सेठ अपनी परेशानी बताते हुए लकीरों पर लकीरें खींचता जा रहा था। यकायक ही आज उसे सेठ गम्भीर सहज स्वभाव वाला न लगकर लुटेरा, डाकू, कमीना, धूर्त और न जाने क्या-क्या लग रहा था… महाजनों का चतुर सोफिस्टीकेटेड वंशज। उसे लगा सेठ उसके एक-एक जेवर को यूँ ही रखता जाएगा। और एक दिन सेठ की तिजोरियों से भरा यह कमरा ऊपर तक भर जाएगा। ब्याज पर ब्याज लगाकर मूल ही वसूलता रहेगा। उसने आसपास बैठे किसानों को गौर से देखा, जो अपनी-अपनी पोटलियों को कसकर हाथों में दबाए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे और सेठ बही-खातों के पीछे बैठा चेहरा झुकाए पैनी निगाहों से गहनों को जाँचता-परखता निश्चित-सा दिखाई दे रहा था।

दूसरे दिन की सुबह। प्रात: छ: बजे उठकर वह नियमित रूप से पेपर पढ़ती है। बरामदे में बैठना उसे अच्छा लगता है। चिडिय़ों के कलरव कभी-कभार सुनाई दे जाते हैं। पर आज उसका सिर भारी था। आँखों में भी दर्द था। फिर भी अखबार पढऩे से वह स्वयं को न रोक सकी। अखबार का प्रथम पृष्ठ पलटा ही था कि बड़े-बड़े अक्षरों में छपा था; किसानों द्वारा सामूहिक आत्महत्या। उसके दिमाग में सनसनाहट फैल गई। खबर पढ़ते हुए उसकी निगाह किसानों की तस्वीर पर टिक गई। कतार में पड़ी लाशें! यह क्या! उसने उलट-पुलटकर बार-बार उन चेहरों को देखा। आश्चर्य है कि उन सबके चेहरों में उसे कल सर्राफे में मिले किसान का चेहरा दिखाई दे रहा था… लेकिन यह तो दूसरे प्रदेश की घटना थी… इसके बावजूद आश्चर्य कि उन सबसे उनका चेहरा इतना अधिक कैसे मिल रहा था? क्या मृत्यु, दु:ख, संताप और विभीषिका देशकाल और स्थान की सीमाओं को तोड़ देती है…? उसे लगा कल जिन बिवाइयों से उसने हल्का-हल्का खून रिसता देखा था, उनसे अब रक्त की धारा फूट रही है और उस रक्त के समन्दर में सेठ और नेताओं के हज़ारों-हज़ार खून से रंगे हाथ उनकी गरदनों की तरफ बढ़ते जा रहे हैं… उसे लगा पूरा ब्रह्माण्ड घूम रहा है… धरती घूम रही है… चारों तरफ अँधेरा बढ़ता जा रहा है…।

”माँ क्या बात है…? क्यों बड़बड़ा रही हो…?’ सामने खड़ी बिटिया उसके कंधे झकझोर रही थी और वह विस्फारित नेत्रों से उसे देखे जा रही थी…।

: 093031&32118]

urmilashirish@hotmail.com

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