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अपनी सही चमक जानने वाला तारा बनना है!

देवेश पथ सारिया ताइवान के एक विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं, और हाल के दिनों में सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं, वेबसाइट्स-ब्लॉग्स में इनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं, सराही गई हैं। इस लेख में उन्होंने युवा लेखन पर अपने कुछ विचार प्रकट किए हैं- मॉडरेटर
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जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को संभावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते पर हैं और उस रास्ते का वर्तमान पड़ाव शानदार दिख रहा है। संभावना बताये जाने का मतलब सिरमौर कह देना नहीं होता। किसी युवा का रास्ता आगे उस भव्य पहाड़ की सफ़ेद चोटी पर ख़त्म होगा या नहीं, यह बहुत सी बातों से तय होगा।
यदि आप अपनी शुरुआती सफलता को ही शिखर मान बैठे हैं तो आप आगे बढ़ेंगे कैसे ? जो आगे बढ़ेंगे उन्हें रास्ते में पथरीले रास्तों से पानी बहता मिलेगा जिसमें पैरों के पास से सांप सर्र से गुज़रते होंगे। बीच-बीच में ‘राइटर्स ब्लॉक’ के सहरा भी आयेंगे। सांप इस सहरा की रेत में भी होंगे। हर बार डसे जाने से भी आपको बचना है।
यदि किसी मुकाम पर आप मान भी लें कि आप लेखन की उत्कृष्टता की सीमा पर हैं तो आप इस पर बने कैसे रहेंगे ? आपके सामने चुनौतियाँ होंगी। बढ़ती हुई उम्र और बदलते समाज के साथ आपका सच बदलेगा। सच हर बार सार्वभौमिक नहीं होता, कभी-कभी व्यक्तिपरक भी होता है। आपकी रचनाओं के बिम्ब बार-बार इस्तेमाल होकर, घिसकर पुराने पड़ जायेंगे। बचपन से जवानी तक बटोरा हुआ सारा सांद्र अनुभव जब आप शुरुआती लेखन में उंडेल देंगे तो आगे क्या करेंगे? जवाब है, यात्राएं। ढेर सारी यात्राएं। अपने भीतर और बाहर, दोनों। यह भी मानना होगा कि व्यक्ति किसी से पूरी तरह सहमत नहीं हो सकता, ख़ुद से भी नहीं। आपके दो साल पुराने स्वरुप की आपके आज के स्वरुप से भेंट हो जाए तो आप दोनों लड़ पड़ेंगे। कला के क्षेत्र में वही बना रह पायेगा जो बदलते परिवेश में ढल जायेगा। जी, यही वजह है जो अमिताभ बच्चन को आज भी लोकप्रिय बनाती है। वे वक़्त के मुताबिक़ निरंतर समकालीनता को पहचानते रहे और ख़ुद को तराशते भी।
एक और समस्या सामंजस्य बिठाने की भी है। यानी सह-अस्तित्व की कला सीखना । जैसे खाद्य ऋंखला में हर कड़ी ज़रूरी है, वैसे ही हर तरह का लेखन भी। यदि सब एक जैसा लिखेंगे तो आपके लिखने का औचित्य ही क्या रह जाएगा ? कुछ नए लेखकों को यह भ्रम होता है कि जिस शैली में वे लिख रहे हैं, वही दीर्घजीवी है। यह तो आने वाला समय तय करेगा। जो समय आया ही नहीं, उसकी करवट हम कैसे भांप लें। यदि इतिहास से सन्दर्भ लेकर भविष्य का अनुमान लगा भी रहे हों तो निर्णय अपने ही पक्ष में क्यों ?
एक पाठक के तौर पर मुझे प्रतिरोध की कविता देर से समझ आती है। यह मेरी कमज़ोरी है। स्त्री विमर्श की अधिकाँश कविताओं से मेरे पाठक को संतुष्टि नहीं होती थी तो इस विषय पर मैं गद्य पढ़ने लगा हूँ। जब मुझे प्रतिरोध या स्त्री विमर्श की कविता लिखने के विचार आते हैं तो मैं लम्बे समय तक अनिश्चय की स्थिति में बना रहता हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे भीतर के पाठक की मेरी इन कविताओं पर वही प्रतिक्रिया होगी, फिर भी मैं लिखता हूँ। हर व्यक्ति अपने लेखन में अपना जिया जीवन, अपने क्षेत्र का सांस्कृतिक प्रभाव, अपने पुरखों तक का इतिहास आदि साथ लेकर आता है। मेरे मन में बीज बन उभरे विचार तभी उस वांछित मुकाम तक पहुँच पाएंगे जब उन्हें मेरे मन से ही खाद, पानी और मिट्टी मिले। उन्हें मैं किसी को गोद तो नहीं दे सकता।
जनवादी कविता के साथ-साथ प्रेम कविता ने आम जनता, ख़ास तौर पर युवा पाठकों को साहित्य से जोड़ा है। नफरत के इस दौर में भी कुछ लोग प्रेम कविताओं को ग़ैर-ज़रूरी मानते हैं। उन्हें इसी तरह के आरोपों का सामना करने पर पॉल मैकार्टनी के लिखे गीत के ये बोल पढ़ने चाहिए :
“तुम सोचते हो कि दुनिया में पर्याप्त प्रेम गीत हैं
मैं अपने चारों तरफ देखता हूँ और पाता हूँ कि ऐसा नहीं है
कुछ लोग दुनिया को बुद्धू प्रेम गीतों से भर देना चाहते हैं
इसमें बुरा क्या है?”
क्या आप उल्कापिंड बनना चाहते हैं? एकाएक चमक बिखेरकर नष्ट हो जाता हुआ? मैं कहूंगा कि आपको ग्रह भी नहीं बनना चाहिए क्योंकि वे सूर्य से उधार पायी चमक को परावर्तित कर बिखरा देते हैं। आप किसी और की नक़ल करके अपनी पहचान नहीं बना सकते। जैसे ट्विटर पर ज़्यादातर हिंदी लिखने वाले गुलज़ार या किसी अन्य की नक़ल करते हैं। उन्हें पढ़कर कुछ समय बाद गुलज़ार या कोई और ही याद रह जाता है। आपको तारा बनने की कोशिश करनी चाहिए और ज़रूरी नहीं कि सबसे चमकदार। आप तारा बनेंगे तो आपको अपनी चमक का सही अंदाज़ा हो जाएगा।
अति आत्मविश्वास से इतर एक दूसरी समस्या भी है जिससे आज का हर युवा (सिर्फ लेखक नहीं) जूझ रहा है, वह है आत्म संदेह। जब मैं कविता में नया आया था, मुझे लगता था कि साहित्य में एक संगठनात्मक तंत्र है जो यह तय करता है कि कोई रचना सबके लिए अच्छी होगी या बुरी । बहुत कम रचनाएं ऐसी होती हैं जो लगभग सबके अनुसार अच्छी या बुरी हों। आम तौर पर रचनाओं का सच व्यक्तिपरक होता है। किसी भी कला के क्षेत्र में ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना, तुंडे-तुंडे सरस्वती’ का सिध्दांत काम करता है। मैं यहां सच्चे आंकलन का ज़िक्र कर रहा हूँ, साहित्य की राजनीति की बात बिलकुल नहीं। कोई आपके लिखे को कमज़ोर बताये तो आपको अपना मूल्यांकन करना है, तटस्थ मूल्याँकन। हर बार रचना ही कमज़ोर हो, ऐसा भी नहीं। बस आप एक दूसरी पसंद रखने वाले व्यक्ति से बावस्ता थे। यहीं वह बात मौजूं हो जाती है, ऐसा तारा बनने की जिसे अपनी चमक का सही पता हो। हालांकि लेखक को समय-समय पर यह जाँचना होगा कि उसके और पाठक के बीच कोई धूल तो नहीं आ गयी, जिसने धुंधला कर दिया हो उसकी रचना का प्रभाव। एक उदाहरण देना चाहूँगा। अप्रैल 2020 में काफ़ी बार प्रयास करने के बाद ‘सदानीरा’ में मेरी कविताएं प्रकाशित हुईं। कुछ लोगों ने उनकी प्रशंसा की वहीं एक आलोचक ने उन्हीं कविताओं को पढ़कर कहा कि मैं लंबी रेस का घोडा नहीं हूँ। मैं सीख रहा हूँ आलोचना को हजम करना और यह जाँचना भी कि वह कब सही है। आँकलन करने से मुझे उन कविताओं में कमी नहीं नज़र आयी पर मैंने पाया कि कुछ और लिखी जा रही रचनाओं में कुछ और धैर्य बरतना होगा।
आत्म संदेह के पीछे आलोचना के डर के साथ-साथ किसी हद तक धैर्य की कमी भी है ही। आजकल इंटरनेट पर खूब ट्रॉलिंग करने वाली युवा पीढ़ी भी दरअसल आत्म संदेह के मनोविज्ञान से राब्ता रखती है। यह एक ऐसा दौर है जहां हर रोज़ सोशल मीडिया पर वैलिडेशन पाने की होड़ होती है। जब कुछ नहीं सूझता तो इतने सारे जवान लोगों की भीड़ में से कुछ धैर्यहीन युवा अलग दिखने की चाहत में, पहले से स्थापित व्यक्तियों का मज़ाक बनाकर स्वयं को स्थापित करने की फ़ौरी कोशिश करते हैं। इसी को वर्तमान युग में ऑनलाइन ट्रॉलिंग कहा जाता है। सच्चाई यह है कि बाहर शेर की तरह गुर्राते हुए ये लोग भीतर से असुरक्षित महसूस कर रहे होते हैं । इनमें से अधिकांश इंसोम्निया का शिकार भी हैं। कभी ट्विटर पर जाइये, ये ट्रॉल्स देर रात को ज़्यादा सक्रिय होते हैं।
अति आत्मविश्वास और आत्म संदेह के बीच एक बहुत पतली डोरी है। डोरी के इस तरफ आप खुशफहमी के बादल में उड़ जाएंगे और उस तरफ संदेह की अंधेरी खाई में गिर जाएंगे । व्यक्तिगत तौर पर मैं दोनों ही चीज़ों का सामना करता हूँ। तारों और ग्रहों के शोध का मेरा काम ऐसा है, जिसमें महीनों तक मैं नालायक सा महसूस करता हूँ, जब किसी समस्या पर पेंच फंसा हुआ हो। कभी-कभी मैं किसी ग्रह के मौजूद होने की संभावना तलाश रहा होता हूँ और ऐसे समीकरण पर फँस जाता हूँ, जिसके बारे में मदद करने वाला सैकड़ों किलोमीटर दूर तक कोई नहीं होता। ऐसे में किसी पत्रिका में छपी कविताओं पर मिली प्रशंसा मुझे आत्म संदेह से निकालती है। पर, बाहर का यह रास्ता भी फिसलन भरा होता है। एक मरहम की तरह मिली इस प्रशंसा में ही खो नहीं जाना होता। काम पर भी लौटना है , अपनी कविता की रूह भी निरंतर टटोलनी है और उसे सजीव रखना है।
एक तरीक़ा है जो मैं जीवन में संतुलन पाने के लिए कभी-कभी अपनाता हूँ। जब मैं निराश होता हूँ तो गूगल पर अपना नाम तलाश कर अपना अब तक का किया-धरा देख लेता हूँ और जब हवा में उड़ने लगता हूँ तो अपने से बेहतर लोगों का नाम तलाश करता हूँ।
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~ देवेश पथ सारिया
 
email:deveshpath@gmail.com
 
 
 
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