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विवाह को ‘जीवन बीमा’ कहने वाली लेखिका प्रियंवदा देवी

 

सुरेश कुमार हिंदी के नवजागरणकालीन साहित्य से जुड़े अछूते विषयों, भूले हुए लेखक-लेखिकाओं पर लिखते रहे हैं। आज स्त्री विमर्श की एक ऐसी लेखिका पर उन्होंने लिखा है जो महादेवी वर्मा की समकालीन थीं। लेकिन उनकी चर्चा कम ही सुनाई दी। इस लेख में प्रियंवदा देवी नामक उस लेखिका की अत्यंत साहसिक और महत्वपूर्ण  किताब ‘विधवा की आत्मकथा’ का विश्लेषण सुरेश कुमार ने प्रस्तुत किया है- मॉडरेटर

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बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में हिन्दी साहित्य में बाल विवाह, विधवा विवाह, बेमेल विवाह, भ्रूणहत्या, व्यभिचार और स्त्री शिक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उभरा था। जहां इस दशक में एक ओर पुरुष लेखक स्त्री समस्या पर विचार कर रहे थे वहीं दूसरी ओर स्त्रियां खुद स्त्री वैचारिकी की मुकम्मल जम़ीन तैयार कर रही थीं। हिन्दी आलोचकों ने इस दशक के पुरुष लेखकों के स्त्री कलम का नोटिस तो लिया लेकिन लेखिकाओं का लेखन इनकी दृष्टि से ओझल हो गया है। हिंदी साहित्य में स्त्री लेखन के सूत्र महादेवी वर्मा की आभा के इर्दगिर्द खोजे जाते हैं। जबकि बीसवीं सदी के शुरुआती दशक में रामेश्वरी नेहरू( संपादक ‘स्त्री दर्पण’), श्रीमती उमा देवी नेहरू, विद्याधरी जौहरी, मनोरमा देवी, विमला देवी पंजीकर, कुमारी सत्यवती, ललिता पाठक(मशहूर लेखक श्रीधर पाठक की बेटी) श्रीमती सीतादेवी (संपादक  ‘महिला सुधार’)] श्रीमती तेजरानी दीक्षित, श्रीमती चंद्रादेवी लखनपाल  एम॰ ए॰  और न जाने ही कितनी  लेखिकाएं ‘स्त्री मुद्दा’  बड़ी बेबाकी से उठा रही थी। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि सन् 1935 में जब महादेवी वर्मा ‘ऋंखला की कड़ियाँ’ ‘चाँद’ पत्रिका में किस्तवार ‘अपनी बात’ के अंतर्गत लिख रही थीं, उससे पांच साल पहले सन् 1930 में श्रीमती प्रियंवदा  ने ‘विधवा की आत्मकथा’ नामक किताब लिखकर पुरुषवादी तंत्र के मुखौटे को बेनकाब कर दिया था। पता नहीं हिन्दी के आलोचकों को सचतेन और आत्मनिर्भर स्त्रियों का लेखन क्यों रास नहीं आता है? इस लेखक में श्रीमती प्रिम्यवदा देवी की किताब ‘विधवा की आत्मकथा’ पर विचार किया जायेगा।

 श्रीमती प्रियंवदा  देवी हिन्दी नवजागरणकाल की बड़ी महत्वपूर्ण लेखिका थीं। एक ऐसी लेखिका जिन्होंने  बीसवी सदी के पुरुष लेखकों से जुदा स्त्री विमर्श की जमीन तैयार की थी। सन् 1930 में प्रियंवदा  देवी द्वारा लिखित एक अदभुद किताब ‘विधवा की आत्मकथा’ प्रकाशित हुई। इस किताब में श्रीमती प्रियंवदा  ने विधवा विवाह, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह और व्यभिचार की समस्या को बड़ी शिद्दत से उठाया था। इस लेखिका ने धर्म गुरुओं, मंहतों और पितृसत्ता के पोषकों की बड़ी तीखी आलोचना प्रस्तुत की है। प्रियंवदा  देवी का कहना था कि पुरोहित और धर्मध्वजा वाहक स्त्रियों को पूजने का प्रवचन सुबह-शाम बड़े जोर-शोर से देते हैं लेकिन हकीकत यह है कि पुरोहित और पुजारी स्त्रियों को पतित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते है। यह दिलचस्प बात है कि जहां एक ओर पुरोहित स्त्रियों को ‘देवी’ का तमगा प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर स्त्रियों की स्वाधीनता पर पहरा भी बिठा देते हैं। और, यही पुरोहित और पोथाधारी स्त्रियों के अधिकारों पर तोप और तलवार चलाकार उसे मनुष्य होने की गरिमा से वंचित भी कर देते है। श्रीमती प्रियंवदा  देवी लिखती हैं:

‘‘आज अपनी दुःख-दर्द भरी आत्मकथा आप लोगों को सुनाऊँ और दिखा दूँ कि जिस जाति के शास्त्रकार डंके की चोट पर बता रहे हैं, कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवताःउसी जाति में, उसी शास्त्र वचन को मानने वाले समाज में, आज नारी-जाति की क्या अवस्था हो रही है और आज नारी-जाति किस तरह पद-पद-पर अपमानित और लांछित हो रही है। ऐं! नारी को रत्न कहा है-हाय हिन्दू समाज! क्या इस रत्न का यों ही आदर होता?  क्या रत्न इसी तरह पैरों से ठुकराया जाता है?

प्रियंवदा अपनी आपबीती में बताती हैं कि उनका विवाह माता-पिता ने एक वृद्ध आदमी से करवा दिया था। प्रियंवदा  देवी ने विवाह के लिए बड़ा ही दिलचस्प शब्द ‘जीवन बीमा’ प्रयोग करती है। प्रियंवदा  अपने पति के सम्बन्ध में लिखती बताती है : ‘‘हिंदू धर्म के अनुसार वर का नाम लेना मना है, पर क्या करूं, इस समय लाचारी, अतएव कहना ही पड़ता है जिन महोदय के साथ मेरा जीवन बीमा हो रहा था,उनका नाम श्री अमरनाथ था। आपकी उम्र इस समय लगभग चासील वर्ष की थी।’’  किताब में यह जानकारी दी गई है कि अमरनाथ की यह दूसरा विवाह था। प्रियंवदा  देवी का जिस व्यक्ति से जीवन बीमा अर्थात विवाह हुआ था। वही व्यक्ति कुछ दिन बाद विधवा बनाकर स्वर्ग सिधार गया था। भारतीय समाज में विधवा विवाह का प्रचलन न होने से विधवाओं को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। प्रिम्यवंदा देवी ने ऐसे पुरोहित और पोथाधारियों के चरित्र को उघाड़ कर रख दिया है जो नैतिकता की आड़ में स्त्रियों का यौन शोषण कर उन्हें पतित कर डालते थे। यह बात तथ्यपरक है कि विधवा स्त्रियों को पुरुष समाज बड़ी ललचाई दृष्टि से देखता था। पुरोहितों से लेकर सगे-सम्बन्धी तक ने विधवा स्त्रियों का अपना नर्म चारा समझ लिया था। अचंभित कर देने वाली बात यह है कि पुरुषों की कामलीला के लिए स्त्रियों को ही जिम्मेदार माना जाता था। बीसवी सदीं के महान संपादक रामरिख सिंह सहगल ने ‘चाँद’ अप्रैल 1923 के संपादकीय में पुरुषवादी मानसिकता के संबंध में लिखा है:

‘‘हम तो यहां तक कहेंगे कि भारतवर्ष में स्त्री-जाति के सम्मान करने की प्रथा और मर्यादा का, साधारण जनता में  तो अभाव है ही मगर दुःख के साथ कहना पड़ता है कि अगर किसी सड़क से कोई भी महिला निकल जाए या किसी सभा में कोई स्त्री जाकर बैठे तो उस सड़क और सभा के शायद ही दो चार भले मानुस ऐसे होंगे जो उसकी तरफ व्यर्थ टकटकी लगाने की गुस्ताखी न करें। इन प्रांतों में पुरुषों को स्त्रियों का सड़क पर चलना, सभा समाजों में भाग लेना आदि काम कुछ ऐसे अनोखे मालूम होते हैं कि टकटकी बन्ध जाना कुछ स्वाभविक सा हो गया है। अगर किसी मुहल्ले में किसी स्थान पर विधवाएं एकत्रित की जाए और आस-पास के आदमियों को मालूम हो जाए कि अमुक स्थान पर प्रत्येक दिन स्त्रियां या विधवाएं एकत्रित होंगी तो, खेद के साथ कहना पड़ता है, कि बुरे आदमी ही नहीं, बल्कि ऐसे भी दो चार आदमी जो सज्जन कहलाते हैं आसपास टहलते हुए नजर आवेंगे। तफसील में न जाकर निर्भीकता के साथ हम कह देना चाहते हैं कि स्त्रियों के प्रति सम्मान,सचरित्रता और पवित्रता दिखाने में हमारा पुरुष समाज इतना कमजोर है कि स्त्रियों के उपकार और विधवाओं के उद्धार के लिए, ऐसे आदमी भी जो इनकी दुर्दशाओं का अनुभव करते हैं इस डर से कोई कदम नहीं बढ़ा सकते कि कहीं पुरुष समाज की निन्दनीय अपवित्र प्रेरणाएं असहाय विधवाओं को कुमार्ग और दुष्चरित्रता के अधिकतर यातनापूर्ण और लज्जाजनक गढे़ में न डाल दे, परदा तोड़ने का सुधार, स्त्री शिक्षा का काम, विधवा सहायता की स्कीम अर्थात स्त्री जाति के उपकार की जितनी भी बाते हैं सभी पुरुष समाज की इस निन्दनीय नीचता और नैतिक दुर्बलता के कारण या तो आरम्भ ही नहीं होती और अगर आरम्भ हुईं भी तो थोड़े दिनों में ही अपमान जनक असफलता को प्राप्त हो जाती हैं।’’

हकीकत यह थी की विधवा आश्रम में रहने वाली स्त्रियों के साथ यौन शोषण आम बात हो गई थी। इन आश्रमों में रहने वाली स्त्रियां कामी पुरुषों की दुष्टता से कभी-कभार गर्भवती भी हो जाया करती थी जिनके भ्रूण कभी नाले में और कभी गलियों में पाए जाते थे। चांद पत्रिका में तमाम स्त्रियों की चिठ्ठी-पत्री छपी जिनमें मंहतों की पोल खोली गई थी। चांद नवम्बर 1929 ‘कलकत्ते का सामाजिक जीवन’  शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख में स्पष्ट तौर पर बताया गया कि मंहत और पुजारी स्त्रियों के साथ पापाचार में लिप्त है। इस लेख में लिखा गया :

‘‘ इसके अलावा मन्दिरों में लुच्चे पुजारियों तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा बहका कर, फुसला कर मन्दिर के अंधेरे कमरों में भगतिनों पर कभी-कभी जो बलात्कार होते हैं, सो अलग। मन्दिरों में अंधेरा काफी रहता है। बेचारी स्त्रियों घूँघट के कारण कहीं ठोकर खाकर रास्ते में गिर भी पड़ती है। मन्दिर के दरवाजे से लेकर मूर्ति तक पहुँचने के रास्ते में छेड़छाड़ का अवसर मिल जाता है। और दर्शन करके रात को जब भी भीड़ लौटती है तो मनचले स्त्रियों को छेड़ते जाते हैं, और प्रायः एकाध महीने में उनका प्रयास पूरा हो जाता है!’’ 

प्रिम्यवदा बताती हैं कि विधवा स्त्रियों के लिए ससुराल काल कोठरी और मायका कैदखाना था। लेखिका सवाल उठाती है कि यह पुरुष समाज विधवा स्त्री को कुदृष्टि से क्यों देखता है? और, उन्हें बात-बात पर प्रताड़ित कर व्यभिचारणी और कुल्टा के विशेषणों से नवाज कर उनके सीने को छलनी करता रहता है। इस बात से सब परिचित हैं कि पुरुषों ने स्त्रियों को लांछित करने के लिए तरह-तरह के उटपटांग मुहावारे गढ़े हैं। यह लेखिका स्त्री विरोधी मुहावरों का प्रबल विरोध करती हैं। इस लेखिका कहना था कि इन मुहावरों का घोषित लक्ष्य स्त्रियों का कमतर आंकना हैं। प्रियवंदा देवी ने लिखा था:

‘‘लोग कहते हैं नारी नरक की राह बताने वाली है। इस तरह न जाने कितनी तरह के वाक्य नारी जाति को-दबा रखने के लिए गढ़ लिए गये हैं। पराधीन, बहुत दिनों से दुर्दशा और आक्रमणग्रस्त हिन्दू जाति की नारियां ये वाक्य सुनते-सुनते अभ्यस्त हो गई हैं। उन्होंने अपने को वास्तव में दोषी और पराधीन समझ लिया है। यह सब क्यों हुआ है-पुरुषों ने सदा से नारी जाति को दबाकर रखना चाहा है, पुरुषों की स्वार्थपरिता का यह भी एक ज्वलन्त उदाहरण है।’’

 यह लेखिका ऐसे लोगों की कड़ी आलोचना और निंदा करती की है जो स्त्रियों को ‘कुल्टा’ की संज्ञा देते हैं। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियों पर कोई लांछन लगाने से पहले पुरुषों को अपने भीतर  झांक कर देखना चाहिए कि वे खुद कितने पावन और सद्चरित्र हैं। यह महान लेखिका दो टूक शब्दों में कहती हैं कि यह पुरुष समाज खुद तो जानवरों की तरह गली-गली में जूठन चाटता फिरता और दोष उसे केवल स्त्रियों में दिखाई देता है। इस लेखिका ने पुरुषों के ‘सदाचार के तावीज़’ के एक एक मूंगे की कलई खोलकर रख दी थी। नैतिकतवादी होने का दंभ भरने वाले इस पुरुष समाज का वास्तविक रुप कैसा था? प्रियंवदा  के इन शब्दों से अंदाजा लगाया जा सकता है:

‘‘पर सारा पाप क्या स्त्रियों में ही घुसा रहता है? किसी स्त्री पर थोड़ा भी अपवाद सुनते ही आप लोग निकाल बाहर करते है और स्वयं इस तरह गली का जूठन चाटा करते हैं- क्या इससे आपके समाज में दोष नहीं फैलता?’’

प्रियंवदा  देवी का आकलन था कि यहां औरतों पर ‘आठ पहर और चौसठ घड़ी’  पुरोहित और सन्यासी सामाजिक अन्याय ढाया करते हैं। लेखिका ने यह भी बताया कि स्त्रियों की दुर्दशा और कुदशा का जिम्मेदार यह पतित पावन पुरुषवादी तंत्र है। लेखिका ने इस किताब में हिंदू विधवाओं के अलक्षित दुख और कष्ट का चित्रण बड़ी शिद्दत के साथ किया। लेखिका बताती है कि पुरोहित और पोथाधारियों ने स्त्रियों का वजूद ही नष्ट कर दिया है। यहां पुरोहित और चौधरियों ने स्त्रियों पर न जाने कैसे-कैसे प्रतिबन्ध लगा रखे हैं। यहां तक विधवा स्त्रियां अपनी इच्छा से वस्त्र भी नहीं ग्रहण कर सकती हैं। वे परिवार के विवाह आदि अवसर में शामिल नहीं हो सकती हैं। क्योंकि यह समाज शुभ अवसर पर विधवाओं का शामिल होना प्रलय के तौर पर देखता था। लेखिका ने सवाल उठाया है कि शास्त्रों की सारी मर्यादा केवल स्त्री पर क्यों लागू होती है ? शास्त्रों के नियंताओं ने पुरुषों के लिए मर्यादाएं क्यों नहीं बनाई? एक विधुर पुरुष तो बड़े शान से शुभ अवसरों में शामिल हो सकता है लेकिन विधवा स्त्री क्यों नहीं? लेखिका लिखती है:

 ‘‘हाँ, मैं विधवा थी- मेरे लिए  ये सभी बातें शास्त्रविरूद्ध थीं। विधवा होंने से ही रंगीन साड़ी तक पहनने का अधिकार चला जाता है। विधवा होने से मानो मन भी सफेद हो जाता है। मन बदले या न बदले अथवा मन की वासनाएं, अभाव के कारण और ही प्रबल हो उठें, तृप्त न होने के कारण और भी धधक उठें, पर मन मारकर रहना ही पड़ता है- यही शास्त्र का वचन है- यही हिंदू धर्म की मर्यादा। पर यही मर्यादा उन पुरुषों पर लागू नहीं होती है, जो एक के मरते ही दूसरा विवाह कर लेते हैं, जो थोड़े दिन भी धीरज नहीं धर सकते जो स्त्रियों में ‘सोलह गुणा काम’ का डंका पीटते पहने पर भी स्वयं एक स्त्री के मरते ही तुरन्त तृप्ति का साधन ढूँढ़ने लगते हैं। शायद परमात्मा ने स्त्री-पुरुष की रचना ही दूसरे ढंग से की हो!’’

 आखिर समाज में स्त्री विरोधी माहौल कौन तैयार करता है? स्त्री के अधिकारों पर कुल्हाड़ी कौन चलाता है? और, विधवाओं को पुनर्विवाह करने से कौन रोकता है। लेखिका बताती है कि इन सबके पीछे तथाकथित पुरोहितगण और शास्त्रों के नियंता जिम्मेदार हैं। एक तरह से वेद और पुराण स्त्रियों के लिए जेलखाना में रहने का आग्रह करते हैं। इन्ही संहिताओं के आधार पर स्त्रियों का चरित्र का निर्धारण किया जाता था। यदि कोई स्त्री खासकर विधवा स्त्री इनकी आज्ञाओं को उलघंन करती तो उसके चरित्र पर ऊंगली उठाकर उसे लांछित और अपमानित किया जाता था। यह लेखिका कहती है कि यहां पुरुषों का वश नहीं चलता नहीं तो ये लोग स्त्रियों के ‘नाक’ और ‘कान’ भी कटवा लेते। प्रियंवदा  देवी ने स्त्री जीवन की खौलती सच्चाई को प्रस्तुत करते हुए लिखा है:

‘‘पुरुष जाति ने नारीजाति- खासकर विधवाओं पर कितना अविश्वास किया है, इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है, विधवाओं का वेश- श्रृंगारहीन अवस्था में रखना। सच तो यह है कि उनका वश न चला;  नहीं तो शायद नाक कान काटने की अनुमति मिल जाती।’’

यह नवजागरणकालीन लेखिका स्त्रियों को पतित बनाने का जिम्मेदार पुरुष प्रधान मानसिकता को मानती है। यह बड़ी बात है जिस दौर में स्त्रियों को अपने पति का नाम तक नहीं ले सकती थी, ऐसे माहौल में यह लेखिका पुरुषवाद मानसिकता से टकरा रही थी। उन्हे स्त्री की दुर्दशा का जिम्मेदार बता रही थी। लेखिका उन विद्वानों और नियंताओं की बड़ी तीखी आलोचना करती है जिनको स्त्रियों में सोलह गुना अधिक ‘काम-भावना’ दिखाई देती है। लेखिका कहना था कि ऐसे लोग नारी जाति के प्रबल शत्रु हैं जो स्त्रियों को ‘काम की पुतली’ समझते हैं। इस लेखिका का कहना था कि पुरोहितों और शास्त्रों की व्यवस्था ने पुरुषों के लिए कोई दंड़ निर्धारित क्यों नहीं किया? शास्त्रों ने पुरुषों को हद से ज्यादा छूट देकर उन्हें अधिक उद्दंड बना दिया है। लेखिका लिखती है:

‘‘नारी जाति काम की पुतली नहीं है नारीजाति मर्यादा और संयम सहज में नहीं त्यागती, उसे नष्ट करता है विधवा होने के बाद ही उसका ऊसर जीवन, और घरवाले उसे हीन-दासी समझकर दुर्दशापूर्ण व्यवहार, वे पुरुष नारी जाति के बड़े सबसे बड़े शत्रु हैं, जो नारियों में सोलह गुणा काम बताते हैं; पर हैं स्वयं काम के पुतले-स्वार्थों के सरोवर! और धर्माचार्यों ने तो उन्हें और भी उद्दंड कर रखा है, जिन्होंने सारी दंड-व्यवस्था का प्रयोग स्त्री जाति पर ही कर दिया।’’

यह लेखिका बताती है कि यह पुरुष समाज बड़ा षड़यंत्रकारी होता है। स्त्रियों के साथ कदम-कदम पर फरेब देकर छलता रहता है। लेकिन शास्त्रवादी व्यवस्था में इनके छल-प्रपंच को लेकर कोई दंड़ विधान नहीं है। इन पुरुषों के पापाचार को देखकर पुरोहित गण न जाने कहां छुप जाते हैं। यह पितृसत्तावादी स्त्रियों के संबन्ध में मिथ्या सूचना पर भी स्त्री को दूध की मक्खी की तरह समाज से निकाल फेंकने का फरमान सुना देते है। विडम्बना देखिए कि पुरुष अपने सिर पर व्यभिचार की पगड़ी बांध कर समाज में कहीं भी स्वच्छंद घूम सकता है।  पुरुष समाज के इस चरित्र की झांकी प्रस्तुत करते हुए प्रिम्यवदा देवी लिखती है:

 ‘‘विधवा या अबला स्त्री ही क्यों, जब कभी प्रलोभनों का फंदा हेर-फेरकर कोई पुरुष किसी स्त्री को फँसा ले जाता है, तो अपराध उस स्त्री का ही माना जाता है और वह पुरुष कुछ दिनों तक उसके साथ पापवासना चरितार्थ कर जब घर लौटता है, तो सारा अपराध उस स्त्री पर लादकर स्वच्छंद घूमता है। समाज उस पुरुष को कोई दंड़ नही देता और वह अबला दूध की मक्खी की तरह समाज से निकाल कर बाहर कर दी जाती है।’’

प्रियंवदा  देवी की  किताब ‘विधवा की आत्मकथा’  नवजागरण काल का एक ऐसा आईना है जिसमें पुरुष समाज की करतूतों और षड़यंत्र का बड़े स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। पश्चिमोत्तर प्रांत से लेकर कलकत्ता की स्त्रियों के आलक्षित जीवन पर यह किताब प्रकाश डालती है। यह कोई छोटी बात नहीं थी कि जब चारों ओर पुरुषों का साम्रज्य व्याप्त हो लेखिका ने स्त्री अधिकार और स्वतंत्रता का सवाल उठाने का सहास दिखाया था। प्रिम्यवदा देवी का लेखन पितृसत्तावादी समाज के सीने पर चुभने वाली उस कील की तरह है जिस पर स्त्री अधिकारों की दावेदारी टिकी हुई है। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में लिखी गई यह किताब निश्चित ही पितृसत्तावादी समाज को आईना दिखती है और पुरुषतंत्र की बखिया उधेड़ कर रख देती है।

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(सुरेश कुमार नवजागरणकालीन  साहित्य के गहन  अध्यता हैं। इलाहाबाद में  रहते हैं। उनसे  8009824098 पर संपर्क किया जा सकता है)

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