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इस अकेले समय में पढ़ने का आनन्द: अशोक महेश्वरी

पिछले दिनों प्रकाशन जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘ऑल अबाउट बुक पब्लिशिंग’ मैंने अंग्रेज़ी के एक प्रमुख प्रकाशन के प्रतिनिधि का इंटरव्यू पढ़ा था, जिसमें उनका कहना था कि लॉकडाउन के दौरान उनके प्रकाशन की किताबों की बिक्री में केवल 3 प्रतिशत की कमी आई है क्योंकि अंग्रेज़ी में ईबुक की जड़ें बहुत गहरी हैं। ख़ैर, मैं हिंदी के बड़े-वरिष्ठ प्रकाशकों-विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया जानने को उत्सुक था तो मुझे राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी का यह लेख पढ़ने को मिला। इस लेख में उन्होंने ईबुक, ऑडियो बुक के साथ साथ वाट्सएप बुक की बात की है। इस लेख से पता चला कि वाट्सएप बुक की मुहिम से अभी तक 25 हज़ार से अधिक लोग जुड़ चुके हैं और इससे जुड़ने वाले लोगों में अलग-अलग उम्र के लोग हैं। मैं बहुत दिनों से ख़ुद स्वयं लोगों को फ़ोन में किताबें पढ़ने की सलाह देता रहा हूँ, किंडल नहीं किंडल के ऐप पर पढ़ने की। लेकिन हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित प्रकाशक जब ऐसी बात करते हैं तो इससे उनका विजन समझ में आता है और बहुत हद तक किताबों के भविष्य के प्रति दूरदर्शिता भी, बदलावों की समझ और उनका आकलन भी। उनके लिखने का यह मतलब यह कदापि नहीं है कि प्रिंट किताबों का स्थान ईबुक या ऑडियो बुक ले लेंगे, बल्कि पाठकों के सामने विकल्प होंगे, वह सुविधा के हिसाब से अपने विकल्प का चयन करेगा। अशोक जी ने अपने इस लेख में ऑडियो बुक की संभावनाओं के बारे में भी बात की है। लगे हाथ मैं यह भी बताता चलूँ कि भारत में अंग्रेज़ी में ऑडियो बुक को वैसी संभावना के रूप में नहीं देखा जा रहा जैसा कि हिंदी में। शायद इसका एक कारण हिन्दी में वाचिक परंपरा की मौजूदगी भी है। ख़ैर, आप श्री अशोक महेश्वरी का यह लेख पढ़िए। यह एक बड़े अख़बार में कुछ समय पहले छपा था। अख़बार का नाम लेख के नीचे दिया गया है। इस लेख को इस समझ के साथ पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि यह हिंदी के एक ‘वेटरन इनसाइडर’ का लिखा लेख है जो हिंदी की परम्परा और भविष्य की संभावनाओं दोनों बहुत अच्छी तरह समझते हैं। इस लेख पर आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है- मॉडरेटर

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पढ़ना हमेशा आनन्द का विषय रहा है। विद्यार्थी जीवन में यह विवशता होती है पर उस समय भी मजबूरी में पढ़ने वाले और आनन्द लेकर पढ़ने वाले छात्रों में अन्तर स्पष्ट देखा जा सकता है। पढ़ना टाइमपास भी है और हमारी जानकारियों को बढ़ाने वाला भी है। हमें उचित अनुचित का बोध कराने वाला, हमें दिशा दिखाने वाला, हमारा विकास करने वाला भी पढ़ना ही है। पढ़ना आनन्द भी है और विकास भी। बहुत से अन्य कामों से भी हमें आनन्द मिलता है पर ज्यादातर वह थोड़ी देर के लिए होता है या फिर केवल अपने लिए। पढ़ने से मिलने वाला सुख स्थायी सुख है, बाहरी भी आन्तरिक भी।
कुछ भी अच्छा पढ़ने से जो तृप्ति मिलती है उसे शब्दों में कह पाना मुश्किल होता है। विकास की बात भी कुछ ऐसी ही है। हम अपने पैतृक प्राप्य से, मित्रों  के सहयोग से, धन से, श्रम से अपना, अपने व्यवसाय का, परिवार का विकास करते हैं पर इसमें पढ़ने का छौंक लग जाये तब! तब इसकी बात कुछ अलग होगी, यह निश्चित ही सुखकर स्थायी और हितकारी विकास होगा, सबको आनन्द देने वाला।
पढ़ा कुछ भी जा सकता है। लेख, टिप्पणी, इन्टरव्यू, गूगल और नेट पर उपलब्ध सामग्री, अखबार, पत्रिका और भी बहुत-सी चीजें, जो हमारे आसपास सहज उपलब्ध हैं। अब तो समाचार पत्र, पत्रिकाएँ न जाने क्या-क्या हमारी हथेली पर, हमारी उंगलियों की छुअन पर, हमारे मोबाइल में ही मिल जाते हैं। बहुत आसानी से हम जो चाहें सो पढ़ सकते हैं। इस सब कुछ में किताब की बात एकदम अलग है। किताब हाथ में लेने का सुख, उसे देखने का सुख, उसकी गंध और न जाने क्या-क्या सब एक साथ हमें मिलता है। पढ़ते-पढ़ते छाती पर किताब रखकर सो जाने का आनन्द तो अलग ही है, जैसे कोई किसी शिशु के साथ खेलते-खेलते आनन्द विभोर होकर सो गया हो।
यह अकेला समय है। हम परिवार के साथ अकेले हैं। सोसाइटी (घरों का संकुल) में, मोहल्ले में, गली में अकेले हैं। कस्बा, शहर, जिला, राज्य भी अकेला है। यहाँ तक कि देश भी अकेला है इस समय। हमारी दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ बन गई थी, ‘विश्व गाँव’। पर इस कोरोना काल में पूरी दुनिया एक गाँव बनने के बजाय गाँव ही अकेला हो गया है। सबको अपनी लड़ाई अकेले लड़नी है। न धन काम आ रहा है न सम्बन्ध।
कोई स्त्री गर्भवती है, बुखार आता है तो डॉक्टर जो आपका परिचित फैमिली डॉक्टर है, देखने से इनकार कर देता है, स्त्री चाहे पाँच माह के गर्भ से हो और गर्भपात ही क्यों न हो जाये। मृत्यु होने पर चार कन्धे नहीं मिलते। बीमार होने पर चक्कर लगाते रहिए न राहत मिलेगी न सलाह। जो राहत दे रहे हैं, इलाज कर रहे हैं, हमारी मदद कर रहे हैं, डॉक्टर और पुलिस; हमारा सन्देह उनपर भी है। यदि वे हमारी सोसाइटी में रहते हैं तो हम उन्हें वहाँ घुसने नहीं देना चाहते। पड़ोसी-अड़ोसी सब पर सन्देह और दूरी।
गाँव चारदीवारी में बन्द है, अकेला। शहरों को चारों तरफ से बन्द कर दिया गया है। राज्यों ने अपनी सीमाएँ सील कर दी हैं, कहीं तो आने-जाने की सड़कें ही आधिकारिक तौर पर तोड़ दी गयी हैं। देशों की सरहदें तो पहले से ही बन्द होती रही हैं। अब उन तक उड़कर बैठकर-चलकर पहुँचने के सारे रास्ते भी बन्द ‌कर दिए गये हैं। मजदूरों, फैक्टरियों में काम करने वाले, घरों में काम करने वाली आयाएँ सब बन्द हैं। जिनके बिना जिन्दगी न चलने की बात होती थी वे सब दूर हैं, हमें उनकी परवाह नहीं, उनसे दुश्मनों सी दूरी हमने बना ली है। आ न जाये, छू न जाये, देख न लें, आँख के रास्ते भी कोरोना आ जायेगा। ऐसे में किसी मृत मित्र को लेकर कोई उसके गाँव घर जाए, यह असम्भव लगता है। यदि कोई जाता है तो वह जरूर पढ़ने-लिखने वाला या पढ़ने लिखने वालों जैसी समझ रखने वाला बहुश्रुत ही होगा, ऐसी संवेदनशीलता पढ़े हुए ज्ञान या सुने हुए ज्ञान को पचाकर जीवन व्यवहार में उतारने से ही आती है। मुझे तो यही लगता है।
समाज की पढ़ाई से दूरी बनी तभी तो ऐसी विपदायें निरन्तरता बनाए हुई हैं। यह तो गजब है, कोरोना, कुछ भी करो ना। न इसकी कोई दवाई है न इलाज, आयुर्वेद काढ़ा बता रहा है, होम्योपै‌थी ड्राप दे रही है, ऐलोपैथी कोशिश कर रही है। विश्वास किसी को नहीं कि यह इसका उपचार है ही।
ऐसे समय में हमारे बच्चे ही हमें बचाए, जियाए हुए हैं। जो बच्चों के साथ हैं वे अकेलेपन के अहसास से बचे हैं। या फिर वे जो शिशु की तरह छाती पर किताब रखकर पढ़ते हुए सो सकते हैं। पिछले डेढ़ महीने किताब भी तो आप तक नहीं पहुँच सकती थी। पढ़ने वालों ने इसका भी रास्ता निकाल ही लिया।
लॉकडाउन (घरबन्दी) और सोशल डिस्टैंसिंग (शारीरिक दूरी) के इस समय में किताब के बदलते रूपों ने समाज को बचाया है और समाज ने इन्हें अपनाया है। ई-बुक की माँग बढ़ी है। आँखें मोबाइल और कम्प्यूटर-लैपटॉप पर पढ़ने की अभ्यस्त हुई हैं। हम कम्प्यूटर टेबल पर सिर रखकर पढ़ते-पढ़ते सोने लगे हैं। मैं नहीं जानता कि इसे माँ की गोद में सिर रखकर सोना कहना ठीक है या नहीं। ऑडियो बुक का चलन भी इधर बहुत बढ़ा है। घर में खाना बनाते, बर्तन  साफ करते, पोछा-सफाई करते हम किताबें सुनने लगे हैं। पहले यह ज्यादातर गाड़ी चलाते हुए ही हो पाता था, आजकल तो गाड़ी चलाना ही बन्द है। घर में काम करते हुए हम किताबें सुन रहे हैं।
एक नई तरह की किताब का जन्म भी इस समय में हुआ है–वाट्सएप बुक। वाट्सएप पर पढ़ी जाने वाली किताब। ये किताबें वाट्सएप के लिए बनी हैं और उसी पर उपलब्ध हैं। इस मुश्किल समय में पढ़ने का आनन्द लेने वालों की मदद के लिए। ऐसे लोग बहुत ज्यादा हैं जो कम्प्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते। यदि कर लें भी तो उस पर पढ़ नहीं सकते। उसे खोलने बन्द करने में उन्हें बहुत उलझन लगती है।  उनके लिए ई-बुक और ऑडियो बुक प्राप्त करना और उसे पढ़ना सुनना कठिन था।
मोबाइल सभी के पास होता है, स्मार्ट फोन। सन्देश-चित्र-वीडियो के लिए वाट्सएप का इस्तेमाल भी सभी करते हैं। इनके लिए वाट्सएप बुक विशेष रूप से बनाई गयी। कह सकते हैं कि कोरोना काल की यह नई खोज है। ई-बुक और ऑडियो बुक जहाँ छपी किताब की ही प्रतिकृति हैं वहीं वाट्सएप बुक एकदम नई किताब है। यह पढ़ने का भरपूर आनन्द देती है। कई किताब, कई लेखक, कई विधायें एक साथ। वह भी निशुल्क। इसे बेचा तो जा ही नहीं सकता। कोई बन्धन इसपर लगना सम्भव नहीं। सबको सुलभ हो इसीलिए इसे बनाया गया। कॉपीराइट देखकर, रॉयल्टी का नुकसान बचाते हुए इन्हें तैयार किया जा रहा है। ये विशेष किताबें हैं जो पढ़ने का सुख देती हैं, अलग-अलग किताबों की जानकारी देती हैं, लेखक के प्रति रचना के माध्यम से कौतुक पैदा करती हैं, जानने की जिज्ञासा बढ़ाती हैं। आपकी रुचि पढ़ने में बढ़े साहित्य की किसी भी विधा को आप पसन्द करें, समयानुकूल रचनाएँ मिलें, नियमित मिलें; पढ़ने का आनन्द आपमें विस्तार पाए यही इन किताबों का उद्देश्य है।
फेसबुक के नाम में तो बुक है पर यह कोई ‘बुक’ है नहीं। अभी इस पर किताब के बारे में, किताब से, किताब के लिए बहुत कुछ हो रहा है। लाइब भी और लिखकर भी। उम्मीद रखनी चाहिए कि ‘फेस बुक’ भी कभी बनेगी। कहने वाले कहते हैं कि आपका फेस पूरी बुक है, चेहरा पढ़ा जा सकता है और इसे पढ़कर भूत, भविष्य, वर्तमान सब जाना जा सकता है।
इस अकेले समय में पाठकों ने किताब की पूछ बहुत बढ़ा दी है। ई-बुक की बिक्री पहले की तुलना में कई गुना हो गई है। ऑडियो बुक भी बहुत ज्यादा पसन्द की जा रही है। घरों, अलमारियों में इन्तजार करती किताबों की धूल साफ हो गई है। उन्होंने छाती पर बैठकर शिशु सा प्यार पाया है। इस नए जन्मे शिशु-सी वाट्सएप बुक का तो कहना ही क्या, जन्मते ही दस हजार से ज्यादा लोगों ने इसे प्यार दिया। कुछ ही दिन में रोज बीस से पच्चीस हजार लोग इसे पढ़ रहे हैं।
हमारे यहाँ किसी भी नई वस्तु को ‘नई नवेली’ कहने का चलन है पर मुझे ‌किताब के लिए शिशु की उपमा ज्यादा सटीक लगती है। उससे सभी प्यार करते हैं। उसे सब अपने अपने ढंग से पुचकार सकते हैं, सहला सकते हैं, गोद में, छाती पर सवार कर सकते हैं। बात कर सकते हैं और इसका आनन्द अलग-अलग अपने-अपने तरीके से पा सकते हैं। शिशु बालक भी हो सकता है बालिका भी। उसकी अपनी धुन होती है, अलग आवाज, अपनी भाषा। दुनिया के सब नवजात शिशुओं की आवाज-बोली एक सी होती है। सभी उसे अपनी भाषा-बोली मानते हैं। अपनी मातृभाषा मानते हैं। अपने आपको उसमें देखते हैं। अपनी शक्ल अपनी अक्ल सब उसमें ढूँढ़ते हैं और पा भी जाते हैं। नई नवेली में इतना सब कहाँ।
किताब के लिए कोई वर्ग भेद नहीं है, अमीर-गरीब, अगड़ा-पिछड़ा, छोटा-बड़ा, स्त्री-पुरुष सब बराबर हैं। शिशु तेजी से अपना विकास करता है, शारीरिक भी और मानसिक भी। किताब उससे भी ज्यादा तेजी से पढ़ने वाले को चौतरफा आगे बढ़ाती है। किताब सबकी है, सबके लिए। किसी के भी पास जा सकती है, कहीं से भी आ सकती है। बिना किसी भेदभाव के, शिशुओं की तरह।
—अशोक महेश्वरी
9 मई, 2020

(यह लेख नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है)

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