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विश्व साहित्य की प्रसिद्ध नायिकाएँ

वरिष्ठ लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह लेख विश्व साहित्य की प्रसिद्ध नायिकाओं को लेकर है। आप भी पढ़िए बहुत रोचक है-

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कोई भी कला स्त्री की उपस्थिति के बिना अपूर्ण है चाहे वह अमूर्त हो कि विशुद्ध या जादुई यथार्थ! साहित्य अधूरा है, नायिकाओं के बिना। नायिकाएं, एकरेखीय जीवन जिएं और उसी धरातल पर खड़ी हों, जहां हर स्त्री खड़ी है तो फिर कहानी कैसे बने? यूं तो हर जीवन अपने भीतर किसी महीन स्तर पर कोई न कोई कहानी कहता चलता है. जब वह एक विचलन बन गाथा में फूटता है, काग़ज़ पर उतरता है और परोक्षतः या अपरोक्षतः, पक्ष में या विपक्ष में खड़े हो जनमानस से साधारणीकृत होता है तो वह क्लासिक का दर्जा पा जाता है। कथा साहित्य में स्त्री का चित्रण विश्व में सत्रहवीं और अठारहवीं सदी से ही मुखर होने लगा था. यहाँ हम तारीख और इतिहास में जाए बिना, स्मृति में अटके रहने वाले, यदा – कदा याद आ दुख देने वाले, प्रेरणा और शक्ति देने वाले प्रसिद्ध स्त्री पात्रों को फिर रेखांकित करते हैं. हो सकता है कुछ मुझसे छूट भी जाएँ.

जब विश्व – सहित्य में प्रसिद्ध स्त्री – पात्रों की बात होती है तो तुरंत जो नायिकाएं मेरे  मस्तिष्क में आती हैं वे हैं  – मॉल फ्लांडर्स, आन्ना कारेनिना, लिलि बर्ट, जेन आयर, हेस्टर प्रेने, एलिज़ाबेथ बेनेट, सेली, सूला, सोफीज़ वर्ल्ड की ‘सोफी’, कैथरीन अर्नशॉ, फरमीना…. और दिमाग़ को आज़ाद छोड़ दें तो किशोरावस्था के पन्ने खुल जाते हैं, हंचबैक औफ नॉत्रदाम की एज़माराल्दा, जिप्सी गर्ल आ जाती है. फिर अरेबियन नाईट्स की शहरज़ाद…..एक हजार एक रातों की तिलस्माती कहानियाँ सुनाती हुई. स्कारलेट ओ हारा….गोन विद द विंड के साथ… चोरी से पढ़े गए उपन्यासों में नॉटी मगर मासूम लॉलिटा,  लेडी चैटर्ली,  मादाम बावेरी वगैरह….टैगोर की चोखेर बाली, शरतचन्द्र की चरित्रहीन की नायिका सावित्री, जैनेन्द्र की मृणाल, फणीश्वर नाथ रेणु की लछमी के साड़ी – दुशालों के साथ – साथ ही अपने सरसराते गाउन और कोर्सेट. और ट्यूनिक और स्लेक्स पहने आ खड़ी होती हैं. किताबों के पन्नों में सोई कितनी महानायिकाओं का एक पूरा संसार हमारे आगे खुल जाता है.

विश्व साहित्य में पिछ्ली सदी में मशहूर हुए क्लासिक्स का समय वह समय था जब स्त्रियों के लिए समय बेहद कठिन था, उस कठिन समय ने ही हमें न जाने कितनी विद्रोहिणी और बेहतरीन नायिकाएँ दी हैं. बहुत पहले कहीं पढ़ा था मैंने, और फिर यह एक स्थायी यकीन बन गया कि त्रुटिहीन होने पर कला, कला नहीं होती. सौंदर्य , सौंदर्य नहीं होता और जीवन तो कतई त्रुटिहीन हो नहीं सकता. छूटी हुई त्रुटि ही किसी सुन्दर कृति को सुन्दर बनाती है. सम्पूर्ण त्रुटिहीन सौंदर्य विकर्षित करता है. इसलिए हमेशा विश्व साहित्य के उपन्यासों में आदर्श पात्रों और एकरेखीय जीवन जीने वाले पात्रों ने कभी नहीं मोहा. कहानी बनने के लिए विचलन तो चाहिए. संसार के ज़्यादातर महान उपन्यासों को महान बनाने के पीछे कहीं न कहीं एक अनूठा, अलग स्त्री पात्र रहा है, जो कि स्मृतियों में बना रहा है. इन उपन्यासों के स्त्री पात्रों की चारित्रिक विकास की यात्रा पर गौर करें तो, तत्कालीन समय, समाज, परिवेश तथा पारिवारिक जीवन मूल्य तथा समाज की बनावट – बुनावट इन पात्रों की जीवन परिस्थितियों के नेपथ्य में ज़रूर होते हैं, जिनसे वे एक मोड़ पर आकर विचलन करते हैं.

आन्ना कारेनिना निस:न्देह संसार के उन्हीं महानतम उपन्यासों में से एक है. यह समाज और उसके नैतिक मापदण्डों के सापेक्ष प्रेम तथा मानव की मूल प्रवृत्तियों, महीन मनोसंसार की हलचल पर लिखा गया उपन्यास है. उन्नीसवीं शती के मास्को और पीटर्सबर्ग के उच्चवर्ग के परिवेश में घुटती आन्ना के विवाहेत्तर प्रेम की क्लासिक गाथा तथा मानव की आंतरिक प्रवत्तियों का एक बेहद समृद्ध और जटिल ‘मास्टरपीस’ है आन्ना कारेनिना. कहाँ आन्ना रूसी समाज के ऊँचे तबके की प्रभावशाली महिला होती है, कहाँ वह व्रोंस्की के साथ असुरक्षित मानसिकता में, बेटे के लिए तरसती, तिरस्कृत, उदास और अकेली छूट जाती है. जिस रास्ते पर कोई न चला उस पर चलने की ज़िद में सुख से ज्य़ादा पीड़ा ही हाथ आई. वह काउंट व्रोंस्की के प्रेम में भी आशंका ढूँढ लेती है. आन्ना का प्रेम भी खीँचतान में बदलने लगता है, और परम – प्रेम की एक स्त्री के मन में बनी तस्वीर धुँधलाने लगती है. यह बहुत व्यापक सत्य है प्रेम का जो टॉलस्टॉय आन्ना के माध्यम से रचा है. प्रेम की इस परिणति को कौन सा काल या परिवेश अपने में बाँध सका है? यही ‘परम प्रेम’ के अस्थायी छिलके में लिपटा स्त्री – पुरुष के प्राकृतिक आकर्षण युक्त खिंचाव, सम्बन्ध स्थापन, प्रजनन के बाद का ‘परम सत्य’ है. यही वजह है कि विश्व साहित्य की नायिकाओं में आन्ना ने सबसे बड़ा मुकाम हासिल किया है.

इसी तरह एक आन्ना कारेनिना के मुकाबले कम चर्चित ‘द फॉर्च्यून एण्ड मिसफॉर्च्यून ऑफ फेमस मॉल फ्लान्दर्स ’ की मॉल फ्लांदर्स है. जिसे डेनियल डेफॉ ने ‘आन्ना कारेनिना’ से बहुत पहले 1721 में लंदन के परिवेश में रचा था. 1722 में छ्पे इस उपन्यास नायिका मॉल फ्लान्दर्स एक चोर है, पाँच बार विवाहित एक असफल पत्नी है, एक वेश्या है और बहुत कुछ है. वर्जीनिया वुल्फ के अनुसार इस 18 वीं सदी की आज़ाद ख्याल इस स्त्री चरित्र के कारण यह उपन्यास निर्विवाद रूप से महान है. एक जेल में जन्मी मॉल की जीवन यात्रा एक किशोरी वेश्या से शुरु होकर, पांच बार विवाह फिर चोरी और ठगी से लेकर एक अमीर स्त्री बनने तक की है, जो इस कथा में बुनी गई है. मॉल की जीवन के प्रति ललक और किसी के अधीन न रहने की जिद और जीवन की छल कपट भरी भूलभुलैया में वह यहाँ तक पहुँचती है. इस पूरे उपन्यास में गझिन जीवन के साथ लगातार एक जीने और आगे बढ़ने…बढ़ते चले जाने की ललक झलकती है, जो मॉल फ्लान्दर्स को तमाम स्त्री पात्रों से अलग करती है. वह भारी विषमताओं के बाद भी आन्ना की तरह के किसी विषाद में नहीं घिरती, पांच शादियाँ करती है…ठगी भी…सफल व्यवसायी भी बनती है…अंतत: समाज में प्रतिष्ठित जगह बना ही ले जाती है.

हम शेक्सपियर की नायिकाओं की बात करें तो बिएत्रिस अपने निशान छोड़ती है…स्मृति में. ‘मच अडू अबाउट नथिंग’ की नायिका बिएत्रिस को शेक्सपियर ने बेहतरीन संवाद दिए, बिएत्रिस शेक्सपियर के स्त्री पात्रों में सबसे मजबूत है. बिएत्रिस एक अमीर गवर्नर की भतीजी है. वह गवर्नर की शांत सौम्य बेटी के उलट गुस्सैल, हमेशा कटाक्षपूर्ण और तेजतर्रार है. वह अपने मंगेतर को अपने लायक न पाकर हमेशा उसका मज़ाक बनाती है और योग्य पुरुष न मिलने तक शादी नहीं करना चाहती है. इसी तरह, 1905 में लिखे गए  उपन्यास ‘हाउस ऑफ मिर्थ’ की नायिका लिलि बर्ट भी महत्वाकांक्षा, प्रेम, बदनामी, पीड़ा और मृत्यु के लिए प्रसिद्ध हुई जिसे ‘एडिथ वार्टन’ ने अमरीका के परिवेश में रचा, मगर यहाँ स्त्री को दोफाड़ करता केवल प्रेम नहीं था, ऎश्वर्यमय जीवन की अदम्य लालसा भी थी. लिली बर्ट एक सुंदर सादादिल युवती है, जो अमीर होने के लिए, अमीर व्यक्ति के प्रेम प्रस्ताव पाने के लिए बहुत से अच्छे मध्यमवर्गीय प्रस्ताव ठुकरा देती है. और बाद में एक झूठे चक्रव्यूह में फंस कर बदनामी सहती है और एक बदनाम अमीर स्त्री की असिस्टेंट बन कर उसे रहना पड़ता है. अंत वही आत्मघात ! अमेरिका की तत्कालीन एरिस्टोक्रेटिक दुनिया के झूठ और छ्ल पर लिखा गया यह उपन्यास बहुत सराहा गया.

फ्रांस के उपन्यासकार गुस्ताव फ्लाबेयर की प्रसिद्ध कृति ‘मादाम बॉवेरी’ को 1856 में अपने प्रकाशन के बाद अधार्मिकता और अनैतिकता के आरोप झेलने पड़े थे। सिर्फ इस‍लिए क्योंकि उन्होंने अपनी नायिका एम्मा बॉवेरी को विवाहेतर प्रेम और यौन-संबंधों में लिप्त दिखाने का साहस किया था। लेकिन आज इस कृति को एक ‘क्लासिक’ के रूप में देखा जाता है। इसकी नायिका मादाम बावेरी न सिर्फ आपने युग का एक प्रतिनिधि चरित्र बन गई है, बल्कि वह एक स्त्री के अंतरंग का एक ऐसा प्रतीक भी बन गई है, जो सारी दुनिया के साहित्य में नए-नए रूपों में बार-बार रचा गया। एम्मा गहरे कहीं रूमानी थी, और ‘एबसॉल्यूट लव’ की तलाश ने उसे बार बार भटकाया. वह सपनों और फंतासियों में जीते रहना और खुद को खूब सारा प्रेम करवाते रहना चाहती थी. एक ग्रामीण इलाके के डॉक्टर से शादी कर, एक बेटी की माँ बन कर भी वह अधूरा महसूस करती थी. इस अधूरेपन ने उसे बदनामी और भारी कर्ज़ से डुबो दिया. अंतत: उसकी दर्दनाक मृत्यु के साथ उपन्यास का त्रासद अंत हुआ.

‘जेन आयर’ को ब्रोंते बहनों में सबसे साहसी ‘शार्लोट ब्रोंते’ ने बहुत ही कम उम्र में रचा था, वह भी किसी छ्दम नाम से. जाहिर है वह विक्टोरियन काल में जीवन के समानांतर कुछ विद्रोही रचना चाहती थी. अनाथ जेन आयर,  उसकी बालसखि हेलेन बर्न्स और नायक रोचेस्टर को कोई भूल नहीं सकता. जेन आयर गवर्नेस के तौर पर एक अमीर घर में नौकरी करती है, और अपनी आज़ादी में विश्वास करती है. जैसे तमाम विषमताओं के बावजूद अपने मूल्यों और जीवन में विश्वास रखने वाली जेन का चरित्र विश्वसाहित्य में हमेशा अविस्मरणीय रहने वाला है. वैसे ही प्राईड एण्ड प्रेजुडिस ( जेन आस्टिन) की एलिज़ाबेथ बेनेट का चरित्र हमिशा याद आता है. जो एक अपनी समृद्धि लगभग खो चुके जंमींदार परिवार की पाँच बेटियों में से दूसरे नंबर की है. जहाँ उसके परिवार वाले चाहते हैं कि वह परिवार की आर्थिक अवस्था को ख्याल में रख एक अमीरज़ादे से विवाह करे मगर वह प्रेम के लिए विवाह करना चाहती है. एलिज़ा न केवल ब्रिटिश साहित्य की लाड़ली रही है, बल्कि विश्वसाहित्य में उसे खूब सराहना मिली. उसके चरित्र को कई फिल्मों में एडॉप्ट किया गया. वह बुद्धिमति, जीवंत लड़की है, जो तत्कालीन समाज के व्यवहार और पाखंड पर अपने व्यंग्य करती रहती है. वह सुंदर लड़की है और अंतत: मि. डॉर्सी को वह हासिल कर लेती है. एलिज़ाबेथ ऎसी लड़की है जो अपने समय के चलन से विद्रोह नहीं करती बल्कि उसका इस्तेमाल अपनी सोच के अनुसार अपने लक्ष्यों के लिए करना बखूबी जानती है.

दो नायिकाएँ अपने अनूठेपन में विश्व साहित्य में एकदम ही अलग खड़ी मिलती हैं, उनमें से एक ‘हेस्टर प्राईन’ अमरीकी लेखक नैथेनियल हॉथॉर्न ( द स्कारलेट लेटर) की रची वह नायिका है…जिसके चलते चर्च के आदेश के तहत स्वयं चरित्रहीनता का प्रतीक अक्षर…स्कारलेट ए उसके ऑरा और पवित्रता का पर्याय बन जाता है. वह एक पादरी की कामुकता का शिकार है, वह अविवाहित माँ है. जिसे चर्च से निष्कासन का आदेश मिलता है और कहा जाता है कि या तो वह अपनी अवैध बच्ची के पिता का नाम बताए या फिर वह अपने सीने पर एडल्ट्री का प्रतीकाक्षर ‘ए’ लगा कर गाँव से बाहर रहे. वह पादरी का नाम नहीं बताती, बच्ची को लेकर चली जाती है और अपने गाउन पर बहुत सुंदर लाल धागों से कलात्मक ‘ए’ काढ़ लेती है. जो अपनी धज के कारण उसकी अबोध बेटी को बहुत प्यारा लगता. खामोश हेस्टर प्राईन का चरित्र मेरी किशोरावस्था से फेवरेट है….दूसरा फेवरेट चरित्र है, विक्टर ह्यूगो के उपन्यास ‘ हंच बैक ऑफ नॉत्रदाम’ …की एज्माराल्दा…उसकी जिप्सी स्कर्ट…उसका डांस और उसकी ढफली और बकरी! उसे प्रेम करने वाले तीन प्रेमी, एक पादरी, एक कैप्टन और नॉत्रदाम का कुबड़ा….उसके लिए तय सज़ा ए मौत और उसका कैप्टन फीबस से अंधा प्रेम. अंतत: नॉत्रदाम के कुबड़े दैत्य का उसके प्रति अनन्य प्रेम और मृत्यु!

बचपन की तरफ मुड़ने पर सबसे पहले ‘अरेबियन नाईट्स’ की शहरज़ाद याद आती है – जो स्मृतियों में सितारा बन टंक जाने वाला स्त्री चरित्र है…जो एक हज़ार एक रातों में हज़ार कहानियों का गुलदस्ता देता है. जब सुंदरी शहरज़ाद की शादी एक ऎसे सुलतान से हो जाती है जो हर रात एक सुंदर युवती से धोखे से विवाह कर सुबह उसका गला कटवा देता है, शहरज़ाद को जब पता चलता है तो वह सुलतान को प्यार से बहला कर कहानी सुनाना शुरु करती है…हर कहानी में से नई कहानी निकल आती है…वह उसे एक हज़ार दिन तक कहानियाँ सुनाती है…एक हज़ारवें एक दिन सुलतान को उससे प्रेम हो जाता है.

लॉलिटा भी बचपन में पढ़ी थी, हिन्द पॉकेट बुक्स के संशोधित – संक्षिप्त संस्करण में लॉलिटा को यानि डोलोरस हेज़ को कुछ जाना, कुछ नहीं, फिर मूल संस्करण पढ़ा तो आँखें फैल गई. कमाल की है यह ‘एपोनिमस निम्फेट’! अरे! यह कोई वैज्ञानिक टर्म नहीं. एपोनिमस शब्द उस नायिका के बारे में इस्तेमाल किया जाता है जिसके नाम पर कथा, काव्य, उपन्यास या फिल्म हो. निम्फेट आकर्षक किशोरी! मुझे लॉलिटा उपन्यास ने, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और नॉबकॉव की भाषा, प्रस्तुति ने बहुत मोहा…यह एक सफल उपन्यास रहा मगर लॉलिटा एक असफल जीवन ही रही, जिस पर मुझे दया ही आई, दुख ही हुआ. कितना ही वह किशोरावस्था में अपने चरित्र में चार्म, सिडक्शन ले आई हो? मिला तो उसे हम्बर्ट द्वारा यौन शोषण ही. सोलह साल की उम्र में गर्भ और गरीबी! खैर…मगर वह छाप तो छोड़ती ही है. लेकिन हर बार मन कहता रहता है, हम्बर्ट न आया होता और हम्बर्ट की कुंठा न आई होती डोलोरस के जीवन में तो कुछ हमउम्र प्रेमी और उत्सुकताजन्य दैहिक स्पर्शों के बावजूद वह सहज जीवन जीती. वह लगभग अगवा की गई थी! उसे मां की मृत्यु तक का पता न था.

लेडी चैटरलीज़ लवर भी उस ज़माने में चरम उत्सुकता जगाने वाली किताब हुआ करती थी, मगर परिपक्व होकर पढ़ने में ‘कोनी’ को अलग तरह से जाना. नियति और उसके खेल…फिर स्त्री का ड्राईविंग सीट पर आ बैठना. विवाह से पहली कोनी एक सुरुचिपूर्ण, पढ़ीलिखी, अमीर परिवार की युवती है उसका विवाह माईंस के मालिक क्लिफोर्ड चैटरली से उसका विवाह हो जाता है. त्रासदी क्लिफोर्ड को व्हीलचेयर पर ले आती है. सब कुछ होते हुए भी वैवाहिक सुख और संतान से वंचित लेडी चैटरली को क्लिफोर्ड बातों बातों में छूट देता है विवाहेतर संबंध की जिसे टालते हुए भी कोनी….अपने जंगल के गार्ड ऑलिवर के आकर्षण में बिंध जाती है. यहाँ कोई विलेन नहीं है…परिस्थितियाँ हैं बस. और बहाव है. लेडी चैटरली एक मजबूत चरित्र होते हुए भी देह के अधीन है, देह के राग और विरागों का आपसी द्वन्द्व भी है. अंत्त: वह ऑलिवर के पास आकर जीवन को निकटता से देखती है और संघर्ष में सुख पाती है.

इसके विपरीत  ‘वुदरिंग हाईट्स’ की कैथरीन अर्नशॉ अपने पिता द्वारा लाए एक अनाथ लड़के हैथक्लिफ़ में अपनी किशोरावस्था से ही जबरदस्त आकर्षण देखने लगती है. लेकिन सामाजिक हैसियत के चलते वह एडगर लिंटन से विवाह कर लेती है, जिसे वह बाँका, अमीर विवाह लायक समझती है. मगर हैथक्लिफ के प्रेम में पागल वह स्वयं को हैथक्लिफ का ही दूसरा हिस्सा समझती है, और अपने दुर्व्यवहार से अपने आस – पास के सभी लोगों का जीवन दूभर कर्ने लगती है. कैथरीन के माता – पिता की मृत्यु के बाद हैथक्लिफ की स्थिति बहुत अपमानजनक हो जाती है, वह न नौकर रह पाता है न घर का सदस्य और वह एक बद्ले की भावना से भर जाता है…फिर कथा शुरु होती एक भरेपूरे परिवार के विनाश की…लिंटन परिवार भी इस चपेटे में आ जाता है. कैथरीन के बहाने एमिली ब्रोंते ने एक स्त्री के अंतर्जगत और मनोवैज्ञानिक बीहड़ को उस ज़माने में खोलने का प्रयास किया और यह उपन्यास क्लासिक का दर्जा पा गया. अंतर्मुखी, युवा एमिली ने कमाल का चरित्र रचा है.

कहना न होगा कि हममें से ज़्यादातर लोगों ने ‘गॉन विथ द विंड’ पहले देखी होगी, फिर पढ़ी होगी. पहले ‘स्कारलेट ओ’ हारा के रूप में हम ‘विवियन ली ‘ को कैसे भूल सकते हैं। उस कठिन समय में वह अपनी बहन के प्रेमी एशली से प्रेम निवेदन करती है, मगर अस्वीकृत होता है उसका प्रेम. उसे प्रेम करने वाले क्लार्क गेबल को वह हमेशा फ्लर्ट समझती है. उसके बार बार मुसीबतों में साथ देने के बावजूद  वह दो बार ऎसे लड़कों से शादी करती है जिनसे वह कभी प्रेम नहीं करती थी उनमें से एक के मर जाने पर वह हल्की सी राहत महसूस करती है.। उसकी दूसरी शादी भी सफल नहीं होती और उससे प्रेम प्रदर्शित करने वाला, साथ देने वाला पुरुष क्लार्क गेबल भी अंतत: उसे छोड़ कर निकल जाता है, वह जीवन भर किशोरावस्था के एशली – प्रेम के भँवर में घूमती हुई असमंजस में ही रह जाती है. मगर संघर्ष से कभी मुँह नहीं मोड़ती स्कारलेट ऑ हारा. युद्ध, आग, पलायन और अकाल…जिसमें भूखे तक मरने की नौबत तक आ जाती है. फिर भी जीवन संघर्ष में अंतत: विजेता होकर भी वह प्रेम में नितांत अकेले पड़ जाती है.

एक अनाम औरत का ख़त के शीर्षक से स्टीफन स्वाइग की ‘लेटर फ्रॉम एन अननोन वुमन’ को पढ़ा था और इस उपन्यास की उस अस्थिर अज्ञात नायिका ने भी बहुत प्रभावित किया था. हरमन हेस ने भी कमाल की नायिकाएँ विश्व साहित्य को दीं चाहे वह स्टेपान वुल्फ की हरमीने और मारिया हों, जो नायक की खोए से अस्तित्व को एक चेतना देती हैं या सिद्धार्थ की कमला हो. एक गणिका जो सिद्धार्थ की खोज को एक नया आयाम देती है.

पिछ्ले दशक मॆं जिन पात्रों से परिचय हुआ वे अलग ही थे. किसी क्लासिक से कम नहीं. मुझे एलिस वॉकर की नायिकाएँ काफी जीवन के करीब लगती हैं. ‘द कलर परपल’ की सैली कमाल की स्त्री है. सैली बचपन ही से घरेलू यौन शोषण की शिकार है अपने ही सौतेले पिता द्वारा जो कि उसे मारता और बलात्कार भी करता रहा है, साथ में नौकरानियों की तरह व्यवहार करता रहा है. जब उसका विवाह होता है तो पति भी उतना ही क्रूर निकलता है. सैली के बदरंग जीवन का एकमात्र खुशरंग कोई है तो वह है नैटी, उसकी बहन. नैटी को वह पालती पोसती है और यौन शोषण से बचाती है. फिर एक दिन नैटी कहीं बाहर भेज दी जाती है. उसके पास बस उसके पत्रों का सहारा रहता है. धीरे धीरे वह ताकत जुटा कर अपने गाँव में अपनी जगह बना लेती है. एक बार उसे पता चलता है कि उसका पति नैटी के पत्रों को और नैटी को उससे दूर कर रहा है तो वह… भीतरी ताकत जुटा कर पति को तुरंत छोड़ देती है, और नैटी को बुला लेती है. पूरे उपन्यास में एक मजलूम, शोषित लड़की सैली के मजबूत होते जाने की गाथा है. सैली का चरित्र प्रेरणास्पद है.

टोनी मॉरिसन ने भी दबे – कुचले वर्ग से निकल कर आए, घरेलू यौन शोषणों से उबरे और सीधे खड़े हुए मजबूत स्त्री पात्र विश्व साहित्य को दिए हैं. उनमें से एक है ‘सूला’ . हालांकि ‘बिलव्ड’  की सेथी उनका रचा क्लासिक स्त्री पात्र है मगर विद्रोहिणी सूला तो जीवन से दो – दो हाथ करती है. पूरा कस्बा, पूरा समाज उसके खिलाफ है मगर फिर भी. सूला – सूला है, जिसके नाम ही से उपन्यास का टाईटल है. सूला जिस समाज में पली उस समाज के हर पुराने रिवाज़ को धता बता कर वह कॉलेज पढ़ने जाती है. वह चाहती तो बहुपत्नी प्रथा वाले समाज में किसी की पत्नी बन सकती थी. मगर वह अपने समाज और छोटे कस्बे से बाहर जाकर, बड़े शहर में वह दस साल बिताती है, कभी पुरुषों को ठेंगे पर रखती है…कभी फयदा उठाती है. जबकि उसकी मित्र नेल अपने कस्बे में रह कर वही करती है जो समाज उस समय की लड़कियों से उम्मीद करता है. जब सूला वापस लौटती है वह समाज उसे अपना दुश्मन और दुष्ट आत्मा की तरह अस्वीकार करता है. वह अपनी लड़ाई लड़ती है…चाहे फिर उसकी कीमत जीवन देकर उसे चुकानी पड़ती है.

एक ओर ‘लव इन द टाईम ऑफ कॉलेरा’ की अधेड़ नायिका ने मार्खेज़ के जादुई संसार में अपनी एक यथार्थपरक उपस्थिति बना ली और ‘फरमीना’ लोकप्रिय हो गई, अपनी अधेड़ावस्था में अपने पुराने प्रेम को पूरे पैशन के साथ जीने के साहस के साथ. दूसरी ओर, हारुकी मुराकामी ने ‘नार्वेज़ियन वुड्स’ की दो परस्पर विरोधी मिजाज़ की मगर पूरक लड़कियों  नाओके और मिडोरी से परिचित करवाया, एक ओर नाओके बचपन के प्रेमी की मृत्यु के बाद आहत, कोमल और शांत है, वहीं बहन की आत्महत्या को आंखों से देखने के बाद मिडोरी चंचल और जीवन के प्रति आसक्त युवती है! इन्हें  फिलहाल भले ही हम विश्व साहित्य में स्थान दें कि न दें मगर मुराकामी की नायिकाएं आधुनिकतम सदी की नायिकाएं हैं।

‘आयन रेंड’ अपने स्वप्निल आवेग में एक बिलकुल अलग तरह का किशोर संसार रचती हैं. सोफी’ज़ वर्ल्ड के बाद उनका उपन्यास ‘ एटलस श्रग्ड’ आया और उसकी नायिका डेग्नी टैगार्ट ने प्रसिद्धि पा ली. डैग्नी एक जीनियस लड़की है, जिसे  को बचपन से पता होता है कि वह अपने पिता की रेलरोड कंपनी संभालेगी, और वह एक कमाल की दक्षता से उसे संभालती है जबकि उसके भाई की वजह से ‘टेगार्ट ट्रांसकॉटिनेंटल कंपनी’ मुसीबत में आ जाती है, तब डेग्नी तमाम मुसीबतों, षड्य़ंत्रों के बीच से उस कंपनी को बचा ले जाती है. डेग्नी एक ऎसा मजबूत चरित्र है कि जिसके पैरेलल भारतीय साहित्य में कोई चरित्र रचा जाना बहुत दूर की बात लगती है. उसके जीवन के तीन शब्द…उम्मीद, चुनौती और नियंत्रण उसे दूर तक ले जाते हैं.

विश्व साहित्य की नायिकाएँ जो हमारे जहन में बच रह जाती हैं, उनमें हर एक में कुछ तो खास होता ही है, चाहे उनमें से कुछ सच में बहुत साहसी थीं, कुछ विवश और कुछ महत्वाकांक्षा की मारी, तो कुछ प्रेम में बर्बाद तो कुछ प्रेम में जीवन पा गई.  इन नायिकाओं से फिर – फिर रू – ब – रू होने पर यह सत्य निरंतर मंथन में से निकला कि सभ्रांत महिलाओं की अपेक्षा संघर्षरत स्त्रियों ने जीवन के संग्राम में हमेशा विजय पाई. संघर्ष किया, घर से निकलीं बजाय मृत्यु वरण करने के. जब सभ्रांत स्त्रियाँ रुसवाई से ही टूट कर बिखर गईं वहीं जन्म के साथ तमाम किस्म के भेदों और यौन शोषण को झेलती स्त्रियाँ जीती रहीं और मिसाल बनीं.

माया एंजलू कहीं तल्ख होकर लिखती भी हैं – “ जहाँ तक कि मैं जानती हूँ, गोरी सभ्रांत स्त्रियाँ उपन्यासों के अलावा कहीं अकेली नहीं दिखीं. गोरे पुरुष उन्हें प्रेम करते रहे, काले पुरुष उनकी कामना और काली स्त्रियाँ उनके घरों के काम करती रहीं. “

विश्व साहित्य पढ़ते हुए लगता है कि विक्टोरियन काल और उसके बाद के एरिस्टोक्रेटिक काल में आदमियों के पास स्त्रियों से जुड़े तीन ही काम थे, उनसे प्रेम करना, उन्हें दुख देना, खुद् दुख सहना और उन्हें विश्वप्रसिद्ध कृति में बदल देना.

वैसे सच तो यह है कि मजबूत स्त्री पात्र पढ़ते हुए कहीं जीवन से जोड़ते हैं, प्राणॉं में नया जीवन संचरित करते हैं. ‘आर्टिस्ट अगेंस्ट ऑड’ की धारणा को प्रबल करते हैं. इसलिए आज के विखण्डन के समय में मजबूत स्त्री पात्रों की आवश्यकता है साहित्य को.

एक प्रसिद्ध लेखक जॉस वेडन की पंक्तियाँ-  लोग पूछते हैं आप मजबूत स्त्री ही पात्र क्यों रचते हैं? मैं कहता हूँ, क्योंकि अब भी आप तो अब भी ये सवाल पूछते हैं!

पुन:श्च – विश्वसाहित्य में ऎसी कितनी ही नायिकाएं हैं जो देश – द्वीप – उपमहाद्वीप, महाद्वीप की सीमाएं लांघ हमारे देश में चर्चित हुईं, अपने सकारात्मक – नकारात्मक पहलुओं के बावजूद सराही गईं।

मनीषा कुलश्रेष्ठ

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2 comments

  1. बेहतरीन।मनीषा अपने अध्ययन से हमेशा चकित करती हैं। बधाई।

  2. डॉ ऋचा द्विवेदी

    बहुत ही ज्ञान वर्धक, सारगर्भित आलेख।
    इतनी बहुमूल्य सामग्री , बहुत बहुत आत्मीय शुभकामनाएं

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