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कोरोना के समय में गंगा से बातें

संवाद अनुवाद के माध्यम से भी होता है। रेखा सेठी का यह अनुवाद पढ़िए उनकी भूमिका के साथ- मॉडरेटर
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भारतीय अंग्रेज़ी कविता की खूबसूरती इस बात में है कि संवेदना के धरातल पर वह अन्य भारतीय भाषाओं के बेहद करीब है, भाषाओं के औपनिवेशिक पदानुक्रम को निरस्त करती हुई। ऐसी कविताओं के अनुवाद करना मुझे विशेष प्रिय है जिससे भारतीयता के अंत:सूत्र को उसकी सामासिक बहुलता में प्रतिष्ठित किया जा सके!
 
अंग्रेज़ी की प्रतिष्ठित कवयित्री सुकृता की अनेक कविताओं के अनुवाद किये हैं। उनकी कविताओं के साथ एक साथीपन का रिश्ता बन गया है। अनुवाद में वे कविताएँ इतनी अपनी हो जाती हैं कि अनुवाद की किसी सैद्धांतिकी में रचना को इस तरह अपना लिए जाने पर चर्चा कम ही हुई है। रूपांतरण में तो यह संभव होता है लेकिन रचना के इतने क़रीब रहते हुए नहीं। मैं इसी अर्थ में इसे ‘भाषाओँ की जुगलबंदी’ कहना पसंद करती हूँ, जहां दोनों कलाकार एक दूसरे को चुनौती देते रहते हैं और रचना अपनी स्वायत्तता में पूरे वैभव के साथ रूप धरती है। साथ-साथ मिलकर पढ़ें तो ये कविताएँ अनुवाद हैं, एक-दूसरे के साथ बिम्ब-प्रतिबिम्ब जैसी लेकिन एक दूसरे से मुक्त और स्वतंत्र भी। इस संकटपूर्ण समय में गंगा से बातें इसलिए भी क्योंकि हमारी नदियाँ ही सारे विष को जज़्ब कर जीवन देती हैं …रेखा सेठी 
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कोरोना के समय में गंगा से बातें
 
मूल कविता : Ganga Dialogues in Corona Times – सुकृता
अनुवाद : रेखा सेठी
 
 
ओ गंगा
आत्मा मेरी, गहरे बसी है
तुम्हारे पानियों में
 
मेरी देह को उतरना होगा
हिमालय की ऊंचाइयों से
नदी में गहरे
 
आत्मा को गले लगाने
 
………….
 
सतह पर तुम्हारी
चमकती चाँदी-सी लहरियाँ
ओ गंगा
उठती हैं तुम्हारी कोमल उंगलियों से
जैसे बजती हों सितार के कसे तारों पर
थिरकती हैं, शिलाओं और पत्थरों पर
तुम्हारे पानी के नीचे
……………
 
धारा-प्रवाह तेज़ बहता पानी
गाता है, रिझाने को शिशिर में
निष्पत्र हो गए वृक्ष
और सदाबहार हरीतिमा से
ढंके पेड़
 
ओ गंगा, तुम बहती हो
अपनी लय और अनोखे अंदाज़ में
समय और स्थान की दूरियों को पाटती
 
महासागर की बाहों में
समाने को चिरातुर
…………..
मौन खड़े पेड़ों की चुप्पी और घनी हो जाती
हाँफती-उछलती लहरों से
ओ गंगा
 
दौड़ती हैं जो छटपटाई-सी
अपनी मंज़िल की ओर
फिर से और फिर से
दुनिया के अंतिम छोर तक
……………
 
ओ गंगा
कोलाहल से भरी तुम्हारी सतह पर
अधीर आकृतियों और घुलते रंगों से
बनती बिगड़ती संरचनाएं
 
भीतर के उस शांत-गहरे प्रवाह को
कैसे प्रतिबिंबित करती हैं
जो लिए आता है
चुप्पियों के पर्वत
मैदानी विस्तार में
 
चट्टानी पत्थरों से बने
निर्मम हृदयों के लिए
जो सदा अदृश्य ही रहे हैं!
………….
 
नदी के पानी का पन्ने-सा हरा रंग
जंगल के हरेपन का मुलायम टोन है
आसमान की निलाई
मिट्टी का मटमैलापन
लिए चलती हो
मैदानों तक
अपने में समाए हज़ारों शव, भस्म
कौन सा रंग है मृत्यु का
ओ गंगा?
 
लेकिन तुम ही जताती हो कि
मृत्यु का कोई रंग नहीं
पारदर्शी है वह, सत्य की तरह
…….
 
नदी के कोलाहल में
घुल रही ब्रह्मांड की ध्वनि
मन के भीतर से उठती है
पिशाची मौन की प्रतिध्वनि
आत्म स्वीकृति जैसी
 
ओ गंगा
मैं तैयार हूँ
फिर से खेलने को अपना ही जीवन
 
* * * *
 
 
तुम्हें पता है क्या
ओ गंगा
मुझे हमेशा से पता था
जन्म से भी पहले
एक दिन मैं तुम में उतरूँगी
अपने दुर्वह
नामों और पट्टियों के साथ
फार्मूलों, सिद्धांतों और परिभाषाओं के साथ
 
और फिर
ओ गंगा
चाँदनी में भीगी
तुम्हारे पार उतरूंगी
अपने से मुक्त
 
जीवन को फिर से जीने
……
 
विश्व का हो रहा है अंत
ओ गंगा
किसी अणु या परमाणु बम से नहीं
न ही बाढ़ या भूकंप से
न ही धरती के डोलने से
बल्कि धीरे-धीरे भय के फैलने से
फिर साँसों के घुट जाने से
शुरु हो चुका युद्ध
मारक वायरस से
 
बताओ ओ गंगा
है तुम्हारे पास समाधान कोई
संकेत दो
प्रजातियों के संरक्षण का
या चाहती हो तुम लुप्त हो जाएँ सब
ले सको ताज़गी भरी साँस
 
समझ रहे हैं हम
जीवन की धारा बहती चले
अनिरुद्ध
……
 
तुम्हारे तूफानी पानियों पर राफ्टिंग के समय
ओ गंगा
कलेजा मुंह को आता है
बल्लियों उछलता है दिल
क्यों डरती हूँ मैं
द्रुत गति से मंज़िल की ओर बढ़ने में
 
मेरा आनंद उस विलंबित लय में है
जो करती है जुगलबंदी मेरे हृदय की गति से
वैसे ही
जैसे शांत बहता तुम्हारा पानी
 
तब तो और भी
जब मंज़िल के निशां
छिपे हों अदेखे कल्पान्तर में
……………..
 
तुमसे मिली मन की आँखों से
ओ गंगा
देखा मैंने प्रभु यीशु, स्टैथोस्कोप लिए
वृद्ध और बीमारों को
उठाये चल रहे हैं
तुम्हारी अशांत छाती के पार
 
थम गया प्रवाह तुम्हारा
गहराइयों से उठती हैं प्रेतात्माएं
करने नृत्य
शीशे-सी तुम्हारी सतह पर
 
औरों के लिए छोड़े बिना
कदमों के निशां
ओ गंगा, कहो तो
क्या वे उतरेंगे पार
हमें पीछे छोड़कर यूँ ही?
…….
 
बच्चों को उठाए
बुझे सपनों के साथ
खून लिथड़ी एड़ियों से घिसट रहे
हज़ारों-हज़ार प्रवासी
घर की ओर
सैंतालीस के काफिलों के विपरीत
इनके पास लौटने को घर है
भले ही बिना छत और दीवारों के
 
तुम्हारी तरह, ओ गंगा
स्थिर और दृढ़, वे बढ़ते जाते
 
शहरों की चुंधियाती रोशनी को पीछे छोड़
 
उठते, गिरते और टूटते
सैंतालीस की ही तरह बिखरते हुए
 
वायरस के आतंक से परे
भूख और थकान से मरने को तैयार
 
खुश हैं वे, ख़ुशी के उस भाव से
जो प्रार्थनाओं से पहले
हाथ-पैर धोने से मिलती है
वुज़ू करते हुए या
शव पर गंगाजल छिड़के जाने से
 
…………….
 
आँसुओं की नदी
ओ गंगा
नीली, हरी या बेरंग नहीं है अब
रक्तिम लाल है
जब उस मृतप्राय मज़दूरिन की कांपती उँगलियाँ
ठेलती हैं सूखी रोटी के टुकड़े
दुधमुँहे बच्चे के होंठों में
जो तालाबंदी के पहले दिन
सिर्फ़ डेढ़ हफ़्ता पहले
अलग हुआ है माँ की नाभि-नाल से
 
बूँद भर भी दूध नहीं है
माँ की सूखी छातियों में
या दुधपिलाई किसी बोतल में
 
ओ गंगा क्या तुम बहती रहोगी?
………………….
 
आज भीतर का सैलाब उठ रहा
तुम्हारी उठती लहरों की होड़ में, ओ गंगा
 
वायरस के हमलों से जूझने
अपने ही रगों में बहते लहू में
प्रतिरोध के सेनानी जीवाणुओं को जगाने
 
जैसे बाढ़ आने पर
तुम समेट लेती हो अपने उफनते किनारे
अपने ही भीतर
हम भी उठेंगे
जीवन और मृत्यु की सीमाएँ पार कर
तुम्हारी छाती पर पड़े
लक्ष्मण झूले से हाथ हिलाते
 
* * * *
 
 
Ganga Dialogues in Corona Times
 
Sukrita
 
My soul lies deep
in your waters
O Ganga
 
My body must dive
into the river
from Himalayan heights
 
To embrace her
 
Silver ripples on your surface
O Ganga
Rise from the soft tips of your fingers
Playing on taut strings of the sitar
rolling under your waters
over rocks and pebbles
 
Gushing waters
Singing seductively to
the naked winter trees
Also, to the fully clad
In evergreen foliage
 
O Ganga, you move on
In time and space
Rhythm and style
 
Forever arriving
In the arms of the ocean
 
Stillness of trees
Becomes more still
With your gasping waves
O Ganga
Running in exasperation
To reach the destination
Again and yet again
Till the end of the world
 
 
 
O Ganga,
How does your noisy surface
With kaleidoscopic patterns,
Restless shapes and wobbly colours
 
Reflect the steady flow
Of your deep and long waters
Carrying mountains of silence
Across the plains
 
Unseen by unmoved hearts
Built with rocks and stones
 
The emerald green of the river waters
Is the green of the forests softened
The blue is that of the skies
And the brown
that of the mud
Carried to the plains
 
With many a million corpses and ashes
In your belly
What of the colour of death
O Ganga?
 
But death you confirm has no colour
It is transparent like truth
 
In the din of the river
The sound of the universe vanishes
And echoes of demonic silence rise
From within the mind
As confessions from within
 
O Ganga,
I am ready to
Perform my life again…
 
 
 
* * *
 
 
 
You know what
O Ganga
I always knew
Even before I was born
That one day I’d dive into you
With my heavy baggage of
names and labels
theories, formulae and definitions
 
And then
O Ganga
Soaked in moonlight
I’d emerge on the other side of you
Redeemed of my load
 
To begin life all over again
 
The world is coming
To an end, O Ganga
Not with an atom or nuclear bomb
Nor with an earthquake or floods
Not with a sudden jolt
but as a gradual spread
first of fear and then of asphyxiation
the war with the deadly virus has begun
 
Say, if you have a solution
O Ganga
Give us signs
For the survival of the species
Or do you too wish
For our extinction
Just to breathe afresh?
 
Yes, we get it
The flow of life must continue
Not choke
 
Rafting on your stormy waters
O Ganga
With my heart in my mouth
Moving ahead in leaps and bounds
Why am I terrified of reaching
My destination faster
 
My joy lies in the slow movement
In sync with the beating of my heart
With yours too
When your waters are calm
 
And when the point of arrival is
Unseen and in distant eons
 
With the inner eye you lent me
O Ganga
I saw Jesus with a stethoscope
Carrying the sick and the old
Across your turbulent chest
 
Your waters stilled
Ghosts rose
From your depths
To dance on your glassy surface
 
Leaving no footprints
For others to follow
 
O Ganga, say, will he reach
your shore across
leaving us behind?
 
Carrying babies and
sacks of deflated dreams
dragging bleeding heels
 
All those thousands
Homeward bound
Unlike the kafilas in 1947
These have definite homes
even if without roofs or walls
 
Like you, O Ganga
Fixated and resolute, they move on
 
Leaving behind the blinding urban glitter
 
Collapsing rising breaking and
Fragmented as in 1947
 
Happily dying of starvation and
Fatigue Not of the virus
 
Happiness comes like the feel
of wuzu or ablution
Or Ganga-jal on dead bodies
 
The river of tears
O Ganga
Is not blue, nor green or neutral
Any more
It’s bloody red
 
When the quivering fingers
of the scrawny bricklayer
shoved a dried piece of bread
into the splitting lips of her baby
severed from her umbilical cord
Just one and a half weeks ago
on the very first day of the lock down
 
no milk in the feeding bottle
not a drop in her shrunken breasts
 
O Ganga, do you continue to flow?
 
Today the river inside
competes with
Your feverish tide, O Ganga
 
Confronting viral assaults
Antibodies awakened, armed
Soldiers stream in the grid of
bloody veins
 
Like you in floods
guzzling your own lush banks
We too are in a leap
Crossing borders between life and death
Waving from the swinging
Lakshman Jhoola across your chest
 
The river of tears
O Ganga
Is not blue, nor green or neutral
Any more
It’s bloody red
 
When the quivering fingers
of the scrawny bricklayer
shoved a dried piece of bread
into the splitting lips of her baby
severed from her umbilical cord
Just one and a half weeks ago
on the very first day of the lock down
 
no milk in the feeding bottle
not a drop in her shrunken breasts
 
O Ganga, do you continue to flow?
 
Today the river inside
competes with
Your feverish tide, O Ganga
 
Confronting viral assaults
Antibodies awakened, armed
Soldiers stream in the grid of
bloody veins
 
Like you in floods
guzzling your own lush banks
We too are in a leap
Crossing borders between life and death
Waving from the swinging
Lakshman Jhoola across your chest
 
 
 
 
 
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2 comments

  1. अच्छी कविताओं का बेहद अच्छा अनुवाद। इतनी अच्छी कविताएँ पढ़वाने के लिए रेखा जी और जानकीपुल का आभार।

  2. डॉक्टर चंद्रकान्ता किनरा

    समय की नब्ज पर हाथ रखती सुकृता की कविताओं के साथ डॉक्टर रेखा सेठी ने न्याय किया है।

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