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जन्नत, दोज़ख़ और पाताललोक

सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पुलिस अधिकारी हैं, शायर हैं। वेब सीरिज़ पाताललोक पर उनकी कहानी पढ़िए। मुझे पाताललोक देखने की सलाह उन्होंने ही दी थी। अब समझ में आया क्यों दी थी। दिलचस्प है- प्रभात रंजन

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तनहाई का शोर है यूं घर आँगन में
कैसे कोई बोले कैसे बात करे
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—‘ख़ुदा का खौफ़ खा मुन्ना! दोज़ख में जाएगा!’ अम्मी की फटकार वाली आवाज़ आई बाहर से, ‘रमज़ान चल रहे हैं। टीवी बंद कर दे!’
‘चित्रहार’ का पहला गाना अभी आधा ही हुआ था कि मुन्ना यानि ख़ाकसार ने, बाहर वाले कमरे के दरवाज़े पर खड़ी रोज़ेदार और पवित्रता की प्रतिमूर्ति बनी बड़ी बहन को घूरते हुए, टीवी की अर्धघुटी आवाज़ को पूरा घोटते हुए वॉल्यूम के स्विच से टीवी को ऑफ कर दिया। तब टीवी की आवाज़ कंट्रोल करने और खुलने-बन्द करने के फंक्शन वाला बटन एक ही होता था। सन इक्यासी में रोज़े मानसून में आए थे। हम स्योहारा सेट हो चुके थे। बड़ी बहन वैसे तो नमाज़ की पाबंद शुरू से ही हैं। मगर रमज़ान में वह पूरी तरह धर्मपरायणता और पवित्रता का आदर्श रूप हो जाती थीं। मुझसे छोटे दोनों भाई बहन तो उनकी फ़ायर-रेंज से बाहर थे मगर मुझ पर और मुझसे बड़े भाई पर उनकी तबलीग़ प्रतिशतता के सौंवे अंक तक आज़माई जाती थी। जब हम दोनों डाइरेक्ट एक्शन से उनके क़ाबू में नहीं आते थे तब वह छद्म युद्ध का सहारा लेती थीं। इस प्रकार के युद्ध के मारक हथियार लाँछन व चुग़ली है।उनकी दृष्टि में हमारे धार्मिक उत्थान के लिए ये हथियार नितांत आवश्यक थे। हालांकि चुग़ली इस्लाम में ख़ुद बड़ा गुनाह है और इसकी उपमा मुर्दा भाई के गोश्त खाने से दी गई है। मगर धर्म-सुधारक का स्वभाव ‘गरल धारण’ वाला हो जाता है जो विधर्मी को सहीह मार्ग पर लाने के लिए ‘मुर्दा भाई के गोश्त खाने’ जैसे नाक़ाबिले कुबूल कृत्य को भी सद्भावना के साथ बर्दाश्त किया जा सकता था। हम दोनों भाइयों के रोज़े की शुचिता, नमाज़ की पाबन्दगी और क़ुरआन शरीफ़ की तिलावत की रिपोर्टिंग उन्हीं के ज़रिये अल्लाह मियां को तो पता नहीं पहुँचती थी या नहीं मगर, अम्मी तक ज़रूर हर घंटे के अंतराल पर पहुंचाई जाती थी।

मंज़र कशी कुछ ऐसे की वाइज़ ने हश्र की
मस्जिद को हम भी खौफ़ के मारे चले गए

उन दिनों मैं ‘साप्ताहिकी’ मे बतलाए हफ्ते भर के प्रोग्राम पूरी बारीकी से ऐसे नोट करता था कि जैसे कोई रिसर्च स्कॉलर अपना जर्नल लिखता है। वह बात अलग कि बिजली चाहे पूरे हफ्ते में कुल मिला कर घंटो के हिसाब से, ठोस रूप में, सिर्फ एक दिन के बराबर ही आए। उन दिनों रमज़ान के फज़ल से बिजली आ रही थी और चित्रहार का वक़्त भी हो चला था। अफ़तार और नमाज़ से फ़ारिग होकर अम्मी बाहर आराम फ़रमा रही थी। बड़ी बहन किचन में व्यस्त थी। रमज़ान में मुसलमान घरों में उन दिनों टीवी शैतान की तरह बंद कर दिया जाता था। फ़र्क़ यह था कि शैतान अल्लाह-मियां के हुक्म से क़ैद होता था और टीवी/रेडियो बुज़ुर्गाने दीन के फ़रमान से। तो आदमी के काम में कुछ गुंजाइश निकल ही आती है तो पापा तीसरे रोज़े ही से सिर्फ़ खबरें सुनने के लिए वे भी बीबीसी पर, रेडियो आधे घंटे के लिए खोलते। फिर हफ़्ते भर में ही हालाते हाज़रा पर मबनी ‘सैरबीन’ रेडियो-प्रोग्राम का प्रचार व प्रसार एक घंटे तक हो जाता। कुछ दिनों बाद ‘समाचार’ दूरदर्शन पर सचित्र हो जाते। तब यह समझ लिया जाता था कि समाचार देखने से इतना गुनाह नहीं होता था जितना कि गाने और पूरी फिलिम देखने से । उस दिन शैतान ने ज़्यादा ज़ोर मारा और कुछ मेहनत साप्ताहिकी लिखने की भी वसूलनी थी। लेकिन भला हो ज्येष्ठ सहोदरा का कि उन्होने हमें गुनाह से बचाकर अपने ख़ुद के नेकियों के खाते को मालामाल कर लिया था।
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मेरे खयाल में ज्ञात इस्लामिक इतिहास में यह पहला रमज़ान होगा कि जब मस्जिदों के साथ-साथ नमाज़ी भी अपने घरों में बन्द थे। मेरे इस शे’र, जो अब मेरी पहचान है, की सार्थकता ही नहीं रही:-

तमाम रात दरे मैकदा खुला रखना
सुना है कोई तहज्जुद गुज़ार आएगा

पहली बार महसूस हो रहा था कि धार्मिक और आध्यात्मिक सफ़ाई के इस वार्षिकोत्सव में मेरा जैसा मुसलमान भी नियमबद्ध रोज़ा-नमाज़ कर लेता था, उसको अब पता ही नहीं चल रहा था कि ‘जुमा’ कब है और तरावीह का वक़्त कब। कहने का मतलब है साम्यवाद के इस महामारी-काल में जुमा का पवित्र दिन भी हफ्ते के बाक़ी साधारण दिनों से अलग नहीं रह पाया। मुझ जैसे नमाज़ी भी कम से कम जुम्मे को मस्जिद का रुख़ देख ही लेते थे। मेरे ख़याल में यह आपदा काल ख़ुदा की फटकार है। साथ ही चिंतन और मनन का समय भी है।
पिछले साल जनवरी के पहले हफ्ते में अपने एक बेचमेट बल्लू भाई का फ़ोन आया कि उनके हवाले से एक लड़के का फोन आएगा जो कि फिल्मों में अभी शुरुआत कर रहा है, उसको उर्दू के कुछ टिप्स देने हैं। बल्लू का काग़ज़ाती नाम Balram Singh Baniwal है जो सूबाए देहली के पित्थोपुरा उर्फ पीतमपुरा गाँव के मुक़ामी बाशिंदे हैं। दिल्ली की इसी मुक़ामियत व चौधराहट के सिलसिले में पैरामिलिट्री की असिस्टेंट कमांडेंट की गैज़ेटेड नौकरी छोडकर दिल्ली पुलिस में थानेदारी में भर्ती हो गए थे। ख़ैर मेरी उनसे क़ुरबत पढ़ने पढ़ाने की निस्बत से रही है क्यूंकि पुलिस की ख़ुश्क और मसरूफ़ नौकरी में पढ़ने-लिखने का मतलब सिर्फ शिकायत-रपट-मज़रूब-मुल्ज़िम-ज़िमनी-चालान ही है। उसी दिन शाम को एक फोन आया, नाम कुछ अलग सा था मगर बलराम के हवाले से ही था। रात को आठ के बाद आने का वक़्त दे दिया।

भाई साहब का नाम Ishwak Singh है। आए। बिलकुल पब्लिक स्कूल के किसी फ़र्स्ट बेंचर की पर्सनेलिटी थी। इशवाक ने बताया कि वह ‘वीरे दी वेडिंग’ में सोनम कपूर के मंगेतर का रोल कर चुके हैं। रिफरेंस बलराम का था। बेयक़ीनी का मामला ही नहीं था। उनका नाम सुनना तो छोडिये मैंने वीरे दी वेडिंग का नाम भी जनरल नॉलेज के तौर पर ही सुन रखा था। इशवाक ने बताया कि वह एक वेब-सीरीज़ में दिल्ली-पुलिस के सब-इंस्पेक्टर का रोल कर रहे है जो कि मुसलमान है। खैर दो सिटिंग में इशवाक साहब को वांछित सभी जानकारी दे दी गयी जो कि उनके किरदार से सम्बंधित थी। बीच में फोन पर बात होती रही उनसे। अक्तूबर 2019 में वह थाना साउथ एवेन्यु भी आए । संजोग से Kashf साहिबा और बिटिया भी आई हुई थीं ।

इस रमज़ान में ‘पाताल-लोक’ रिलीज़ हुई। मनोरंजन के सामूहिक स्थल जैसे सिनेमा-हाल, मॉल इत्यादि ख़ुदा के वबाई फरमान के चलते बंद थे। मुशायरों में न शामिल होने की कसक फेसबुक लाइव से निकाली जा रही थी। लेकिन ‘दोज़ख-रसीद’ होने का बचपने वाला डर इस सीरीज़ को देखने से रोक रहा था। लेकिन ‘सैर-बीन’ और समाचार की तरह फेसबुक और दूसरी सोशल साइट्स से शैतान छोटे गुनाहों के लिए बरग़ला ही लेता था। तो हज़रात तीन दिनों में ड्यू इबादतों और दीगर मज़हबी फ़राइज़ के बीच ‘पाताल-लोक’ देख ही ली। कोई और मुआमला होता तो शायद न भी देखता मगर पर्सनल दो चीजें ‘दिल्ली-पुलिस’ और सब-इंस्पेक्टर इमरान अंसारी इसमें थीं और अब अपने ऊपर बड़ी बहन की अनुशासनात्मक छड़ी भी नहीं थी। तो थोड़े गुनाह का रिस्क उठा ही लिया।
पहले तीन एपिसोड तक तो मैं इस सीरीज़ को उपरोक्त वर्णित दोनों निजी बाध्यताओं की वजह से देखता रहा।
कुछ ख़ास न था। लेकिन चारों में से एक मात्र मुल्ज़िमा ‘चीनी’ का लिंग-परिवर्तन (दर्शकों की दृष्टि में) इस सीरीज़ में टर्निंग-पॉइंट था। फिर तो अंत तक सीरीज़ में धमाके ही होते रहे। पाताललोक_में_कीड़े_रहते_हैं इसका अनुभव एक पुलिस वाला भली भांति कर सकता है। क़ुरआन में मानव योनि को अशरफ़ुल-मख्लूक़ात अर्थात प्रकृति की सर्वोत्तम कृति कहा गया है लेकिन आप दिल्ली के किसी रेल्वे स्टेशन, ****पुरियों, कोठों और कच्ची कॉलोनियों के पाइपों के बीच में ‘कुछ दिन तो गुजारिए’ को अनुभव करें। तो क़सम से आपके सभ्य जीवन के तत्वों का ज्ञान अपनी मीमांसाओं के साथ उड़न-छू हो जाएगा और त्वरण के सारे कीर्तिमानों को तोड़ते हुए अपने घर-समाज पहुँच कर अपनी दोस्त-भाई-माँ-बहनो-बेटियों को आदर देने लगोगे।
सीरीज़ के अंत तक मैं न चाहते हुए भी ख़ुद को हाथीराम से रिलेट होने न रोक सका। खैर यह तो फिलिम ठहरी। फिल्म भी तो साहित्य का एक रूप है और साहित्य तो समाज का ही दर्पण है। एक सफल पुलिसवाला फेमिली फ्रंट पर असफल रहता है। कुछ हद तक ठीक बात है । हाँ अगर आपको पारिवारिक सपोर्ट है तो दोनों जगह सामंजस्य बैठा सकते हैं। बाप-औलाद के परस्पर सम्बन्ध वाले सीन में मैंने असहजता महसूस की। वाकई पुलिस की नौकरी में आपके बच्चों से मात्र कूटनीतिक संबंध ही बन पाते हैं। आह!
जर्नलिज़्म, कारपोरेट-राजनीति, डीसीपी-साहब, अपराध-राजनीति, सीबीआई वगैरह पर टिप्पणी मेरे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। हाँ इतना ज़रूर कहना है कि मनोरंजन की किसी भी विधा की तरह वेबसीरीज़ का अनंतिम उद्देश्य भी धनोपार्जन ही है। भाइयों यदि ऐसा नहीं दिखाया जाएगा तो आदर्श और ईमानदारी की बातें तो आपको धर्मशास्त्र भी बता सकते हैं। चाहे तो उनको घर की सबसे ऊंची अलमारी से उठा कर पढ़ लेना।

मैं जवानी में इशवाक सिंह जैसा खूबसूरत तो नहीं रहा। मतलब खूबसूरत तो शायद अब भी नहीं। हाँ सीरीज़ में दिखाई गई नौकरी के प्रोस एन्ड कोन्स वाली हालत कमोबेश झेली है। कुछ दोस्तों को यह सीरीज़ जातीय और धार्मिक आधार पर प्रेज्यूडिस लग सकती है। लेकिन इसको आप मात्र धार्मिक-अल्पसंख्यता और जातीय कमज़ोरी का मामला नहीं समझे। धर्म-जाति की लड़ाई से अधिक यह विचारों की संख्यात्मकता का द्वंद्व है। जो गिनती में कम है उनको अस्तित्व के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। रही बात विद्वेष, पक्षपात, भेदभाव की तो इसका उदाहरण आपको हर समय-काल, स्थान में मिल जाएगा।इतिहास के कालक्रम की निकटता के लिहाज़ से कर्बला की लाल मिट्टी देख सकते हैं और स्थानीय निकटता के समीप देखना हो तो कुरुक्षेत्र देख लीजिये। यह डार्विनवाद है अर्थात ‘It is not the strongest species that survive, nor the most intelligent, but the ones most responsive to change.’ यदि ऐसा न होता तो इस वेबसीरीज़ के चारों मुल्जिमान कथित रूप से सवर्ण, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्रेणगुण धर्मी न होते।
पाताललोक की भाषा वगैरह पर टिप्पणी से पहले यह सोचें कि हम लोग अपने रोज़मर्रा में क्या भाषा इस्तेमाल करते हैं। यह कम से कम 18+ के प्रमाणन में तो है। गाली और अश्लीलता बच्चा सबसे पहले अपने परिवार से सीखता है। ढकोसला छोड़ कर आइए आँखें मूँद कर अंतरदृष्टि से देखें तो आप पाएंगे आपने अपनी पहली गाली अपने बाप से या चचा से सीखी होगी। हर संघर्ष आदिम हैं। आदम का बच्चा हर परिस्थिति में लड़ने का बहाना ढूंढ ही लेता है। इस वेबसीरीज़ में दर्शाये गए कुछ सींस व बोले गए कुछ शब्दों विशेषकर एक ‘अंग-विशेष’ को लेकर बोले गए शब्द से मेरे जैसे नाम वालों को ऐतराज़ होगा। मैं फिर कहता हूँ, अपने भीतर देखें। आपके यहाँ भी आपस में ‘खटमल-मच्छर’ का इस्तेमाल खूब होता है। मनोरंजन को मनोरंजन की नज़र से देखिये जनाब। यही सहिष्णुता है।
मुझे संतोष है कि सब इंस्पेक्टर इमरान अंसारी ने मेरे द्वारा कराये गए डी कोर्स को खूब अच्छी तरह अपनी रेगुलर सर्विस में निभाया है। जो ज़िम्मेदारी आपको समाज और आपके मैंटर ने दी उसको, उपलब्ध रिसोर्सेज़ के साथ बिना शिकायत के कैसे निभाया जाता है एसआई अंसारी से सीखें। दुआ करता हूँ कि अगले सीज़न में यह आईपीएस बनें और इनको AGMU Cadre अलॉट हो ।
इस वेबसीरीज़ की मेरी खोज अभिषेक बनर्जी हैं। मिरज़ापुर में उनका किरदार बाहुबली-पुत्र की छाया में दब गया था। पातालोक में इस ‘त्यागी’ की भाव-भंगिमा बोलती है, डॉयलाग नहीं। ‘लंगड़ा’ के बाद भारतीय फिल्मों के त्यागी इतिहास में हथोड़ा त्यागी संभवतः दूसरा नाम है जो स्वर्णिम रूप में लिखा जाएगा।
उपसंहार: ज्ञात मानवीय इतिहास में पहला महायुद्ध महाभारत का है। वैसे तो हर युद्ध धर्म और अधर्म का है। प्रथम पक्ष अपने को धर्म का ध्व्जवाहक मानता है और अचरज होता है कि ऐसा ही दूसरा पक्ष भी सोचता है। लेकिन फैसला तो निष्पक्ष अर्थात सेकुलर ईश्वर ही करेगा। महाभारत की अंतिम कथा सुनाता हूँ। सुनी तो होगी ही। स्वर्ग के द्वार पर इन्द्र्देव आतुरता से धर्मराज युधिष्ठिर का इंतज़ार कर रहे हैं।ज्येष्ठतम-पाण्डव अपने पीछे असमान नेह (द्रौपदी), बौद्धिक अहंकार (सहदेव), आत्ममुग्धता(नकुल), अति आत्मश्रेष्ठता (अर्जुन) व अतृप्ता (भीम) को को छोड़ कर यहाँ पहुंचे हैं। वह सदेह स्वर्गलोक में जाने के लिए विशेषाधिकृत हैं। परंतु, कुत्ता साथ है।
—‘कुत्ता मेरे साथ ही जाएगा!’
—‘ यह संभव नहीं है। सबको स्वर्ग नहीं मिल सकता। कुत्ता बूढ़ा व मरियल है और धेले का नहीं है।’
धर्मराज अचल हैं ।
‘जो उनके साथ पूरे रास्ते भर वफ़ादार रहा उसको अब कैसे छोड़ा जा सकता है। स्वर्ग के मिलने का सुख अपने प्यारे ‘साथी’ को खोने के दुख के मुक़ाबले कुछ नहीं है।’
‘ इसमें मेरे भाइयों और पत्नी वाली कोई भी कमी नहीं है जिसके कारण इसको छोड़ा जा सके। अगर यह स्वर्ग में प्रवेश के योग्य नहीं है तो मैं भी नहीं।’ वह अपने तर्क इन्द्र्देव को बताकर स्वर्गप्रवेश की संभाव्यता को नकारते हुए पलट कर चलने लगते हैं ।

बाक़ी आपको पता ही है। मेरा मक़सद आपको यह याद दिलाना है आपके साथ आपका धर्म ही जाएगा। नेह, बुद्धि, सुंदरता, मुग्धता, बल आदि सभी गुण इस नश्वर संसार में छोड़ने पड़ेंगे। संसार की तुच्छ से तुच्छ चीज़ ईश्वर की बनाई हुई है। यह आपका और मेरा वहम है कि आप मुझसे और मैं आपसे बड़ा और बलशाली हूँ । इस कोरोना वाइरस को ही देखिये। देख भी कहाँ पा रहे हैं? अब सब बलशालियों ने भी कह दिया है न कि इसके साथ ही जीना पड़ेगा। अतः सबका सम्मान कीजिए। सिंबयोसिस भी यही है।

वीडियो में दिखाए गए कुत्ते इंडिया गेट राजपथ के निवासी हैं । अफ़तार के बाद आजकल मैं इनके साथ वॉक करता हूँ। कह सकते हैं जुम्मा-जुम्मा आठ दिन की यारी है। मगर यारी तो है। चलिये छोड़िए। नया शे’र सुनिए जो इशवाक सिंह द्वारा निभाए गए किरदार सब-इंस्पेक्टर इमरान अंसारी की सहिष्णुता को नज़्र करता हूँ :-

तनहाई का शोर है यूं घर आँगन में
कैसे कोई बोले कैसे बात करे

दुआओं में याद रखिएगा ।

Moral of the discussion: When a dog loves man, he is a good man. — When a man loves dog, he is good man. Commando One-Eyed बोले तो काना कमांडो of patallok

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2 comments

  1. mahesh shrivastava

    भाईजान बाद सलाम अर्ज़ है की आपने शाउब उल इस्लाम को बहुत सही और वाजिबुल दीन
    पेश किया

  2. शुक्रिया महेश जी

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