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भारतेंदु युग की लेखिका मल्लिका और उनका उपन्यास ‘सौंदर्यमयी’

चित्र साभार: भारतेंदु समग्र, सं. हेमंत शर्मा

 भारतेंदु युग की लेखिका मल्लिका को लेखिका कम भारतेंदु की प्रेमिका के रूप में अधिक दिखाया गया है। लेकिन युवा शोधार्थी सुरेश कुमार ने अपने इस लेख में मल्लिका के एक लगभग अपरिचित उपन्यास ‘सौंदर्यमयी’ के आधार पर यह दिखाया है कि बाल विवाह, विधवा विवाह जैसे ज्वलंत सवालों को लेकर मल्लिका कितनी मुखर थी। 1888 में प्रकाशित यह उपन्यास अपने समय से बहुत आगे था। इस शोधपूर्ण लेख को पढ़िए- मॉडरेटर

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 श्रीमती मल्लिका देवी उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध की हिन्दी और बांग्ला भाषा की प्रसिद्ध लेखिका थीं। पश्चिमोत्तर प्रांत में स्त्रियां बाल विवाह और विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा का मुद्दा अपने लेखन में बड़ी शिद्दत के साथ उठा रही थीं। आखिर, एक औरत में यह हिम्मत कहां कैसे आ गई कि जिन्हें पुरुषों के सामने बोलने तक का अधिकार नहीं था वे अपने बारे कैसे लिखने लगी?  इसका बड़ा कारण औपनिवेशिक शासन का उदार रवैया था। सन् 1857 के बाद भारत का शासन महारानी विक्टोरियों के हाथों में आ गया था। भारत में महारानी विक्टोरिया के शासन को स्त्रीराज के तौर पर देखा जा रहा था। इस शासन का एक बडा असर यह हुआ कि भारत में पितृसत्ता का दायरा थोड़ा कमजोर हुआ। इस शासन में तमाम स्त्रियों को जनाना स्कूलों व विदेश में शि़क्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रमाण के तौर पर पंडिता रमाबाई, रख्माबाई और हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका और ‘भारत भगिनी’ पत्रिका की संपादक श्रीमती हरदेवी का नाम विशेष तौर लिया जा सकता है। महारानी विक्टोरिया के शासन को यहां की पढ़ी लिखी स्त्रियों ने अभिव्यक्ति और मुखरता के तौर पर लिया था।

पश्चिमोत्तर प्रांत के लेखकों ने महारानी विक्टोरिया के शासन को उगते हुए सूर्य के समान पर देखा था। इन लेखकों का कहना था पहली बार ऐसा हुआ कि ‘शेर और भेड़’ एक घाट पर पानी पी सकते हैं। दरअसल, विक्टोरिया शासन स्पष्ट तौर से यह घोषणा करता है कि भारतीय जनता अपने साहित्य और संस्कृति का प्रचार-प्रसार खुलकर कर सकते हैं। इसके बाद विक्टोरिया शासन ने भारतीयों का यह भी अश्वासन दिया कि उनके धर्म और काननू में हम तब हस्तक्षेप नहीं करेंगे, जब तक भारतीय विद्वानों की तरफ से पहल नहीं की जाएगी। सन् 1877 में दिल्ली दरबार के अवसर पर महारानी विक्टोरिया के शासन ने देश के तमाम विद्वानों और राजा-महाराजाओं के साथ उनकी स्त्रियों को भी आंमत्रित किया था। दिलचस्प बात यह कि पश्चिमोत्तर प्रांत से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को भी विक्टोरिया शासन की ओर से दिल्ली दरबार में आमंत्रित किया गया था। भारतेन्दु ने इस दरबार का आंखों देखा हाल लिखकर ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ (Delhi Assemblege Memorandum )शीर्षक से सन् 1877 में पुस्तिका के रुप में मेडिकल हाल प्रेस से छपवाया था। पश्चिमोत्तर प्रांत के लेखकों पर इस ऐताहासिक उत्सव का असर क्या पड़ा? इस पर अलग से अध्यन और शोध करने की आवश्कता है। सन् 1901 में जब महारानी विक्टोरिया का इन्तकाल हुआ तो भारत की पढ़ी लिखी लेखिकाओं ने कहा कि यह बड़े दुख और क्लेश की बात है कि भारत से स्त्रीराज उठ गया है।

दूसरी तरफ भारत के प्रमुख शिक्षाविद् और स्त्री हितैषी ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के अथक प्रयास से ब्रिटिश सरकार ने ‘विधवा विवाह अधिनियम 1856’ पारित  कर दिया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने ‘विधवा विवाह’ नामक ग्रंथ लिखकर स्त्री समस्या पर एक अलग तरह के विमर्श की जमीन तैयार कर दी थी। इसके अलावा 19वीं शताब्दी के उतार्राध में जो महत्वपूर्ण घटना घटी वह महान सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती का पदार्पण और समस्त देश में आर्य समाज की सभाओं का कायम होना था। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी तर्क विद्या से पुरोहितों और पोथाधारियों को बैकफुट पर धकेलने का काम शुरु कर दिया था। पश्चिमोत्तर प्रांत में दयानंद के आंदोलन का काफी असर हुआ। दयानंद सरस्वती ने अपने चिंतन में स्त्री मुद्दा और अछूत समस्या पर बल दिया था। स्वामी दयानंद सरस्वती के आंदोलन से स्त्रियों को एक उम्मीद की झलक दिखाई दी। ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका ने स्वामी दयानंद सरस्वती का आभार प्रकट करते हुए कहा कि अब देश में आर्य समाज की सभाएं क़ायम हो रही है उम्मीद है कि इन सभाओं में स्त्री के साथ न्याय किया जायगा।

 19वीं सदी के स्त्री चिंतन पर ब्रह्म समाज और आर्य समाज, विक्टोरिया शासन, विद्यासागर के समाज सुधार आन्दोलन की गहरी छाप दिखाई देती है। इन आन्दोलनों का असर भी मल्लिका देवी के साहित्य में देखा जा सकता है। मल्लिका देवी ने अपने कथा लेखन में बाल विवाह, बेमेल विवाह, और विधवा पुनर्विवाह का मुद्दा मुख रुप से उठाया था। मल्लिका देवी के ‘कुमुदिनी’ और ‘पूर्णप्रकाशचन्द्रप्रभा’ के उपन्यास पर नीरजा माधव ने अपने इतिहास ग्रंथ ‘हिन्दी साहित्य का ओझल नारी इतिहास’ में चर्चा की है। इस लेख में मल्लिका के उपन्यास ‘सौन्दर्यमयी’ चर्चा प्रस्तुत करुंगा।

हिन्दी नवजागरण पर शोध करते हुए मुझे मल्लिका देवी के उपन्यास ‘सौन्दर्यमयी’ की एक प्रति मिली। यह संवत हरिश्चन्द्र-3 अर्थात भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की मृत्यु के तीन वर्ष बाद सन् 1888 में ‘सौन्दर्यमयी’ उपन्यास श्री अम्बिकाचरण चट्टोपाध्याय द्वारा काशी दशाश्वमेधस्थ अमर यन्त्रालय से प्रकाशित हुआ था। मल्लिका ने यह उपन्यास पहले बांग्ला भाषा में लिखा होगा, और खुद ही इसे हिन्दी में अनूदित कर सन् 1888 में प्रकाशित करवाया होगा। इसके प्रथम कवर पृष्ठ पर सौन्दर्यमयी को एक वियोगांत श्रेणी का उपन्यास बताते हुए बंग भाषा से श्रीमती मल्लिका देवी द्वारा अनूदित लिखा है। श्रीमती मल्लिका देवी के अलावा और किसी लेखक के नाम उल्लेख नहीं है। नीरजा माधव ने अपने इतिहास ग्रंथ ‘साहित्य का ओझल नारी इतिहास’ में इस उपन्यास के संबन्ध में एक बड़ी दिलचस्प सूचना दी है कि ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’  के संवत 2058 अंक 1 में इस उपन्यास को मल्लिका देवी के नाम से प्रकाशित किया। मेरा मानना है कि इस उपन्यास को मल्लिका देवी ने पहले बंग भाषा में लिखा होगा और बाद में इन्होंने खुद इसका अनुवाद कर हिन्दी में प्रकाशित करवाया होगा। यह संभावना तब और प्रबल हो जाती है जब इसकी कथावस्तु और भाषा उनके अन्य उपन्यासों से काफी मिलती-जुलती है। यदि यह उपन्यास किसी दूसरे लेखक का होता तो उस ग्रंथाकार का उल्लेख अवश्य किया जाता। 19वीं सदी के दस्तावेज को खंगालने पर यह भय और चुनौती बनी रहती है कि वास्तविक लेखक कौन है? हिन्दी नवजागरणकाल के गहन अध्येयता और विद्वान वीरभारत तलवार ने अपनी चर्चित किताब ‘रस्साकशी उन्नीसवीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत में’ मल्लिका के अध्यन संबन्धी में समस्या को लेकर बड़ी महत्वपूर्ण कही है। वीरभारत तलवार लिखते हैं:

‘‘मल्लिका के साथ कठिनाई यह है कि उनकी सभी रचनाएँ प्रकाशित नहीं हुईं, अधिकतर रचनाएँ पांडुलिपि के रुप में भारतेंदु के वंशजों के पास रह गईं जिन्हे शायद नागरीप्रचारिणी सभा कभी प्रकाशित करे। दूसरी कठिनाई यह है कि कुछ-एक रचनाएँ जो छपी थीं, उनकी ठीक-ठीक पहचान कर पाना मुश्किल है कि उनमें से कौन सी-मल्लिका की हैं और कौन-सी भारतेंदु की। मल्लिका की होने पर भी उस पर से भारतेंदु की छाप को अलग करने का प्रश्न बना रहेगा।’’

मल्लिका के सृजन और साहित्य को पहचाने और भारतेंदु की छाप से अलग करने की एक कसौटी  यह भी हो सकती है कि जिन रचनाओं में बाल्यविवाह, विधवा पुनर्विवाह और बेमेल विवाह की समस्या को उठाया गया हो वह रचना मल्लिका काफी हद तक की हो सकती  है । मल्लिका देवी के जीवन के संबन्ध में प्रचलित धारणा यह है कि वे बाल विधवा थीं। इसलिए उनकी रचनाओं में बाल्यविवाह की कुरीति का विरोध दिखाई देगा। इसके साथ विधवा पुनर्विवाह की मांग की दावेदारी भी नजर आयेगी।

सौन्दर्यमयी उपन्यास में बाल्य विवाह और विधवा विवाह की समस्या को उठाया गया है। इस उपन्यास का पात्र रामदास जाति से ब्राह्मण है और उसकी एक कन्या है जिसका नाम सौंदर्य है। रामदास अपनी कन्या सौन्दर्य का बाल्य विवाह कर देता है। उपन्यास की कथा में दिखाया गया है कि सौन्दर्यमयी का विवाह जिस लड़के से होता है वह कुछ दिन बाद मर जाता हैं। अब रामदास की कन्या सौन्दर्यमयी बाल्य विधवा होकर घर पर ही बैठी है। रामदास अपनी कन्या का पुनर्विवाह करना लोकरीति के विपरीत समझते हैं। सौन्दर्य जब विधवा हुई तो उसकी अवस्था मात्र नौ वर्ष की थी। सौन्दर्य की अवस्था जैसे-जैसे बढ़ी वैसे ही उसे विधवा जीवन का अहसास यह समाज कराने लगा था। समाज ने विधवा स्त्रियों का सामाजिक उत्सव, जैसे विवाह आदि में अपशगुन के भय से शामिल होने पर प्रतिबंध लगा रखा था यदि गलती से बाल विधवा विवाह के अवसर पर पहुँच जाती तो उन्हें बड़ी हिकारत भरी दृष्टि से देखा जाता था। सौन्दर्य अपने सखी लावण्य के विवाह असर पर उसके घर गई। वहां स्त्रियां उसे बड़ी हिकारत भरी दृष्टि से देख रही थी। इस तरह के व्यवहार से सौन्दर्य का दिल बड़ा आहत हुआ। इसके बात वर के शगुन की सामग्री को छूने की रस्म आई। जब सौन्दर्य इस रस्म के लिए खड़ी हुई तो लावण्य की माँ ने उसे कहा कि सौन्दर्य तुम वर की सामग्री को मत छूना क्योंकि यह रस्म सुहागिन स्त्रियां करती हैं। लेखिका ने यह दिखाने की कोशिस की है कि यहां विधवा स्त्रियों को कदम-कदम पर सामाजिक अपमान का घूँट पीना पड़ता है। यह समाज विधवाओं स्त्रियों के साथ बड़े ही दोयम दर्जो का व्यवहार करता था। एक बार स्त्री विधवा हो जाने के बाद उसके सारे अधिकार छीन लिये जाते थे। उन्हें पशुओं से भी बदतर प्राणी समझा जाता था। उनकी इच्छाओं पर अंकुश लगा दिया जाता था। उपन्यास की कथा में कहा गया है कि उच्च घरों की स्त्रियां घोर संताप और बन्धन में जीवन व्यतीत कर रही हैं। इन विधवा स्त्रियों की रिहाई के लिए कुलीन वर्ग आगे नहीं आ रहा है।

उपन्यास की आगे की कथा में दिखाया गया है कि सौन्दर्य विधवा होने के बाद हीरालाल नमक युवक से प्रेम करने लगती है। हीरादास भी सौन्दर्य से प्रेम करता है। दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं और विवाह करना चाहते है लेकिन पुरोहित के विधान पुनर्विवाह में बाधा बने हैं। सौन्दर्य हीरालाल को चाहती तो है लेकिन आत्मसमर्पण नहीं करती है। लेखिका ने लिखा है: ‘‘सौन्दर्य ने मन ही मन में हीरालाल को प्राण सौंपा था। किन्तु आत्म समर्पण नहीं किया।’’  आज से लगभग सवा सौ साल पहले लिखी गई इस पंक्ति में क्या आधुनिक स्त्री विमर्श के सूत्र नहीं मिलते हैं। सौन्दर्य यह भलीभांति समझ चुकी थी कि यह निष्ठुर समाज उसे हीरा से पुनर्विवाह करने की इजाजत नहीं देगा। सौन्दर्य अपनी अंतरिक पीड़ा को मन ही मन हीरा लाल को संबोधित कर कहती है:

 ‘‘हीरा प्राण! मेरा प्यार! टरे क्या करैं और क्या कहैं? जो विधाता की विडम्बना  से आप ही चिर दुखी है, वह दूसरे को क्या सुख देगी। जिसको विपक्षअपने लोग,- ज्यादे क्या ईश्वर भी विमुख है, वह दूसरों को कहां से सुख देगी, हम तो सोचते थे कि पिता विधवा तम से हमको ब्याह देंगे, हम जिसको चाहते है उसको पावैगें, किन्तु आशा विफल हुई हा भगवान ! हा करुणमय! तुम दयावान होकर अपनी कन्याओं की यह दुर्दशा देखते हो। नाथ एक बार भारत की ओर दृष्टि करके देखो। हमारी भाति कितनी पतिहीन युवती रोते रोत रुद्धकंठ हो रही हैं, कितनी आत्म हत्या करती हैं, कितनी दूसरे उपाय से रहित होकर कंलक की डाली सिर पर लेती हैं, असंख्य भ्रूणहत्या नित्य होती है। हे दया मय तुम्हारी दुहिताओं का आंसू तुम न पोंछोगे तो कौन पोंछेगा।’’

सौन्दर्य ने अपने कथन में विधवा स्त्री के जीवन का खौलता हुआ सच कह दिया है। यदि साहित्य की कसौटी वेदना को माना गया है तो सौन्दर्य की पीड़ा को आज के स्त्री विमर्शकार कौन सी संज्ञा देंगे।

सौन्दर्य की सखी लावण्य सौन्दर्य की दुर्दशा देखकर बड़ी चिंतित है। वह सवाल उठाती है कि आज कल लोग अपनी कन्याओं की सात-आठ साल की अवस्था में पशुओं की तरह जिधर चाहा उधर हांक दिया। विवाह तो ऐसे हो गया है जैसै गुड़िया और गुड्डों का खेल खेला जाता है। लावण्य अपनी चिंता इन शब्दों में व्यक्त करती है: ‘‘तुझको देखकर मेरी छाती फटती है। हाय! तब तेरा ब्याह न हुआ होता तो आज तै विधवा न होती। तेरा जीवन वृथा गया। स्वप्न की भांति सब हुआ। जैसे गुडिया का खेल।’’ लावण्य आगे कहती है कि ‘‘आज कल तो बंगालियों में विधवा विवाह की धूम मची है, इसी समय तेरा बाप हीरालाल के साथ  ब्याह दे तो अच्छा हो’’  लेखिका ने इस उपन्यास से कई जगह ईश्वर को भी कटघरे में खड़ा किया है। स्त्रियों को लेकर उस पर निष्ठुर होने का आरोप सौन्दर्य लगाती है। सौन्दर्य कहती है: ‘‘ हाय विधाता! तेरा कैसा चरित्र है। विधवा किया किन्तु उसके साथ ही आंकाक्षा को क्यों निवृति नहीं किया? जो यही जानता था निवृति न करैगें श्रृति दिया तो श्र्रवण शक्ति क्यों नहीं दिया। पिपासा है तो पानी क्यों नहीं।’’ लेखिका ने ईश्वर के जरिए लेकर पुरोहितों और निंयताओं से सवाल किया है। क्योंकि पुरोहितगण अपने आपको ईश्वर के समक्ष रखते थे। सौन्दय का सवाल ईश्वर और पुरोहित दोनों से कि विधवा पुनर्विवाह का मार्ग क्यों नहीं खोला जा रहा है। सौन्दर्य की सखी लावण्य भी बड़ी मुखरता से स्त्री सवालों का उठाती है। वह पुरुषवादी मानसिकता को सवालों के दायरे में खड़ा करती है। लावण्य अपने कथन में पुरुषों को स्वार्थी बताती है और कहती है कि यह पुरुष समाज एक पत्नी के होते हुए भी न जाने अपने जीवन में कितने विवाह करते हैं लेकिन यह पुरुषवादी समाज विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह भी नहीं करने देता है। लावण्य अपने पति से सवाल करती है: ‘‘अच्छा हम पूछते हैं, पुरुष इतने स्वार्थी क्यौं होते हैं ? पुरुष स्त्री का मारना कौन कहे, जीते ही कितना ब्याह करते है, इसमें दोष नहीं?’’ विमर्श की दृष्टि से यह कितना मारक सवाल है। लेखिका ने एक ही पंक्ति में पुरुष चरित्र का रेशा-रेशा उघाड़ कर रख दिया है।

मल्लिका देवी ने उपन्यास में दिखाया गया है कि रामदास का एक बंगाली मित्र उसे समझाता है कि अपनी बाल विधवा कन्या सौन्दर्य का पुनर्विवाह कर दो लेकिन उच्च श्रेणी की मानसिकता वाला रामदास अपनी कन्या का पुनर्विवाह करने के लिए राजी नहीं होता है। यह रामदास कहता है कि हम कोई नीच जाति के नहीं हैं जो पुर्निववाह की रीति को माने! रामदास और उसके मित्र के बीच जो संवाद हुआ। वह इस प्रकार है:

बाबू -तुम्हारी कन्याबाल्य विधवा हुई सुनकर बड़ा दुख हुआ।

रामदास – ईश्वर के कार्य में किसी का अधिकार का नहीं।

बाबू – किन्तु बन्धु ! ब्ंगालियों में प्रातः स्मरणीय विद्यासागर जी महाशय ने  जो विधवा विवाह की प्रथा चलाई है अति उत्तम कार्य किया।                                                                                                                    

रामदास -चले न तब?

बाबू -चलने से चलेगा।

रामदास – अब तक तो नहीं चला।

बाबू – क्यों नही? दो एक विवाह नित्य होता है।

रामदास मृदु हंसकर बोला, ‘‘कहाँ’’?

बाबू – क्या तुम्हें खबर नहीं रखते।

रामदास – न रखते होंगे।

बाबू – भाई क्रोध मत करों, हमारी राय में तुम्हारी कन्या को ब्याह देना उचित है।

रामदास – ऐसा करे तो समाज से जाते रहें।

बाबू – समाज क्या है? जो पांच मिलकर करें वही समाज होगा।

रामदास – सो तो ठीक है पर पहिले कौन करे?  

बाबू-जिसको आवश्यक होगा वही करेगा। तुम्हारा आवश्यक है तुम करो।

रामदास मृदु हंसकर बोला,‘‘हमें आवश्यक नहीं है’’

बाबू – क्यों?

रामदास – ब्राह्मण की कन्या की ऐसी रुचि क्यौं होंगी?

रामदास हंसकर बोला, हम लोगों के घर नहीं नीच जातियों में’’

 विधवा विवाह अधिनियम 1856 भले ही बन गया था लेकिन जमीनी स्तर पर विधवा पुनर्विवाह का विरोध जारी था। इसमे कोई दो राय नहीं है कि बंगाली समाज अन्य की अपेक्षाकृत आधुनिक था।  इतना आधुनिक होने पर दिलचस्प बात है कि जब ब्रिटिश शासन ने ‘बाल विवाह’ के रोकने का प्रयास किया तो बंगालियों की तरफ से इस प्रयास का विरोध किया गया था।  ‘हिन्दी प्रदीप’ पत्रिका जुलाई-अगस्त 1890 के अंक में एक लेख लिखा गया जिसमें बंगालियों की इसलिए भर्त्सना की गई कि बंगाली लोग बाल्य विवाह सुधार का विरोध क्यों कर रहे हैं ? हिन्दी प्रदीप में लिखा गया:

‘‘ कौन कहता है कि बंगाल के हमारे सुशिक्षित धर्मशील ऐसे मूर्ख हो जांय कि बाल्य विवाह की कुरीति मिटाने में इतना विरोध प्रकाश करेंगे- प्रथम तो यही सिद्ध करना कठिन है कि बाल्य विवाह हमारे धर्म का मूल अंश है क्योंकि हजारो लाखों विद्वान इससे सहमत है कि यह कुरीति धर्ममूलक नहीं वरन मूर्खता और अविद्या के कारण चल पड़ी है जो यही मान लिया जाय कि यह धर्म ही है तब भी हमारी गवर्नमेंट का यह न्याय नहीं है कि धर्म के बहाने आपको दूसरों पर अन्याय करने दे- क्या हमारे धर्माभिमानी लोग भूल गये कि सती होना हमारे यहाँ धर्म ही समझा जाता था कन्याओं का बध भी हमारे यहां क्षत्री लोग अपना धर्म संप्रादाय ही समझते थे तो क्यों गवर्नमेंट ने उन घोर अन्याय ओर पापों को रोका और धर्म में हस्तक्षेप की अनिष्ट शंका से न डरी यदि इस प्रकार गवर्नमेंट डरती रहे और अपना उचित काम करना छोड़ दे तो दो ही दिन में राज्य ऐसे लोगों के हाथों में आ जाए जो स्त्रियां पर यावत् प्रकार के अत्याचार करना अपना धर्म मानते है-’’

इस लेख में आगे बंगवासियों  को फटकार लगाते हुए लिखा गया कि बंगाली बंधु अपनी हठधार्मिता और बकवाद छोड़कर बाल्य विवाह की कुरीति को मिटाने में सरकार का सहयोग करें।

सन् 1888 में लिखे गए इस उपन्यास में यह भी दर्शाया गया है कि विधवा स्त्री पर तमाम तरह के लांछन लगाकर उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था। औपनिवेशिक भारत में स्त्री यौनिकता का सवाल व्यापक स्तर पर उभर के सामने आया था। विधवा स्त्रियों का यौन शोषण आम बात हो गई थी। धर्मगुरु से लेकर सगे-संबन्धी तक ने विधवाओं को अपना नरम चारा समझ लिया था। यह समाज कामी और व्यभिचारी पुरुषों की करतूतों का सारा लांछन स्त्रियों के सिर मढ़ देता था। एक स्त्री के तौर पर सौन्दर्य को इन लांछनों का सामना करना पड़ा था। कोई विधवा स्त्री कितना भी सत् जीवन व्यतीत करने की कोशिश करती लेकिन उस पर कोई न कोई अपराध सिद्ध कर उसे समाज से निष्कासित करने का फरमान सुना दिया जाता था।

सौन्दर्य इस बात से चिंतित है कि वह जिसे अपने प्राणों से अधिक चाहती है, वह पुरोहित व्यवस्था के चलते उसे पा नहीं सकती है। सौन्दय का पिता हीरालाल के साथ उसका पुनर्विवाह के लिए राजी नहीं है। सौन्दर्य यह सब सोचकर इतना दुखी होती है कि उसका स्वास्थ्य खराब होने लगा। सौन्दर्य का जब स्वास्थ्य खराब हुआ तो यह चर्चा फैल गई कि वह गर्भवती हो गई है। सौन्दर्य आपने माता-पिता को बताती है कि बीमारी के चलते मेरा पेट बिगड़ गया है, आप यकीन करें मेरे पेट में किसी का गर्भ नहीं है। लेकिन उसके माता-पिता उसकी बात पर यकीन नहीं करते है। समाज के चौधरियों और पुरोहितों के भय से सौन्दर्य को घर से बाहर निकल जाने का फारमान सुना देते है। सौन्दर्य अपने पिता से आग्रह करती है कि बिना किसी दोष के मुझे घर से मत निकालें। सौन्दर्य का यह मार्मिक कथन देखिए: ‘‘हमको मत छोड़िये इस संसार में हमारा कहीं खडे़ होने का भी स्थान नहीं है। इस निरापराधी को घोरतम् भयानक दण्ड मत दीजिए’’ उपन्यास कथा में दिखाया गया है कि यह समाज स्त्रियों को लेकर कितना शुष्क और कठोर है। विधवा स्त्रियां इच्छा रखते हुए भी पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। उच्च श्रेणी के हिन्दू देशाचार, पुरोहित और पांडों के बहकावे में आ कर अपनी बेटियों को उम्र भर दुख के खंदक में ढकेल देते थे। पुरोहितों और पुजारियों की पोथी और उच्च श्रेणी के हिन्दुओं की हठधर्मिता के चलते सौन्दर्य का जीवन भेंट चढ़ जाता है।

 सौन्दर्यमयी उपन्यास में स्त्री के खौलते हुए सवालों का उठाया गया है। बाल्य विवाह को एक सामाजिक बुराई के तौर पर दिखाया गया है। विधवा स्त्रियां किस तरह से अधिकार विहीन कर दी जाती थी मल्लिका ने इसकी बानगी बड़ी प्रामाणिकता के साथ पेश की है। इस उपन्यास का अंत बड़ा मार्मिक दिखाया गया है। सौन्दर्यमयी अंत की कथा में बीमार हो जाती है। सौन्दर्यमयी मृत्यु को प्राप्त होने से पहले अपने प्रेमी हीरालाल को देखना चाहती है। जब सौन्दर्य की सखी लवण्य को यह बात पता चली तो उसने रामदास से कहकर एक अखबार में इस आशय का विज्ञापन दिया कि सौन्दर्यमयी की काफी बीमार है और वह हीरालाल को देखना चाहती है। इधर, हीरालाल जब यह विज्ञापन देखता है तो शीघ्र ही वह सौन्दर्य से मिलने के लिए निकल पड़ता है। उपन्यास कथा के अंतिम अध्याय के यह संवाद देखिए:

‘‘ हे जीवन के सर्वस्वधन ! प्राणेशर हमारे मृत्यु को अब विलम्ब नहीं है। किन्तु, आज हमारा आनन्द का दिन है? आज तुम्हारा वही मुख, जो कि हमारे निद्रा क्या स्वप्न, जाग्रत क्या ध्यान, दिन रात हमारे नेत्र में हमारे प्राण मुख देखते 2 मरेंगे।’’

 सौन्दर्य का कंठरोध हुआ!  हीरालाल घबड़ाकर बोला, ‘‘सौन्दर्य’’ कुछ सिर ऊंचा कर बोली, ‘‘आं’’

उसका सिर तकिये पर गिर पड़ा। बोली,‘‘जल’’ हीरालाल ने उसके मुख में जल दिया। थोड़ी देर पीछे सौन्दर्य बोली, ‘‘इस जीवन में दुख का शेष नहीं था। ईश्वर अब दुख का शेष करेगा। हीरालाल हम तो जाते है…’’

हीरालाल तुम क्या बकती हो?

सौन्दर्य! मृदु हंसकर बोली, ‘‘क्या बकते हैं? अरे इतना दुख भोगकर भी जाने की इच्छा। होगी?’’ हीरालाल रोने लगा, सौन्दर्य बोली, ‘‘ प्यारे रोते क्यौं हो? उह!! जल।’’ हीरालाल ने जल दिया जल पीकर फिर बोली,‘‘ अन्तिम काल ह्दय खोल ईश्वर से प्रार्थना करती हूं। तुम सुख से रहो। और भी कहते हैं, हे दयामय! भगवान! हमारी भांति किसी रमणी को दुख मत देना।’’

इस कामना के साथ सौन्दर्य अपने प्राणों का त्याग कर देती है। 19वीं सदी के आठवें दशक की स्त्रियों का यह वास्तविक प्रेम और उनकी पीड़ा का चित्रण है। इन पंक्तियों को पढ़कर कोई यह भी कहता दिखाई देगा कि इसमें नई बात क्या है? इस उपन्यास की कथा में नया यह है कि जब स्त्री को पुरुष समाज में बोलने का अधिकार तक प्राप्त नहीं था, तब मल्लिका ने यह कहने का साहस दिखाया कि स्त्री दुर्दशा का मुख्य कारण पुरोहितवाद और उच्च श्रेणी के हिन्दुओें की पितृसत्ता है। यह कोई छोटी बात नहीं थी कि एक विधवा पुरोहितों और पोथाधारियों को अपनी दुर्गति का जिम्मेदार ठहरा रही थी। यह मल्लिका की वास्तविक पीड़ा थी जो उपन्यास कथा के तौर पर इस समाज को बता रही थीं। हिन्दी साहित्य में प्रचलित धारणा है कि मल्लिका भारतेंन्दु की प्रेमिका थी। मल्लिका के सृजन पक्ष पर कम प्रेमिका वाले पक्ष को ज्यादा प्रस्तुत किया जाता है। मेरा कहना है मल्लिका का साहित्य जैसे-जैसे सामने आयेगा, वैसे-वैसे इस पुरुष समाज का वास्तविक  चेहरा और चरित्र भी उजागर होता जायेगा।

(सुरेश कुमार नवजागरणकालीन साहित्य के गहन अध्यता हैं। इलाहाबाद में रहते हैं। उनसे  8009824098 पर संपर्क किया जा सकता है)

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