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ज्वलंत सवालों की किताब ‘बोलना ही है’

रवीश कुमार की किताब ‘बोलना ही है’ पर यह लम्बी टिप्पणी लिखी है संजय कुमार ने। संजय कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज(सांध्य) में राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं-

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आप रवीश को ट्रोल कर सकते हैं। आप रवीश को मोदी विरोधी कह सकते हैं। आप रवीश को देशद्रोही कहे सकते हैं। आप रवीश को कांग्रेसी या विपक्षी पार्टियों का  दलाल कहे सकते हैं। लेकिन सबसे अहम बात यह है कि रवीश के द्वारा उठाए गए सवालों से कैसे बच के निकल सकते हैं जो आज के समय में रवीश के द्वारा लगातार उठाए जा रहे हैं। एनडीटीवी चैनल के प्राइम टाइम शो के माध्यम से, और अब रवीश अपनी पुस्तक ‘बोलना ही है’ के माध्यम से ज्वलंत सवालों को उदाहरण सहित क्रमबद्ध तरीके से जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

किताब एक ऐसा माध्यम है जिसके माध्यम से आप अपनी बात को सही तरीके से रख सकते हैं। हिस्ट्री  के छात्र होने के कारण भी रवीश किताब लेखन की अहमियत को अच्छे समझते हैं बहुत सारी किताबों ने देश और दुनिया के इतिहास की दिशा को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रवीश की पुस्तक भी आने वाले समय में सोशल साइंस तथा वर्तमान राजनीतिक दौर के घटनाक्रमों को समझने में महत्वपूर्ण दस्तावेज का काम करेगी। रवीश का लेखन भारत की वर्तमान लोकतांत्रिक प्रणाली, राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक दलों के क्रियाकलाप और सरकारों के कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाने का काम कर रहा है। पुस्तक के माध्यम से रवीश यह सवाल भी पैदा कर रहे हैं कि क्या देश संविधान के आधार स्तंभों के आधार पर चलाया जा रहा है या नहीं, आजादी के आंदोलन के दौरान जिसको स्थापित किया गया था भारत की पत्रकारिता के उन उच्च मानकों को किस प्रकार एक एक करके तार तार किया जा रहा है।

दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में पत्रकारिता के पेशे को आज भी लोकतंत्र का प्रहरी के तौर पर माना जाता है। लेकिन क्या अब भारत में पत्रकारिता और पत्रकार टीवी चैनल और न्यूज़ पेपर में आज जिस तरह से काम कर रहे हैं क्या इसी का नाम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है,  मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ इसी कारण से कहा जाता था कि वह सरकार और व्यवस्था की खुलकर आलोचना और उसकी कमियों को उजागर करना का काम दिन रात करता रहता है।

क्या लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का काम वर्तमान में भारतीय मीडिया कर रहा है या मात्र सरकार के प्रवक्ता या राजनीतिक दलों के आईटी सेल के दिए हुए या बनाए हुए कार्यक्रम को दिन रात प्रसारित कर रहे हैं ताकि जनता की सही आवाज और  विपक्ष की आवाज को भी खत्म किया जा सके।

एक लंबी लिस्ट सवालों की बनाने का प्रयास किताब की समीक्षा के दौरान किया जा रहा है जिसको रवीश ने अपने आवाज और लेखनी के माध्यम से उठाया है, किताब वर्तमान में भारत के राजनीतिक व्यवस्था में आई दरारों, कमियों और पत्रकारिता के गिरते स्तर को उदाहरण सहित व्याख्या करके बताने में अपनी किताब में काफी हद तक कामयाब हुए हैं।

सवाल-1 मॉब लिंचिंग पर-

पुस्तक की भूमिका में ही मॉब लिंचिंग के संदर्भ में कहा गया है कि हम जिस लिंचिंग के खतरों की बात करते हैं वह कुछ लोगों के लिए सामान्य कार्य हो चुका है किसी से असहमति होने पर उसकी लिंचिंग करने का ख्याल आना अब आम बात की तरह है ।

सवाल-2 आजकल की भीड़-

जो यह भीड़ है महज शब्द नहीं है इसमें बहुत से लोग हैं मरने वाले, मरते हुए देख कर चुप रहने वाले और अपने मोबाइल फ़ोन से वीडियो बनाने वाले आवारा भीड़ का निर्माण तीव्र गति से चल रहा है।

सवाल-3 मीडिया की जवाबदेही-

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों की जवाबदेही समाप्त हो चुकी है। बस शाम को टीवी पर आना है। दो वक्ताओं को बुलाकर आपस में लड़ा देना है और असली खबर को दबा देना है। अब यह कार्यक्रम विकराल और इतना व्यापक हो चुका है कि इसमें नैतिकता और अनैतिकता की बिंदु खोजने का कोई मतलब नहीं रहा है। न्यूज़ चैनलों ने भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करने में जो मेहनत की है उसी का नतीजा है कि अब भारत के लोग उन चैनलों को बगैर किसी सवाल के देखते हैं। लोकतंत्र के बड़े प्रतीक मीडिया में विपक्ष को क्यों गायब किया जा रहा है। प्रेस की गुणवत्ता अब एक ही मानक है कि वह सत्ता पक्ष का गुणगान कितना अच्छा करता है। 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के इंटरव्यू गुणगान के लिए देखे जाने चाहिए गुणवत्ता के लिए नहीं, प्रैस का प्रोपेगंडा तंत्र में बदल जाना भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का  सहज हिस्सा है। ऐसा सिर्फ सरकार की वजह से नहीं हुआ है दर्शकों और पाठकों की भी वजह से हुआ है। तभी तो चैनल या अखबार जितना दरबारी है वह रेटिंग  की होड़ में उतने ही बेहतर नंबर पर हैं।

सवाल-5  खराब शिक्षा व्यवस्था का नतीजा और प्रभाव-

 NACC  की रेटिंग में 68% यूनिवर्सिटी  औसत या औसत से भी खराब है। 91% कॉलेज औसत  या औसत से भी नीचे  है, इन खराब कॉलेजों ने कितनी मेहनत से छात्र और छात्राओं की कई पीढ़ियों को औसत या औसत से नीचे तैयार किया होगा। जानने, पढ़ने, और समझने की हर बेचैनी को खत्म किया होगा। लोकतंत्र उन आदर्श लोगों के दम पर जिंदा और मजबूत रहता है जो दुनिया को बेहतर ढंग से समझने को उत्सुक रहते हैं जो सवाल करते हैं, तो क्या हम उन छात्र-छात्राओं से लोकतांत्रिक उच्चतम आदर्शों की उम्मीदें कर सकते हैं जिनको एक औसत दर्जे की शिक्षा व्यवस्था ने शिक्षा दी है इन पर पहले अज्ञानता का भार लादा गया और अब सांप्रदायिकता का चश्मा पहना दिया गया है।

सवाल-6  खुल कर बोलना-

बोलने के लिए जानना  पड़ता है तब जानने की हर कोशिश नाकाम कर दी जाए या जानकारी कम कर दी जाए तो बोलने का अभ्यास अपने आप कम हो जाता है। न्यूज़ चैनल और अखबारों में मेहनत से खोज कर लाई गई खबरें गायब होती चली गई। अब तमाम मीडिया तंत्र के जरिए जो जानकारी आप तक पहुंच रही है वह आपके बोलने की क्षमता को सीमित कर रही है। मां-बाप बच्चों को ज्यादा बोलने और लिखने से मना कर रहे हैं, अध्यापक अपने विद्यार्थियों को सिर्फ पढ़ने और राजनीति दूर रहने की सलाह दे रहे हैं ,सारा समाज मिलकर भारत के महान लोकतंत्र को दब्बू बनाने में लगा है। सेंसरशिप की बात कहां नहीं है।

अब सवाल करने वालों पर आईटी सेल की ट्रोल आर्मी ने जोरदार हमला बोला दिया है उन्हें देश विरोधी- धर्म विरोधी से लेकर विरोधी दलों का दलाल तक कहा जाने लगा,  व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी ने कई पत्रकारों की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाने की कोशिश की है। बोलने की आजादी को लेकर अपनी तरह की इस नई व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने अपना एक नया बेंच मार्क तय किया है। तब क्यों नहीं बोले और अब ही क्यों बोल रहे हो तथा हर मुद्दे पर तब कहां थे जब वह हुआ था।

सवाल-7  सोशल मीडिया का दुरुपयोग-

2014 के बाद से सोशल मीडिया के द्वारा 10- 12 पत्रकार, लेखक और अभिनेताओं को टारगेट किया गया, इस खेल के जरिए जनता के एक बड़े वर्ग को डरा दिया गया, जनता को यह डर सताने लगा कि जब बड़े बड़े लोगों की ऐसी हालत हो सकती है तो आम आदमी की क्या बिसात, जनता के हिस्से ने भीड़ का वह डर खरीद लिया। आईटी सेल ने अपनी आक्रामकता के सहारे ड़र बिठाने का यह काम बहुत बारीकी से किया, आईटी सेल की भाषा सरकार के मंत्री की भाषा हो गई और सरकार के समर्थक लोग की भी। लगता है मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया ने डर की फ्रेंचाइजी ले रखी है जहां कोई सरकार के बारे में आलोचनात्मक  बोलता है सोशल मीडिया से हमला होने लगता है व्हाट्सएप पर। घेरकर मार दिए जाने की धमकी से लेकर फोन नंबर पब्लिक कर गाली दिलवाने की धमकी तक का ऐलान यह सब एक आदमी को डराने के लिए काफी है।

सवाल -8  अल्पसंख्यक समुदाय पर प्रभाव-

मुसलमानों  को किस हद तक यह महसूस कराया जा रहा है कि राजनीतिक रूप से वह कितने अप्रासंगिक हो चुके हैं इस समझना  अब कोई  रहस्यमय  बात नहीं है। अधिकांश मुस्लिम अभी महसूस करते हैं कि अगर वह अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरेंगे तो मीडिया केवल उनकी दाढ़ी या उनकी शेरवानी दिखाएगी उनके मुद्दों की बात के बारे में बात नहीं करेगा। यह दरअसल अपने को दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में मान लेने की  विडंबना है।

सवाल-9  क्या बोलना जोखिम भरा काम हो गया है-

यह सवाल आप खुद से कीजिए क्या आपको सरकार के बारे बोलते वक्त डर लगता है? क्या आप हिसाब करने लगते हैं कि किस हद तक बोला जाए ताकि सरकार और सोशल मीडिया की नाराजगी न झेलनी पड़े, क्या आपको लगता है कि आपको टारगेट किया जाएगा। भारत में झूठे मुकदमों में फंसाना सबसे आसान काम है। यह काम सरकारे भी करती है और संगठन के लोग भी करते हैं।

एक बड़ी आबादी के भीतर धर्म के प्रति कट्टर आस्था भर दी गई है। कैसे धर्म के आधार पर किसी गलत को सही और सही को गलत की तरह देखा जा सकता है। क्या धर्म इतना अंधा हो गया है कि भीड़ को हिंसा की इजाजत देता है?भीड़ संविधान से ही बड़ी हो गई है?

सवाल-10  फेक न्यूज़ के प्रभाव

उदाहरण के तौर पर 9 दिसंबर 2017 को गुजरात चुनाव के समय नरेंद्र मोदी के दिए गए भाषण में फेक न्यूज़ का जिक्र इस किताब में किया गया है किस प्रकार से मणिशंकर अय्यर के घर पर हुई रात्रि भोज को एक गुप्त मीटिंग का नाम देकर पाकिस्तान का गुजरात चुनाव में हस्तक्षेप की बात अपने भाषण में मोदीजी करते हैं, जिसका उद्देश्य गुजरात चुनाव के असली मुद्दों से ध्यान भटकना  है, जब फेक न्यूज़ की चर्चा या जानकारी किसी बड़े पद के व्यक्ति के द्वारा की जाती है तो जनता इसको इसी प्रकार से मानती है कि कुछ तो है। यही बात है जो फेक न्यूज़ के लिए  ईंधन का काम करती है, फेक न्यूज़ ने पहले खबरों और पत्रकारिता को फेंक किया और अब वह जनता को फेक रूप तैयार कर रहा है। फेक न्यूज़ के बहाने एक नए किस्म का सेंसरशिप आ रहा है। आलोचनात्मक चिंतन को दबाया जा रहा है। फेक न्यूज़ का एक बड़ा काम है नफरत फैलाना, फेक न्यूज़ के खतरनाक खेल में बड़े अखबार और टीवी चैनल शामिल हैं, लेकिन भारत में अब कुछ वेबसाइटों ने फेक न्यूज़ से लोहा लेना शुरू कर दिया है। लेकिन यह सब बहुत छोटे पैमाने पर हो रहा है इसकी पहुंच मुख्यधारा के मीडिया के फैलाए फेक न्यूज़ की तुलना में बहुत सीमित है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कैबिनेट मिनिस्टर का विरोध या असहमति  दर्ज करने पर कितने ही पत्रकारों आम नागरिकों पर पुलिस केस और मानहानि केस दर्ज भारत में हो रहे हैं। इन्हीं सब तरीकों से नागरिक अधिकारों को कम करने या उनको खत्म करने की सुनियोजित तरीके से योजना सरकारों के द्वारा चल रही है।

सवाल- 11  भीड़ मत बनिए-

पुस्तक में भीड़ और प्रोपेगेंडा का नतीजा बताया गया कि किस प्रकार से जर्मनी में हिटलर और उसकी नाजी पार्टी ने  भीड़ को और प्रोपेगंडा को इस प्रकार से तैयार कर दिया था। यह लोग खुद अपने आप से ही एक समय के बाद यहूदियों को मार रहे थे,  प्रोपेगंडा का एक ही काम है भीड़ का निर्माण करना ताकि खून भीड़ करें तो दाग भी उसी भीड़ के दामन पर आए। सरकार और महान नेता निर्दोष नज़र आए। भारत में सब हत्या करने वाली भीड़ को ही दोष दे रहे हैं, उस भीड़ को तैयार करने वाले प्रोपेगेंडा में किसी को दोष नजर नजर नहीं आता है। भारत में अभी इन घटनाओं को इक्का-दुक्का रूप में ही पेश किया जा रहा है। जर्मनी में भी पहले चरण में यही हुआ जब तीसरा चरण आया तब उसका विकराल रूप नजर आया तब तक लोग छोटी-मोटी घटनाओं के प्रति सामान्य हो चुके थे, जो समाज इतिहास के जरूरी सबक भूल जाता है वह अपने भविष्य को खतरे में डालता है।

सवाल-12  मुद्दे से भटकाव के लिए नया एजेंडा-

गोदी मीडिया ने मुद्दों से नागरिकों को दूर करने  के लिए एक नया नेशनल सिलेबस तैयार किया है।

कभी खिचड़ी-बिरयानी, कभी ताजमहल -मंदिर, कभी नेहरू बेनाम पटेल या बोस बनाम नेहरू, कभी तीन तलाक, अकबर, औरंगजेब, शाहजहां, अशोक, टीपू सुल्तान रानी पद्मावती और सबसे ऊंची मूर्ति, हिंदू मुस्लिम, इन सब चीजों पर मीडिया रोज रात को चर्चा करता रहता है और चुनाव के समय इसमें दिन-रात चर्चा का केंद्र बना कर बैठ जाता है। ऐसा लगता है कि पूरा देश की इतिहास की कक्षा में बैठा हुआ है और हम पहली बार इतिहास पढ़ रहे हैं। जो न्यूज़ एंकर और ट्रोल है वह हमारे  इतिहासकार है चाणक्य के नाम से आजकल  कुछ भी चल जाता है,  यहाँ मीडिया शो देख कर आपको ऐसा लगेगा कि इतिहास से जोड़ा जा रहा है आपको, लेकिन नहीं, बहुत चालाकी से आपको इतिहास से काटा जा रहा है। आपको इतिहासविहीन बनाया जा रहा है। सच्चे हिन्दू की दुहाई देकर हम सब में एक बदले की भावना भरी जा रही है इतिहास की ज्यादती का  बदला आज लेना है।  रवीश का पुस्तक में कहना है कि इस नेशनल टॉपिक से खुद को बचा लीजिए। इसकी थीम बहुत घातक है।

सवाल 13 अंधविश्वास और बाबाओं का धंधा

बाबाओं के पास हर समस्या का समाधान है और देशभर के न्यूज़ चैनल सिर्फ एनडीटीवी को छोड़कर इस समाधान को बहुत बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत करते रहते हैं। दिन रात, कुछ तो बाबाओं के अपने भी चैनल अब स्थापित हो चुके हैं। हिंदी बोलने वाला बाबा राशिफल कुंडली भाग्य अन्य समस्याओं का निदान करता है, जो बाबा इंग्लिश बोलने में एक्सपर्ट होते हैं वह अभी स्ट्रेस मैनेजमेंट का कोर्स करवाते हैं। बड़े-बड़े ऑफिसों, राजनीतिक रसूखदार लोगों, शासन प्रशासक लोगों में बड़ी डिमांड रहती है। देश का राजनीतिक वर्ग अंधविश्वास का सबसे बड़ा संरक्षक है। बाबा लोग टीवी चैनलों पर हर तरह की समस्याओं पर बात कर रहे हैं, जैसे कब लड़का लड़की को प्रपोज करना चाहिए, सिजेरियन कब कराना चाहिए, ऑफिस में प्रमोशन का उचित समय क्या रहेगा, बिजनेस प्लान कब शुरू करना चाहिए, मुकदमा कब करना चाहिए- इन सब बातों को देखकर ऐसा लग रहा है कि बाबाओं और ज्योतिषी का हर दिन भारत की अलग-अलग समस्याओं के क्षेत्र में अपना विस्तार कर रहे हैं।  दिल पर मत लीजिए, यही हिंदुस्तान है। यही हम और आप है

सवाल-14  भारत में इश्क करना और उसकी चुनौतियां

भारत में इश्क करना अनगिनत सामाजिक धार्मिक धारणा से जंग लड़ना होता है।  मोहब्बत हमारे घरों के भीतर प्रतिबंधित विषय है। हम सबके जीवन में प्रेम की कल्पना फिल्मों से आती है। फिल्में हमारी दीवानगी की शिल्पकार है। हमारे शहरों में प्रेम की कोई जगह नहीं है। प्रेम के दो पल के लिए रोज हजार पलों की यह लड़ाई आपको प्रेमी से ज्यादा एक्टिविस्ट बना देती है। इश्क हमें इंसान बनाता है, जिम्मेदार बनाता है। इश्क हमें थोड़ा कमजोर, थोड़ा संकोची बनाता है। एक बेहतर इंसान में यह कमजोरियां न हो तो वह शैतान बन जाता है। प्रेम करने की सजा के तौर पर 2016 में दिल्ली के अंकित की हत्या धर्म के कारण और कोयंबटूर में  शंकर की हत्या दलित जाति के कारण की गई। और इन सभी हत्या पर एक खास प्रकार की राजनीतिक मानसिकता का समर्थन मिलने से हत्या करने वाले को किसी प्रकार का पश्चाताप भी नहीं हो पा रहा है।

सवाल -15  प्राइवेसी के अधिकार और उस पर हो रहे हमले-

नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अगस्त 2017 में प्राइवेसी को मौलिक अधिकार बताया,  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार नीतियों की समीक्षा उस पर सवाल करना, उससे ऐसा असहमत होना इन सभी अधिकारों को भी संरक्षण प्राप्त है। संविधान पीठ ने कहा कि यह सब करने से लोकतंत्र में एक नागरिक सक्षम बनता है और वह अपना राजनीतिक चुनाव बेहतर तरीके से कर पाता है। अनुच्छेद 19 ओर 21 से ही प्राइवेसी के अधिकार की खुशबू आती है। कानून विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा ने कहा कि मौलिक अधिकार का मतलब है जनता का सरकार पर अंकुश न कि सरकार का जनता पर अंकुश।

रवीश की यह पुस्तक वर्तमान में देश के राजनीतिक सामाजिक आर्थिक सभी पक्षों पर सच्चाई को बयान करने  का एक साहसिक गंभीर प्रयास है, स्पष्ट तरीके से इन सब मुद्दों पर सोशल साइंटिस्ट भी वर्तमान में नहीं लिख पा रहे हैं और कुछ के द्वारा लिखा हुआ प्रयास भी वर्तमान में मात्र लाइब्रेरी या कुछ एकेडमिक लोगों के बीच में ही चर्चा का विषय बन के रह जाता है। लेकिन रवीश की पुस्तक आमजन को आमजन की भाषा में ही समझाने का प्रयास है कि देश के सामने किस प्रकार के मुद्दे क्यों चलाए जा रहे हैं? उसके पीछे क्या रणनीति है? यह एक साजिश से सब  कुछ सुनियोजित तरीकों से किया जा रहा है और आम नागरिकों के अधिकारों पर किस प्रकार से हमला किया जा रहा है, लोकतांत्रिक संस्थाओं को, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को किस प्रकार से कमजोर किया जा रहा है और यदि यही सब चलता रहा तो जल्दी ही भारत की राजनीतिक व्यवस्था उसी दौर में चली जाएगी जिस दौर में आम नागरिक अपनी आवाज को कभी भी बुलंद नहीं कर नही कर पायेगा।

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किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। 

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3 comments

  1. डॉ संजय कुमार

    धन्यवाद Jankipul,
    धन्यवाद प्रभात रंजन जी,

  2. मैं इतना जानती हूँ एक अज्ञान व्यक्ति सामान्य जन की संवेदनाओं के साथ खेल रहा है। जन सामान्य की हालत इतनी खस्ता हो गई है कि साधारण सी बात उसके दिमाग में नहीं चढ़ती। सबसे अहम मुद्दा एक बार सिर्फ एक बार प्रधानमंत्री का साक्षात्कार रविश कुमार के द्वारा होना चाहिये। फिर देखिये क्या होता है। और ये बहुत जरूरी भी है।

  3. Explained in a lucid and comprehended manner 👍🏻

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