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संतोष दीक्षित की कहानी ‘काल कथा’

संतोष दीक्षित की यह कहानी कोरोना काल के घटनाक्रम से बुनी एक रोचक कहनाई है। समय मिले तो पढ़िएगा- जानकीपुल

                                                         (1)

यह कथा वैसे तो मेरे शहर की है, लेकिन आपके शहर की भी हो सकती है। इसके लिए पहले यह मान लेना होगा कि आप एक ऐसे शहर में रहते हैं जिस शहर के बीच से रेलवे लाइन गुजरती है। रेलवे लाइन के इस पार झोपड़पट्टियों का एक भरा पूरा इलाका है। इसी ओर नगरपालिका के एक खाली मैदान में शहर भर का कूड़ा कचरा भी फेंका जाता है। कचरे के ढेर के तीनों बगल पानी से भरे तीन बड़े गबड़े हैं। इनमें जलकुम्भियों की भरमार है। हरे , घुंघराले पत्तों के बीच बैंजनी और आसमानी फूल खूब शोभते हैं यहाँ की लोगों की आँखों को। इधर की लड़कियों और जवान औरतों के कपड़ों में भी इन रंगों की छटा देखी जा सकती है।

रेलवे लाइन के उस पार, पूरे शहर को एक छोर से दूसरे छोर तक नापती , रेलवे स्टेशन , हवाई अड्डे को छूती , एक लम्बी शानदार सड़क है। इस मुख्य सड़क से फूटता सड़कों का महाजाल … जो शहर भर में इस कदर फैला है कि इसके सहारे किसी भी बाज़ार, मॉल, कॉलोनी, और बहुमंजिली इमारतों तक आप आसानी से पहुँच सकते हैं। वायुयान द्वारा शहर के ऊपर से गुजरने पर यही सड़कें शहर को श्रृंगारित सी करतीं प्रतीत होती हैं।

                                                                        (2)

तो यही है हमारी इस कथा भूमि, इस शहर की मोटामोटी संरचना। आज की ग्लोबल शब्दावली में कहूँ तो लाइन के इस पार अश्वेतों की बस्ती है , उस पार श्वेतों की। उस पार सुख, समृद्धि और ललक है , इस पार दुःख, गरीबी और हताशा। इस पार तन को पोसने और ढकने की विवशता है, उस पार फेयर और स्लिम होने की प्रतिस्पर्धा। उस पार बी.एम्.डब्ल्यू है तो इस पार जोगाड़ गाड़ी। उधर हॉट डॉग है तो इधर चनाजोर गरम का ज़लवा अभी भी कायम है। लेकिन एक ऐसी क्रांति है जिसने समान भाव से शहर के दोनों हिस्सों में अपनी पुख्ता जड़ें जमा ली है। मोबाइल उस पार भी है इस पार भी। उस पार के वासुदेव श्रीवास्तव और उनकी पत्नी ममता अमेरिका और यू.के. में कार्यरत अपने बच्चों से वीडियोकॉल कर, उनको देखते बतियाते हैं। इस पार का कृष्णा बिंद और उसकी पत्नी सुन्दरी पंजाब के किसी फैक्ट्री में काम करनेवाले अपने बच्चों की आवाज़ मोबाइल को अपने कान से सटाकर सुनते हैं। यह संयोग की बात है कि यह कथा कोरोनाकाल की है। महत्व काल से अधिक कथा का होता है। काल एक प्रवाह है। कथा इस प्रवाह में डगमगाती आगे बढती जीवन नैया।

तो देशकाल की इस संक्षिप्त लेकिन ज़रूरी भूमिका के बाद अब लौटते हैं मुख्य कथा की ओर। कोरोना का कहर वैसे तो लाइन के उस पार ही था लेकिन लॉकडाउन का ज़्यादा असर शहर के इस पार दिखने लगा था। शुरू में तो विदेशों से आये तीन चार लोगों में ही इसके लक्षण दिखे। लेकिन जब इनके संपर्क में आये लोगों की ‘चेन’ को तलाशा गया, पूरे शहर में हड़कंप सा मच गया। शहर के कई कई वी.आइ.पी. स्व इच्छा से क्वारिंटीन में चले गए। ढेरों अन्य लोगों में धीरे धीरे संक्रमण किसी विस्फोट की तरह फूटता रहा। आज इस इलाके में तो कल उस इलाके में। यह सब लॉकडाउन प्रथम के मध्य में घटित हो रहा था, जिसे पूरा शहर कौतूहल से निहार रहा था… एक कौतुक कथा के रूप में सुन रहा था। चारों ओर एक अभूतपूर्व बंद। कफ्र्यू की तरह गहरा सन्नाटा। वाह रे इंडियाऽ वाहऽऽ !

लॉकडाउन टू के समाप्त होने से पहले ही शहर के इस पार के लोगों के छक्के छूटने लगे थे। आंतें कुलबुलाने लगीं थीं। उस पार के किराने वाले अपने प्रिय ग्राहकों के आदेश पर उनका वांछित सामान घर तक पहुँचाने लगे थे। इस पार के टुच्चे छोटे दुकानदारों ने अब उधार देना भी बंद कर दिया था। उस पार सब्जियों, फलों से लदे ठेले एक एक घर, एक एक गलियों तक, एक के पीछे एक आवाज़ लगा रहे थे। लगातार सस्ती दर सस्ती होतीं सब्जियां।  देश में ऐसा पहली बार घटित हो रहा था कि खरीददार कम पड़ रहे थे , बिकवैये ज्यादा !

इस पार का कृष्णा बिंद भी अब ठेले पर सब्जियां बेचने लगा था। आखिर कितने दिन बैठकर खाता। पूंजी जब ओरियाने लगा तो सुन्दरी देवी ने ही सुझाव दिया कि इसके अलावा और कोई रास्ता नही। दोनों लड़के अजय और विजय, पंजाब में फंसे पड़े हैं। उनकी हालात भी वहां पतली हो चुकी है। सो उधर से कोई उम्मीद नहीं। कल बता रही थी मोबाइल पर अजय की कनियाँ। बता क्या रही थी , बस भर भर मुंह रोये ही चली जा रही थी। एक घूँट बोलती, तीन घूँट रोती। किसी तरह अटकते हुए बताया कि गुरुद्वारा से थोड़ा बहुत खाना मिल जाता है। इसके लिए भी दोनों बखत लम्बी लाइन में लगना पड़ता है। पुलिस की लाठियां खानी पड़ती है। तब किसी तरह से आधे पेट पर पल रहे हैं। कारखाना बंद है और मालिक फरार ! न कोई पगार न किसी के आगे गुहार ?

सुनकर आँखें भींग आयीं थीं कृष्णा बिंद की। सुन्दरी देवी कपसते हुए कहने लगी -“चारों तरफ बंद ! यह बंद , वह बंद। मगर पेट कोई बंद कर दिखाए तो ? स्सालाऽ… भड़ुआ ऽ…! – पता नहीं किसे गालियां दे रही थी वह उन्माद की उस चरम अवस्था में।

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इधर मिसेज श्रीवास्तव यू.के. में रहनेवाले अपने छोटे बेटे को कुकिंग टिप्स दे रहीं थीं और हँसते हँसते लोटपोट भी हुई जा रही थीं। उनका छोटू शुरू से स्वभाव का काफ़ी मज़ाकिया रहा है। अभी भी , इस स्थिति में भी , खूब हंसाता रहता है माँ को। उसे अभी लन्दन पहुंचे तीन महीने ही हुए थे कि लॉकडाउन में फंस गया। एक मामूली मुसीबत यही थी कि अकेला ही फंस गया। पत्नी उसकी दिल्ली में जॉब में थी। अभी उसका वीजा कन्फर्म नहीं हुआ था। वरना वह भी छुट्टी लेकर पहुँच गयी होती। छोटू की सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि वह खाना बनाना बिल्कुल नहीं जानता था। माँ की भेजी सूची के हिसाब से सारा सामान मंगवा लिया था उसने। और अब तो माँ की हिदायत के मुताबिक बढियां से पकाने खाने लगा था। बड़ा वाला अपने परिवार के साथ था, सो इस समस्या से मुक्त था। श्रीवास्तव दंपत्ति अब आश्वस्त थे। दोनों बेटे घर से एक कदम भी बाहर नहीं निकालते। दोनों कंप्यूटर इंजीनियर थे। अगले आदेश तक घर से काम करने की अनुमति कंपनी ने दे रखी थी। दरमाहा समय पर उनके खाते में आ जा रहा था। अपनी माँ के खाते में भी दोनों बच्चे उनके निर्वाह लायक पैसे डाल दे रहे थे। समय कठिन था, लेकिन उसे काटना इतना दुश्वार भी नहीं था।

जबकि कृष्णा बिंद के लिए एक एक दिन गुजारना केहुनी से पहाड़ ठेलने की तरह था। वह रोज सुबह उठता और दो मील दूर मंडी से थोक में सब्जियां लेकर लौटता। तब तक सुन्दरी देवी रोटियां बनाकर रखती। रोटी खाकर दोनों लाइन के उस पार के एक मुहल्ले में सब्जी बेचते। एक बजे तक घर लौटते। खा पीकर आराम करते और तीन बजे कृष्णा अकेले निकलता। जिस दिन बिक्री अच्छी हो जाती, शाम का निकलना महंटिया देता। इतने कठिन परिश्रम के बाद भी जिस दिन सौ रूपये बच जाते, वह दिन अच्छा और सगुनिया हो जाता उन दोनों के लिए। हौसला इतना बढ़ जाता कि अजय या विजय जब अपनी विपदा के छोर पर बातों के दौरान पिघलने लगते , वह दृढ़ता के साथ कहता -“जैसे भी पार लगे एहिजे आ जाओ सब लोग ! मिलजुल कर सारी आफत विपदा काट लेंगे।”

 यद्यपि कि ऐसा कहते हुए कलेजा काँप जाता उसका। दिल में कितने अरमान पाले थे उसने इन बेटों को लेकर। किन किन सपनों के साथ सरकारी हाई स्कूल में दाखिला कराया था। इनकी बढती जरूरतों के साथ बेटी के ब्याह के लिए पोस्ट ऑफिस में रेकरिंग खाता भी खोला। परिवार के बटवारे के बाद हिस्से में मिली आठ धूर जमीन में दो कमरे का ईंट का पक्का घर भी बनवाया। अफ़सोस कि छत खपरैल का ही करना पड़ा। इस ख्वाहिश के साथ की आगे छत ही नहीं ढलवाना है , एक मंजिल ऊपर और बनवाना है ताकि दोनों बेटे भविष्य में तर ऊपर रह सकें।

कृष्णा बिंद ने बच्चों को पढ़ाने की बहुत क़ोशिश की। कई बार तो मारा पीटा, डराया धमकाया, ललकारा पुचकारा, सब किया लेकिन वह सरकारी उच्च विद्यालय मध्य वय के लड़कों को बिगाड़ने का सबसे बड़ा केंद्र निकला। कुछ भी बोलने पर फटाक यही ज़वाब देते लड़के – “पढाई ही नहीं होती हम क्या करें?” स्कूल से भागकर सिनेमा देखना, इधर उधर मटकते फिरना, सिगरेट पीना, और इसके लिए घर से पैसे चुराना या तीन पत्ती खेलना। इन लड़कों पर न बाप की सख्ती का असर पड़ा, न माँ की ममता और सीख का। जैसे कि अपने भविष्य के प्रति पूर्ण आश्वस्त हों दोनों। जैसे जानते हों कि किन स्थितियों में , किस तरह , जीवन यापन करना है उन्हें?

                                                                        (4)

समय सरकारी बाबुओं की तरह सबके साथ एक तरह का सुलूक नहीं करता। किसी के लिए यह बेहद क्रूर हो सकता है तो किसी के आगे हाथ बांधे, चिरौरी करता नज़र आता है !

वासुदेव श्रीवास्तव के आगे समय खीसें निपोरता क्रमशः मेहरबान दर मेहरबान होता गया था…! वह एक सरकारी निगम में लेखा अधिकारी थे। अपने काम में माहिर और मेहनती। वरीय अधिकारी उनसे प्रसन्न रहते और वह स्वयं अधिकारियों को प्रसन्न रखने का कोई अवसर नहीं चूकते। आदान प्रदान की इस संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उनका घर सदैव ऊपरी आमदनी एवं उपहारों से भरा रहता।

दैव कृपा से उन्हें दो पुत्र रत्न ही थे। कहा जाता है कि पति पत्नी ने उन दिनों के बहुप्रचलित एक तकनीक का सहारा लेकर केवल एक गर्भपात के जरिये दोनों पुरुष शिशु प्राप्त किये। पहला दैव योग से लड़का ही था। दूसरे मामले में दैवयोग को नकार दिया गया और तीसरे प्रयास में पुनः दैव कृपा।

श्रीवास्तव जी की नौकरी में पेंशन नाम मात्र का था। कर्मचारी राज्य बीमा योजना वाला। लेकिन एक धनात्मक बात यह थी कि तबादला नहीं था। नौकरी के अलावे अपना पूरा ध्यान वह बच्चों पर केन्द्रित रखते। अच्छे प्राइवेट स्कूल के चयन के साथ साथ ज़रूरत के हिसाब से योग्य ट्यूटर भी रखे गए। किशोर वय में ही बच्चों के मन में श्रीमती ममता ने प्रतिस्पर्धा की ज़रूरी भावना भरपूर मात्रा में भर दी। यह भय भी पैदा किया – “पढ़ो या मरो ! तुमलोग जो कुछ नहीं बन सके तो हम सबों का मरना तय है। तुम्हारे पापा तुमलोगों की पढाई की वजह से कुछ भी बचत नहीं कर पाते। कुल मिलाकर किराये के उस मकान में एक ऐसी हाहाकारमय स्थिति थी कि बच्चे पढाई के अलावा कुछ सोच ही नहीं पाए और लगातार अच्छा … और अच्छा … करते , आगे बढ़ते रहे।

                                                                        (5)

जब बड़का अजय बीस साल का हो गया, कृष्णा बिंद ने उसे ठेला खींचने के काम में लगाना चाहा।

“हम कुछ धंधा करने का सोच रहे हैं !” पिता के जोर देने पर विजय ने ठंडे, सपाट स्वर में कहा।

“धंधा के लिए पूंजी पगहा भी जरूरी होता है। नाना छोड़ गए हैं गड़लका धन कऽ जे इतना इतराइत हे ?”

यह सुनकर अजय तो नहीं , लेकिन उसकी माँ सुन्दरी देवी अवश्य हत्थे से उखड़ गयीं। बोली कि कब से पांच हज़ार मांगित हे लड़का , तोरा से तो उतनो जुड़ल पार न लगित हे और इल्जाम नाना पर …! सुनते ही कृष्णा बिंद भी ताव खा गया। बोला – “चलो कल दिए तुमको पांच हज़ार ! बाकी यह जान लो कि काठ की हांड़ी दुबारा नऽ चढतो हम्मर चूल्हा पर।”

उसी शाम को अपने सेठ से पांच हज़ार एडवांस लेकर कृष्णा बिंद ने अजय को पैसा थमा दिया। आजकल कृष्णा ने एक प्लास्टिक फैक्ट्री के मालिक के यहाँ काम पकड़ रखा था। नित्य गोदाम से कई खेप माल दुकान में लाना होता। फैक्ट्री से गोदाम भी पहुँचाना होता। काम बंधा बंधाया लेकिन आसान था। ठेला में माल ऊपर तक भर जाता, फिर भी खींचने में ज्यादा जोर नहीं पड़ता। बेटी को ब्याहने के बाद से ही उसका शरीर थकने लगा था।

पैसा पाने के दूसरे दिन ही अजय लापता। उसकी माँ ने बताया कि सुबह की गाड़ी से दोस्तों संग पंजाब चला गया है। वहीं एक फैक्ट्री में काम मिलने की बात तय है।

अजय गया सो गया। चिट्ठी पत्री आती कभी कभी। कभी किसी दोस्त के फ़ोन से समाचार मिल जाता। दो साल बाद आया वह दीवाली, छठ में। बाप के लिए कपड़ा, माँ की साड़ी। विशेष तोहफे के रूप में छोटा सा मोबाइल। बोलने बतियाने और हाल समाचार जानने के लिए। छुट्टी के बाद वह छोटे भाई विजय को भी साथ लेता गया। रह गए घर में पति पत्नी और बच्चों की राजी ख़ुशी से जोड़े रखनेवाला मोबाइल। बच्चों के शादी ब्याह हो गए। मोबाइल की कंपनी बदल गई। कृष्णा बिंद घर की छत पक्का कराने का सपना लिए आज भी ठेला खींच रहा है। बेटों ने साफ़ मना कर दिया है लौटने से। जहाँ दो रोटी का ठिकाना हो, समझो कि वही देश अपना। अब तो वहीं बसने की ज़िद पकड़े हैं दोनों। बतियाते हुए सलाह देते रहते हैं – “घर जमीन बेच कर यहीं आ जाइये कितना काम कीजियेगा?  बैठकर अराम से खाइए अब! “

लेकिन कृष्णा ठहरा पुराने ज़माने का आदमी। उसका यही मानना है कि जड़ उखड़ गया, तो समझो पेड़ मर गया। मरे पेड़ की क्या बिसात? जलावन बनकर रह जायेगा ! सुंदरी गयी थी पंजाब महीने भर के लिए। पंद्रह दिन में ही जिद करके वापस लौट आई। “नर्क है उस भीड़ भाड़ में बेपर्द ढंग से रहना। अपना घर तो अपने घर है !”

                                                                               (6)

श्रीवास्तव दंपत्ति प्रतिदिन बच्चों से बात करते। मिश्री समान बोलों से कुशलता के समाचार का आदान प्रदान होता। उधर की कुछ ज़रूरी ख़बरें और इमेज श्रीमती श्रीवास्तव अपनी मित्र मंडली के व्हाट्सएप ग्रुप पर शेयर करतीं और वाहवाही लूटतीं। अकेला बेटा जो कुछ बनाता, प्लेट में सजाकर तस्वीर भेजता। माँ प्रमुदित होतीं और उसके आत्मनिर्भर बनने पर गर्व करतीं। कहतीं कि अब मैं निश्चिन्त हूँ। घर से बाहर निकलने की जरूरत ही क्या है? जितना बढ़ता रहे लॉकडाउन अच्छा ही है। घर से काम करो, घर में सुरक्षित रहो।

बड़ा बेटा अमेरिका के न्यूजर्सी में है। वहां न्यूयॉर्क की अपेक्षा हालात उतने ख़राब नहीं हैं। वह परिवार के साथ घर में मस्ती करता और काम करता। छुट्टी के दिन गिटार बजाकर गाना गाता और वीडियो घर भेजता। यह वीडियो माता पिता अपने ग्रुपों में शेयर करते और इस विषम परिस्थिति में भी उनके बेटे के रचनात्मक होने के सराहे जाने से, खुद भी गौरवान्वित होते। कोरोना के दिनों का यह बेहद कारुणिक समय उनके परिवार के लिए एक विस्मयकारी खुशहाल समय में परिवर्तित हो गया था। जहाँ एक मात्र और एक मात्र बंदिश थी -घर से नहीं निकलना है। ‘स्टे होम’ , ‘स्टे सेफ’ का स्टिकर सबों ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर चस्पां कर रखा था।

इधर के कृष्णा बिंद को अब मोबाइल की घंटी यमदूत के आगमन की तरह आतंकित करने लगी थी। “क्या हुआऽ… सब ठीक तो है न…”का जब थोड़ा भी आश्वस्तकारी ज़वाब मिल पाता, कलेजे की धड़कन थोड़ी सम हो पाती।

“कऽ करें बाबू… सब भाग रहे हैं…! जिसका जैसे सींग समां रहा है… भाग रहे हैं !”

“यहाँ घर भी तो दू कोठरी का है , छत भी नहीं !” – माँ चिंता करती।

“… कौनो बात नहीं है ! आ जाओ सब लोग… गर्मी का तो दिन है। कहियों गमछी बिछाकर पड़ रहेंगे !” बाप उन्हें आश्वस्त करता – ‘‘यहाँ कौनो न कौनो काम का जोगाड़ हो ही जायेगा ! इतना हेत मेल है , परिचित हैं , कोई अंजान जगह थोड़े न आ रहे हो ?”

अजय और विजय को जब यह विश्वास हो गया कि यहाँ जान बचनेवाली नहीं , एक सुबह दोनों भाई गठरी मोटरी और परिवार सहित निकल गए। एक ट्रक जा रहा था सहारनपुर। उसी में दिल्ली तक के लिए सवार हो गए। सुना था कि दिल्ली से सरकार कुछ इंतजाम कर रही है गरीब गुरबों के लिए। लेकिन हुआ यह कि हरियाणा बॉर्डर पर ही पुलिस ने उन्हें उतार दिया। इसके बाद तो उनके मोबाइल ने भी काम करना बंद कर दिया।

कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी की हालत का क्या बयान करना? रेत में पड़ी मछली की तरह तड़पते हुए दाल रोटी की जुगाड़ में लगे तो रहते, मगर ध्यान हरदम मोबाइल पर ही रहता। खुद भी दिनभर में दस बार से कम फोन न टिपटिपाते। हर बार इस आशा के साथ भोले बाबा का नाम लेकर …कि शायद कोई सन्देश मिल जाये…! पता नहीं कहाँ बिला गए सब के सब? पुलिस की क्रूरता और बर्बरता से दोनों जने संभावनाओं से कहीं परे तक अवगत थे। सबसे छोटा पोता पांच साल का था और पोती… विजय की बेटी पायल… उसने अभी तीसरा भी ठीक से नहीं देखा था…!… हे राम…! हे भोले बाबा …! किससे कहें, कहाँ फ़रियाद करें…?

                                                                        (7)

चौथा लॉक डाउन शुरू होते ही वासुदेव श्रीवास्तव का चेहरा खिल उठा था। अमेरिका से बेटे ने खु़शख़बरी सुनाई थी। वह आ रहा है घर ! यहाँ की स्थिति भयावह है। अब देश में ही रहकर काम करेगा। हमारी सरकार ने लौटने की योजना चलाई है। टिकट कन्फर्म होते ही सूचना दूंगा।

“अरे आओ बेटा आओ … आओ … आओ … आओ … , तुम्हारे लिए बेसन के लड्डू , मठरी, गुझिया सब बना के रखूंगी। जल्दी खुशखबरी दो बेटा… जल्दी।” श्रीमती श्रीवास्तव बोल नहीं , जैसे गीत गाने लगीं हों। प्रवासी संतानों से मिलने की ख़ुशी इतनी बड़ी होती ही है माँ बाप के लिए।

सचमुच ऐसी ख़ुशी के क्षण के मुकाबिल दुनिया में शायद कुछ भी नहीं। कृष्णा बिंद का झुर्रियों से अंटा चेहरा इतना फ़ैल गया था कि सारी झुर्रियां गायब ! सुंदरी देवी कम इस्तेमाल होने वाले दूसरे कमरे में झाड़ू लगाते हुए, सोहर की धुन पर कुछ गुनगुना रहीं थीं।

आज दोपहर में अचानक से मोबाइल जब टुनटुनाया, उधर से एक आश्चर्य की तरह अजय था। बताया उसने कि किसी तरह बॉर्डर तक आ गए हैं। सबलोग राजी ख़ुशी हैं। कभी कोई सवारी , कभी पैदल, जैसा संयोग हो पाता , आगे बढ़ते आ रहे हैं।

चावल की बटलोही तब खदक रही थी और उसे देखते हुए हर्षितमना सुंदरी देवी यही कल्पना कर रही थी कि कब वह शुभ दिन आएगा जब सारे बच्चे घर पर होंगे और वह भर बटलोही भात पसाएगी। कल ही राशन दुकान से चावल उठाकर ले आएगी। एक किलो दाल भी। उसके खाते में सरकार ने हज़ार रूपये भेज रखे हैं , इन पैसों से हफ्ते भर तो पेट भर ही जायेगा। आगे देखा जायेगा। दोनों बेटे जवान हैं, हाथ पर हाथ धरे थोड़े न बैठे रहेंगे?

मारे ख़ुशी के आज शाम को सब्जी बेचने जाने का क्रम भंग कर कृष्णा गबड़े की ओर निकल गया था। बहुत सारे आदमी, औरत, बच्चे … सब मछली मारने को गबड़े में उतरे हुए थे। पानी लगभग सूख चुका था। कादो कीच में हाथ घुसाकर गरई, पोठिया जो मिले पकड़ने में सब जुटे थे। कृष्णा ने सड़क किनारे से एक पोलिथीन उठाया और लुंगी समेट गबड़े में उतार गया। बहुत दिनों से कुछ अच्छा न तो खाया था, न खाने की इच्छा ही थी। लेकिन आज रात में मछली के नोनगर झोर के साथ गरमागरम भात का ज़ायका अभी से उसके मुंह को चटपटाने लगा था।

इधर वासुदेव श्रीवास्तव के यहाँ भी वह बहुप्रतीक्षित शुभ सूचना आ चुकी थी। आ चुका है बड़ा बेटा …सपरिवार …!… दिल्ली से आज रात चलेगा वह स्पेशल ट्रेन से।

                                                                         (8)

सुंदरी ने प्रेम से खाना काढ़ा था। भात की मीनार के तीनों बगल मछली और उसका गाढ़ा तीखा झोर। एक भुनी सूखी मछली भात के मीनार के ऊपर खोंसी हुयी… जैसे भूख के किले पर विजय पताका फहरा दी गई हो।

“तुम भी ले आती न अपना। जोरे बैठ के खाते। लड़कों के आ जाने पर इस सुख को तरसोगी , सो जान लो !’’

 दोनों अभी खाना शुरू करने को ही थे कि फोन की घंटी।

“… कऽ हुआ अजय ऽ… हाँ ऽ… हाँऽऽ… बोल बेटा … की भेलो …?”

सुंदरी देवी अचानक से फफकने लगी थी।

“हम्मर विजय और अजय के बेटा ऽ… हमार पोतवाऽ… हे रामाऽ … ट्रक धक्का मार देलकै पीछू से !”

“तो …?”

“तो कि … किस्सा ख़तम !”

                                                                                                 संतोष दीक्षित

                                                                                                दुल्ली घाट, दीवान मोहल्ला

                                                                                          पटनासिटी, पटना – 8

                                                                                                 मो0 – 09334011214

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One comment

  1. शेफाली चौबे

    परत-दर-परत सुगबुगाती, यथार्थ के पन्नों को अपनी नब़्ज से टटोलती। बखूबी उपमाओं का प्रयोग अपनी जमीं के अपनेपन का ऐहसास कराती। समाज के दो भागों को रेखांकित करती कहानी उस ठौर पर ले जा कर खड़ा कर देती है। “बहुत खूब”

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