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‘मम्मी शिमला गई थीं ‘महाभोज’ लिखने के लिए’- रचना यादव

यह एक पुरानी बातचीत है रचना यादव से।संगीता ने रचनाजी  से यह बातचीत वेबपत्रिका लिटरेट वर्ल्ट के लिए अगस्त 2003 में की थी।रचना यादव हिन्दी की मशहूर कथा-लेखिका मन्नू भंडारी और बहुचर्चित लेखक-संपादक राजेन्द्र यादव की बेटी हैं। रचना को उसके मम्मी पापा और सभी जानने वाले टिंकू ही पुकारते हैं। रचना ने एडवर्टाइजिंग में मास कम्यूनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। फिर एडवर्टाइजिंग एजेंसी में नौ साल तक नौकरी की। इन्होंने अपनी डिज़ाइनिंग की हॉबी को पूरा किया। रचना की दिलचस्पी साहित्य से अलग फिजिकल एक्टिविटीज में ज़्यादा है। इस बातचीत में रचना कहती हैं ,’मम्मी को मैंने हमेशा माँ की तरह ही पाया है। वो लेखक की तरह कभी बीहेव ही नहीं करतीं। मुझे तो बचपन से ही उन्होंने अपना पूरा समय दिया। सबसे ज़्यादा मेरा समय उन्हीं के साथ बीतता था।’

 

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मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी। एक बेटी को वो हमेशा माँ की तरह मिलीं। घर और परिवार की जिम्मेदारियों को अपने करियर से ज़्यादा महत्व दिया। अपने पाठकों को अपने चुनिंदा ही सही, पर दमदार लेखनी से संतुष्ट किया। लेकिन वे कभी टिपिकल गृहिणी नहीं बनी। यहाँ भीतर की लेखिका ने अपने विचार, दूरदृष्टि और समझ का उपयोग व्यवहार के साथ किया, हर उन छोटी–बड़ी समस्याओं के समय जब-जब घर में ऐसे हालत आए। तब ऐसा हरगिज़ नहीं हुआ कि पुरानी रूढ़ियाँ उनके घर में भी चलीं। करियर मन्नू के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना राजेन्द्र यादव के लिए। हाँ, अपने करियर, एम्बीशन और ‘हंस’ की ऊँची उड़ान की चाह में, उस जद्दोजहद में एक पिता ने भले ही खुद को काट लिया अपने परिवार से, अपनी पत्नी से और अपनी बेटी से। पर मन्नू ने उसी परिवार को अपनाया, उन्हें ज़िम्मेदारियाँ ही ज़्यादा जरूरी लगीं। करियर की छटपटाहट और घुटन तो मन्नू को भी हुई ही होगी। पर यहाँ तो सवाल था चुनाव का। सो ‘माँ’ बनना, माँ की ज़िम्मेदारियों को निभाना उन्होंने ज़्यादा जरूरी समझा। मन्नू की बेटी रचना कहती हैं ‘मम्मी को मैंने हमेशा माँ की तरह ही पाया है। वो लेखक की तरह कभी बीहेव ही नहीं करतीं। मुझे तो बचपन से ही उन्होंने अपना पूरा समय दिया। सबसे ज़्यादा मेरा समय उन्हीं के साथ बीतता था।’ मन्नू अपनी बेटी की माँ के साथ-साथ दोस्त बनकर भी रहीं। रचना बताती हैं ‘वे बहुत ओपन माइंडेड हैं।’ उन्होंने अपनी ज़्यादातर बातें हमेशा रचना के साथ शेयर कीं। और रचना को भी उनके साथ समय बिताना अच्छा लगता था।

रचना जब छोटी थी और मन्नू को कुछ लिखना होता था तब कई बार वे दिल्ली से बाहर चली जाती थीं, एक या डेढ़ महीने के लिए। ऐसे में रचना घर में अपनी बुआ और चाचा के साथ रहती थी। रचना कहती हैं, ‘पर कभी भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मम्मी द्वारा मुझे नेगलेक्ट किया जा रहा है। ये तो उनका बहुत ही स्ट्राॉन्ग प्वाइंट है कि उन्होंने अपने घर को भी ठीक से चलाया और लेखन भी जारी रखा। उन्होंने घर और लेखन के बीच पूरा संतुलन बनाए रखा।’

मन्नू जी के साथ बिताये कुछ ख़ुशी के क्षण लिटरेट वर्ल्ड को भी बताएँ? ‘ख़ुशी के तो खैर…’ जैसे गहरी खाई सा ख़ालीपन था उस दूर से आई रचना की आवाज में, जो मेरे ही बहुत पास बैठी थीं। ‘एकदम से पीछे जाना। ये मुश्किल है। … कभी-कभी मम्मी जब अकेली होती थीं। क्योंकि उनके साथ मैं ही होती थी तब जिससे वो अपने दुख या प्रॉब्लम शेयर करती थीं। तब की मुझे कुछ वीक मेमोरिज़ है कि मम्मी दुखी हैं। मुझसे बातें कर रही हैं। तब शायद मैं इतनी मैच्योर नहीं थी कि उनको समझ सकूँ, शेयर करूँ।’

जब मन्नू कुछ लिखती थीं तो टिंकू से शेयर करती थीं। जब वे ‘महाभोज’ लिख रही थीं तब टिंकू दसवीं में थी। टिंकू बताती हैं, ‘वे लिखती थीं। मुझे सुनाती थीं और मैं सुनती थी। हम आपस से बैठकर डिस्कस करते थे। …ये अच्छा लगता था। मम्मी शिमला गई थीं ‘महाभोज’ लिखने के लिए।’

शुरू से ही टिंकू ऐसे माहौल में बड़ी हुई थी कि उसे पता होता था कि अभी मम्मी लिख रही हैं, अभी उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना है। मन्नू के ब्रेक का इंतजार होता था रचना को। और ब्रेक के समय दोनों ख़ूब बातें करती थीं, खेलती थीं।रचना कहती है ‘कभी वो एक कोने में लिख रही होती थीं, तो कभी आकर मेरे पास मज़ाक़ कर रही हैं। तो इस तरह की शेयरिंग रही है हमारी, हर एरिया में। दरअसल मुझे कभी पता ही नहीं चला कि वो कुछ इतना बड़ा काम कर रही हैं। मुझे लगता था कि ये तो लिखती ही रहती हैं। हाँ, सहज भाव से सब कुछ हो जाता था। घर में खाना भी बन जाता था। दीवाली में मिठाइयाँ भी बना लेती थीं। शापिंग भी कर आती थीं। बीच में लिख भी लेती थीं। सब कुछ इतना नॉर्मल था कि मुझे पता ही नहीं चलता था कि वो कुछ बहुत बड़ा कर रही हैं। आडम्बर तो बिल्कुल भी नहीं।’

रचना जब बाहर जाकर अपने सर्किल में जिक्र करती कि मेरी मम्मी राइटर हैं तो सर्किल वाले रियेक्ट करते थे कि ‘अरे राइटर हैं।’ ‘बाहर वालों का रियेक्शन मैं सुनती थी तब एहसास होता था कि मम्मी बहुत बड़ी हस्ती हैं या सामान्य नहीं, सबसे अलग हैं। ‘महाभोज’ के लिए जब उन्हें एवार्ड मिला तब मुझे महसूस हुआ कि ये बहुत बड़ी राइटर हैं, या बहुत अच्छा लिख रही हैं।’

मन्नू भंडारी व राजेन्द्र यादव

मन्नू बहुत ही ट्रांसपैरेंट हैं। खुली सोच, खुले विचार और इतनी सहज की किसी से भी अपनी बात शेयर कर लेती हैं, हर किसी पर विश्वास कर लेती हैं कि सामने वाला भी उन्हीं की तरह सीधा, सरल और उतना ही सच्चा है।‘कभी मैंने उनको किसी का बुरा सोचते नहीं देखा। इतनी इनोसेंट हैं, इतनी साधारण हैं कि कई बार लोग उनको बेवकूफ बनाकर चले जाते हैं। हर किसी की बात मान लेती हैं। उनको ये नहीं लगता है कि लोग बेईमान भी हो सकते हैं। झूठ भी बोल सकते हैं। जैसे घर में कोई लेबर आया काम करने, वो जो कहेगा या बताएगा, उसको ठीक समझेंगी।’

बहुत ज़्यादा सेंसिटिव हैं वे। उन्हें कुछ कहने से पहले उन्हें जानने और मानने वालों को ये सोचना पड़ता है कि इस बात से उन्हें कहीं ठेस तो नहीं पहुंचेगी। यही हाल उनकी अपनी बेटी रचना का भी है। रचना कहती है ‘मैं उन्हें कहती हूँ कि तुम्हारे साथ तो हम खुलकर लड़ भी नहीं सकते हैं। जैसे एक नॉर्मल माँ-बेटी में लड़ाई होती है। लड़ते हैं, तो तुम ग़ुस्सा जाती हो। अगर हम दोनों में लड़ाई हो जाए, तो वो दस दिन तक हमसे बात नहीं करती हैं। उनके साथ बहुत ज़्यादा सँभल कर बात करना पड़ता है। बहुत ज़्यादा सेंसेटिव हैं वे। पापा को कुछ भी बोल देती हूँ, तो वे हाँ-हाँ करके सुन लेते हैं। पर मम्मी को नहीं बोल सकती मैं। ऐसा भी नहीं है कि उनसे डरती हूँ मैं। पर वे बहुत ज़्यादा सेंसिटिव हैं।’

मन्नू के पास कोई अपनी समस्या लेकर आता है, तो भले ही वह उसकी कुछ और वजह बताए। पर उनकी उस विषय पर की गई एनालिसिस अक्सर समस्या के काफी क़रीब निकलती है। उनकी एनालिसिस और ग्राफ़ कि किसी प्रॉब्लम के पीछे क्या कारण है उसकी एनालिसिस वो बहुत अच्छा करती हैं। रचना कहती है ‘जैसे किसी के रिलेशनसिप की प्रॉब्लम है। चाहे वो माँ-बेटा हो, माँ-बेटी हो, हसबैंड-वाइफ़ हो, किसी का एक्सट्रा मैरिटल अफ़ेयर हो या कुछ भी हो। लोग आते ही रहते थे उनके पास ऐसी समस्याएँ लेकर। जैसे किसी ने उनको प्रॉब्लम आकर बताई। वो मुझे डिस्कस करती थीं कि उसने तो ये प्रॉब्लम बताई है पर उसके पीछे मुझे कारण दूसरा लगता है। और बाद में पता चलता था कि मम्मी की एनालिसिस सही है।दरअसल उनके एनालिसिस की ग्राफ़ इतनी एक्चुअल होती थी कि…जबकि उन्हें देखकर मुझे हमेशा लगता रहता था कि वो इतनी सिम्पल हैं, वो क्या पकड़ पाऐंगी बातों के पीछे की बात। लेकिन नहीं काफी डीटेल में जाकर वो बातों को पकड़ लेती हैं।’

वे बीमार रही हैं ज़्यादा। अकेली रहती हैं वे। और इतनी बीमारियाँ हैं उन्हें। इस तरह उनका पूरा ध्यान अपनी बीमारियों पर लगा रहता है। साइकोलॉजिकली भी वे ज़्यादा परेशान होती हैं। उनका शेड्यूल अपनी बीमारी और अपने शरीर के इर्द–गिर्द घूमता रहता है। ‘मैं ये नहीं कहती कि उनको तकलीफ़ नहीं हैं। तकलीफ़ है, मगर उनका पूरा ध्यान बीमारियों पर ही केन्द्रित रहता है। उन्हें लगता रहता है कि शरीर में हर जगह कुछ गड़बड़ हो रही है। इस तरह उनका दिमाग़ चलता रहता है जो कि ठीक नहीं है। उन्हें कई बार ये भी लगता है कि अगर मैं टिंकू को बताऊँगी कि मैं बीमार हूँ तो वो दौड़ती हुई आ जाएगी।’

रचना बताती है, ‘मम्मी थोड़ी सेट हैं अपने आइडियाज़ में। एक तरफ़ तो मैं कहूँगी कि काफी ब्रॉडमाइंडेड हैं, पर एक तरफ़ सेट हैं। कुछ उन्होंने अपनी सोच बना ली है। वे उसी के हिसाब से चलेंगी। और ये उम्र के साथ बढ़ता ही जा रहा है। अकेले रहती हैं। अकेला फ़ील करती हैं। इनसिक्योर फील करती हैं। वो माने या ना माने। उनको मैंने बहुत-बहुत बोला है कि तुम हमारे साथ रहो। पर वे तैयार नहीं होती हैं। उनके कुछ मित्र हैं जिनसे वे अपनी बातें शेयर करती हैं।’

दिल्ली में मन्नू के क्लोज़ मित्रों में निर्मला जैन, राजी सेठ, अर्चना वर्मा और कुछ कॉलेज की पुरानी फ़्रेंड हैं जिनसे बात करना उन्हें अच्छा लगता है। अजित कुमार उनके अच्छे मित्र हैं। दिल्ली में लम्बी दूरी की वजह से लोगों का आपस में मिलना-जुलना कुछ कम ही हो पाता है। लोग फोन पर ही यहाँ लंबी-लंबी बातें करते हैं। रचना कहती हैं, ‘उनकी सबसे क्लोज़ फ्रैंड उनकी बहन सुशीला भंडारी हैं, जो कलकत्ते में हैं। मैं उन्हें मम्मी बुलाती हूँ। एक्चुअली बचपन में मुझे उन्होंने ही पाला है। अच्छा, पापा कि तरह वो सोशल भी नहीं हैं। सोशल हैं, पर किसी अजनबी से घंटा भर बात कर लिये ऐसा नहीं है। आजकल वो कितना किसके साथ शेयर करती हैं…ये मुझे नहीं पता।क्योंकि मैं अब उनके साथ नहीं रहती हूँ।’ रचना हफ़्ते में एकाध चक्कर ज़रूर लगा लेती हैं अपने मम्मी–पापा के।

मन्नू लिखना चाहती हैं। पर बीमारी कि वजह से लिख नहीं पाती हैं। टिंकू कहती है ‘मम्मी लिखने लगे तो उनका ध्यान भी बँटेगा। वे लिख नहीं पा रही हैं, उसका भी फ़्रस्ट्रेशन है। है तो थोड़ा कठिन। वो बहुत चाहती हैं लिखना।पिछले कितने ही सालों से नहीं लिखा है उन्होंने। बीमारी और पर्सनल प्रॉब्लम की वजह से उनका कॉन्फ़िडेंस बहुत ख़त्म हुआ है। उन्हें लगता है कि अब वे लिख नहीं पाएँगी। मैं उनसे कहती हूँ कि तुम ये क्यों सोचती हो कि तुमसे लिखा नहीं जाएगा, कोशिश तो करो। दिमाग़ में, आइडियाज़ चलता रहता है। पर उसको लिखना, अब तो एक पैराग्राफ़ लिखने के लिए दस पन्ने फाड़ती हैं। पहले फटाफट-फटाफट लिख देती थीं। अब पहले वाली बात तो नहीं ही होगी। पर धीरे-धीरे पिछले महीनों में लिखना शुरू किया है उन्होंने।’

रचना कहती है ‘मम्मी पहले मम्मी हैं, राइटर बाद में हैं। मम्मी अगर ख़ुश हैं, तो चेहरे पर ख़ुशी होगी, जोर-जोर से हँसेंगी और दुखी हैं तो वह भी दिखेगा। पर पापा हर स्थिति में सामान्य दिखते हैं, भले ही उनके भीतर कुछ और चल रहा हो। पापा मेरे लिए एक ऐसे फ़िगर थे जो एक कमरे में बैठकर लिखते रहते थे और लोगों के आने पर उससे बातें करते थे। और तब मैं छोटी थी तो उतना डीटेल में देखती नहीं थी और बहुत बातें समझ भी नहीं आती थी।’

जैसे कि पापा कहते हैं कि मम्मी से पता नहीं टिंकू की रात-रात भर क्या बातें होती रहती हैं। जबकि एक-दो बात करने के बाद मेरी समझ में आना बंद हो जाता है कि क्या बात करें? जबकि ऐसा नहीं है कि हम दोनों को एक-दूसरे के लिए फ़ीलिंग नहीं है। पर उस तरह का डायलॉग ही नहीं है।‘हालाँकि मैं उनकी अकेली लड़की थी। पर पापा के लिए मुझे हमेशा लगता था कि वे अपनी ही दुनिया में लीन हैं। जब शाम को वे घर आते थे तब तक मैं अपने कामों में बिज़ी होती थी। या फिर उनके साथ कोई न कोई होता था। लेकिन मम्मी के साथ ऐसा नहीं था।वे मेरे साथ बहुत ज़्यादा समय बिताती थीं। मुझे हमेशा छूट दी गई कि अकेले जाओ, अकेले ये करो, वो करो…। बहुत कम उम्र से ही मैं बसों में ट्रैवल करने लगी थी। यही सब वजह होगी कि मैं बहुत कॉन्फ़िडेंट हूँ।’

रचना के कॉन्फ़िडेंट होने में डेफ़िनेटली उसके पापा का भी कॉन्ट्रिब्यूशन होगा। ‘अगर मैं कुछ कर रही हूँ और वो पापा को पसंद नहीं आ रहा है तो वो मुझे डायरेक्टली कभी नहीं बोलते थे। वो मम्मी के थ्रू होता था कि मुझे कैसे होना चाहिए और कैसे नहीं, कैसे जाना चाहिए, मुझे क्या करना चाहिए। मम्मी पूरा ध्यान रखती थीं कि तुम ये करोगे, वो करोगे। ये ठीक है, ये ठीक नहीं हैं। यही नहीं वे भी अपना एक-एक मिनट मुझसे शेयर करेंगी…। कि अच्छा जब मैं उठी तो मुझे ऐसे लगा मुझे ये हो रहा है। फिर शाम को बताएँगी…मैं डॉक्टर के पास जा रही हूँ। पापा ऐसे डे-टू-डे का शेयर नहीं करते हैं। उनको ये स्टुपिड भी लगता है। पापा के साथ ऐसा कुछ याद नहीं आता है। उन्हें फ़रमाइश करते थे कि हमें गिटार चाहिए। मुझे याद है, उनके ऑफ़िस के बाहर एक खास तरह का लॉलीपॉप मिलता था। वे ऑफिस जाते थे तो कहती थी कि पापा वो लॉलीपॉप चाहिए। पर उनके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ कि अपने प्रॉब्लम डिस्कस कर रही हूँ। जब मम्मी नहीं होती थीं एक-एक महीने, दो-दो महीने। तब घर में बुआ होती थीं, जो मेरी देखभाल करती थीं। पर पापा…। आजकल पापा से काफी डायलॉग है। मुझे उनके साथ बचपन का इन्टरेक्शन याद है। बीच का नहीं।’

आजकल राजेन्द्र यादव मन्नू और टिंकू की छोटी–छोटी बातों का ध्यान रखते हैं या उन्हें ख़बर होती है, पर पहले ऐसा कहाँ था। ‘अब पापा को अन्दर से शायद एक इमोशनल नीड लगती होगी कि फ़ैमिली का साथ भी होना चाहिए। पापा जितने केयरिंग आज हैं और जितनी छोटी-छोटी डीटेल वो याद रखते हैं। पूछते हैं, चाहे वो मेरे बारे में हो या मम्मी के बारे में। अब वे जितना फ़िक़्रमंद रहते हैं, ऐसा पहले नहीं था जब हमलोग साथ रहते थे। साथ रहके टेकन फॉर ग्रांटेड हो जाता है। जितने केयरिंग पापा अब हो गए हैं उतने कभी भी नहीं रहे, दूर-दूर तक नहीं। ये इन्टरेक्शन मेरे ख्याल तब ज़्यादा बढ़ने लगा जबसे वे दोनों अलग रहने लगे।’

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About Amrut Ranjan

कूपरटीनो हाई स्कूल, कैलिफ़ोर्निया में पढ़ रहे अमृत कविता और लघु निबंध लिखते हैं। इनकी ज़्यादातर रचनाएँ जानकीपुल पर छपी हैं।

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One comment

  1. A. Charumati Ramdas

    बहुत अच्छा लिखती हैं रचना, एकदम दिल से!

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