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कविता शुक्रवार: कुमार अम्बुज की नई कविताएँ

पाठकों का अभिनन्दन
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जैसा कि अमूमन होता है कि किसी प्रस्तुति-विशेष की शुरुआत करते हुए लक्ष्य, उद्देश्य या दावों के साथ (महत्वपूर्ण भी बताते हुए) कदम बढ़ाया जाता है। संयोग से ‘कविता शुक्रवार’ के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। शुद्धता यह कविता का मंच है। कविता के श्रेष्ठ या निम्न होने का मापदंड भी पाठकों, और उससे कहीं अधिक कवियों की खेमेबंदी के पास ही रहे, तो शायद अधिक उचित होगा।
हिंदी में जितने तरह के वाद, मठ या स्कूल हैं, यह मंच उन सबके लिए है। मालवी में एक शब्द है ‘ओटला’। यह घर के बाहर बैठने की एक जगह होती है। जिस पर फुरसत में शाम को उस गली-मोहल्ले में रहने वाले विपरीत सोच वाले व्यक्ति (जिसमें मजे लेने वाले अधिक ही होते) बैठकर गपियाते थे। और अपनी तार्किक-अतार्किक दलीलों से मजे-मजे में वाकयुद्ध करते रहते थे। यह भी कुछ-कुछ ऐसा ही ओटला है, जिस पर परस्पर सम्वाद-कटुता की जगह केवल कविताओं को ही स्थान मिल पाएगा।
कविता शुक्रवार’की पहली प्रस्तुति में कुमार अम्बुजकी तीन नई कविताएं दी जा रही हैं, जो उन्होंने इसी वर्ष जनवरी में लिखी हैं। उनकी विचारधारा का झुकाव किधर है, यह सभी जानते हैं। वे अभी भी मार्क्सवाद के अध्ययन में रुचि रखते हैं और लेखन के लिए वामपंथी नजरिये को जरूरी समझते हैं। उनके प्रकाशित कविता संग्रह ‘किवाड़’, ‘क्रूरता’, ‘अनंतिम’, ‘अतिक्रमण’ और ‘अमीरी रेखा’ हैं। एक कहानी संग्रह ‘इच्छाएँ’, एक डायरी संकलन ‘थलचर’ और एक निबंध संग्रह ‘मनुष्य का अवकाश’ है। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार और गिरिजाकुमार माथुर सम्मान मिला है। वे अपने स्वभाव के संकोच को सोचने-लिखने में ध्वस्त करते रहते हैं। आइए, पढ़ते हैं कुमार अम्बुज की नई कविताएं।
राकेश श्रीमाल
=================
 

 

1
धरती का विलाप
 
(फासिज्म मुर्दाबाद)
 
दुख उठाने के लिए स्त्रियाँ ही बची रह जाती हैं
मानो उनका जीवनचक्र हैः सुख देना, दुख सहना
और नये दुखों की प्रतीक्षा करना
पार्श्व में संगीत गूँजता है विलाप की तरह
एकॉर्डियन और गिटार अपना काम करते हैं
बंदूकें अपना
 
 
विस्थापन की मुसीबत में नदी भी एक दिन
आदमियों, गलियों और पेड़ों को घेर लेती है
मगर बाढ़ में घिरी एक अकेली स्त्री
किसी दूसरी जमीन पर जाने से इनकार कर देती है
डूबते घर के सेहन में टूटी कुर्सी पर बैठकर
निष्कंप देखती है गूँगा हाहाकार और मृत्यु
जैसे वह जानती है कि नौकाएँ भी दुखों को
इस पार से महज उस पार ही लेकर जा सकती हैं
 
 
एक उम्रदराज़ घर प्रलय के बीच में खड़ा होकर
अपनी खिड़कियों से परदे हटाकर झाँकता है
लोगों की परछाइयाँ नदी की अतिशयोक्ति में झिलमिलाती हैं
वह देखता है घर से बाहर कदम रखते ही हर जगह
हर आदमी शरणार्थी हो जाता है
खेल के मैदान में सूखते रहते हैं कपड़े
ओस, नमी, आँसू और खून उन्हें पूरी तरह सूखने नहीं देते
रंगशालाएँ और सभागार बदल जाते हैं शरणस्थलियों में
ईर्ष्या, नफरत और क्रूरता अंतिम वक्त तक पीछा करती है
सारे पात्र अभिनय करने की कोशिश कर रहे हैं
केवल घटनाएँ हैं जो बिना अभिनय के घट रही हैं
 
 
अचानक पति का साथ छूटता है तो याद आता है बेटा बचा है
जब बेटा छूटता है तो याद आता है पति पहले ही छूट चुका है
नृशंसता के युग में हर आकांक्षा, हर जगह बरबाद हो जाती है
घरों के भीतर गृहस्थी का टूटा-फूटा सामान भी नहीं दिखता
रात में सैक्सोफोन की आवाज बारिश को स्तब्ध करती है
और औंधे मुँह गिरकर कीचड़ में सन जाती है
गिटार से वायलिन की जुगलबंदी हवा में है
लेकिन हवा में तैरती उमस
हर संगीत को विफल कर देती है
 
 
आदमी तकलीफें झेलता चला जाता है अपनी छाती पर
और बैठे-बैठे ही या धीरे से लुढ़कते हुए अकस्मात
सूचित करता हैः बस, बहुत हुआ
अब रंगमंच पर खाली कुर्सियों का सूनापन
उनकी आकांक्षा, उनका अवसाद आपके सामने है
वहीं आप संगीत की उदासी में थिरक सकते हैं
या लड़खड़ाकर गिर सकते हैं
हाथ में हाथ डालकर चलते रहने से भी
न अकेलापन खत्म हो पाता है, न निर्वासन, न भय
लैम्प की रोशनी का उजास गिरता है जीवित चेहरों पर
देख सकते हैं कि थकान और आतंक की स्याही अमर है
प्रिय चीजें अधूरे स्वेटर की तरह उधड़ती रहती हैं
सूखते सफेद चादरों पर बनते हैं उँगलियों के निशान
जैसे कोरे कैनवस पर हल्के हाथों से
लगाया जा रहा हो रक्तिम ब्रश
 
 
नेपथ्य में से रेलगाड़ी शोकाकुल सवारियाँ ढोकर लाती है
लाचारी का धुआँ पटकथा को काला कर देता है
नदी किनारे और भूरी जमीन पर बिखरी लाशें
करती हैं अपनों के रुदन का इंतजार
और अपनी उन कब्रों का जो उन्हें कभी नसीब नहीं होतीं
सुनसान पठारों पर भी गश्त जारी है जहाँ मरण का शोक
मिट्टी में मिलकर धूल-धूसरित हो गया है
 
 
दो प्रेमी, दो बच्चे, दो भाई चले जाते हैं अलग रास्तों पर
एक स्त्री की मृत्यु उन्हें कुछ देर के लिए इकट्ठा करती है
एक स्त्री अपने सन्निपात में
अपना दुख बताने की कोशिश में बार-बार होती है नाकाम
एक स्त्री उसे सांत्वना देते हुए अपने ही संताप में गिर पड़ती है
एक स्त्री का अनश्वर आर्तनाद उठता है
वही है अंत, वही है अनंत
वही बचा रहता है।
 
(थियो एंजेलोपोलस की फिल्म ‘द वीपिंग मीडो-2004’ के लिए आदरांजलि)
2
एक अधूरी कहानी
 
 
हम कौन हैं की तरह यह एक जटिल सवाल है
कि आखिर कहाँ है इनकी जमीन, कितना है इनका रकबा
क्या ये इस घर में, इस पेड़ के नीचे, इस नदी किनारे
इस तलहटी में जीवन भर रह सकते हैं
या तुम्हारे द्वारा खींच दिए घेरे के निशान से बाहर
ये एक कदम भी रख देंगे तो हो जाएँगे निर्वासित
 
 
जैसे वस्तुओं को, जानवरों को नहीं पता होता
वे कहाँ के लिए ले जाए जाते हैं
इन लोगों को भी नहीं पता वे किस सफर में हैं
उन्हें बस अंदेशा है, जिसमें नये अंदेशे जुड़ते जाते हैं
वे आशंका की सवारी में ही कर रहे हैं यात्रा
और जान चुके हैं कि जब तक सफर में हैं
बस, तब तक ही वे शरणार्थी नहीं हैं
 
 
यह समय भी हो गया है कुछ अजीब
इसमें शीत, धुएँ, धुंध, बादल के कई परदे हैं
मशक्कत के बाद कभी झीनी-सी धूप झाँकती हैं
तो इनकी परछाईं भी ठीक से नहीं बनती
जबकि कल तक इन सबका एक घर था
आग थी, पानी था, बिस्तर था,
इंतजार था, एक खुली जगह थी, आसमान था
फैली हुई बाहें थीं, उगते हुए पौधे थे और तारे
एक देह थी जिसमें छिप सकते थे
एक कोना था जहाँ सुबक सकते थे
 
 
इन्हें अंदाजा है जो पीछे छूट गए वे मारे जा चुके हैं
जो आगे जा रहे हैं मरने के लिए जा रहे हैं
जो अभी जिंदा हैं, खुश दिखते हैं या नाराज
इनमें बस एक समानता हैः
ये सभी मौत को पीछे छोड़कर आए हैं
और जानते हैं उनके लिए हर शब्द का,
हर चेष्टा, हर चीज का पर्यायवाची मृत्यु है
वे बताएँगे किस तरह हर चीज में से झाँकती है मृत्यु
पेड़ से, खिड़की से, टूटी दीवार से, अँधेरे से, रोटी से,
सहानुभूति से, कुर्सी और हथेली की ओट से
वे तर्जनी से दिखा देंगे हर जगह मृत्यु हैः
सड़क पर, आकाश में, हँसी में, तुम्हारी आँखों में,
चाय की केतली में, कचहरी में, इस किताब में,
इन कपड़ों में, पाताल में, इस सवाल में
सब जगह मृत्यु है और हमलावर है
जिससे भी कहा जाता है तुम जिंदा रहोगे
सुबह उसकी ही लाश सबसे पहले मिलती है
 
 
ये लोग जिंदा होकर भी इकट्ठा नहीं होते
एक-एक करके मरते चले जाते हैं
यही पुरातन कहानी है जो हर बार नयी हो जाती है
 
 
विस्थापन और अनिश्चितता ने इन्हें पूरी तरह बदल दिया है
अब इनमें से इनका कुछ भी पुराना बरामद नहीं किया जा सकता
याददिलाही का कोई निशान नहीं बचा, माथे की चोट वैसी नहीं रही,
जो नये घाव हैं उनका कोई जिक्र पहचान पत्र में नहीं
तसवीर खींचों तो किसी दूसरे ही आदमी की तसवीर निकलती है
पसीने की गंध बदल गई है इतनी कि अंतरंग क्षणों में
इनका प्रिय इन्हें किसी और नाम से पुकारने लगता है
तब विश्वास हो जाता है कि अजनबीयत ही इनका हासिल है
 
 
अपनी जगह से उजड़े निष्कासित आदमी को
आप किसी भी नाम से पुकारें, वह चौंककर
इस तरह देखेगा जैसे वही उसका नाम रहा हो
और जब उससे कभी कोई दुलार से कहता है कि आओ,
यह मेरा घर है लेकिन इसे तुम अपना ही समझो
तो याद आता हैः हाँ, उसका तो अब कोई घर नहीं है
 
 
उसी वक्त बगल से ठसाठस भरी एक रेलगाड़ी गुजरती है
हर डिब्बे से उठती है रुदन की आवाज
मातम है कि कभी खत्म ही नहीं होता
रेल की सीटी और धड़-धड़ की आवाज भी
उसी मातम का हिस्सा हो जाती है
टूट चुके हैं आँसुओं के नियम
अवसाद एक नैतिक सूचना भी नहीं देता
और जुट जाता है भीतर की तलाशी में
उदासी अपने सूनेपन में सब देखती रहती है चुपचाप
कि लोहे और सोने पर जंग लग रहा है एक साथ
गुम हुई चीजें कहीं मिलती भी हैं तो पहचान में नहीं आतीं
आदमियों के बारे में यह बयान पहले ही दिया जा चुका है
 
 
अंत में वे बच्चों को
अपनी त्रासदियाँ किसी कहानी की तरह सुनाते हैं
और उसे अधूरा छोड़ देते हैं क्योंकि यह अधूरी ही है
वे कहते हैं- यह अब उस तरह पूरी होगी
जैसे मेरे बच्चो, हम चाहेंगे और तुम चाहोगे।
3
जब एक पोस्टर का जीवन
 
 
जिन चीजों के लिए हमें
एक मिनट का भी इंतजार नहीं करना चाहिए
उनके लिए हम एक साल, दस साल, बीस साल
न जाने कितने वर्षों तक इंतजार करते चले जाते हैं
जैसे प्रतीक्षा करना भी जीवन बिताने का कोई उपाय है
जब ऋतुओं के अंतराल में पतझर आता है
हम आदतन अगले मौसम का इंतजार करने लगते हैं
लेकिन देखते हैं हतप्रभ कि अरे, यह तो पलटकर
वापस आ गया है पतझर
 
 
सब कुछ नष्ट होते चले जाने के दृश्य
चारों तरफ चित्रावली की तरह दिखते हैं
मुड़कर देखने पर दूर तक कोई दिखाई नहीं देता
न किसी के साथ चलने की आवाज आती है
तो कुछ इच्छाएँ प्रकट होती हैं, कहती हैं हम अंतिम हैं
हमें एक पुराना नीला फूल खिलते हुए देखने दो
देर रात में उस लैम्पपोस्ट के नीचे से गुजरने दो
दोस्त के साथ बचपन के शहर में रात का चक्कर लगाओ
यह जानते हुए कि उस पौधे की प्रजाति खत्म हो चुकी है
लैम्पपोस्ट का कस्बा कब का डूब में आ गया
और दोस्त को गुजरे हुए बीत गया है एक जमाना
इच्छाओं से कहता हूँ: तुम अंतिम नहीं हो, असंभव हो
 
 
आगे चलते हुए वह एक अकेला बच्चा मिलता है
जो रास्ते में मरी एक चिड़िया को देखकर
इस तरह रोने बैठ जाता है
जैसे जिंदगी में पहली ही बार अनाथ हुआ हो
प्रतीक्षा भरी इस अनिश्चित दुनिया में
वह भोर के तारे को उगता हुआ देखता है
और उसे अस्त होते हुए भी
वह समझ लेता है कि यतीम होते चले जाने के
इस रास्ते से ही गुजरकर सबको निकलना है
 
 
सभ्यता की राह में फिर दिखती हैं वे दीवारें
जिन पर लगाये पोस्टर फाड़ दिए गए हैं
दरअसल, चलते-चलते हम आ गए हैं उस जगह
जहाँ एक पोस्टर तक का जीवन खतरे में है
और सबको अंदाजा हो जाता है
कि अब मनुष्यों का जीवन
और ज्यादा खतरे में पड़ चुका है।
 
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रेखांकन : चरण शर्मा
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ये तीनों रेखांकन वरिष्ठ चित्रकार चरण शर्मा के हैं। वे विषय-विशेष पर चित्रों की सीरीज बनाते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी पसन्द किए जाते रहे हैं। फिलहाल कोरोना के इस कालखंड को मुंबई के अपने स्टूडियो में शिद्दत से अनुभव कर अपनी स्केच बुक में उकेर रहे हैं।
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‘कविता शुक्रवार’ के इस अंक में बसंत त्रिपाठी की कविताएं और सफदर शामी के चित्र …

14 comments

  1. Adbhut…
    Respected Kumar Ambuj sab
    Aseem Shubhkamnaye…

  2. आज के समय को अभिव्यक्त करती बेहतरीन कविताएं

  3. कुमार अम्बुज मेरे प्रिय कवि हैं । आज उनकी कविताओं से गुजरते हुए ऐसा लगा कि जीवन का ‘ लोक पक्ष ‘ इनकी कविता में अपने सम्पूर्ण तेवर में मौजूद है । समाज का सबसे वंचित तबका महा विपदा में है । कवि उसके लिए चिंता में है । यह कविताएँ इस असमय का दस्तावेज है । कविवर् को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।
    राकेश श्रीमल जी का कहन अद्भुत और विलक्षण है ।
    जानकीपुल को साधुवाद इस महत्वपूर्ण साहित्यिक पहल के लिए ।

  4. मनोज शर्मा

    बेहद मार्मिक और ज़रूरी कविताएं।इन्हें बार-बार पढ़ा जाना चाहिए।
    मनोज शर्मा

  5. पाठक को समृद्ध करने वाली शानदार कविताएं

  6. हमारे समय को दर्ज करती कविताएं। बहुत खूब…

  7. अद्भुत कविताएँ हैं, बल्कि किसी नाटक के चरित्र के अलग अलग एकालाप हैं ये…
    कुमार अम्बुज जी, आपको बहुत बहुत साधुवाद 🙏🌹

  8. pavitra salalpuria

    ” अपनी जगह से उजड़े निष्कासित आदमी को
    आप किसी भी नाम से पुकारें, वह चौंककर
    इस तरह देखेगा जैसे वही उसका नाम रहा हो”
    अम्बुज मेरे सबसे प्रिय कवि हैं और लम्बे अरसे से पहचानता हूं इसलिए अब उन्हें पढ़ कर चकित नहीं होता क्योंकि मैं जानता हूँ कि बुद्धिजीवी रचनाकार उपलब्ध ज्ञान तथा प्रचलित शिल्प दौनों का अतिक्रमण करता है।
    प्रस्तुत तीनो कविताओं के लिये बधाई।

  9. बसंत त्रिपाठी

    मैंने कुमार अम्बुज के संग्रह ‘अमीरी रेखा’ की समीक्षा में लिखा था – कुमार अम्बुज हमारे समय के बड़े कवि यूँ ही नहीं हैं। आज उसी पंक्ति को फिर दुहराता हूँ। खबरें रचनात्मकता में कैसे बदलती हैं, तीनों ही कविताएँ इसके उदाहरण हैं। बेहद बेहद महत्वपूर्ण कविताएँ। चरण शर्मा के रेखाचित्र भी लाज़वाब हैं।

  10. पवन कुमार वैष्णव

    कविता शुक्रवार का मुझे बेसब्री से इंतजार था..! वरिष्ठ कवि कुमार अम्बुज को इस सिलसिले की पहली कड़ी में पढ़कर,कविता शुक्रवार की सर्थकता सिद्ध हुई। कुमार अम्बुज को पढ़ते हुए लगा कि कविता अपने होने की वजह स्वयं बताती है।

  11. अरुण आदित्य

    कुमार अंबुज की महत्वपूर्ण कविताओं से कविता शुक्रवार की शुरुआत बहुत अच्छी शुरुआत है। अंबुज हमारे आसपास के घटित को कवित्त बनाने की सामर्थ्य रखते हैं। विचार, संवेदना और शिल्प हर दृष्टि से वे परफेक्शनिस्ट पोएट हैं। कवि को बधाई और राकेश श्रीमाल व प्रभात रंजन को शुक्रिया इस सार्थक पहल के लिए।

  12. धरती का विलाप कविता इस अर्थ में मुझे बहुत मार्मिक और अर्थपूर्ण लगती है कि यह अपने रचनात्मक कौशल और अथाह संवेदनशीलता में बता जाती है कि यह सिर्फ अंतरअनुशासनिक कविता नहीं है। यह एक बेहतरीन फिल्म के कुछ मार्मिक दृश्यों से भले ही पंक्तियों में थोड़ा सा लाभ उठाती हो, लेकिन दूसरी पंक्ति में ही यह अपने माध्यम का वैशिष्ट्य बरक़रार रखते हुए उससे आगे जाती है।
    शीर्षक के बाद ब्रेकेट में फासिज़्म मुर्दाबाद ने मुझे थोड़ा खिन्न कर दिया क्योंकि इस ब्रेकेट का मेरे लिए यहां कोई अर्थ नहीं था बल्कि यह कविता का ही नुकसान करता है क्योंकि यह कविता अपनी कहन में इतने दु:खों और संतापों के इतने कोने-अंतरों में जाती है जहां इसमें अर्थ के अनंत दरवाज़े खुलते हैं और कविता हमारे किसी भी समय का लांघते हुए और उसमें धंसते हुए भी एक अनसुने आर्तनाद में बदल जाती है।

    केदारनाथ सिंह की कविता पानी से घिरे लोग के बरक्स इस कविता की इन पंक्तियों पर गौ़र किया जाना चाहिए :
    विस्थापन की मुसीबत में नदी भी एक दिन
    आदमियों, गलियों और पेड़ों को घेर लेती है
    मगर बाढ़ में घिरी एक अकेली स्त्री
    किसी दूसरी जमीन पर जाने से इनकार कर देती है
    और फिर इस पंक्ति पर भी ग़ौर करिए कि :
    वह देखता है घर से बाहर कदम रखते ही हर जगह
    हर आदमी शरणार्थी हो जाता है।
    क्या कहने की ज़रूरत रह जाती है कि इस कविता की पंक्ति हमारे समय का हाहाकारी बयान बनने के बजाय अपने कलात्मक संयम में उस आंच में बदल जाती है जो हमें अपने दु:ख से भी विस्थापित लोगों के अंतर्जगत का दृश्यांकन करती है। और यह अंबुज जी के कवि का ही सामर्थ्य है कि यह मार्मिक दृश्यांकन, फिल्म के दृश्यांकन से आगे चला जाता है। इस दृश्यांकन में रात में सैक्सोफोन की आवाज बारिश को स्तब्ध करती है
    और औंधे मुँह गिरकर कीचड़ में सन जाती है
    गिटार से वायलिन की जुगलबंदी हवा में है
    लेकिन हवा में तैरती उमस
    हर संगीत को विफल कर देती है।

  13. कुमार अंबुज की यह कविता अधूरी कहानी मुझे उनकी ही ताक़तवर कविता क्रूरता का विस्तार प्रतीत होती है और अधूरी कहानी में भी कवि की एक ऐसी करुण आवाज़ सुनाई देती है जो दरअसल तमाम विस्थापितों के कोरस से बनी है। यह कोरस तमाम भौगोलिकताओं की सीमाओं के पार जाकर हमें उस भूगोल में ला खड़ा कर देता है जहां :
    इसमें शीत, धुएँ, धुंध, बादल के कई परदे हैं
    मशक्कत के बाद कभी झीनी-सी धूप झाँकती हैं
    तो इनकी परछाईं भी ठीक से नहीं बनती
    जबकि कल तक इन सबका एक घर था
    आग थी, पानी था, बिस्तर था,
    इंतजार था, एक खुली जगह थी, आसमान था
    फैली हुई बाहें थीं, उगते हुए पौधे थे और तारे
    एक देह थी जिसमें छिप सकते थे
    एक कोना था जहाँ सुबक सकते थे

    इस कविता में वह करुणा है जो अनिवार्य प्रतिरोध की कविता में इस तरह बदलती है कि हम अपने ही निकट, बिलकुल निकट उस उजड़े आदमी की मौजूदगी महसूस कर सकते हैं जो किसी का भी नाम पुकारे जाने पर अपनी नाम पुकारे जाना समझता है :
    अपनी जगह से उजड़े निष्कासित आदमी को
    आप किसी भी नाम से पुकारें, वह चौंककर
    इस तरह देखेगा जैसे वही उसका नाम रहा हो

    अंबुज जी की ये पंक्तियां बहुत मारक हैं कितने धीरज के साथ हमारे समय का विचलित कर देने वाला यथार्थ प्रकट कर देते हैं। और धरती का विलाप कविता कि वह पंक्ति याद करिए यहां जिसमें कहा गया है :
    वह देखता है घर से बाहर कदम रखते ही हर जगह
    हर आदमी शरणार्थी हो जाता है
    और ये शरणार्थी ही हैं जो अधूरी कहानी में हमें यह बताते हैं कि :
    हर चेष्टा, हर चीज का पर्यायवाची मृत्यु है
    किस तरह हर चीज में से झाँकती है मृत्यु।
    और चारों ओर पसरी मृत्यु के बीच यह एक ऐसा मातम है जो कभी खत्म नहीं होता है और रेल की सीटी और धड़-धड़ की आवाज भी, उसी मातम का हिस्सा हो जाती है।
    कहने दीजिए ये कविताएं हमारे समय का ज्यादा प्रामाणिक और ज्यादा संवेदनशील दस्तावेज हैं।

  14. अंबुज जी की ये तीनों कविताएं कोलाज की तरह लगती हैं। जैसे कोलाज में हर टुकड़ा अपनी स्वतंत्र ईकाई में महत्वपूर्ण और अर्थवान है उतना ही एक बड़े संयोजन में और अधिक अर्थवान हो उठता है। इस कविता में भी एक बड़े परिप्रेक्ष्य में हम उस अंतहीन भूदृश्य को देख-समझ सकते हैं जहां यह सब कुछ घटित हो रहा है। इस घटित को अघटित की तमाम आशंकाओं की परछाईयों ने काले बादलों की तरह ढंक रखा है और चारों तरफ सब कुछ नष्ट हो जाने के दृश्य चित्रावली की तरह हैं, जैसे ये पंक्तियां कि :
    आगे चलते हुए वह एक अकेला बच्चा मिलता है
    जो रास्ते में मरी एक चिड़िया को देखकर
    इस तरह रोने बैठ जाता है
    जैसे जिंदगी में पहली ही बार अनाथ हुआ हो
    प्रतीक्षा भरी इस अनिश्चित दुनिया में
    वह भोर के तारे को उगता हुआ देखता है
    और उसे अस्त होते हुए भी
    वह समझ लेता है कि यतीम होते चले जाने के
    इस रास्ते से ही गुजरकर सबको निकलना है

    ये पंक्तियां विचलित करती हैं और हमें एक आशंकाग्रस्त भविष्य से इस तरह नत्थी कर देती हैं जहां पोस्टर का जीवन ही नहीं मनुष्य का जीवन ही खतरे में पड़ गया है हालांकि जब तब कुछ इच्छाएं पकट होकर कहने लगती हैं कि : हम अंतिम हैं, हमें एक पुराना नीला फूल खिलते हुए देखने दो।
    जब कोई हस्तक्षेप नहीं करता तो मुर्दा नहीं, कुमार अंबुज जैसा कवि अपनी पूरी ताकत से हस्तक्षेप करता है और कहता है कि :
    जिन चीजों के लिए हमें
    एक मिनट का भी इंतजार नहीं करना चाहिए
    उनके लिए हम एक साल, दस साल, बीस साल
    न जाने कितने वर्षों तक इंतजार करते चले जाते हैं….

    जाहिर है इस कविता में मैं करुणा और प्रतिरोध को अलग अलग नहीं देख पा रहा क्योंकि इस कविता में करुणा घुलकर प्रतिरोध को ताकत देती है तो प्रतिरोध करुणा का अधिक अर्थवान बना देता है। यह करुणा कातरता में नहीं बदलती बल्कि बदलाव करने का सबब बनती है। इसके पहले भी कुमार अंबुज अपने कविताओं में यह बखूबी बताते रहे हैं कि वे कैसे विचार कविता में घुल जाता है और कविता में बदलता है और कविता कैसे किसी बड़े विचार में कलात्मक ढंग से बदल जाती है।

    इस कविता का एक सिरा हिंदी की पूर्ववर्ती कविता से जुड़ता है तो दूसरा सिरा विश्व कविता से जुड़ता है। यह कविता अपने देशकाल से नाभिनाल बद्ध होकर विश्व कविता के भूगोल की परिक्रमा भी करती है।

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