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कलिकथा: मंज़िल वाया बाइपास: यतीश कुमार

यतीश कुमार ने काव्यात्मक समीक्षा की अपनी विशेष शैली विकसित की और इस शैली में वे अनेक पुस्तकों की समीक्षाएँ लिख चुके हैं। इसी कड़ी में आज पढ़िए अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलि कथा वाया बाइपास’(राजकमल प्रकाशन) की समीक्षा। 1990 के दशक के आख़िरी सालों में जिस उपन्यास ने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा था वह कलिकथा था। कई प्रमुख यूरोपीय भाषाओं में अनूदित और समादृत इस उपन्यास को आज की पीढ़ी से जोड़ने का काम करती है यह समीक्षा। आप भी पढ़ें-
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कलि कथा वाया बाइपास -अलका सरावगी
 
1)
 
कहानियाँ तहों में लिपटी होती हैं
एक सिरा दूसरे को
दारोमदार सौंपता जाता है
यूँ कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं
 
आदमी भी तहदार होता है
समय का हाथ रह-रह कर उधेड़ता
कपड़े का थान रंग बदलता रहता
बदलते रंग की कहानी ही जीवन है
 
इतिहास को धो पोछकर
साफ कर देने का रिवाज़ बहुत पुराना है
इतिहास खुद अपना प्रतिबिम्ब
आज खरोंचा हुआ देख रहा है
 
लहरें जहाँ तक जाती हैं
झाग की लकीर खींचती चली जाती हैं
 
समय की लहरों से खींची लकीरें
माथे पर दिखती हैं
जहाँ कहानियों का ज़ख़ीरा है
 
और जीवन पुनरूक्ति है
एक सपनीली पुनरूक्ति
 
2.
सामाजिक बेहोशी में
हिटलरशाही का कवच पहने
जीवन काट लिया गया
और सब बीतता चला गया
 
सत्तरवें साल में जाकर होश आया
कि लोग पहचानते ही नहीं
इन दिनों खुद की ही ख़ोज में
बेआवाज़ टहल रहा हूँ
 
जब कभी होश आता है
स्मृतियों के खेत लहलहाने लगते हैं
दरसअल बीता हुआ एक भी लम्हा मरता नहीं
बीते समय की मधुमक्खियां शहद छुपाए घूमती हैं
 
3.
तरलता को आने से पहले ही सोख लेना
उस आँख का हुनर है
जिसमें स्वाभिमान का लोबान जलता है
 
दूसरों की धारणाओं में बह जाने से बेहतर है
अपनी टूटी फूटी नाव मजबूती से खेना
प्रारब्ध से अवांतर जरूरी है
यहाँ से फिसलने के बाद
तो बस ढलान ही ढलान
और मिट्टी आखिरी मंजिल
 
यह जानने वाले ज्यादा लंबी यात्राएँ नहीं करते
 
4.
हवेली के सपनों में
ऐसी गरम हवा चलती है
कि उसन कर रख दे
 
हवेली के गुम्बद पर चढ़ते वक़्त
पैर फिसल जाए
तो वह सड़क का भी नहीं रहता
 
गिरकर लोग मरते हैं
हवेली की स्मृतियाँ नहीं मरती
 
हवेली चढ़ना एक लत है
जहाँ से गिरने के बाद भी लत
रक्त बीज को सौंप दी जाती है
 
समय के हाथ लोग चले जाते हैं
आदतें साथ रहती है
यह एक पुश्तैनी श्रृंखला है
 
5.
खपरैल से हवेली के बीच
शहर से शहर के बीच
आकाश अपनी शक्ल बदल लेता है
 
मिट्टी की तासीर
हवा की महक
शहर का अहसास बदल देती है
 
शहर कोई भी हो
रूक कर छू लो तो अपना ही लेता है
निर्वासन में आसन लग जाये
तो वास में बदल जाता है
 
बिना कमाए घर लौटना
निर्वसन वापसी है
वे गंगा को अपना लेते हैं
पर खाली हाथ नहीं लौटते
 
इस बात से अनभिज्ञ
कि शाश्वत सच यही है
“खाली हाथ आना
और खाली हाथ ही जाना “
 
 
6.
 
पिता कहीं नहीं जाते
अपनी छोटी छोटी आदतों में जिंदा रहते हैं
 
आदतें जिंदा हों
और ज़िद वही पुरानी
तो दुर्भाग्य भी सौभाग्य की शक्ल
इख्तियार कर लेता है
 
विपरीत समय के फेरे में
शब्द अर्थ के साथ हेरा फेरी करते है
अभाव भाव को महसूसता है
नफ़रत प्रेम की तफ़सील लेता है
 
ये शब्दों का जादू ही है
जो मुलम्मा बन धीरे धीरे
मुस्कान उगाती रहती है
 
मुलम्मा और मुस्कान
ज़ख्म की आदत हैं
और इस तरह
जीवन में हरापन जिंदा है
 
7.
अजीब शहर है
जहाँ बरसात के पानी का भी
फाटका चलता है
बादलों पर भी बाज़ी लगती है
 
तारीख़ के मसले के साथ
यहाँ सदी भी कौम के हिसाब से है
तारीख़ी गलतियाँ धर्म पर हमेशा भारी पड़ती हैं
 
संस्कार की जड़ें
आदम के भीतर से होते हुए
पीढ़ियों के पिछवाड़े तक जाती हैं
मुक्ति का मार्ग इतना आसान कहाँ
 
उस समय यह एक अलग शहर था
जहाँ औरतों की सड़कें छतें होती थीं
अब छतों को भी पाट दिया गया है
और सड़कें भी दरवाजे के साथ बंद है
 
कसबिनें जादूगरनी होती हैं
बंगाल की और ज्यादा
कोलकाता की उससे भी ज्यादा
उनकी लटों से निकल भागना आसान नहीं
 
यूरेशियन कभी इस शहर का सच रहा होगा
16 हज़ार कहानियों का शहर
प्रबुद्ध लोगों की नगरी
जहाँ राजनीतिक चेतना का दिया हर घर में जलता है
 
चेतना और आशंका का गठजोड़ है
ये लेयर्स में रहती हैं
 
हर समय आशंका में जीने वालों के शहर से
ओलनाल काटना कहाँ आसान
 
8.
शत्रु का चेहरा देखते-देखते
अचानक अपना चेहरा दिख जाए
तो धुआँ कमरे के भीतर घुस आता है
सपने धुंधलके हो जाते हैं
 
जीवन में छूट गए लम्हे
कांटे -से टसकते हैं
हौल उठता तो आंगी तक भीग जाती है
 
सत्य इतना करीब होता है
कि नज़र नहीं आता
और आँखे डबडबा जाती हैं
 
जो कभी पुरानी चीजों को
नए में बदलने का हुनर रखता रहा
वही अब स्मृतियों के बक्से में
कैद हो जाना चाहता है
 
दिखावे के रास्ते पर मतिभ्रम भी
वाट जोहते रहते हैं
अभिमान चश्मे में फिट बैठता है
अब ज़ख्म नहीं दुनिया हरी दिखती है
 
आदमी अपने अंत के पहले
ज्योतिषी बन जाता है
सबके भविष्य में झांकने लगता है
सबकी चिंता उसके अंत को खिसकाने लगती है
 
9.
 
नदी को याद करता हूँ
हर- हर गंगे को आवाज़ देता हूँ
गंगा लोटे में सिमट आती है
आखिर है तो माँ ही
 
सबसे बड़ी शिक्षिका और सेविका ‘माँ ‘
जिसकी रंगीन ओढ़नी
खूंटी पर अचानक एक दिन टंगी रह गई
फिर कभी उसके काम नहीं आई
 
माँ की दुनिया ऐसी फैली है
कि पिता स्मृतियों के जाले में कैद
दूर धूल धूसरित नज़र आते हैं
 
माँ की स्मृतियों में टटका कच्चे दूध की महक
आज भी मेरे होंठ पर फैल आती है।
स्मृतियां लहलहा उठती है
पिता उस लहलहाहट में गुम हो जाते हैं
 
बडे भाई चादर की तरह होते है
तुम्हें ढके-ओढ़े रखते हैं
वो आसमान और सड़क
एक साथ बनना चाहते हैं
 
झीनी चदरिया बनने से पहले
समय के उस अंतिम क्षण में
माँ का हाथ छोटे के हाथ में रखते हैं
वो सच में पिता वाली छत से कम नहीं होते
 
हम कालातीत जीवन की खोज में लगे रहते हैं
अगर ठीक से पहचान लो तो
तो मृत्यु भी तुम्हें पहचान लेती है
 
 
10.
 
हार और जीत सिक्के के हेड और टेल की तरह
अपने मायने बदलते हैं
फिर उनका कोई मतलब नहीं होता
सिक्का उछलता है
और दोनों के अर्थ एक हो जाते हैं
 
कोई दुनिया छोड़ कर जाते हुए कहती है -मैं जीत गई
और कोई इस फानी दुनिया में रहकर कहता है-मैं हार गया
 
चोट जितनी पुरानी हो उतनी ही टसकती है
तिक्तता से शहद बनाने के सपनों में डूबा
वह देर तक जागा हुआ
एक परेशान आदमी है
 
दिन के सवाल
रात के डर की असलियत है
अंतर्द्वंद सपनों में उनींदी लेते हैं
हार जीत का मतलब फिर बदलने लगता है
 
सपने दरअसल सिर्फ स्वप्न है
उठते ही खत्म हो जाते हैं
 
 
11.
 
दिशाहारा नहीं था वह
सिर की चोट थी
पर वो अभ्यंतर में टहलता
और आभ्यन्तर की बातें करता
 
उसके यथार्थ में हीरो बदलते रहे
सुभाष ,गांधी,नेहरू और फिर हिटलर
एक दिन अचानक उसे इन सब के चेहरों पर
सफेद बीट का तिलक पसरता दिखा
 
दरअसल सार्वजनिक अपमान
मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता
 
12.
 
एक खुली हुई हँसी
सालों के कसाव को पी सकती है
पुराने दोस्त
भटका हुआ भाई
पुरानी प्रेमिका
मिलते ही बस एक हँसी पाट देती है सारी दरारें
 
हँसी दरअसल हवा नहीं हैं
पर उतनी ही जरूरी है
और हंसी का चूकना
कम खतरनाक नहीं
 
मदद के साथ साधन की शुद्धता भी जरूरी है
वृक्षों के साये अदृश्य होने से पहले
बहुत लंबे होते जाते हैं
 
 
13.
 
हर शख्स के भीतर शून्यता
अपने दायरे के साथ उपस्थित है
इसका घटना और बढ़ना
एक साधारण आदमी की कथा है
 
हम किसी एक को खोते हैं
पर उस खोने का नाम अनेक होता है
 
एक मुर्दे को निकलते देखो
तो गौर से देखो
यह अर्थी तुम्हारी-हमारी भी है
एक दिन देखने के लिए दूर खड़े ना बचोगे
हरेक अर्थी के साथ थोड़ा सा मैं भी मर जाता हूँ
मरना कुछ इस तरह है
जैसे किसी ने बस म्यूट कर दिया हो
 
मुक्ति भी टुकड़ों में मिलती है
डर और लज्जा से मुक्ति मिल जाये तो
लोग पागल करार देते हैं
जान गया कि जीवन में अपवाद तिक्तता है
 
 
14.
 
इस देश की समस्या भी अजीब है-न त्यागना
हर घर में कबाड़,हर शहर में कबाड़
 
सत्य भीतर है
और हम उन्हें रूप में खोज रहे
सदियों ने रूप को स्वीकारा
और खोजते रहे कि सत्य न जाने किस रूप में मिल जाये
 
और यूँ अनगढ़े ईश्वर स्मृतियों से निकल
धर्म के कबाड़ में दाखिल होते रहे
 
लौकी के खोल को सुखाकर एकतारा बनता है
उसे पता है उसे भी इसी गति से गुजरना है
 
एकतारा और दो तारा
बाउल और दरवेश
दोनों को एकराग हो जाना है
 
पलकों की तरह अस्थिर विप्लवी मन को
सिर्फ और सिर्फ शांति चाहिए
 
15.
 
स्थिर जल में जलकुंभी जड़ और लताएं होती हैं
उनमें मछलियाँ नहीं फंसती
मनुष्य फंसते हैं
 
इसलिए अब वह
अनवरत अविच्छिन्न प्रवाह की तलाश में है
 
उसे तालिकाओं के चौखानों में
कैद दिख रहा है
छटपटाता नया भारत
 
टायर से दब गए कुत्तों की संख्या
उस शहर के विकास की गति दर्शा रही है
 
भूख जब अंतड़ियों को खाने लगती है
तब जिस्म का ख्याल नहीं रहता
चेहरा रोता है बिना आँसू के
 
सब अब बाज़ार है
इससे ज्यादा कुछ नहीं
 
रोज़ रोज़ दुख देखो तो
दुख का स्वहनन होने लगता है
 
तल छू लेने के बाद
दुःख भी तैलीय लगता है
 
संख्याएं समस्याओं को निगलती नहीं छुपा लेती हैं
फिर दुःख या सुख
कम या ज्यादा नहीं
संख्याएं कम या ज्यादा होती रहतीं हैं
 
 
16.
 
इतनी सारी भाषा
भाषा में बंटे मुहल्ले
खानपान ,कपड़े ,रहन सहन
एकता हो या भाईचारा
सब एक रंगे के इंतजार में है
रंगरेज़ के इंतज़ार में है तकसीम देश
 
धरती पर कोहराम, भुखमरी, मुसीबतों की बाढ़ है
पर आसमान निर्लिप्त है
इंद्रधनुष का दायरा बढ़ाते हुए
 
उत्थान पतन और फिर पुनरुत्थान
सृष्टि चक्र की गति नहीं बदलती
 
झुटपुटी चेतना की ख़ोज में
सत्य के पुंज
झुरमुट से झाँकते रहते हैं
जहाँ उजास वृत बन रहा है
वहाँ कितना साफ-साफ दीख रहा है
कि धर्म हिटलर से बड़ी शक्ति है
वहाँ भी परचम में
स्वस्तिक ही लहराता है
 
सभी धर्मों से गुजरते हुए
महसूसता हूँ
ग्रंथो का सार गीता में समाहित है
और अब उसी को पढ़ता हूँ
 
दरसअल गीता धर्मग्रंथों का बाइपास है
 
जिंदगी को देखने की नज़र अता करती है बाइपास
जब सारे रास्ते जाम हो जाते हैं
तब बायपास ही एक मात्र समाधान है
” मंजिल वाया बाइपास “
=================
यतीश कुमार          

 

 

 

 

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8 comments

  1. तरलता को आने से पहले ही सोख लेना
    उस आँख का हुनर है
    जिसमें स्वाभिमान का लोबान जलता है…..

    वाह ! कैसी अनछुई कल्पना है। बहुत सुमंदर

  2. यतीश जी की लिखी समीक्षा को पढ़ना,अपने आप मे एक अनुभव है,।नदी की धार की तरह समानांतर चलती है दो रेखाएँ। एक जिसकी समीक्षा की जा रही होती है और एक रेखा खुद उनकी लिखी ,जो एक अलग ही दुनियाँ में बहा ले जाती है। अगर किसी ने पुस्तक पढ़ी है तो, सब सजीव हो एक अलग रंग में आँखों के सामने आ जाता है और अगर नहीं पढ़ी तो पढ़ने की ललक बलवती हो जाती है। यह पुस्तक मैंने नहीं पढ़ी है, और पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही । बहुत बहुत बधाई यतीश को और नमन लेखनी को।

  3. यतीश जी की लिखी समीक्षा को पढ़ना,अपने आप मे एक सुखद अनुभव है। मैं इनकी कविताओं की भी पाठक हूँ।
    इनकी समीक्षा के रंग इनको दूसरे समीक्षकों से अलग करते हैं।
    इनकी लिखी समीक्षा को पढ़ते समय ,अगर पुस्तक न पढ़ी गयी हो तो उसे पढ़ने की लालसा बलवती हो जाती है, और इनकी लेखनी का प्रभाव लोबान की खुशबू की तरह ही अंतस को सुगंधित करता है। मैंने यह पुस्तक नहीं पढ़ी है,पर इतने सुंदर समीक्षा के बाद इसे पढ़ने का लोभ संवरण कर पाना अब मुश्किल है। हार्दिक बधाई यतीश जी को , नमन उनकी लेखनी को,और दुआ यह कि कलम यूँ ही चलती रहे…. बिना बायपास के….लंबे रास्ते

  4. Avinash Srivastava

    बधाई यतीष, आप फिर से पिता बन गए ! १६ समृद्ध समीक्षात्मक कविताओं के जनक, आपको बधाई और शुभकामना की ये यात्रा ऐसे ही जारी रहे और मंज़िल मिलती रहे। समीक्षा तो सुन्दर है ही पर जो विशेष रूप से याद रह गया उसे यहाँ लिख रहा हूँ-

    हँसी दरअसल हवा नहीं हैं
    पर उतनी ही जरूरी है
    और हंसी का चूकना
    कम खतरनाक नहीं
    —————————
    हम किसी एक को खोते हैं
    पर उस खोने का नाम अनेक होता है
    —————————–
    सत्य भीतर है
    और हम उन्हें रूप में खोज रहे
    सदियों ने रूप को स्वीकारा
    और खोजते रहे कि सत्य न जाने किस रूप में मिल जाये
    —————————-
    टायर से दब गए कुत्तों की संख्या
    उस शहर के विकास की गति दर्शा रही है
    —————–
    रोज़ रोज़ दुख देखो तो
    दुख का स्वहनन होने लगता है (ग़ालिब याद आये- मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी की आसां हो गयीं)
    ———————–

    पुनः धन्यवाद ! अच्छा लिखा हुआ पढ़ना अच्छा लगता है !!

  5. अद्भुत समीक्षा , यतीश जी ने एक अद्भुत शैली विकसित की है कविताओं के जरिए पुस्तक समीक्षा की इन कविताओं को पढ़ते वक्त कोलकाता शहर.और इतिहास के पन्ने को समेटते हुए उपन्यास की आत्मा तक पहूँचा जा सकता है 👌👌

  6. Amitabh Ranjan Kanu

    Loved all the poems. Very near to life. Some lines kept my breath in abeyance, I should say. Great, dear…

  7. प्रीति कर्ण

    इस नवीन काव्य विधा में समीक्षा पढ़ने का अवसर पहली बार प्राप्त हुआ। अनुभूति वास्तव में रोचक है। कविताओं का पोषण करती समीक्षाएं अक्सर गद्यांश ही देखे गये किंतु उपन्यास की काव्यात्मक समीक्षा निश्चय ही सराहनीय। इन कविताओं की अंतर्यात्रा अपने आप में एक बेहतरीन अनुभव है।
    अपने संग बहा ले जाती धार उन्हीं के शब्दों में ” समय की लहरों से माथे पर खींची लकीरें दिखा देती हैं” ।

    यतीश जी इन कविताओं का बोध जीवन से गुजरते आस पास के रास्ते पगडंडियों और स्थिर जल में जलकुंभी से भरी नदी के पास भी बिठा देती है।
    जीवन के अनुभूत सत्य की सरल कथा है यह समीक्षा जिसे पुस्तक के संदर्भ में मानना भी अनिवार्य है।
    मैं की बार पढ चुकी हूँ… मन कहीं ठहर सा गया है इन पंक्तियों में। विवशता आंखों में उतर आयी है गहरी पैठ लिए।
    “बिना कमाए घर लौटना निर्वसन वापसी है।
    वो गंगा को अपना लेते हैं पर खाली हाथ नहीं लौटते।” ”
    एक भाव से दूसरे भाव में जाने के बाद भी स्थिति वैसी ही हो जाती है क्योंकि सारी कविता मन बस गयी। इनमें कोलकाता शहर की मिली जुली और खालिस गंध है जो जानी पहचानी लगती है। किताब के प्रति जिज्ञासा उपजना स्वाभाविक सी बात है। अशेष आभार आपका इस बायपास से मन की बंद राहें खोलने के लिए।
    आपको पढ़ना सदैव ही सुखद।

  8. हमेशा की तरह समृद्ध और जीवंत काव्यात्मक समीक्षा !

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