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नाटक कथा की प्रस्तुति प्रक्रिया: उथल पुथल की सृजनात्मकता

प्रवीण कुमार गुँजन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र रहे हैं।अब बेगूसराय में थिएटर करते हैं। नाटक की तैयारी, प्रस्तुति को लेकर उन्होंने बड़ा रोचक लेख लिखा है-जानकी पुल

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चन्दन, कब नया नाटक होगा? अभिनेता खोजो, वह भी नया हो तो ज़्यादा अच्छा। कुछ पुराने लोग होंगे पर बहुमत में नए लोग होंगे। सबकुछ नया – स्क्रिप्ट भी नया। कोई आइडिया नहीं, कोई स्क्रिप्ट नहीं, हमें जैसे भी हो एक नया नाटक करना है – बस।

धड़कन तेज़ — बेचैनी क़ायम — डर के आगे जीत — ज़ीरो अर्थात शून्य से आरंभ करना है, कुछ धमाका नहीं होगा अब — कौन होगा एक्टर — अभिनेत्री तो है ही नहीं — विपुल ने एक लड़की के बारे में बोला था, पटना में रह कर पढ़ती है, पर नाटक कभी खेला नहीं है। तो क्या हुआ, सब नया का ही तो प्रण लिया है। वो तो है पर नए सब क्या मुझे झेल पाएंगे? फिर संदेह की शुरूआत!

एक बार फिर, फिर वही शुरुआत!

नाटक की प्रक्रिया शुरू करो – सब होगा – ये पहला नाटक तो है नहीं या ना ही आख़िरी – कब तक बैठोगे? आओ, सब मिलके कुछ गुनगुनाते हैं, कुछ हवा में हाथ पांव मारते हैं, समुंद्र में तैरते हैं, ये जानते हुए कि तैरना नहीं आता है हम सबको।

तो शुरू हो गया हमारा नाटक का खेल, मतलब – रचना-प्रक्रिया। अभिनेता आ गए हैं, ‌कुछ अभिनेता बाद में आते गए। सब लोग जमा हो चुके हैं। देखकर डर लग रहा है। हाथ में कुछ नहीं।

रिहर्सल की शुरूआत, पहला दिन बातचीत और कुछ काम। तब तक ना हाथ में स्क्रिप्ट, ना कहानी। किधर जाना है, क्या करना है, कुछ पता नहीं। अचानक एक आवाज़ आती है “क” की। “क” इस एक शब्द के हज़ारों मतलब सभी लोगों के दिमाग में आते चले गए।

चलो जाओ आज चिकन ले आओ, सब मिल बनाते खाते हैं। चिकन का बनना और फिर खाना आरम्भ। हमारे समुह में लोगों को पता है कि गुंजन व नाटक के साथ चिकन का सम्बंध व्यापक है। “चिकन बनाना, नाटक बनाना, नमक स्वदानुसार” यह मेरा तकिया कलाम रहा है।

ज़्यादा समय लड़ना, प्रेम करना, नाचना गाना, यहीं से तो जन्म लेगा “क” की “था” तक यात्रा और साथ में तुमलोग के अंदर अभिनेता बनने की कहानी का भी आरम्भ होगा।

किसी का मन्तव्य था कि सृष्टि के आरंभ में केवल जल की ही सत्ता थी। तो क्या संसार का मूल जल है? तब तो जल बिना इंसान रह नहीं सकता! और इसके अलावा क्या हो सकता है जिसके बिना इंसान रह नहीं सकता या सृष्टि हो नहीं सकती? वह तो प्रेम ही है। जल व प्रेम – आवश्यक है जीवन के लिए। सृष्टि इसके आस-पास घूम जाती है।

सुधांशु फिरदौस जी के साथ अंदरखाने बात होती रही कि जल व प्रेम पर नाटक लिखना है और उसे करना है। आप सोचें, हम भी अभिनेता समुह के साथ कुछ रचके लाते है और ये वादा हुआ कि लेखक व निर्देशक मिलके समुह के साथ कुछ बनाते हैं।

अब नाटककार भी नया!

रिहर्सल स्पेस में अभिनेता रोज़ कुछ रचने व बनाने की प्रक्रिया में टूटते व बिखरते  हैं और कुछ चीज़े रह जाती, उसी को लेकर आगे बढ़ते।

तुम लोग आसपास से जुड़ते क्यों नहीं?  तुमलोगों को कब समझ आएगा कि अभिनेता के पास एक दिमाग होता है और उसे रोज़ ब रोज़ समृद्ध करना होता है। कोई बात नहीं “ज़रा धीरे – धीरे गाड़ी हाँको मेरे राम गाड़ी वाले—“

बिस्तर पर लेटे हुए कुछ सोच रहा था – “हँसी ख़ुशी को आकर्षित करती है, नकारात्मकता को नष्ट करके  चमत्कारिक इलाज की ओर ले जाती है। अपने मनचाहे काम कैसे कर सकते है और आप अपनी  मनचाही चीज़ कैसे पा सकते हैं? अंततः तनाव प्रकट हो ही जाता है। तनाव परिणाम है, कारण नकारात्मक चिंतन है और यह सब एक छोटे से नकारात्मक विचार से शुरू हुआ था। आपने जो तनाव प्राप्त किया हो आप उसे बदल सकते है, एक छोटे सकारात्मक विचार से और फिर उसके बाद एक और सकारात्मक विचार से। पर रंग-सृजन का तनाव तो हमेशा सकारात्मक और जादुई रहा है। कल्पना ही सब कुछ है। यह जीवन के आगामी आकर्षणों का पूर्वदर्शन है।”

प्रक्रिया की शुरूआत, रोना धोना तो आम बात पर प्रेम महत्वपूर्ण, जंग में सब जायज है। अभिनेता करना ही नहीं चाहते या कुछ समझ ही नहीं पा रहे या हम समझा नहीं पा रहे है। आज रिहर्सल में खूब गरमा गर्मी हुई है, ज़्यादा अभिनेता दुखी थे। ज़रुर कुछ अच्छा होने का संकेत है, दुख के आगे ही तो सुख है, अरे! देखो अभिनेता इमोशनल साउंड कर रहा है – मतलब बन रहे है, यही तो है नये अभिनेताओ का संघर्ष व बनने की प्रकिया। आंखों में चमक – कुछ तो होगा लगे रहो गुँजन। वैभव कमजोर है अभी बालक है, उसे जवान होना होगा। “सुनो अस्मिता चिपको — ओपन करो अपने आप को — कुश्ती लड़ो वैभव साथ।”

एक साथ दो निशाना यही तो है निर्देशक की नज़र। आपलोग को रंगमंचीय अनुभव के लिए इस दो महीने के प्रोसेस को दो साल के अनुभव में तब्दील करना है।

                                         समय अपनी गति से चलता जा रहा अब तक कई दिन बीत चुके हैं – चलो यार, अब तुम लोग के साथ भी नाटक खेलते है —-

अगले दिन रिहर्सल स्पेस का माहौल पूरा शांत – स्पीकर पर मध्यम मध्यम सुगम संगीत चल रहा है। निर्देशक महोदय मुस्कुराते लहज़े में कहते हैं – “आज हम लोग पूरी रात गंगा किनारे शमशान और रेलवे स्टेशन का भ्रमण करेंगे।”

अभिनेता को पहली बार में यह सुनकर ऐसा लगा कि यह एक तरह का मज़ाक़ है। नाटक को बनाने के लिए लगातार रिहर्सल की आवश्यकता होती है, कहानी की आवश्यकता होती है, शमशान और रेलवे स्टेशन का भ्रमण करके क्या मिलने वाला है!

एक अभिनेता का कथन “आप प्रवीण गुंजन के साथ काम करते हैं, तो आप रेलवे स्टेशन या शमशान नहीं इस दुनिया में स्थित किसी भी जगह पर जा सकते हैं, जिसकी शायद कभी कल्पना भी ना की हो और ना ही करना चाहेंगे।”

रात के 11:00 बजे सभी लोग बेगूसराय रेलवे स्टेशन पर, स्टेशन घूमते – घूमते स्टेशन के अंतिम छोर पर जाना।

रेलवे स्टेशन — रेलवे की पटरियां — रेल की पटरियों पर लेट जाओ — इस बीच पुलिस द्वारा जांच पड़ताल भी करना कि हम लोग इतनी रात को यह क्या कर रहे हैं। चलो गंगा किनारे चलते है — गहरी रात — बेगूसराय का दूरगामी इलाका — सन्नाटा — रात के 1:00 बजे ई रिक्शा में सारे लोग सवार होते हैं और वहां से शुरू होती है गंगा किनारे की शमशान यात्रा – रास्तों के उतार-चढ़ाव से गुज़रते हुए हम लोग घाट पहुंच जाते हैं।  जाने और आने के क्रम में लगातार कहानियों पर चर्चा होती है। यह सामान्य सी बात है कि हम जब जिस माहौल में होते हैं तब उस माहौल के हिसाब से कहानियों का पिटारा खोलते हैं। हमारे ग्रुप में आई नई लड़की अस्मिता जिसके द्वारा सुनाई गई उसके गांव की कहानी हम सभी को सोचने पर मजबूर कर देती है।

अंत में गंगा के किनारे — “हे गंगा मैया, एक नाटक बना दो” — शायद यह सोच-सोचकर हैरान होंगे आप, “आखिर यह रहस्य है क्या? ” मैं आपको बताता हूँ कि मेरे हिसाब से इसका क्या मतलब है, अंधविश्वास के लिए नहीं बल्कि विश्वास के लिए। अगर आप अपने दिमाग में सोच लें कि आप क्या चाहते हैं और उसे अपना प्रबल विचार बना ले, तो वह चीज़ आपके जीवन में प्रकट हो जाएगी।

अगले दिन से कहानी की प्रक्रिया शुरू होती है। वहां से एक आस जगती है कि अब नाटक बहुत जल्द बन जाएगा। सुधांशु फिरदौस साहब, हमारे नाटक के लेखक के लगातार कई रातें बिन सोये गुज़ारने के बाद, आख़िर वह दिन आ ही गया जब सबके हाथ में पूरी नाटक की स्क्रिप्ट थी।

“क” की महिमा समुह को समझ में नहीं आ रहा था। पर समूह को विश्वास था कि इसका सही मतलब सिर्फ और सिर्फ एक ही के दिमाग में है, जिन्हें अब तक समझ पाना मुश्किल ही है।

दिनभर बैठकर अलग-अलग तरह के गाने सुनना व गाना और छोटे-मोटे क्रिया- कलाप में चार-पांच दिन और निकल गए। दरअसल वह छोटे-छोटे क्रियाकलाप कलाकारों का असली परिचय था, जिसे सामने कुर्सी पर बैठा एक इंसान बड़े ध्यान से अपने जेहन में उतार रहा था, सिगरेट के हल्के-हल्के कश के साथ।

चंदन वत्स कल साइकिल की 4 रीम ख़रीद लाना – मैं खुद मन ही मन मुस्कुरा रहा था कि भला नाटक में साइकिल के रीम का क्या काम? शायद बाक़ी कलाकार भी कुछ ऐसा ही सोचते हों।

कभी आंखों पर पट्टी बांधकर नाचना। तो कभी रीम के साथ अलग अलग तरह के खेल करना। तो कभी अचानक ही सभी कलाकारों का दो गुट हो जाना और कबड्डी का खेल प्रारंभ कर देना। जो आगे चल कर नाटक कि प्रस्तुति मे कुश्ति दंगल का रुप लेता है। अनायास ही उत्पन्न होने वाले क्रियाकलाप जिनसे हम लगातार रंगमंच की कई छोटी-छोटी चीज़ें सीख रहे थे। कभी जीवन की बड़ी-बड़ी मौलिक सीख और आप ना चाहते हुए भी सोचना प्रारंभ कर देते हैं। खाते हुए सोचना, चलते हुए सोचना, नींद में सोचना आख़िर इसे ही तो रचनात्मक व सृजनात्मक सुख कहते हैं।

रचनात्मक चुनौती ही सृजनात्मक व्यक्ति का परम आनंद है और अब आरंभ होती है असली चुनौती। ज़्यादातर अभिनेता नए हैं – पर एक लंबे कठिन प्रोसेस से गुजर चुके है — नाटक की स्क्रिप्ट तैयार है — चरित्र अब दिखने लगे हैं कुछ कुछ —- गीतों पर काम चल पड़ा है। कुल मिलाकर एक देसज संगीतमय काव्यत्मक प्रस्तुति का आभास होने लगा। प्रेम कहानी फूट रही है — अकाल पड़ा है — दंगल की तैयारी है — कथा का बहाव अपने भीतर कई उपकथाओं को समेटे हुए है और अब पूरा दवाब महसूस होने लगा है। मादा तितली को भी प्रेम की परीक्षा देनी है।

अभिनय की अहमियत इस कदर समझ सकते हैं कि कहानियां भी किरदारों की मोहताज होती हैं। अभिनय तो प्याला है नशा का, थोड़ा प्रेम से दर्शकों को पिलाओ।

चाँद की रोशनी बाहर फैली है, रात्री गहन होती जा रही है, गुड़िया (अस्मिता) का चाँद के साथ संवाद – चन्दन कश्यप साइकिल का रीम लिए चाँद बना है। उसकी आँखों में नींद साफ झलक रही है और अस्मिता आधी नींद वाले चाँद से संघर्ष कर रही है – अरे! बाहर चाँद रोमांस की छटा बिखेर रहा है और अंदर मेरा चाँद मतलब रीम वाला चाँद मेरी अभिनेत्री को डरा रहा है! कोई बात नहीं डर के आगे जीत है – अस्मिता बस लगी रहो/ पर हो बहुत अंदर से शैतान। गजब का अभिनय सीख रही हो। बहुत खूब निभा रही हो प्रेम में अजनबी होने की अदा। लोचन से प्रेम है, वह भी असीम। अजनबी नहीं अपना है, तेरे बहुत करीब है जितना तुम भी न हो। समझा करो यार। हर एक्शन आपके अंदर से निकलता है और वह भी सच्चा, तब दर्शकों होते है आपके साथ।

हमारा मानना था, विशेष कर के इस नाटक में कि एक अभिनेता को एक चरित्र को इस तरह से प्रस्तुत करना चाहिए जो चरित्र और चरित्रहीनता नहीं, बल्कि चरित्र के कार्यों का वर्णन प्रतीत हो। ऐसा इसलिए क्योंकि हम अपने दर्शकों को लगातार याद दिलाना चाहते थे कि वे एक नाटक देख रहे थे। विशेष कर कथिक (कथा कहने वाला) के चरित्र में। चन्दन वत्स, अंकित शर्मा व अमरेश अमन आपके लिए, आप कथा कह रहे है समझ रहे हो? आप नाटक के सूत्र को तोड़ भी रहे हो और जोड़ भी।

अभिनय जिसमें एक अभिनेता चरित्र की भूमिका को पूरी तरह से निभाते हुए ईमानदारी से और भावनात्मक रूप से प्रदर्शन को प्रोत्साहित करना चाहता है। अभिनय तकनीक जिसमें अभ्यास अभिनेताओं के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण है। जिसमें एकाग्रता, आवाज़, शारीरिक कौशल, भावना स्मृति, अवलोकन और नाटकीय विश्लेषण शामिल हैं। यह महसूस करते हुए कि हर नाटक के लिए एक ही दृष्टिकोण काम नहीं कर सकता है, आपको नाटक के कथ्य व जो शैली बना रहे है आप, उस दृष्टिकोण से दर्शकों पर पकड़ व उनकी रुचि का ख़याल रखते हुए परिवर्तित होते रहना है।

बंद करो, तुम क्या कर रहे हो रहमान (मलंग की भुमिका करने वाला अभिनेता) अभिनय करना है और अभिनय नहीं भी करना है। समझने की कोशिश ही नहीं करते हो, शब्दों के अर्थ तब ग्रहण करोगे जब उस शब्द का बिम्ब बनाओगे – शब्दों की उल्टी नहीं करना है। गुलाब की पंखुड़ियों की तरह शब्दों के साथ व्यहवहार करो।

“मैं रहमान तू मीरा।”

शब्द के अर्थ को तलाशो, मीरा व रहमान का प्रेम वैसे ही है जैसे पवित्रता। बड़ा बिम्ब है। बहुत गहरा अर्थ है इसके अंदर छिपा, ऐसे बोलो अंदर से, कुछ समझ कर बोलो जैसे महाकाव्य के सूत्र खोल रहे हो।

हद करते हो, अपना सिर दे मारो दिवार पे कमलेश ( नायिका के भाई की भुमिका) अपनी एंट्री तो सही समय पर लो। तेरी एंट्री के पहले गाना चल रहा था – वह भी क्लाइमेक्स और तुम तुरन्त उसके बाद इतनी ठंडी एंट्री लोगे और संवाद इस स्केल पर? नाटक जैसे जैसे आगे बढ़ता है हर अभिनेता की ज़िम्मेवरी बढ़ती जाती है। समझो न … (गाली)

चल रहा तनाव से उपजा सृजन

यात्रा दर चाय

गर्म चाय की चुस्कियो के संग

यात्रा दर समोसा

कभी समोसे व भुंजा के संग

यात्रा दर संगीत

गीत व संगीत के संग

यात्रा दर चीख़

शोर व चीत्कार एक साथ

यात्रा दर यात्रा

दुल्हिन तोहे पिया घर जाना

यात्रा जारी है —

आज नाटक बन्द या कुछ होने वाला है। निर्देशक कुछ समझ नहीं पा रहा –  गजब की चुप्पी — ख़तरनाक रंग में आ चुका तनाव आज चरम पर है, जो पुराने लोग थे नये लोग को समझा चुके है आज अनुशासन में रहना। क्योकि निर्देशक इतना चल रहा है, मतलब घूम रहा है, कुछ बोल नहीं रहा। तभी एकाएक बोल फूट पड़े – आपलोग शुरू से गाने की प्रैक्टिस शुरू करो। ढोल व हारमोनियम वाद्ययंत्र के साथ आरम्भ “एक बार जो रघुवर की नज़रों का इशारा हो जाये, इशारा हो जाये” सांस रोक देने वाला महौल / गर्म का आभास / आग की आंच तेज़ / सबकुछ पकने वाला है / चिकन आ चुका है रात्रि के 9 बज रहे है।

निर्देशक के लिए अभिनेता की इच्छा ही आदेश है और सच में आप अभिनेताओं की इच्छा ही मेरे लिए कर्म भी है। अच्छा महसूस करते वक्त नकारात्मक विचार सोचना असम्भव है। अगर आप अच्छा महसूस कर रहे है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि आप अच्छे विचार सोच रहे है। देखिए, आप जीवन में जो चाहे पा सकते है, इसकी कोई सीमा नहीं है, सिर्फ एक पेंच है : आपको अच्छा महसूस करना होगा, तनाव के पल को अद्भुत मानो व समझो, जरा सोचे! दरअसल आप यही तो चाहते हैं। एक बात हमेशा याद रखो कि कल्पना मनुष्य की सृजनात्मक सक्रियता का एक आवश्यक तत्त्व है।

जबसे मनुष्य का इतिहास है कथा का भी इतिहास है।

इस संसार में कथा सुनाने वालों की लंबी परम्परा रही है, जो घूम-घूम कर सिर्फ कथा बांच कर ही अपना जीवन चलाते थे। नाटक कथा ऐसे ही कथावाचकों की आपसी बातचीत से सम्भव हुई कथा है, जिसमें काथिक (कथावाचक) कई कहानियों के माध्यम से प्रकृति, जल व प्रेम को बचाने की बात करते हैं। काथिकों को लगता है कि संसार को बचाये रखने के लिए प्रेम व पानी को बचाए रखने की ज़रुरत है। नाटक अपने कथा सूत्र से बार बार इस बात को भी सामने लाने का प्रयास करता है कि जो भी कोमल है, जो भी नाजुक है उसे समय की क्रूरता या तो मार देगी, नहीं तो कम से कम अपनी तरह क्रूर बना देगी और इसके साथ ही नाटक की विषयवस्तु बहु-आयामी होती चली गयी। पानी के संघर्ष को प्रेम के संघर्ष में रूपांतरित कर उस संघर्ष को वर्ग संघर्ष की ऊँचाई तक उठाने का प्रयास किया गया। लेखक सुधांशू जी की काव्यत्मक दृष्टि अब सृष्टि में तब्दील तेजी से होने लगी थी। नाटक में एक साथ क्लासिकल और समसामयिकता का फ़्यूजन ऐसा है कि अनेक कथाएं एक ही साथ, समय, रेखा पर कई स्तरों पर चलती रहती है।

अमरेश हारमोनियम पर बैठ गया है। दीपक कई वाद्ययंत्रों के साथ आसन लगा चुके हैं, साथ में रविकांत। बाहर से घूम कर मैं आ चुका हूँ और चाँद व छत गाने का सूत्र मिल चुका है। अभिनेताओं को अपने चरित्रों के शब्दों पर पकड़ हो चुकी है।

मलंग के किरदार के कुछ हिस्सों में रहमान के पास जिब्रीश था और उसका अर्थ लेने के लिए वह संघर्षरत था। अस्मिता तेजी से खुल रही थी और टूट भी रही थी, वैभव जवान हो चुका था।

कभी कभी अभिनेता आपस में लड़ भी लेते थे। नाटक बन्द होने के आसार कई बार आ चुके थे। निर्देशक प्रेम व तनाव में डूब चुका है। चन्दन कश्यप की आँखों मे तनाव साफ देखा जा सकता था। चन्दन वत्स को जिम्मेदारी का आभास होने लगा था। अमरेश अमन सुर सही लगाने लगा। देवानंद भोजपुरी फिल्मों से बाहर निकल गया था। अंकित शर्मा भी मुश्किल समय के सारथी की भूमिका में रम गया था। कमलेश सोना भूल चुका है। जीतेंद्र काफी मुश्किल में था। पर नाटक तो अब बनना ही था। निर्देशक का दिमाग तकनीकी पक्षों को लेकर भी सावधान हो गया था।

” होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥”

कॉस्ट्यूम डिजाइन होकर सिलने के लिए टेलर्स को दिया जा चुका है। चिंटू अपनी प्रकाश परिकल्पना के लिए रिहर्सल में आना शुरू हो चुके हैं। अभिजीत पूरा साउंड ट्रैक के साथ एंट्री ले चुका है। लेखक महोदय अभी संतुष्ट नहीं है, यात्रा जारी है — कुछ बड़ा, बहुत कुछ छूट रहा है- निर्देशक सोच की मुद्रा में है, रात के 2 बज रहे हैं। चांद की लालिमा बहुत दुर आसमान में दिख रही है, और सपनों की तरह कैनवास पर चित्रित होते आगामी योजनाएं। मंच परिकल्पना मानस-पटल पर अंकित हो चुकी है। प्रेक्षागृह नाट्य प्रदर्शन के लिए आरक्षित हो चुका है, प्रदर्शन की तारीख तय हो चुकी है। नाटक के पोस्टर व बैनर लग चुके हैं, पर नाटक की स्थिति अच्छी नहीं है, बहुत काम बाक़ी रह गया है। सामूहिक प्रयास जारी है। नाटक से भावात्मक लगाव पूरे समूह का हो चुका है। रिहर्सल के लिए लगभग डेरा डाल दिया गया है। बीच में तूफान भी आए, मुश्किलें भी आईं, पर शो को होना ही है। यात्रा अनवरत है। अब केवल फैक्ट स्पेस में रहना हो रहा है व नाटक के अभ्यास के साथ साथ दवाब भी बनता जा रहा है, थकान देखी जा सकती है, गर्मी भी भीषण है। पूरी टीम मुख्य लक्ष्य की ओर चल पड़ी है।

पर्दा तो उठेगा। दर्शक के नज़रों के सामने होगा हमारा नाटक, वह भी अपने शहर में – रोमांचित हूँ!  पटना से संजय उपाध्याय जी का कॉल आ चुका है, उनकी संस्था के नाट्य समारोह में पटना में कथा की प्रस्तुति करनी है। पर मन अभी करने की स्थिति में नहीं है, अभी पूरा ध्यान बेगूसराय में प्रथम शो पर केंद्रित है। पटना में शो के लिए संजय भैया को बोले हैं – प्रथम शो के बाद तय करते हैं।

नाटक तो होगा और इसके अलावा हम कर भी क्या सकते हैं। खूब रोने का मन करता है, खूब चीख़ने का मन करता है। इसके पीछे का कारण हम तो युवा लोग के साथ नाटक कर रहे है। तनाव का सृजन दर सृजन ही इनकी प्रतिभा का विकास कर जाएगा और नाटक तो होता रहा है, यह भी हो जाएगा। नाटक के गीत जुबान पे चढ़ने लगे हैं, मतलब गुनगुनाने लगे हैं। थर्ड बेल का इंतजार हम सब कर रहे हैं। नगाड़े व ढोल बज उठे है —-

#कथा 

लेखक – सुधांशु फ़िरदौस 

परिकल्पना व निर्देशन – प्रवीण गुंजन 

प्रस्तुति – फैक्ट रंगमंडल, बेगूसराय

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