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लाल्टू का ‘खंडहर एक सफ़र’

चित्र साभार:कविता कोश
लाल्टू हिंदी के जाने माने कवि  हैं, सामाजिक कार्यकर्ता हैं, अनुवादक हैं। इस बार उन्होंने गद्य में खंडहर का सफ़रनामा लिखा है। आप भी पढ़िए इस खंडहर होते समय में कुछ खंडहर यादें- जानकी पुल
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खंडहर : एक सफर
 
1
ठंड की बारिश बन टपक रहा हूँ। बेमहाबा ग़ालिब सा आतिश-ए-खामोश के मानिंद जलता हुआ।
पहाड़ से पत्थर गिरकर सड़कें टूटी हुईं। अँधेरे में दो घंटे।
सुबह एक छोटी बच्ची बन कर आई है, दोस्त बन गई है। पत्ते, पत्थर, मिट्टी, लकड़ी के टुकडे, उसके खिलौने।
समझ नहीं पाया हूँ कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। भाग रहा हूँ। सच है कि भागना चाहता हूँ। पर भाग नही सकता, कहीं छिप नहीं सकता।
दोपहर बारिश में देसी दारू की गंध। मक्का और कोदो के दानों में पानी मिलाकर लकड़ी की नलियों से बारिश पी। खट्टी अंगूरी।
 
सुकून है कि पहाड़ हैं।  
2
 
कहीं तो पहुँचना है। थकी हुई किस्मत से महरूम बारिश।
खुद से रूबरू, ग़ाफिल, कुछ न सोचने की कोशिश में बारिश। ग़फलत के अनगिनत पल।
दरवाजे पर आहट। एक बड़ा मेढक बेताबी से खड़ा है।
“कौन है भई?” मेढक से पूछता हूँ।
मेढक मेरी ओर देखता है। वह पूछता है, “तुम कौन हो भई?”
जिस खंडहर को पढ़कर मैं भागकर यहाँ आया हूँ, वह उसे थमाता हूँ – भाई, पढ़ लो।  
3
 
कहानी लिख रहा हूँ। खंडहर टूटी दीवारों, इतिहास के भूचालों या मलबे का जंजाल नहीं है। मेरा कोई होना महज प्रासंगिक है। इतनी बुरी तरह सर्वव्याप्त हूँ कि अदृश्य हूँ। संकट की तैयारी में सोचना नहीं पड़ता।
 
देश के असंख्य महानगरों, नगरों में मैं दिख जाऊँगा। कुछ बातें हैं, जो मुझमें और किसी औरत में एक जैसी मिल जाएँगी।
 
यह खंडहर, जिसमें बैठा, जहाँ गिरा, जिससे दबा, जहाँ एक जंगली फूल की तरह उगता हुआ, जिसमें गंदे कीड़े की तरह कुलबुलाता हुआ, जिसकी धूप और जिसके अँधेरे में जागता सोता हुआ, बिखरे नुकीले काँटों पत्थर व काँच के टुकड़ों से बार बार घायल होता हुआ, मैं ज़िंदगीनामा तैयार कर रहा हूँ, यह मुझे कब मिला या मैं इससे कब मिला, यह बतला पाना मुश्किल है, क्योंकि मेरे जन्म के पहले इस खंडहर के मेरे साथ होने का दावा मैं नहीं कर सकता। पर मेरा जन्म कब हुआ?
 
एक दिन अचानक अपने साथ चलते खंडहर को देखा। ऊपर नीचे चारों ओर, इस तरह मुझसे चिपका हुआ था कि अचरज हुआ कि अब तक अब तक इसे देखा क्यों न था। धीरे-धीरे एक-एक ईंट का टुकड़ा पहले से देखा हुआ लगने लगा। एक के बाद एक खंडहर का हर कण अपने अतीत में मिल गया।
 
खंडहर अनादिकाल से साथ है। बिना किसी पहचान के, अदृश्य, सोया हुआ, खोया हुआ।
खंडहर, मैं, मेरे द्वारा खंडहर की पहचान और खंडहर का होने वाला ध्वंस, यही कहानी बार-बार।
 
 
4
 
नक्सलबाड़ी में लोग रहते हैं। लोगों के साथ गाय-भैंस, मुर्ग, कुत्ते, बिल्ली भी रहते हैं। नक्सलबाड़ी से पानी-टंकी इलाके तक और वापस बसें चलती हैं। बसों के साथ और गाड़ियाँ, टैक्सियां, आटो, स्कूटर भी चलते हैं, इन इलाकों से बोर्ड दिखते हैं, जो बतलाते हैं कि नक्सलबाड़ी एक इलाका है। वहाँ कोई टूरिज़्म नहीं है, पर होना चाहिए, गाइड होने चाहिए जो पचास साल पुराना इतिहास बतलाएं। – इतना लिख कर हाथ रुक जाता है। कलम रुकती है कि हाथ रुकता है? या ज़हन रुकता है।
कौन ‘हवा-ए-सरे-रहगुज़र’ जीता है? किसकी लाश खिंची जाती है?
 
5
 
एक बच्चे ने पूछा- आप कौन हैं?
मैं मुस्कराता हूँ।
एक लड़की जिसके चेहरे पर जरा सी विकलांगता है, बिगड़ी आवाज़ में चिल्लाती है- तुम चोर हो, भाग जाओ। वह देर तक चिल्लाती है- भाग जाओ, तुम चोर हो।
या ग़ालिब, ग़मे रोजगार छूटता ही नहीं है।
 
6
 
पहाड़ बादलों से ढँके है। सैलानी बादलों को देखकर खुश हैं – एक-दूसरे को दिखला रहे हैं।
 
दस जगह सोच कर निकले हैं, एक से भी रंगे नहीं जाएँगे। अब किसी और व्यू-प्वाइंट के लिए निकलेंगे – यहाँ बारिश ने चौपट कर दिया। लौटकर कहेंगे कि ये देखा और वो देखा।
 
पहाड़ से पूछता हूँ कि यह किसका खंडहर ढो रहा हूँ। एक सफेद आवाज़ मुझे सहलाती है।
7
 
कमरे की पिछली दीवार की खिड़कियों के पार थोड़ी दूर एक गाय और उसका बछड़ा बँधे हैं। दूसरी दीवार के पार इलायची के पौधे हैं, इसी तरफ से पहाड़ बुलाते हैं।
 
थोड़ी देर के लिए धूप। पानी भाप बनता बादल बन उड़ चला, और छोटे-छोटे उड़ते बादल।
कपड़े जो धोए थे उन्हें सुखाने के लिए जगह नहीं।
दिनों से दुनिया की कोई खबर नहीं है। फ़ोन पर न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्डियन की हेडलाइन है। न्यूज़ एलर्ट देखते ही डिलीट करता हूँ।
 
8
 
सोचने को इतना कुछ है, निश्चिंत सोचता हूँ। सोचते हुए दिन गुजारता हूँ। बचपन से सोचता रहा हूँ। सोचना चिंताओं से भरा होता है। अनगिनत अपराध-बोध, डर, शंकाएं, यही सोच के पर्दे पर नाचते हैं, निश्चिंत सोचता हूँ। पहली बार इस तरह सोच रहा हूँ। हमेशा छिपा नहीं रह सकता, हालाँकि छिपा तो यहाँ भी नहीं हूँ। कोई पकड़ना चाहे तो आसानी से ढूँढ सकता है। तमाम शंकाओं में दूसरों को जीता हूँ।
 
खंडहर जारी है।
 
9
 
हल्की ठंडी हेमंत की इस रात को पहाड़ों के सामने खड़ा मैं क्या कर रहा हूँ! थोड़ी देर पहले धानखेत के सामने छोटा नाला पार करते वक्त पैर में एक जोंक सट गया था। इसके पहले कि हटा सकूं, उसने खूब खून चूस लिया। पसीना आ रहा है। रात में धूप खिल गई। दूर से कोई आ रहा है। परिचित-सा। बहुत कोशिश करके भी पहचान नहीं पाता हूँ। मैंने इसे कहीं देखा है। वह बहुत करीब आ पहुँचा है। उसकी आँखें ठंडी हैं। किसी ने मेरी बाँह पकड़ ली है।
“जाओ, मिलो इनसे, तुम इनसे जरुर मिलो।”
इसी बीच वह आदमी सामने खड़ा है। उसने उंगली उठाकर मुझे कुछ कहना शुरु किया है – अस्पष्ट शब्दों में…
“…..तुमने पूरे परिवार को बिगाड़ दिया। तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि तुम्हारे चले आने के बाद …?”
“पर मैं तो …। मुझे क्या मालूम कि …।
“तुम मुझे नहीं पहचानते?” उसकी आवाज में गहरा अवसाद था।
”मैं कैसे नहीं आता! मैं तंग आ चुका था।”
“तुम नहीं समझोगे बेटे हिंदुस्तान में जनम लेना कैसा अभिशाप है।”
अभी तक समझ में नहीं आया यह आदमी है कौन – पूछने से पहले ही वह बोल उठा, “मैं तेरा पिता हूँ बेटे।”
उस आदमी को धक्का देने की कोशिश करता हूँ। वह पत्थर की मूरत बन गया है। उसके कपड़े, कुर्ता धोती सब पत्थर के तराशे हुए बेजान चीज़ें बन गई हैं।
“चलो, वापस चलें।”
“कहाँ ?”
”तुम्हारे घर, जहाँ से तुम बहुत पहले चले आए थे।”
“मेरे घर?” ….. वहाँ मेरा अब कौन है?
वह आदमी, जिसने खुद को मेरा पिता कहा, वह फिर खड़ा था। उसके पास एक जवान लड़की थी, जिसके चेहरे में कुछ था पहचाना हुआ – फिर वही दिक्कत, याद नहीं आता, कहाँ देखा है।
मैं गुस्से से उबलकर उस आदमी पर कूद पड़ा। अब वह गायब हो गया। वहाँ कोई नहीं है, मैं बीच सड़क पर खड़ा हूँ और कोई नहीं है।
”तुम्हें पता है, वह आदमी कौन था?”
”वह तुम्हारे पिता की प्रेतात्मा थी!”
वह जवान लड़की बैठी है। मैं दौड़ने लगता हूँ। वह पीछे से कुछ कहने की कोशिश कर रही है।
कुछ कहना चाहता हूँ। उसने मेरा गला पकड़ लिया है। खिड़की से रात के तीसरे पहर का गहरा भूरा आकाश दिखलाई पड़ रहा है। दो तारे हैं। शरीर पसीने से तर है। 
10
 
इस वक्त भूख कुछ और है। नीम-बेहोशी और बुखार में कहीं लेटा हूँ।
सुबह होने में देर नहीं है। बीच-बीच में रह-रह कर किसी का चेहरा दिमाग में तैर रहा है। अंदर धक् सी कहीं कोई आग जल उठती है। कोई कहता है कि उसका गला पकड़ लूं और एक-एक नस कुतर दूँ।
सुबह। ठंडी हवा।
और वह धीरे-धीरे मेरी दुनिया से निकल गया।
11
 
कायनात की शुरूआत में दो नदियों, तीस्ता और रंगीत को इकट्ठा लाकर संगम करवाना था। तीस्ता नर और रंगीत मादा। सारे प्राणी इकट्ठा हुए और पूछा गया कि कौन तीस्ता को लाएगा कौन रंगीत को। साँप ने कहा कि वह तीस्ता को लाएगा। वह सीधे चलता हुआ तीस्ता को ले आया। रंगीत को लाने चली चिड़िया। चिड़िया को लगी भूख। वह कभी दाएं तो कभी बाएं दाने चुगती रही। इसलिए रंगीत बलखाती हुई आई, फिर दोनों नदियों का संगम हुआ।
 
सुबह चाय के साथ धूप में पहाड़। एक छोटी बच्ची, बिना कुछ खाए-पिए, दूर तक मस्त चलती है। आधा रास्ता जंगल के बीच में से है।
किस अनहोनी से आतंकित हूँ, मुझे पता नहीं है, पर सोचता रहता हूँ कि एेसा कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगा। आजीवन दोस्त ढूँढते हैं जो हमारी सभी कमज़ोरियाँ जानें, हमें बतलाए कि हम कहाँ ग़लत रहे, पर नैतिकता के पाठ न पढ़ाएं।
 
कुछ पन्नों में खंडहर समा जाता है, जो एक नहीं अनेक खंडहरों से बना है और आगे और कई खंडहर बनाता चलता है।
12
 
खंडहर को पहचानने में ज़माने लग जाएँगे। जितनी भी कोशिश करुँ, यह कहानी खत्म नहीं कर पाऊंगा। दिन रात रोओं में खंडहर समाए घूम रहा हूँ। खंडहर तभी सार्थक है जब यह जटिलता कायम रहे। खंडहर बनाने वाली ताकतें बहुत सारे खेल खेलती हैं। इसी भूलभुलैए में फँसे हम रोशनी की लकीर ढूँढ बैठे हैं। वह लकीर चौड़ी होती जा रही है।
अँधेरा हो चुका है। आस्मान में चाँद। दिन भर की बदली के बाद आस्मान साफ हो गया है। हवा में हल्की सी ठंडक। खेतों के बीच में से साइकिल चलातेा हूँ। अँधेरे में साइकिल।
 
घर अँधेरे गड्ढे की तरह इंतज़ार करता है। शहर में बिजली गुल है। अँधेरे में मोमबत्ती जलाकर हाथ पैर धोता हूँ। मोमबत्ती बुझाकर खिड़की के पास लेटता हूँ। आस्मान में बादल इधर उधर चाँदनी में बिखरे हुए। एहसास कि किसी को अपना हाथ देकर कहना चाहता हूँ , ‘पकड़ो।’ सिर झुकाकर कहना चाहता हूँ, ‘पकड़ो मेरे बाल।’ अंदर सोया कोई जाग रहा है और उसे आस्मान जैसे चौड़े एक मैदान की ज़रूरत है।  
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कोई परेशां है कि उसने क्या ग़लती की कि कोई नाराज़ हो गया है, और हत्यारे सीना चौड़ा कर दुनिया पर राज करते हैं। यही खयाल बार-बार ज़हन में आता है। आम भले लोग इतिहास नहीं हैं। हत्यारे इतिहास हैं। हत्यारा कभी भली बात कर बैठता है तो इस बहस में ज़िंदगी बीत जाती है कि उसकी भलाई पर गौर किया जाए।
 
शरीर चाहे बूढ़ा हो जाए, पर मन कभी बूढ़ा नहीं होता। खुद से छिपना चाहता हूँ। बारिश से ऊब होती है। सारे ब्रह्मांड से जुड़े होने का एहसास होता है, या कि बादल, पहाड़, आस्मां, सारी कुदरत को खुद में पाता हूँ। विशालता का यह एहसास साथ रख पाऊँगा? क्या पोंगापंथियों से चिढ़ खत्म हो जाएगी? इंसान ही है, जिससे जुड़ना हमेशा संभव नहीं होता।
 
बादल, जंगल, पहाड़, गुफ्तगू में शामिल हैं। एक पिघलता है, एक सोखता है और एक उदासीन, निष्ठुर खड़ा रहता है।
हर आवाज़ कुछ कहती है। भौंरे की, तरह-तरह की चिड़ियों की, पौधों और पत्तों की, भाप बनकर उड़ते पानी की आवाज़ है। एक आवाज़ सन्नाटे की है। 
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शहर अनुमान से ज्यादा बड़ा है। थकी सवारियों से भरी जीपें एक के बाद एक गुजरती जाती हैं। परिवार में दो मुर्गे और एक मुर्गी भी है। एक बिल्ली है। कभी-कभी एक कुत्ता आकर ऐसे बैठ जाता है जैसे वह इसी परिवार का है। आसपास और कुत्ते हैं। सुबह एक कुत्ता मेरे साथ खेलने लगा। बच्ची मेरे साथ खेलती है। बीच-बीच में एक अजीब सी उदासी उसमें दिखती है। वह रोती कम है, पर जब रोती है तो मेरा सीना फटने लगता है।
 
खंडहर, खंडहर।
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कोई कह रहा है, हर कोई वही है, जो तेरे अंदर है। उससे कह कि एकबार दोस्त की तरह तुझसे बातें करे।
मुझे इस बहस में फिर आना है। दरअसल कई बार आना है। और धीरे-धीरे शक्ल इस तरह बदलनी है कि मुझे फिर कोई अँधेरी रात में न रोके।
 
दोस्त बहस में लगे हुए हैं। बहस ही उनका जीवन है। साफ सुनाई तक न देता है कि कोई कह क्या रहा है। वह क्या बातें कर रहे हैं। वे अंग्रेज़ी में या हिंदी में बोल रहे हैं?
 
क्या वे नशे में हैं? ऐसा लगता है कि जैसे हर कोई हवा से बातें कर रहा हो। क्या हर कोई अपने एकांत में खुद से कुछ कहने की ग़फ़लत में है?
 
घबराकर मुड़ता हूँ। तेज कदमों से दौड़ता हूँ । कोई चीखता है। कहीं कोई जोर से हँसता है। पता नहीं क्यों दौड़ रहा हूँ।
 
सुबह बहस में चुप बैठी एक औरत के बारे में सोचता रहा। यह औरत मादाम कूरी क्यों नहीं बन सकी?
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पहाड़ पर रुई जैसा बादलों का आवरण बिखरता है। दूर किसी गाँव का कोई मकान दिखता है। ताज़ा बारिश मे धुला हुआ। अजीब सा सर्रीयल एहसास। इंसानी दिमाग कुदरत की कैसी अनोखी देन है। कठिन स्थितियों में सारे दिन बड़े सहज ढंग से जुगाड़ और एक सार्थक जीवन। धरती, आस्मां – कुदरत सब कुछ देती है। इस पहाड़ का क्या हश्र होगा?
रात। ठंड। जोरों से बारिश। कँपकँपी। डर कि बुखार तो नहीं। सुबह सिर भारी।
गाँव का आदमी दूर की नहीं जानता। समझता है कि कौन क्या खाता है, यह आप तय नहीं कर सकते। किसी को बीफ नहीं खाने दोगे तो वह आदमी मार कर खाएगा।
 
काश कि एक आरामकुर्सी होती। 
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बच्ची स्कूल गई। दीदी उसे साथ ले गई है। स्कूल के कपड़े बिल्कुल साफ दुरूस्त। जूते उलटे पहने हुए थे। बतलाया तो खोल कर कहा कि पहना दो। सीधे पहना दिए तो हँसने लगी। उसकी हँसी में पहाड़, दरख्त, पंछी, हर कोई शामिल था। दुबारा जूते खोल कर उल्टे पहन लिए। खिलखिलाती सामने की ओर झुकी तो समझा कि वह दुनिया रच रही है। मैंने डाँटने का बहाना किया और उसके दाएँ हाथ की नर्म उँगली पकड़ ली।  
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एक फौजी हेलिकॉप्टर आया। हेलिपैड पर उतरा। सड़क से चार-पाँच जीप और दूसरी गाड़ियाँ आईं। अफसर और सिपाही। ज्यादातर की तोंदें बढ़ी हुई हैं। जाते हुए लंच के लिए मुर्गा ढूँढ रहे थे। ग़रीब लोग फौजियों से डरकर मुफ्त में ही खाने का सामान दे देते हैं।
ग़ालिब से ऊबकर जासूसी उपन्यास पढ़ रहा हूँ। फ़ोन में है। कहानी में कोई ग़रीब मुफ्त में मुर्गा नहीं देता है।
नींद में खंडहर पढ़ा जा रहा था।
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तंग गलियों में से गुजर रहा हूँ। गैस पीड़ित बच्चे आ-आ कर मेरा हाथ छू रहे हैं। रह-रहकर नींद टूट जाती है। खिड़कियाँ बंद होने के बावजूद ठंड लग रही है। उठकर खिड़कियों में जहाँ भी छेद हैं, वहाँ कपड़े ठूँसता हूँ। मजदूर, बच्चे, अँधेरे में खो गए।
बच्चे लौटकर आकर कहते हैं, ‘गुरू जी। मैंने तितली देखी। …मैंने घास तोड़ा। कोई कहता है, मैं गाना सुनाऊँ।
बेचैनी में मुझे हँसी आ रही है।
फटे कंबलों में लिपटे मजदूर मेरे पैर छूते हैं। एक मेरी ओर बीड़ी का बंडल बढ़ाते हुए पूछता है, “बीड़ी पिएँगे मास्साब!”
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वे मेरे बारे में बातें कर रही हैं। किसी ने मुझे हल्की चपत लगाई। चश्मे के पार उसकी आँखें देखता हूँ। आँखें पत्थर जैसी स्थिर हैं। गीत रुक चुका है। दो-चार लड़कियाँ कोरस में गाने लगी हैं। उठो जागो बहना, आओ बहना, अब नहीं और सहना…
कटाक्षों में आत्मीयता है, जिससे मुझे सुकून मिलता है। बहस में मर्दों जैसा तीखापन नहीं है। हँसी-मजाक। परिवेश सखि-मय है। लोगों पर नशा सा छा रहा है। कोई किसी के ऊपर लेट रही है। बातों में नखरा और शोर-गुल बढ़ रहा है। अचानक कोई गीत गाती है। दर्द भरा गीत। सखी तुझे खोए कई महीने बीत गए रे। वो जालिम मर्द तुझे ले गया, उसे क्या परवाह होगी तेरी री। तू आ देख मैं भी खिलती जा रही हूँ। मेरी छातियाँ जो धड़क रही हैं, यह सब तेरे लिए है री।
 
उसकी आँखों में यह कैसी तड़प! उसकी देह काँप क्यों रही है? वह तो इतनी अशांत न थी। मेरे अंदर यह कौन उठ रहा है, जो तुम्हारी ओर दौड़ने को इतना व्याकुल है! तुम्हारा यह कैसा रूप है? हाथों में नरमुंड, जीभ लाल, पुष्ट जाँघों में थिरकन.…
 
 
 
21
 
एक तार से लटकी पच्चीस वाट की बत्ती बुझाकर मैं सोने की कोशिश करता हूँ। ठंड और घबराहट से परेशान।
आँख खुली और माथे पर हल्का नर्म सा स्पर्श। वह। क्षण भर चौंका। उसकी मौजूदगी में भरपूर सुकून है। उसने बिस्तर पर बैठते हुए मेरा सिर उठाया और अपनी जाँघों पर रखा। मैं उसका नाम लेकर पुकारना चाहता हूँ पर मैं रो पड़ा। उसके हाथ मेरा सिर थामे हुए हैं। मेरी शिराओं में, शिराओं की हर कोशिका में सृष्टि का अनहद नाद दौड़ रहा है। वह स्त्री। स्त्री के हाथ। मेरे सीने के चमड़े पर, बालों पर। वह धीरे-धीरे मुझे जगा रही है। मैं जो आग सा जगा हुआ था, उसके स्पर्श से जाग रहा था। मेरी उँगलियाँ सुंदर की अर्चना करते हैं। उसके होंठ मेरे होंठों पर हैं। हमारे कपड़े शरीर पर से सरकते जा रहे हैं। उसका गीलापन छूते ही मेरे हाथ पहली बार जीवित हो गए हैं। सुन रहा हूँ शंखनाद और घंटों की ध्वनि। देर रात की अजान। उसकी साँसों में लावा फूट रहा है। किसी के होंठों के बीच किसी के होंठ थे। जीभ से बँधी जीभ। मेरी कमर अचानक तड़पती सी उठी।
परेशान मैंने आँखों पर हाथ रख लिया। उसने मेरा सिर अपनी गोद में रखा।
मैंने आँखों पर से हाथ उठाया। उसकी ओर देखा।
मैं समझ गया कि वह स्त्री, वह प्रकृति, वह आदि, वह अनंत, वह प्रगाढ़, वह संपूर्ण है।
वह मेरी टूटी हुई याद है। उसने मुझे अपनाया और मुझे मेरी अपूर्णता से मुक्त किया। और यह सपना न था।
22
 
पहाड़ नहीं दिख रहा। बादलों की ओढ़नी गायब है। मटमैला दिगंत। आज घर याद नहीं आएगा।
एक मुर्गी छः चूजों के साथ-साथ आई है। चूजे बहुत छोटे हैं जैसे परसों अंडों से निकले हों। माँ के पीछे-पीछे भागते हैं। माँ कीड़े चुन कर खिलाती है। कभी-कभार माँ की लत्ती चूजे पर पड़ती है तो वह कलाइयाँ खाता है।
किसी से रंजिश है। किसे रंजिश है? कलाइयाँ खाते चूजे को देखता हुआ अपनी रंजिशों को परखता हूँ। क्या इतनी मुश्किलें ज़िंदगी में आई हैं कि ‘यूँ ही गर रोता रहा ‘गालिब’ तो ऐ अहले जहाँ ! देखना इन बस्तियों को तुम, कि वीराँ हो गईं?’
बार बार फिसलता हूँ। अंदर गहराई तक जाने के लिए रेंगना पड़ता है। दो पत्थरों के बीच से मोटे से मोटे लोग अंदर घुस जाते है। जिसने पाप किया हो, वो कितना भी पतला हो, अंदर नहीं जा सकता। वह बच्ची जो इतनी काबिल है, क्या उसे यह विकल्प जीवन में मिलेगा कि वह यहाँ की रुटीन ज़िंदगी से हटकर कुछ और बन सके?
 
23
 
उस के जिस्म की महक साथ है। साथ बिताया एक-एक पल, उससे सीखी एक-एक बात फिर से जी रहा हूँ। उस के बारे में छोटी-छोटी बातें याद करते हुए मैं बीच-बीच में मुस्करा उठता हूँ। भीड़ भरी बस में लोग बार-बार मेरी ओर ताकते हैं।
जीवन में और क्या हुआ है, कोई तो बतलाएगा। न कोई आकर्षण है, न कोई नफ़रत।
कभी-कभी डर लगता है कि मैं भीड़ में खो जाऊँगा। वह भीड़ में खो जाएगी। हम बहुत समझदार है, पर मन नहीं मानता।
क्या मुझे यह एहसास है कि संबंधों का क्या अर्थ होता है? नज़रें कमरे की खिड़की से बाहर दूर तक कुछ देखतीं स्थिर हैं। वहाँ तरह तरह के झाड़ और एक दो मकानों के ऊपर एक मटमैला आकाश है। वक्त शाम और आस्मान में हल्की रोशनी।
खयाल पूरा किए बिना ही गहरी नींद।
24
 
– साइकिल पर सवार वह पहाड़ ढूँढता चला है। वह रात को आता है, दिनभर ढूँढता है। सुबह वह बादलों में सूरज ढूँढता है। वह पहाड़-पहाड़ ढूँढता है। वह समंदर-समंदर ढूँढता है। वह खेलता ढूँढता है। वह पढ़ना या लिखना ढूँढता है। वह गाता ढूँढता है। वह रोता ढूँढता है। वह पेड़ पर चढ़ता ढूँढता है। वह ज़मीं पर लेटा ढूँढता है। किसको?
 
छिपकर ढूँढना अब आसान नहीं रहा। तार-बेतार किस्म-किस्म की दूरबीनों से लोग ढूँढ लेते हैं ढूँढते हुए को। मेटामोरफोसिस अंग्रेजी में कहो कि हिन्दी में वे तुम्हें ढूँढ लेंगे। जंगल-गुफाओं में छिपो या कि माशूक की गोद में, वो ढूँढ लेंगे। तुम ढूँढने निकले हो, इसकी खबर उनको जमाने से है।
 
हे पहाड़, हर पल मुझे बतलाते रहो कि मैं कितना छोटा हूँ। और इतने में ही मैं भी अपने लिए पहाड़ हूँ। पहाड़ आँखों में डूब रहा है। 
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यह मेरा बाँया हाथ तुम्हारे दाँए हाथ में और तुम्हारा बाँया हाथ मेरे दाँए हाथ में।
ये हाथ ये पैर हमारे, तुम्हारे।
सतपुड़ा की पहाड़ियों में ये बहती नदियाँ, मैं और तुम।
हमारे हाथ, हमारे पैर इकट्ठे। हमारा इकट्ठा होना सूरज का उगना है। हमारा इकट्ठा होना परेशान धरती के सीने में चाँदनी का बिछ जाना है।
पीछे हैं गहरी काली सुरंगें। सामने पीले सरसों के खेत। शरत् की धूप और खिलखिलाते बच्चे।
हम हाथ थामे चल रहे हैं फरवरी ऊँची सुनहरी गेंहू के खेत में से। खुशी में किसान हमारी ओर देखकर हँसते हैं और बच्चों से कहते हैं – वो देखो! सोनचिरैया।
हम शहरों में उड़ रहे हैं। शहरों में चौड़ी खुली सड़कों पर गाड़ियाँ हैं। सब कुछ शांत है। शांत हवा है। लोग आ जा रहे हैं। रेलगाड़ियाँ रंग बिरंगी खिलौनों सी चल रही हैं। गोधूलि-बेला में दूर-दूर से हल्की बाँसुरी की आवाज़।
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चलो पहाड़ पर चढ़ें। पहाड़ पर कैक्टस हैं। देखो, मैं फिसला। इस कैक्टस ने मेरी कमीज़ पकड़ ली है। देखो, मैं आ गया। तुम हँस क्यों रही हो?
अरे चलो, हमारी बस आ गई। दौड़, दौड़। ठीक है, फिर मिलेंगे। और सुनो, …। अरे, तुम तो परेशान हो गई। अरे, अब तो बस चल पड़ी।
27
आज हम तुम्हें कहानी सुनाएँगे। सब चुप हो जाओ। अभी भी शोर मचाना है। फिर हम कहानी नहीं सुनाएँगे। अच्छा, अब सुनो। हाँ, हाँ, राजकुमार वाली। और राजकुमार तो उसका नाम था – था तो वह किसान का बेटा। और राजकुमारी उसे कहते थे, पर वह थी नयागंज के बढ़ई की बेटी। तो राजकुमार घोड़े पर बैठकर आया और घोड़ा वह किसको कहता था – अपनी बकरी को न! राजकुमारी अपने घर में छोटी कोठरी की खिड़की पर बैठी थी। राजकुमार ने राजकुमारी के लिए बेर छिपाकर रखे थे। जब वह बेर देने गया तो अचानक क्या हुआ – राक्षस…!
 
28
 
राक्षस को राक्षस नहीं होना था। पर बस जब लाइन-क्रॉसिंग पर खड़ी हुई, उस वक्त वह राक्षस ही था। वह मुझे पकड़कर कहीं खींच कर ले जा रहा था। मैंने बस में बैठे ही चिल्लाने की कोशिश की, पर किसी ने नहीं सुना। जब तक मैं उतरा, लोग काफी दूर जा चुके थे। मैं उनके पीछे दौड़ने की कोशिश करता रहा। पर वे लोग ओझल हो चुके थे। कोई सामने खड़ा हँस रहा था। कोई मेरी ओर देख रहा था।
बस चली और रुकी। बस पीछे चली, आगे मुड़ी। बस बीच में कहीं लटकी रही। कहीं दीवाली के पटाखे फूट रहे थे और कहीं होली खेली जा रही थी। कोई हँस रहा था, कोई रो रहा था। मैंने सोचा कि वह कोई खास दिन था, पर जब सोचा कि वह कौन सा दिन था, तो कहीं कोई बोल उठा, ‘यह वह दिन है जब कायनात बनी।’
 
कौन था वह जो मुझसे यह कह रहा था? घूमकर देखा कि कोई हँस रहा है, ‘कायनात कोई एक नहीं, कई हैं। कायनातें बनती हैं, खत्म होती हैं। किसी भी पल हम किसी एक कायनात में से दूसरे में चले जा सकते हैं।’
 
मैं देख रहा हूँ, वह हँस रहा है। सड़क पर एक गाय आ गई है और ड्रायवर ने अचानक ब्रेक लगा दिया है।
29
 
‘रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो’
 
असल में हम एक फिल्म के किरदार हैं। पटकथा हमारे अभिनय के साथ बदलती रहती है। जो लिखोगे, वह बदल जाएगा। कोई और किरदार पहले लिखी हुई लाइनों पर खचाखच कलम चलाएगा। तुम्हारी कहानी लाल स्याही से काटी जाएगी।
 
मेरी रूह के गाँव में शोक का माहौल है।
किसी का दर्द हम सुन लें, इतना ही हम कर सकते हैं।
जमकर बारिश। झमाझम। ऐसे में मुझे कविताएं लिखनी चाहिए, पर तय कर चुका हूँ कि कुछ नहीं लिखूँगा।  
30
 
– चप्पे-चप्पे पर नाकाबंदी है, सब्ज़ा-ओ-गुल पर उन्होंने पतंगों के आकार के ड्रोन बैठा दिए है, वे ढूंढ रहे हैं कि तुम किधर कहाँ किसे ढूंढ रहे हो। तुम डरते-घबराते रेंग-रेंग कर बच निकलने की कोशिश में होते हो, वे हँस रहे होते हैं कि तुम इतनी बातें एक लफ्ज़ मे क्यों नहीं बयाँ करते – ढूँढना।
 
दोस्त, साथी, आमिगो, सब ढूँढ लिया है तुमने, अब जाओ प्रेम ढूँढो। तम्हें पता नहीं था कि इसीलिए तुम जन्मे हो, इसीलिए तुम मरोगे। जाओ प्रेम ढूँढो। इसीलिए तुम नाचते हो, हँसते-रोते हो, बच्चों के साथ बच्चा और बड़ों के साथ बड़ा बन जाते हो। जाओ, प्रेम ढूँढो, तसल्ली से ढूँढो। यादों में ढूँढो, ढूँढने में ढूँढो। बुल्ले-कबीर के साथ ढूँढो, अकेले ढूँढो, जाओ प्रेम ढूँढो।-
 
31
 
– तय करें कि पहला इंकलाब पहाड़ से हो। पहाड़ से इंकलाबी मंत्र नदियों के पानी में घुलकर मैदानों में पहुँचें, मैदानी लोगों के सपने में पहाड़ आएं। तय करें कि हम पहाड़ के साथ खाएं-पिएं। पहाड़ मुर्गा खाए, तो हम मुर्गा खाएं, पहाड़ गाय खाए तो हम गाय खाएं। पहाड़ झपकी ले तो हम उसे जगाएं कि हमें इंकलाब लाना है। पहाड़ झारखंड से सिक्किम तक आए तो हम देर रात बहस करें कि उसे वापस कैसे लौटाएँ, फिलहाल पहाड़ चाय पिए और हम छांग।
– नींद आती है, कहीं दूर से कोई पुकार रहा है कि उठो, पत्थर उठाओ। नींद आती है, नम हवा कान में कह जाती है कि अंटार्कटिका में बर्फ पिघल गई। नींद आती है। हिमालय मेरे बाएं पैर के अंगूठे पर खड़ा हो कर कहता है,काश्मीर का क्या हुआ ? नींद आती है, दनादन सीने पर मुक्के मारता हूँ। पलकें ग़ालिब के काफिर की मिजगाँ हैं, कौन कह सकता है कि उठ जाएँ तो क्या हो जाएगा। नींद आती है।
32
 
हर कोई मोबाइल में सपने ढूँढता है, धूप निकलते ही सपने भाप बन उड़ते हैं और मोबाइल बजता रहता है। बजते हुए ध्वनियों का तंत्र एक कायनात बनाता है। कायनात में वक्त चलता है शिकारी मानव से शिकारी मानव तक, आदिम ध्वनियां बजती हैं और कविताओं में खून चढ़ता है। कायनात में मानव सोच नहीं पाता, मोबाइल सोचता है। तरह-तरह की मौत की खिचड़ी पकाना कविता का काम रह रह जाता है।
 
अँधेरे और रोशनी के दरमियान इक सतह पर खड़े हो, जो दिखता है वह नहीं दिखता है, जो नहीं दिखता है, उसे नहीं दिखना चाहिए कहते हो और झंडा थामे छलांग लगाते हो गहरी खाइयों में।
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संभावित सच सोचता हुआ डरता हूँ कि जो सोचता हूँ वह सच न हो जाए, तो एेसा क्यों न सोचूं कि कायनात जाए भाड़ में, तबाह हो जाए ताकि किसी सच की संभावना न बचे।
 
वक्त कैसे बदलता है। एक वक्त था कि कोई अपनी ज़ुबान में बात कर रहा हो तो बहुत मन करता था कि उससे जान-पहचान बढ़ाएं। अब हमज़ुबां लोगों से चिढ़ता हूँ। ‘दारुन, दारुन’ कहते रहेंगे, दूसरी ओर फोन पर दफ्तरी बातचीत । बच्चों से ज्यादा वयस्क शोर मचाते हैं।
34
 
धूप में बैठे पहाड़ साँसों में भर आता है।
कमाल कि ग़ालिब ने महसूस किया था कि बँधे दायरों में पूरी बात कही नहीं जा सकती।
‘ब-क़द्र-ए-शौक़ नहीं ज़र्फ़-ए-तंगना-ए-ग़ज़ल
कुछ और चाहिए वुसअत मिरे बयाँ के लिए’
वक्त पत्ते सा बहता है, पर थम कर गिरता नहीं। जो थमा नहीं उसे कैसे बाँधोगे? बहते हुए उसके रंग बदलते हैं, उसके आँसू गिर कर पौधों में सफेद ख़ून बन जाते हैं।
 
क्या कविता में जीवन जो खंडहर बन चुका है, उसका सब कुछ बयान हो सकता है? 
 
35
 
क्या वह ऐसे ही भाग गया था जैसे मैं तुम्हारी तलाश में दूर चला आया हूँ। उसने लिखा है कि उसे फिर वहाँ आना था। और वह वहाँ आया। उसे छोड़कर, जिसने उसे ज़िंदगी दी, जो उसकी ज़िंदगी थी। तो क्या मैं भी वैसा ही हो जाऊँगा। तुम जो मेरी हर साँस हो, तुम्हें ढूँढता पहाड़ों में खो जाऊँगा। वह भागा तो वहाँ गया। मैं वहाँ से भाग रहा हूँ और पहाड़ों में तुम्हें तलाशता छिपा हूँ। सुबह में सुबह ढूँढता, रात में रात ढूँढता, हर पल में पल ढूँढता, तुम्हें तलाशता छिपा हूँ। मौसम दर मौसम, किसी एक मौसम और दूसरे के दरमियान, कहीं लटका हुआ तुम्हें तलाशता छिपा हूँ।
 
36
 
सुबह से पूरी धूप खिली है। बर्फीली सफेद चोटियाँ चमक रही हैं। इन दिनों को मैं पहाड़ों के सुस्त दिन कहूँ तो ठीक।
– पहाड़ों के ये सुस्त दिन
मन चंगा तन दुरुस्त दिन –
– देर तक धूप से गुफ्तगू । धोए कपड़ों से पानी सोखने के लिए धूप को शुक्रिया। धूप ने मेरी गाल पर गर्म तमाचा जड़ा और कहा कि यह मेरा खेल है। यह भी कि फालतू का शुक्रिया अदा करने के लिए तुझे तमाचा। तू अब अपने खेल से निकल। स्टैंड पर बैठा सुस्ती कर ले। थोड़े ही दिनों में वापस अपने खेल पर जाएगा।
धूप को सौगात देने के लिए मेरे पास कुछ खयाल थे। खयालों में खयाल मैंने धूप को दे दिए। यह बात सिर्फ उस तितली को पता चली, जब उसे गाना सुनाने से रुकते मुझे देखकर बच्ची हँस पड़ी।-
– एक है प्रजाति अनोखे जानवरों की, ये उड़ नहीं सकते, पानी में रह नहीं सकते, छलांग पेड़ पर नहीं लगा सकते, दौड़ने में फिसड्डी, वजन इतना नहीं कि कोई दब जाए, दबाया भी किसी चींटी को तो उसकी चिउँटी से परेशान, साँप डँस ले तो डर से मर जाए। कमाल कि इस प्रजाति ने धरती तबाह करने की ठान ली है। एक दिमाग के बल पर।-
 
37
 
– चुस्कियों के साथ चाय के प्याले में तुम्हें पीता हूँ। सुबह आवाजें आती हैं कि तीस्ता बुला रही है, खिड़की का पर्दा हटाकर देखता हूँ कि तुम कितना छिपे और कितना उजागर मेरे लिए मुस्करा रहे हो। खबर है कि एंटार्कटिका पिघल रहा है, पर तुम घूप निकलते ही चमक-चौंधियाते रहते हो कि हम भी उस्ताद हैं। तुम्हारे साथ के दिन अब कम रह गए हैं। रोज गिनता हूँ और डरता हूँ कि जब तुमसे दूर चला जाऊंगा तो मेरे अंधेरे को कौन रोशनी देगा। हो सकता है कि अगली सदी में मैं तुम्हारी गोद में लेटते अणुओं में बस जाऊ और तुम्हें पिघलने न देने की तरकीब ढूँढूँ।
 
चारों तरफ से भयंकर आवाजें आती हैं कि यह प्रजाति गरज रही है। पैरों की थापों से, हाथ, पीठ, जंघाओं से कुचल रही तीस्ता की आवाज़। कितनी धरतियाँ तबाह होंगी, कितने ग्रह-तारे। कितनी ख्वाहिशें पूरी होंगी, कितने डर सुलझ जाएंगे, जब कायनात का यह एहसास, यह होने का, होते रहने का एहसास खत्म हो जाएगा। –
38
 
साथ जगह-जगह बिताए पिछले दिनों की कहानियां। साथ बैठकर बीयर पी, साथ में तली मछली। तितलियों की प्रजातियों की कहानियां।
सूरज छिपने के बाद थोड़ी देर तक पहाड़ आस्मान और धरती नीले रंग में रंग जाते है। फिर धीरे-धीरे सब कुछ स्याह होता जाता है। यहाँ पंछी ज्यादा नहीं हैं, जो हैं चहचहाते रहते हैं। साथ में झींगुर, मेढक वगैरह हैं। गाय बछड़े अब तक चुप हो गए हैं। मुर्गा-मुर्गीअपने छोटे लकड़ी के घरों में बंद हैं।
 
बहुत कुछ खो गया है, बीस सुस्त दिन खुद को फरेब के लिए कि खोई दुनिया वापस आ सकती है या कि जो खो गया, वह ग़ैरज़रूरी और खारिज।
39
 
 
– थकी उदास नींद। जीवन में शिकवा की गुंजाइश नहीं, फिर भी मन यह जीवन बदलना चाहता है। किसी और ग्रह में किसी और प्राण में। कुछ न करने से आती नींद। पूर्वी यूरोप की सत्तर की किसी फिल्म के नायक की तरह यातनाओं में सुबकती नींद। अंजान दुर्घटनाओं से बार-बार टूटती नींद। कुहासे के एहसास को रोम-रोम में पिरोती नींद। ठिठुरती, तड़पती नींद।-
 
देर रात तक बारिश में भीगते हुए लड़के-लड़कियों का शोरगुल। सुबह चारों ओर कचरा।
रात को फ़ोन की बैटरी मर गई। दुबारा खोलकर लगाया तो चल पड़ी।
सुबह धुंध गहरा है। पहली बार इतना घना धुंध। पहाड़ तो क्या, दस गज दूरी पर कुछ नहीं दिख रहा, पर धीरे-धीरे छँट रहा है।
हर कोई काम पर लग गया है। हर कोई कुछ न कुछ कर रहा है। मेरा निकम्मे बैठे रहना अखरता है।
 
बहुत हो गया। अब वापस।
पहाड़ हरे, कहीं नीले, बिल्कुल साफ धुले नजर आ रहे हैं। रूई जैसे बादलों के गुच्छे उनके ऊपर मँडरा रहे हैं।
 
रात के दुख। दिन के सुख-दुख। 
40
 
बर्फ पिघल रही है। हर दिन सफेद के बीच और काले धब्वे दिखने लगे हैं। कहते हैं कि पहले इससे कहीं ज्यादा दिनों तक पहाड़ बर्फ से ढँके रहते थे, पर अब बर्फ जल्दी पिघलने लगी है।
फिर कहीं जाने की तैयारी है।
– जब धरती छोड़ कर जाओगे, कितनी स्मृतियों का भार ढोओगे? सदियों बाद मिलेंगे क्या रंगीन फोटोग्राफ, डिजिटल कार्ड में सँजोए गीत? अंजान नाम वाले दरख्त, मुर्गी के बच्चे, जब कभी आती बेचैनी, मोह-माया, मिलेंगे दुबारा कभी? कुछ तो टुकड़े दिख ही जाएंगे। क्या सोचोगे तब जब यादों को छिन्न-विच्छिन्न देखोगे ?
सभी स्मृतियाँ बदलती रहती है। बचपन से किशोर और वृद्धवय तक आते-आते स्मृतियाँ नीरस हो जाती हैं। हालांकि कभी-कभी भारी हो कर बरस ही पड़ती है। बादलों की तरह हल्की नहीं होती है।
स्मृतियों को बचा रखने वाले कुछ ढूंढते रहते हैं जो कहीं नहीं होता। उन्हे ढूंढते हुए वे अपने नाक के बाल उखाड़ते रहते हैं। सोच-तड़प कर क्या होगा। स्मृतियों को तो कभी बूढ़ा होना ही था।
 
बूँदों की रिमझिम बादलों का अलाप है। मल्हार की तोड़ी में द्रुत लय में उमड़ आते हैं बादल। –
 
41
 
आखिरी दिन और रात। सुबह उठकर कूच करना है। सर्रीयल सा लगता है। अपने सभी अंदरूनी दानवों के रहते भी जीना खूबसूरत है कि यह भी संभव हुआ।
तसल्ली कि मुर्गी के पॉचों चूजे सलामत हैं। एक जो नेवला ले गया, उसका पंचतत्व विलीन वाला किस्सा रह गया।
रात :
तो क्या अपनी अपनी दुनिया से अलग बिताए इन उन्नीस दिनों ने मुझे पहले से बेहतर इंसान बना दिया? कुछ भी नहीं बदला।
जम कर बारिश हो रही है। सोया जाए।
42
 
जिनको छोड़ आया, उनके लिए मैं कौन हूँ। एक अतिथि। बच्ची को घर के बड़े मजाक में पूछते होंगे कि सर चला गया तो तुम किससे खेलोगी। मेरे रहते उसको कोई खास लगाव मुझसे नहीं था। बड़ों की समझ में आ रहा था, कि मुझे उससे लगाव है। सच यह है कि बच्चों के साथ मैं भी थोड़ी देर के बाद थकने लगता हूँ।
लौटकर कुछ दिनों तक ताज़गी रहेगी। तुमसे बात करने के लिए भी कोई तरीका ढूँढना होगा। तुम्हें समझा तो न पाऊँगा कि तुम्हारी तलाश में ही तुमसे दूर गया था।
 
43
 
आखिर में कायनात वही है जो हमारी चेतना में है। हम जो बनाते हैं, रचते हैं, सारे जीव-निर्जीव, मूर्त-अमूर्त, वही कायनात है। जो यह कायनात है, उसकी व्यथाएँ, यंत्रणाएँ, तकलीफें हैं। उस कायनात का क्या होगा, जो उसकी थी, जिसमें बात यहाँ खत्म हो गई कि वह एक औरत से ज़िंदगी साझी करेगा। क्या उसके बाद उसे ज़रूरी नहीं लगा होगा कि वह अपनी कायनात को कायम रखे, उसी तरह दर्ज़ करे, जैसे इसके पहले की बातों को उसने कायम रखा है?
यह जो मेरा दिमाग हमेशा भारी-सा रहता है, क्या यह इसलिए नहीं कि तुम्हारी तलाश में मैं इतना कमज़ोर पड़ चुका हूँ कि कुछ भी और करता हूँ तो वह माथे पर वजन सा लगता है।
वह उसके जीवन में क्या थी?
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