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सुश्री आशकारा ख़ानम ‘कश्फ़’ की ग़ज़लें

प्रख्यात कवयित्री और शिक्षाविद् सुश्री आशकारा ख़ानम ‘कश्फ़’ दिल्ली में रहती हैं। वह उनके पति, श्री सुहैब फारूकी (दिल्ली पुलिस अधिकारी) से बहुत प्रेरित हैं, जो स्वयम हिन्दी, उर्दू के प्रसिद्ध कवि व ब्लॉगर हैं। सुश्री आशकारा ख़ानम ने अपनी काव्य यात्रा ‘कश्फ़’, जिसका अर्थ उद्घटन या प्रकटन है, के क़लमी नाम से शुरू की। उनकी कविता के प्रमुख विषय प्रेम, नारीवाद और सामाजिक कुरीतियां हैं। उन्होंने बहुत कम समय में प्रसिद्धि प्राप्त की है। अब तक, वह सौ से अधिक गज़लें कह चुकी हैं जो जल्द ही प्रकाशित होंगी। सुश्री आशकारा ख़ानम ‘कश्फ़’ की गरिमामय उपस्थिति एनसीआर के मुशायरों को अलग सा निखार देती हैं-
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ज़ख़्मे दिल ज़ख़्मे जिगर है या रब
दिल्लगी मिसले शरर है या रब
(मिस्ल-समान, शरर-चिंगारी)
 
कोई अंदेशा न डर है या रब
जो तिरी हम पे नज़र है या रब
 
मौत है आख़री मंज़िल जिसकी
ज़िंदगी ऐसी डगर है या रब
 
बाद मरने के हमें ज़िंदा रखे
क्या कोई ऐसा हुनर है या रब
 
सुर्ख़ आँखों से छलकते आँसू
सोज़े पिन्हाँ का असर है या रब
(सोज़-जुनून/जज़्बात, पिन्हा-छुपा)
 
ज़ुल्मतों से है तजल्ली की उमीद
कितना नादान बशर है या रब
(ज़ुल्मत-अंधेरा, तजल्ली-तेज, बशर-मानव)
 
ख़त्म होगा कि नहीं दौरे वबा
क्या कोई ख़ैर ख़बर है या रब
(वबा-महामारी)
 
तेरी नज़रों मे बराबर हैं सभी
न कोई ज़ेर ज़बर है या रब
(ज़ेर-नीचा, ज़बर-ऊपर)
 
पंख फैलाए हुए धूप ही धूप
कोई साया न शजर है या रब
(शजर-वृक्ष)
 
बैन करने की ज़ुरूरत क्या है
हाले दिल तुझको है या रब
 
‘कश्फ़’ क्या ख़ूब इनायत है तिरी
एक सीपी मे गुहर है या रब
(इनायत-अनुग्रह, गुहर-मोती)
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ज़िक्र करे है महफ़िल महफ़िल कश्फ़ मेरी तन्हाई का
नाम नहीं लेना है मुझको अब ऐसे हरजाई का
 
चाक गरेबाँ तन पे लपेटे पैराहन रुसवाई का
तुझसे बिछड़के हाल हुआ क्या देख तिरे शैदाई का
(चाक गरेबाँ-फटा कॉलर, पैराहन-वस्त्र, शैदाई-मुग्ध)
 
लुत्फ़ो करम जब मुझपे नहीं है उस पैके रानाई का
आज मुझे अहसास हुआ है अपनी शिकस्ता पाई का
(लुत्फ़ो करम-कृपादृष्टि, पैक-बाण, रानाई-सुंदरता
शिकस्ता-टूटना पा-पैर)
 
जब दीदार न कर पाऊँ मैं जानाँ की ज़ेबाई का
या रब मुझसे छीन ले क्या करना ऐसी बीनाई का
(दीदार-दर्शन, ज़ेबाई-सुंदरता बीनाई-दृष्टि)
 
कोना कोना ख़ुश्क पड़ा है सावन मे अंगनाई का
ख़ाक उड़ाना काम हो जैसे इस ठंडी पुरवाई का
(ख़ाक-धूल)
 
जो इंसान मज़ा चख लेता है महफ़िल आराई का
हर लम्हा डसता है उसको तब गूँगी तन्हाई का
(महफ़िल आराई-सभा सजाना)
(आज मुझे एहसास हुआ है अपनी शिकस्ता पाई का शकील बदायूँनी साहब की ग़ज़ल के मतले का मिसरा है)
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One comment

  1. Satyadeo Jangid

    वाह…

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