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वीरेन्द्र प्रसाद की कुछ कविताएँ व गीत

 

भा.प्र.से. से जुड़े डॉ. वीरेन्द्र प्रसाद अर्थशास्त्र एवं वित्तीय प्रबंधन में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। वे पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर भी हैं। रचनात्मक लेखन में उनकी रुचि है। प्रस्तुत है भीड़भाड़ से दूर रहने वाले कवि-लेखक वीरेन्द्र प्रसाद की कुछ कविताएँ और गीत-जानकी पुल

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१.

मेरे जीवन का चिरन्तन
तुम्हारे पलकों का कंपन
खुलते है पलक तेरे
झुकते है पलक तेरे
जैसे किसी सपने का खिलना
तेरे अधरों का स्पंदन
तुम्हारे पलकों का कंपन।
एक किरण सपनों की दो
एक चरण मेरे घर कर दो
मेरा इष्ट, तेरे सपने का कण होना
स्पर्श तेरा जैसे विकंपन
तुम्हारे पलकों का कंपन।
जीवन का आधार बनो
कर्तव्य का श्रृंगार बनो
सब समय पराया लगता है
क्षण अपना, पलकों का झंपन
तुम्हारे पलकों का कंपन।
मेरे जीवन का चिरन्तन।

२.

यहाँ भी रह जाओगे
जब तुम चले जाओगे
जैसे रह जाती है
तृणपात पर तुहिन वन
पहली बरसात के बाद
धरती की सौंधी सुगंध
बोल तेरे खुशनुमा
बोलेगी आंखों की चमक
कुछ अधूरा सा सही,
पर दर्पण सा रह जाओगे
जब तुम चले जाओगे।
यहां भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
सकार में भी तारे
गुंचा के मुरझाने, पर भी
महक ढ़ेर सारे
मंदिर की घंटियों में तुम
नदियां भी तुम्हें पुकारे
जीवन के डगर पर
थोड़ा सा रह जाओगे
जब तुम चले जाओगे।
यहां भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
दमकती प्रार्थना मन में
वसंत के जाने के बाद भी
कलरव रहता उपवन में
तुम्हारे होने का अहसास
जीवट बनाये, पल में
सूरज के किरणों जैसे
कण-कण में बस जाओगे
जब तुम चले जाओगे।

 

३.

तुमसे मिलकर, सब कुछ कहकर
कुछ ऐसा है जो रह जाता है
तुम भी उसको मत देना स्वर ।
परछाई है मेरे पावन विश्वास की
दौलत है मेरे मूक अभ्यास की
रचना का क्रम आत्मविश्वास की
बढ़ता जाता हरपल जैसे, महीश्वर
तुम भी उसको मत देना स्वर।
वेदना जो मुझको अपनाती है
सच्चाई जो पल पल सिखलाती है
आस्था है जो रेत में भी तरी खेती है
देती है अमरता का हरपल वर
तुम भी उसको मत देना स्वर।
साथ चलो, अब दे दो अपनी वृति
इहलोक में जो हो मेरी अनुकृति
युगो युगो के बंधन की हो आकृति
साक्षी जिसके है अवनि और अंबर
तुम भी उसको मत देना स्वर
तुमसे मिलकर सब कुछ कहकर
कुछ ऐसा है जो रह जाता है
तुम भी उसको मत देना स्वर ।

 

४.

मिल गये उस जन्म में
क्या मुझे पहचान लोगे
मेरे रूह के टुकड़े हो तुम
क्या क्षण में ही जान लोगे।
चौंक कर मृगिनी सा पग धर
दौड़ पड़े पुलकित होकर
खुली लट होगी, चूमती मुख
क्या अंक भरोगे ललककर
इस जन्म के लोक लाज को
क्या हित मेरे त्याग दोगे
क्या मुझे पहचान लोगे।
युग युग के प्यास, का ख्याल
पूछेंगे मेरा हाल चाल
सासें तेरी बनके प्रभंजन
बह जायेंगे सारे सवाल
भ्रम से उपजित अभिमानों को
छोड़ मुझे स्वीकार करोगे
क्या मुझे पहचान लोगे।
प्रणय नहीं मोहताज किसी का
सकल सांझ, ताज किसी का
युग का विरह बिता कर मैंने
संभाला है अहसास किसी का
समर्पित होकर तुम अब
क्या नया इतिहास रचोगे
मिल गये उस जन्म में
क्या मुझे पहचान लोगे।

( वीरेन्द्र प्रसाद भारतीय प्रशासनिक सेवा २००४ बैच के अधिकारी हैं।)

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