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युवा लेखक अमित गुप्ता की कहानी ‘अमावस’

कल पूर्णिमा थी। आज युवा लेखक अमित गुप्ता की कहानी अमावस पढ़िए-

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अमावस की रात थी और मैं काफ़ी देर तक खिड़की की देहरी पर बैठा बारिश देख रहा था, रह-रहकर सामने नीम के पेड़ से उल्लू की बोली सुनायी पड़ रही थी। जैसे ही बारिश तेज़ होती, सामने वाले घर के लाल टीन की छत पर पड़ती बारिश की बूँदें टनन-टनन करके ज़ोर-ज़ोर से बजने लगती। ऐसे में उल्लू बोलना बंद कर देता। शायद बूँदों की इस तेज़ खड़खड़ाहट से उसका मन खीज जा रहा था।

   न जाने क्यों तेज़ बारिश की ध्वनि से मन में एक कोलाहल सा मचने लगता है, ऐसा लगता है जैसे बारिश की ये मोटी-मोटी बूँदें सामने किसी टीन की छत पर नहीं, आपके अस्तित्व के भीतरी परत पर गिर रही हैं। अक्सर जब बारिश तेज़ होने लगती है, तब नजाने क्यूँ मन खीज सा जाता है। शायद मुझे भी कोलाहल से डर लगने लगा है। शायद मुझे भी मद्धिम बारिश के स्वर में अपने मन की ख़ामोशी ज़्यादा साफ़ सुनायी देती है।

   इसी कोलाहल के बीच, मेरे साथ रहने वाली मेरी बिल्ली के घिघियाने की आवाज़ ने, मेरे मन-मस्तिष्क को और ख़ीजा दिया। अभी एक घंटे पहले ही मैंने इसे कटोरा भर दूध पीने को दिया था, जो वो ख़ुशी-ख़ुशी एक ही बार में गटक गयी थी, और फिर चुपचाप अपने निर्धारित स्थान पर जाकर सो गयी थी। लेकिन अचानक ही वो मेरे पैरों के पास आकर बैठ गयी और फिर से कातर नज़रों से मुझे देखने लगी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था, आख़िर क्या था उसकी बेचैनी का कारण – सामने नीम के पेड़ से आने वाले उल्लू की बोली, बाहर होने वाली तेज़ बारिश या फिर मेरी निर्जनता?

   एक रोज़ की बात है, रात के कुछ आठ बज रहे थे और मैं लाइब्रेरी से घर लौटा था। जब मैं अपने छोटे से बाग़ीचे से होता हुआ अपने घर के मुख्य द्वार पर पहुँचा, तो पाया, एक बिल्ली पूरी तरह से भीगी हुई मेरे दरवाज़े के पास बैठी हुई है। वो ठंड से काँप रही थी और अपनी आँखों में आशा लिए, जैसे मुझसे कहने की कोशिश कर रही थी, “बरसात की इस काली रात में मैं कहाँ जाऊँगी। मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है और साथ ही बहुत ठंड भी लग रही है। मुझे अपने घर में जगह दे दीजिए, कटोरा भर दूध दे दीजिए और सोने के लिए अपने इस बड़े से घर में एक कोना। मैं वचन देती हूँ कि मैं सुबह होते ही यहाँ से चली जाऊँगी।”

   मैंने उसे नज़रअन्दाज़ करने का निश्चय किया और अपने घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया। ड्रॉइंग रूम की बत्ती जलाने के बाद, जब मैं दरवाज़ा बंद करने के लिए पीछे मुड़ा, तो वो बिल्ली अपनी लाचार आँखों से मेरी ओर एक टक देख रही थी। मुझे उस पर दया आ गयी। एक वो दिन था और एक आज का दिन है, वो मेरे घर में, मेरी ज़िंदगी में प्रवेश कर गयी। तब से वो मेरे साथ ही रहती है। अमावस की काली रातों में, जब मेरी सुनसान ज़िंदगी मेरे अस्तित्व को ललकारती है, उस वक़्त भी वो मेरा साथ नहीं छोड़ती। कई बार मेरी पूर्व-पत्नी, जब ये देखने आती है, कि मैं अब तक ज़िंदा कैसे हूँ, मरा क्यों नहीं, उस वक़्त भी वो मेरे पास से एक क्षण के लिए नहीं हटती। ऐसा लगता है कि जैसे वो मुझे काल के प्रकोप से, रिश्ते-नातों के बंधन से और इस दुनिया की मुफ़लिसी से बचाना चाहती है। हालाँकि उसने कहा था कि वो सुबह होते ही चली जाएगी, लेकिन शायद उसकी नज़र में, मेरी ज़िंदगी में उजाला अब तलक नहीं फूटा था। इसमें ना उसका कोई दोष था और ना मेरे नसीब का।

   बिल्ली के इस घर में बस जाने के पहले ये अलाम था कि मैं रात के वक़्त उल्लू की बोली ध्यान-मग्न होकर सुनता रहता था। पर आज मेरी बिल्ली की वजह से, मेरा ध्यान उस पर से एक क्षण के लिए हट गया। और ये बात, शायद वो बर्दाश्त नहीं कर पाया। क्षण भर में वो मेरी ओर उड़कर आया और अपनी चोंच से मेरी आँखों पर वार करने लगा। उस रात के बाद से मैं एक अंधकारमयी दुःस्वप्न में जी रहा हूँ। ऐसा लगता है कि शायद मेरे हृदय-रूपी आँगन में अंधकार की कहीं कोई कमी रह गयी थी, और इसलिए भगवान ने मेरी आँखों की रोशनी छीनकर वो कसर भी पूरी कर दी।

बतलाता चलूँ कि मेरा पिछला उपन्यास एक अंधे लेखक पर आधारित था, जिसका नाम ब्रिज था। ब्रिज ने अपने अंधेपन के बावजूद भी लेखन जारी रक्खा था। हालाँकि वो ज़्यादा दिन जी नहीं पाया। उसके रचयिता ने (यानी कि मैंने) उसे ‘आत्महत्या’ करने पर मजबूर कर दिया था। एक अंधा आदमी जी तो सकता है, पर अकेलापन एक ऐसी बीमारी है जो एक स्वस्थ इंसान को भी मौत के घाट उतार देती है। क्या मैंने उसे इतना प्रताड़ित कर दिया था कि अब वो मुझे मेरे कुकर्मों की सज़ा देना चाहता था? जब मैं अध्याय-दर-अध्याय धीरे-धीरे उसके प्राणों की आहुति ले रहा था, क्या उस वक़्त वो मुझसे नाराज़ रहने लगा था? कहीं वो ये तो नहीं चाहने लगा था, कि मैं भी अंधा हो जाऊँ और उसकी ही तरह घुट-घुटकर जियूँ?

   पर ऐसा कैसे हो सकता है – वो आदमी मेरे उपन्यास का मात्र एक पात्र था; वो पात्र जिसको मैंने जन्म दिया था, और उस पात्र का वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। एक लेखक होने के नाते, मैं अपने पात्रों को जितना चाहे उतना कष्ट दे सकता हूँ; उन्हें एक ज़िंदा लाश में तब्दील कर सकता हूँ, उनको किसी पहाड़ से नीचे खाई में धकेल सकता हूँ, उन्हें तिल-तिलकर मार सकता हूँ, उन्हें एक निहायत ही घटिया इंसान बना सकता हूँ, उन्हें देवता बना सकता हूँ, कभी साधु तो कभी पिशाच बना सकता हूँ। कहानी के अनुसार मेरे जो जी में आए वो मैं, उनके साथ कर सकता हूँ। ऐसा करने का, मुझे पूरा-पूरा हक़ है।

   अंधे होने का दर्द मेरे लिए कोई नया नहीं, जब मैं वो उपन्यास लिख रहा था, तब बहुत बार ऐसा होता था कि मैं ख़ुद को एक अंधे आदमी सा महसूस करता था – पर वो कुछ ही देर के लिए ही होता था, हमेशा के लिए नहीं। पर अब ये व्यथा मेरे लिए असहनीय बन चुकी है। क्या मुझे रचने वाला, मुझे इस व्यथा से मुक्ति नहीं दिला सकता?

   ब्रिज ने ना सिर्फ़ मुझे अभिशप्त किया बल्कि हर दिन वो मेरे यहाँ आ कर मुझे यह याद दिला जाता था कि मैंने उसे कितनी तकलीफ़ें दी थीं, और काश ऐसा हो कि मेरी भी आँखें फूट जाएँ और मैं भी अंधा हो जाऊँ, फिर मुझे उसका दर्द ज्ञात होगा। तो क्या वो यह कहना चाहता था कि एक लेखक को उसके रचे हुए पात्रों के दर्द का एहसास नहीं होता?

   एक रात जब मैं एक नयी कहानी लिख रहा था, वो बाल्कनी के दरवाज़े से मेरे कमरे में दाख़िल हो गया और मुझसे कहने लगा, “तुम मेरे प्रति निरदयी थे, तुमने पूरी कोशिश की कि मैं तन्हाई की मौत मरूँ, साथ ही एक वीरान मौत भी। मैं कई दिनों तक मरके अपने कमरे में पड़ा सड़ रहा था, पर तुमने उस वक़्त भी मेरी कोई सहायता नहीं की। भाग्यवश एक दिन मेरी पूर्व-पत्नी मुझसे मिलने आयी, हालाँकि वो सिर्फ़ यह जानने के लिए आया करती थी कि मैं जीवित हूँ या मर गया। उस दिन से पहले जब भी वो मुझसे मिलने आया करती, मुझे जीवित पाकर बहुत हताश होती थी। लेकिन उस दिन शायद उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा होगा। आख़िरकार मैं मर चुका था, और मेरे वसीयत में लिक्खे उसके हिस्से की दौलत अब उसे मिलने वाली थी। पर मैं तुम्हें श्राप देता हूँ, कि ना सिर्फ़ तुम एक तनहा मौत मरोगे पर तुम अपने इस बड़े से बंगले में, जो तुमने कहानियाँ लिखकर – लोगों को पीड़ा देकर कमाए पैसों से बनाया है, उसमें महीनों तक सड़ते रहोगे। और तुम्हारी यह जो प्रिय बिल्ली है, तुम्हारे लाश की बदबू से घुटकर दम तोड़ देगी। मैं तुम्हें यह भी श्राप देता हूँ कि तुम्हारी पूर्व-पत्नी तुम्हें देखने भी नहीं आएगी, और क्यूँ आए, तुमने उसके लिए क्या रख छोड़ा है अपनी वसीयत में।”

   वो कई बार बाल्कनी से होता हुआ मेरे कमरे में दाख़िल हो जाता और मेरा तिरस्कार करके चला जाता। देर तक फिर मेरे कानों में उसकी बात गूँजती रहती, “तुम भी एक दिन अंधे हो जाओगे”। “तुम भी एक दिन अंधे हो जाओगे”।

आपलोग सोच रहे होंगे कि शायद मैं पागल हो गया हूँ और उट-पटाँग बक रहा हूँ, पर मेरा यक़ीन मानिए, मैं पागल नहीं हूँ। उस अंधे पात्र का मक़सद हमेशा से ही, मेरे एकांत में ख़लल डालना रहा है। मेरी रचनात्मकता का विरोध करना रहा है।

“आगे से तुम अपनी रचनाओं में किसी भी पात्र को ऐसे दुःख नहीं दोगे। उन्हें अपने हिसाब से जीने दोगे। उन्हें अपनी क़लम का ग़ुलाम नहीं बनाओगे और उन्हें आज़ाद रहने दोगे। सर्वोपरि तुम उन्हें ज़िंदा रक्खोगे”, ये तमाम बातें वो मुझे बार-बार कहता रहता था।

उपन्यास का दूसरा पात्र – माया, जो उस अंधे लेखक की टाइपिस्ट थी। एक रोज़ की बात है, ब्रिज अपनी गाड़ी में अपने घर लौट रहा था, रात काफ़ी हो चुकी थी और साथ ही मूसलाधार बारिश भी हो रही थी। आसमान ने जैसे एक काले रंग की शाल ओढ़ रक्खि थी, जिसमें से ना ही बिजलियाँ बाहर झाँक पा रही थीं और ना ही चाँद।

   ब्रिज की गाड़ी उसके घर की ओर मुड़ ही रही थी, कि तभी एक युवती रास्ते के बीचों-बीच आ गयी। ब्रिज ने गाड़ी की स्टीयरिंग घुमाने की पूरी कोशिश की, पर वो असफल रहा। वो उसे बचा नहीं पाया, वो युवती गाड़ी की बायीं हेडलाइट से धक्का खाकर ज़मीन पर मुँह के बल गिर पड़ी। उसके सर से लहू ऐसे बह रहा था जैसे बाढ़ का पानी घाट को छोड़कर चारों ओर बहने लगता है। रात के डेढ़ बज रहे थे और सड़क पूरी सुनसान थी, यहाँ तक कि हर रोज़ वहाँ पर जो कुत्ते दिखायी देते है; जो उसके गाड़ी के पीछे दूर तक भोंकते चले आते थे, आज वो भी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे थे। उसने उस युवती को उठाया और गाड़ी के पीछे वाली सीट पर लेटा दिया और फ़ौरन उसे पास के अस्पताल में ले गया। इमर्जेन्सी वार्ड में युवती को तुरंत दाख़िल कर लिया गया। पुलिस भी आयी, पर ब्रिज के सुप्रसिद्ध लेखक होने के कारण उसे कोई भी दिक़्क़त का सामना नहीं करना पड़ा। उसने पुलिस के कहे अनुसार सारी औपचारिकताएँ पूरी की।

   अस्पताल में उसे दाख़िल करवाने के बाद कई सारे सवाल उसके सामने आकर खड़े हो गए – आख़िर उस युवती के घरवालों को कैसे ख़बर करूँ? यह युवती इतनी रात गए ऐसे सुनसान सड़क पर अकेली क्या कर रही थी? जब उसे होश आएगा, तो क्या वो उसका सामना कर पाएगा? सर पे इतनी गहरी चोट लगने के बाद कहीं उसकी याददाश्त चली गयी तो? ये सारे सवाल उसके दिल में बिजली के समान कौंध रहे थे, गोया प्रश्न ना हों बरसात की मोटी-मोटी बूँदें हों जो टीन के छत पर गिरकर आपको ख़िजाते हैं।

   ब्रिज अस्पताल के वेटिंग रूम में बैठा था। हर पाँच मिनट में उसकी नज़र दीवार पर टँगी घड़ी पर जाती, और जैसे-जैसे समय बीतता जाता, उसकी व्याकुलता बढ़ती चली जाती। जब वो रातों को लिख नहीं पाता था, तब भी वो इतना बेचैन नहीं रहता था जितना अधीर वो इस वक़्त हो रहा था। अस्पताल के इस वेटिंग रूम में एक अज्ञात सी ख़ामोशी चारों ओर फैली हुई थी। इस वक़्त उसके अलावा वहाँ बस काल का अभागा चेहरा मौजूद था।

भोर के तीन बज रहे थे और बारिश अब रुक चुकी थी। चाँद की मद्धिम रोशनी आसमान में चारों ओर छिटकी हुई थी, रह-रहकर बादलों के हटने से इकहरी सी चाँदनी अस्पताल के वेटिंग रूम की खिड़की पर आकर ठहर जा रही थी।

“आपको डॉक्टर साब बुला रहे हैं”, एक नर्स ने आकर ब्रिज को सूचित किया।

ब्रिज तुरंत ही डॉक्टर के चेम्बर पहुँचा और दरवाज़े पर दस्तक दी।

“कम-इन”, अंदर से डॉक्टर ने उत्तर दिया।

“आइए ब्रिज बाबू, बैठिए।”

“धन्यवाद डॉक्टर साब”, कहते हुए ब्रिज एक कुर्सी खींचकर बैठ गया। “अब कैसी है वो युवती?” ब्रिज की आवाज़ में कौतुहल था और आँखें डॉक्टर पर गड़ी हुई थीं।

“उसके सर पर गहरी चोट आयी है, अठारह टाँके पड़े हैं, और…”, कहते-कहते डॉक्टर साब रुक गए और एक लम्बी साँस ली।

“और क्या डॉक्टर साब?” ब्रिज ने तुरंत पूछा।

“मुझे अफ़सोस है, उसकी दोनों टाँगे हमें उसके घुटने से काटनी पड़ी। अब वो कभी चल-फिर नहीं पाएगी।”

ब्रिज के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गयी, जैसे उस युवती के नहीं, उसके पैर किसी ने उसके शरीर से काटकर अलग कर दिए हों। यह उसके हाथों से क्या हो गया?

“अब मैं क्या करूँ डॉक्टर साब, मैं तो उस युवती को जानता तक नहीं?” ब्रिज ने कहा।

“मैं आपकी अवस्था समझ सकता हूँ। उसके पास हमें कोई पर्स इत्यादि भी नहीं मिला, जिससे हमलोग उसके घरवालों के बारे में कुछ पता लगा सकते।”

“तो फिर, अब आगे क्या डॉक्टर साब?”

“मरीज़ की हालत को देखते हुए, हमें इन्हें यहाँ कम-से-कम तीन से चार हफ़्ते रखना होगा। आप इन्हें देखने आते रहिए और इसी दौरान इनके लिए कोई महिला आश्रम ढूँढ़ने की कोशिश कीजिए। मैं कुछ संस्थानों के नाम आपको लिखकर दे दूँगा।”

“धन्यवाद डॉक्टर साब। क्या मैं उसे देख सकता हूँ?”

“अभी तो नहीं। मैंने नींद की गोली दी है ताकि दर्द का एहसास ना हो। आप एक काम कीजिए, कल सुबह दस बजे आ जाइए। मिलने का समय दस बजे से दोपहर के दो बजे तक होता है।”

“जी, बहुत अच्छा। मैं कल दस बजे ही आ जाऊँगा। धन्यवाद”, ब्रिज ने डॉक्टर से विदा ली और कमरे के बाहर आ गया।

भोर अपनी आँखें खोल चुकी थी, पर हवा अब भी अप्रकाशित थी, गोया हवा का एकमात्र उद्देश्य जैसे उसके धमनियों को छेड़ना था। आसमान में एक अनिश्चित उजाला तैर रहा था – कहीं भी कुछ साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। कैलेंडर के हिसाब से अगर देखा जाए तो एक नया दिन आँखें खोलकर ब्रिज की ओर देख रहा था, पर अगर रात की घटना स्वरूप देखा जाए, तो बीता हुआ मनहूस कल उसके समक्ष सर उठाए खड़ा था, और उसकी दयनीय स्तिथि पर हँस रहा था। ब्रिज अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा, गाड़ी की बायीं हेडलाइट टूट चुकी थी, बॉनेट पर काफ़ी जगहों पर डेंट था और कहीं-कहीं पर ख़ून के धब्बे भी, जो अब सूखकर पपड़ी बन चुके थे। हेडलाइट तो बदल जाएगी, बॉनेट की भी मरम्मत हो जाएगी, पर यह ख़ून के धब्बे, यह तो रंगाई-पुताई के बाद भी नहीं जाएँगे मेरे आँखों से, ब्रिज ने मन-ही-मन सोचा।

ब्रिज का मन इस समय बहुत विचलित था, और ऐसे में उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। उसने गाड़ी स्टार्ट की और हाइवे की ओर निकल गया। घड़ी में पाँच बज रहे थे और लोग अपने घरों से सैर-सपाटे के लिए निकल रहे थे। ऐक्सिडेंट का दृश्य बार-बार ब्रिज के आँखों के सामने आ रहा था। बॉनेट और गाड़ी पर लगे ख़ून के धब्बे उसकी आँखों के सामने एक अनकट फ़िल्म की तरह चल रहे थे।

   ब्रिज अब हाइवे पहुँच चुका था। वो इस वक़्त घर नहीं जाना चाहता था, सो वो सुनसान हाइवे पर बहुत धीमी गति में अपनी गाड़ी चलाता हुआ जा रहा था। दिन का उजाला धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगा था, सड़क के किनारे खड़े दरख़्त, ऐसे लग रहे थे जैसे गहरी सोच में डूबे लोग। कैसे उजाला होते ही सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता है, लेकिन, ब्रिज के सामने अब भी पिछली रात का अंधेरा बरक़रार था।

   अचानक उसने देखा कि उसकी गाड़ी के सामने एक ट्रक बहुत धीमी गति से चल रहा है। उस ट्रक में एक युवती व्हील-चेयर में बैठी हुई है और उसकी ओर घूर रही है। ब्रिज को बहुत ताज्जुब हुआ, ग़ौर से देखने पर पता चला, वो वही लड़की थी जो कल रात उसकी गाड़ी के सामने आ गयी थी। ब्रिज ये दृश्य देख घबरा गया और तुरंत उस ट्रक को ओवर्टेक कर लिया। जैसे ही वो उस ट्रक को ओवर्टेक करके उसके आगे पहुँचा, उसके सामने एक और ट्रक धीमी गति में चलता हुआ नज़र आया। इस ट्रक में कई व्हील-चेयर थे और हर एक में वो युवती बैठी हुई थी। उन सबके चेहरे के भाव लेकिन, अलग-अलग थे – किसी में पीड़ा तो किसी में यातना का भाव था, किसी में उदासी तो किसी में अधीरता, किसी में ग़ुस्सा तो किसी में लाचारी।

   उनमें से कुछ तो ब्रिज को देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने भी लगी थीं। ब्रिज का दिमाग़ अब काम नहीं कर रहा था। क्या वो इतना व्याकुल था कि उसे ऐसा भ्रम हो रहा था? एक-आ-एक उसकी नज़र गाड़ी के दाएँ रीयर-व्यू मिरर पर पड़ी, उसकी गाड़ी के पीछे भी एक ट्रक उसका पीछा कर रहा था और उस ट्रक के छत पर उस युवती के जैसे दिखने वाले ढेरों लोग बैसाखी लिए खड़े उसे घूर रहे थे। उसने फिर ऐक्सेलरेटर दबाया और अपने सामने वाले ट्रक को ओवर्टेक कर लिया, पर यह क्या, सामने एक और ट्रक था जिसमें उस युवती जैसे दिखने वाले अनेक लोग थे। क्या ब्रिज अपना दिमाग़ी संतुलन खो रहा था? वो जिस ओर भी देखता, उसे एक ट्रक दिखायी देता जिसमें उस युवती की शक़्ल के लोग या तो व्हील-चेयर में या फिर बैसाखी लिए उसे घूरते हुए नज़र आ रहे थे। ब्रिज एक के बाद एक ट्रकों को ओवर्टेक करता चला गया पर हर बार ही उसे अपने आगे और पीछे ट्रक नज़र आते रहे। वो सब युवतियाँ एक साथ मिलकर चिल्लाने लगीं, “तुमने मुझे अपाहिज बना दिया, मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी। तुमने मुझे एक ज़िंदा-लाश बना दिया। तुम एक ख़ूनी हो, तुम एक ख़ूनी हो।”

ब्रिज अपनी गाड़ी रोकना चाहता था, पर उसे यह डर था कि उसके गाड़ी रोकते ही कहीं उसके आगे और पीछे के ट्रक उसकी गाड़ी को कुचल ना दें। “तुम एक ख़ूनी हो”, यह नारा उसके कानों में लगातार गूँजकर उसे पागल बना रहा था। एक भयावह सा अंधेरा उसके आँखों के सामने छा गया।

   अँधेरा अब भी ब्रिज का पीछा कर रहा था और सूर्य उदय होने में अब भी काफ़ी वक़्त था। इसी उधेड़-बुन में ब्रिज ने अपनी आँखें एक क्षण के लिए मूँद लीं, और उसकी गाड़ी बेक़ाबू होकर हाइवे के डिवाइडर से जाकर टकरा गयी।

ब्रिज की जब आँखें खुली तो उसे बताया गया कि वो अस्पताल में है। ऐक्सिडेंट होने की वजह से उसके सर पर गहरी चोट आयी है, और उसके आँखों की रोशनी… [यहाँ कुछ शब्द मिसिंग हैं ]।

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2 comments

  1. जानकीपुल, नमस्कार…आपके चैनल पर रचना को पोस्ट करने का तरीका क्या ?आज तक समझ नहीं आया, कृपया बताएं …

    • Prabhat Ranjan

      आपको मेल से रचनाएँ भेजनी होंगी। अगर कविताएँ हैं तो बिलकुल नहीं

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