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इरशाद खान सिकंदर की कहानी ‘मदारी’

इरशाद ख़ान सिकन्दर जाने पहचाने युवा शायर हैं। वे उन शायरों में हैं जो गद्य भी अच्छा लिखते हैं। जैसे यह कहानी पढ़िए। एक अलग मिज़ाज की कहानी जो पूरी रवानी के साथ चलती है। आप भी पढ़िए-

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तमाशबीन!

वो एक तमाशबीन था।सर से पाँव तक तमाशबीन ही तमाशबीन।चेहरे-मोहरे से औसत क़द-काठी से साधारण हाव-भाव से दीन-हीन।तमाम हरामीपन के बावजूद उसके पूरे अस्तित्व से शराफ़त टपकती थी।इसे वो अपनी ख़ूबियों में शुमार करता था।
उसका मानना था कि सारी कायनात क़दम दर क़दम एक तमाशा है।धर्म,संगठन,मुल्क, सरहद सब एक मज़ेदार तमाशा। एक अच्छे तमाशबीन का काम है कि वो अपने अन्दर जितनी देखने की संभावनाएँ हों, जितनी भी आँखें हों सबको एकत्रित और एकाग्र करके देखने के काम पर लगा दे अन्यथा वो स्वयं  एक तमाशा बनकर रह जायेगा और मनुष्य का तमाशा बनना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं। तमाशा यानी खेल! देखना ही है तो क़ुदरत का तमाशा देखा जाय। नेचर ने हमारे लिए एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज़  तमाशे पैदा किये हैं उन्हीं को देखने और समझने के लिए ज़िन्दगी बहुत कम है। फिर हमें ख़ुद को तमाशा बनाने की क्या ज़रूरत है?
वो पेशे से पत्रकार था उसका ये भी मानना था कि एक अच्छा पत्रकार वही है जो सच्चा तमाशबीन हो।जिसकी सभी आँखें खुली हुई हों।
उसकी जीवन,दर्शन और प्रकृति पर  अपनी अलग तरह की राय थी जिसे वो केवल उन लोगों से साझा करता था जिनमें भविष्य में अच्छे तमाशबीन बनने की भरपूर सम्भावना नज़र आती थी। जैसे कि मैं। वो कहता था कि जमूरा होना भी कोई बुरी बात नहीं है लेकिन बुरा जमूरा होना बुरी बात है। फिर वो अच्छा जमूरा कौन है इस पर अपनी राय ज़ाहिर करता।
‘’अच्छा जमूरा वो है जिसके अन्दर एक मदारी भी हो और एक तमाशबीन भी’’।
अच्छे मदारी पर भी उसकी व्यक्तिगत राय थी।
‘’अच्छा मदारी वो है जो अपने जमूरे और तमाशबीन से चार क़दम आगे हो अगर तमाशबीन या जमूरा मदारी के बराबर भी आ जाँय तो मदारी को तमाशा बन्द कर देना चाहिए’’।
उसकी एक सबसे अच्छी बात ये थी कि दुनिया जहान के तमाम विषयों पर अपनी अलग राय रखने के बावजूद वो अपने विचार किसी पर थोपता नहीं था।मसलन यदि वो कहता-
‘’देखिये भइ ये देश से मुहब्बत, अपने गाँव घर मिट्टी से मुहब्बत, ये सब तो नेचुरल बात है। हम जिस देश जिस मिट्टी जिन लोगों के बीच रहते हैं उनसे तो लगाव स्वभाविक रूप से होता ही है लेकिन ये देशभक्ति लफ़्ज़ मुझे समझ नहीं आता। मुझे तो ये जगह-जगह जो सरहदें बनी हैं …बॉर्डर..ये बॉर्डर भी मैं समझता हूँ कि अच्छी बात नहीं हैं…और ये मज़हब-वज़हब भी एक तरह का बॉर्डर ही तो है..बॉर्डर क्या बल्कि कोई ऐसी चीज़ है जो इन्सानियत की जड़ में मट्ठा डालने का काम करती है..सारा निज़ाम तहस-नहस कर  देती है..मैं तो कहता हूँ अगर तमाम दुनिया के लोग एक साथ नास्तिक हो जाँय तो आधे मसअले यहीं ख़त्म समझिये।लेकिन ये मुमकिन नहीं है इसी तरह दुनिया भर में ये जो..तमाम तरह के संगठन हैं तंज़ीमें हैं..इनमें भी शामिल होना मेरी समझ से बेवक़ूफ़ी है। इसका कारण जो मैंने अनुभव किया है वो ये है कि कोई भी संगठन कितने ही पवित्र उद्देश्य से क्यों न आरम्भ हुआ हो? अधिक समय तक पवित्र रह नहीं पाता। इसलिए जहाँ तक संभव हो इनसे बचना चाहिए। व्यक्ति हमेशा तमाशबीन बना रहे, हमेशा सब कुछ ध्यान से देखता रहे यही उचित है।बल्कि मैं तो इस बात का क़ायल हूँ कि आदमी या तो सच्चा तमाशबीन हो या मूर्ख।सच्चा  तमाशबीन विवेकशील होता है। जो विवेकशील होगा वो खोजी भी होगा और विवेक द्वारा की गयी कोई खोज, जहाँ तक मैं समझता हूँ कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगी। किसी को भी।
अच्छा! जो सच्चा मूर्ख है वो भी  सिवाए अपने किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाता।
नुक़सान पहुँचाते हैं ये बीच वाले लोग जो थोड़े से विवेकवान और थोड़े से मूर्ख होते हैं यही बीचवाले लोग ही धर्म,संगठन,सरहद,मुल्क और न जाने क्या क्या उत्पात मचाते हैं’’।
तो इन सारी बातों के बाद वो ये भी कहता कि-
‘’देखो भइ ये मेरे अपने अनुभव और व्यक्तिगत विचार हैं। तुम अपने विवेक से सोचकर देखो! कुछ नयी बात दिखे तो मुझे भी बताना’’।
वो घमण्ड नहीं बल्कि पूरे आत्मविश्वास से ख़ुद को सच्चा तमाशबीन कहता था। इसका कारण ये था कि उसने आज तक जितने भी तमाशे देखे थे। उन सभी तमाशों की जड़ तक पहुँच गया था। ख़ुफ़िया एजेंसीज़,जासूसी कम्पनियाँ और न जाने कितने धुरन्धरों को मात देता हुआ उस मक़ाम पर कि जहाँ मदारी को तमाशा बन्द कर देना चाहिए।
अपनी तमाशबीनी पर उसे बहुत नाज़ था अक्सर वो अपने आप से कहता-
‘’ऐ काश कि जिस दिन मैं किसी तमाशे का तिलस्म न समझ पाऊँ उस दिन मेरा खेल ख़त्म हो जाए’’
इन सबके बावजूद वो किसी तमाशे का राज़ जल्दी किसी से शेयर नहीं करता था वो कहता था।
‘’देखो भइ बहुत से ऐसे तमाशे हैं जिनका अगर मैं राज़फ़ाश कर दूँ तो तमाशा ख़त्म हो न हो मेरी ज़िन्दगी ज़रूर ख़त्म कर दी जाएगी।अब ये जानते हुए कि फ़लाँ काम करने से मुझे मार दिया जाएगा फिर भी करना.. मैं समझता हूँ कि ये भी एक तरह से ख़ुदकुशी करना है…और मुआफ़ कीजियेगा मुझे ख़ुदकुशी पसन्द नहीं… ।अब इसका मतलब ये भी नहीं है कि मैं राज़फ़ाश नहीं करूँगा…करूँगा, लेकिन अभी ज़िन्दगी तो जी लूँ। अभी तो सिर्फ़ चालीस का हूँ मैं। जब जाने का समय होगा तो आनेवाले तमाशबीनों के लिए  पिछले तमाशों का सब हाल दर्ज करके चला जाऊँगा… ।आप मुझे डरपोक कहेंगे। तो हाँ मैं डरपोक हूँ तमाशबीन का बहुत अधिक बहादुर होना कोई अच्छी बात नहीं है’’।

तमाशबीन मुझपर विशेष कृपा रखता था। वो अक्सर कहता था-
‘’देखो मियाँ जहाँ तक मैं समझता हूँ कि तुममें  एक अच्छा तमाशबीन छुपा हुआ है और यही कारण है कि मैं तुमसे बहुत सी बातें साझा कर लेता हूँ.. ।मन की कहूँ तो तुमसे डर नहीं लगता।‘’
वाक़ई वो मुझपर इतना भरोसा करता था कि कभी-कभी किसी तमाशे का कुछ हिस्सा मुझे सुना भी देता था। लेकिन बिना किरदारों के नाम बताये या नाम बदलकर।
मैंने आज तक उसके जैसा तमाशबीन नहीं देखा।तमाशा कहीं भी हो जैसे-तैसे अक्सर वो वहाँ पहुँच ही जाता था और काफ़ी समय से मुझे ये लगने लगा था कि तमाशे उसे आवाज़ देते हैं।
कुछ बरस पहले की बात है एक रात अपने कमरे में लेटा वो रेडियो सुन रहा था। रेडियो पर तलत महमूद द्वारा गाया गीत बज रहा था ‘’ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो …अपना पराया मेहरबाँ नामेहरबाँ कोई न हो..’’ । गीत सुनते-सुनते उसे जाने क्या सूझी कि वो अचानक बिस्तर से उठा, तैयार हुआ और रेलवेस्टेशन पहुँच गया। स्टेशन पहुँचकर उसने तय किया कि जो कोई ट्रेन सबसे पहले मिल गयी चाहे वो कहीं भी जाती हो उसी में बैठना है और ट्रेन जहाँ जाये वहाँ चले जाना है उसके आगे का उसके आगे सोचेंगे। सो उसने यही किया एक अनजान ट्रेन में सवार होकर एक अनजान शहर पहुँच गया। जहाँ एक तमाशा उसका मुन्तज़िर था। उसने न सिर्फ़ तमाशा देखा बल्कि बरसों की मेहनत के बाद तमाशे की जड़ तक भी पहुँच गया और एक दिन आने वाले तमाशबीनों के लिए उसे अपनी डायरी में दर्ज कर दिया। ये बात तमाशबीन ने ही एक रात शराब पीते हुए बहुत जज़्बाती लहजे में मुझे बताई थी। बात-चीत की शुरुआत उसने कुछ इस तरह की थी।
‘’मियाँ मैं फ़ाइन आर्ट के लोगों की बहुत इज़्ज़त करता था। मुझे लगता था कि..दुनिया का अस्तित्व इन्हीं की वजह से है…दुनिया में जहाँ कहीं भी थोड़ी सी सुन्दरता, थोड़ी सी इन्सानियत क़ायम है वो सब इनके ही कारण है लेकिन मुआफ़ कीजियेगा इनके यहाँ भी एक से एक मादर….भरे पड़े हैं। देखो.. मैं भी कोई बहुत अच्छा आदमी नहीं हूँ लेकिन इनके जितना ख़राब भी नहीं हूँ …एक तमाशा सुनो… ।
उस मदारी..कौन सी गाली दूँ स्साले को …छोड़ो ऐसे नीच लोगों का नाम लेकर क्या अपनी ज़बान ख़राब करूँ?आज भो….का बहुत बड़ा अदीब बना फिरता है। सरकार भी इन्हीं लोगों को सर पर बिठाती है। जनता को मैं दोष नहीं देता जनता तो भोली है उसे कुछ पता ही नहीं..जनता भी जमूरा है जमूरा… लेकिन बुरा जमूरा …तुम जानते हो न अच्छा जमूरा कौन होता है?’’ ।
मैंने हाँ में गर्दन हिलाई।
वो शराब पीने के बाद गालियाँ बहुत बकता था संभवतः इसी तरह उसका आक्रोश कम होता हो। मैं शराब नहीं पीता था फिर भी कोल्ड ड्रिंक का पैग बनाये हुए अक्सर उसका साथ निभाता। ऐसा मैं स्वार्थवश करता था क्योंकि वो किसी तमाशे का आधा या कभी-कभी पूरा टुकड़ा उसी दरमियान सुनाता था। ये क़िस्सा भी उसने ऐसी ही एक शाम को टुकड़ों-टुकड़ों में गालियों के चखने के साथ सुनाया था।अफ़सोस बस इतना है कि उसने मुख्य किरदार और शहर का नाम नहीं बताया । मैं उसकी बात को अपने लफ़्ज़ों में रखने की कोशिश कर रहा रहा हूँ क्योंकि यदि उसके लफ़्ज़ों में रखा तो शायद आपको गालियों के अलावा कुछ समझ में न आये।

जमूरा
तमाशबीन उसे ध्यानपूर्वक देखता रहा। मोटा थुलथुल बदन,छोटे-छोटे सफ़ेद बाल, झुर्रियों भरा किन्तु आकर्षक चेहरा, दशकों का दौरा कर चुकी स्वप्निल आँखें,पतली सी ज़ंजीर के माध्यम से गले में लटकता हुआ गोल शीशों वाला चश्मा, नंगे पाँव,लिबास के नाम पर गन्दी सी मैक्सी,कन्धे से लटकती हुई एक बड़ी सी गठरी,छोटी सी लाठी टेकती कभी बैठकर सुस्ताती कभी हिलती-डुलती डगमग चलती हुई एक बूढ़ी औरत।
आख़िर कौन है ये बुढ़िया? तमाशबीन की जिज्ञासा जाग चुकी थी उसने अपनी सारी आँखों को इकठ्ठा किया और खोज में लग गया।कौन है?क्यों है?यहाँ क्या कर रही है? तमाशबीन को अपने सारे प्रश्नों का उत्तर चाहिए था। उसे तमाशा मुकम्मल ही देखना था।दूर तक  घना अँधेरा होने के बावजूद वो ठहरा नहीं बल्कि सँभलता हुआ आगे बढ़ने लगा। चलते-चलते आख़िर उसे अँधेरे में जुगनू का साथ मिल ही गया।

बुढ़िया की रात मन्दिर के पिछवाड़े गुज़रती थी। एक टाट की तनी हुई छत, एक बोरी का बिछा हुआ बेड,कुछ पुराने-धुराने कपड़े,कथरी कम्बल,रद्दी सी एक कॉपी,पेंसिल,एक प्लास्टिक की बोतल,कुछ कुल्हड़, ये थी बुढ़िया की सारी गृहस्थी। कभी मन्दिर से प्रसाद की पूरियाँ, तो कभी आस-पास के रेड़ी-पटरी वाले कुछ फल इत्यादि दे जाते इस तरह भोजन की आवश्यकता पूरी हो जाती। किसी रोज़ कुछ न मिले तो भूखी ही सो जाती। उसकी ग़ैरत ने कभी भीख माँगना गवारा न किया। मन्दिर से थोड़ी दूरी पर एक पब्लिक लाइब्रेरी थी।दिन सारा लाइब्रेरी में कुछ न कुछ पढ़ते हुए गुज़रता था।यानी बुढ़िया पढ़ी लिखी भी थी।तमाशबीन की दिलचस्पी बढ़ चुकी थी।
बुढ़िया के बारे में किसी को भी कोई जानकारी नहीं थी।किसी को उसमें दिलचस्पी भी नहीं थी।बुढ़िया तुनकमिज़ाज इतनी थी कि कुछ पूछने पर टेढ़ा ही जवाब देती मसलन किसी ने पूछ ही लिया।
‘’और अम्मा कैसी हैं आप?’’। तो उसका जवाब होता
‘’साहबज़ादे ज़बरदस्ती के रिश्ते बनाने से बेहतर है आप अपने घर जाएँ और अपनी अम्मा की ख़ैरीयत पूछें’’।
फिर देर तक डगमग-डगमग चलते हुए जाने क्या बुदबुदाती रहती। उसकी चाल उन नन्हें बच्चों की तरह थी जो नया-नया चलना शुरू करते हैं।और देखने वालों को लगता है अब गिरे कि तब गिरे…गिर भी पड़ते हैं। लेकिन बुढ़िया की अच्छी बात ये थी कि वो गिरती नहीं थी। वो चलती थी लेकिन न जाने कहाँ पहुँचने के लिए और न जाने कबसे चल रही थी। अपने आशियाने में बैठी कॉपी पर न जाने क्या लिखती थी। अपने कन्धे पर लटकी गठरी जो लगभग  उसके जिस्म का हिस्सा बन चुकी थी न जाने क्या ख़ज़ाना छुपा रखा था उसमें। इस तमाशे का कोई भी सिरा तमाशबीन की पकड़ में नहीं आ रहा था।आता भी कैसे ? अभी तक मदारी की इंट्री जो नहीं हुई थी। तमाशबीन के लिए ये अनजान शहर था लेकिन ग़नीमत ये थी कि उसके बजट में था। वो चार दिन यहाँ गुज़ार चुका था। अभी दो दिन और आराम से गुज़र सकते थे।

तमाशा..मुआफ़ कीजियेगा मुशायरा शुरू हो चुका था। लाइब्रेरी के छोटे से सभागार में कोई बीस-तीस लोग सुननेवाले थे। मुशायरा ख़त्म होने पर पता लगा कि सुननेवाला तो सिर्फ़ तमाशबीन था बाक़ी सब शायर थे।शायर भी सब वैसे ही थे जिनकी वजह से शायरों पर सैकड़ों लतीफ़े समाज में प्रचलित हैं। जो नाज़िम थे वो बारी-बारी सबको तीन-तीन हाथ लम्बी तक़रीरों के साथ बुलाते रहे। लोग आते रहे और शायरी के अलावा सबकुछ सुनाते रहे।बुढ़िया भी सुननेवालों में बैठी हुई थी।और उसकी वजह से तमाशबीन भी बैठा हुआ था।बुढ़िया हर शायर के कलाम पर नाक-भौं सिकोड़ती और लगातार बुदबुदाती रही।आख़िर में नाज़िमे-मुशायरा ने अपना कलाम पढ़ा। उनका सब्र,कलाम,क़द-काठी चेहरा,दाढ़ी और लफ़्फ़ाज़ी का तरीक़ा चीख़-चीख़कर बयान कर रहा था कि वो मूलतः आदमी तो सियासत के हैं पर ग़लती से अदब में आ गये हैं।ख़ैर उन्होंने अपना हुनर ज़ाया नहीं जाने दिया और आगे चलकर अदब में सियासत की मिसाल क़ायम की।नाज़िम ने अपना कलाम पढ़ने के बाद जो कहा वो तमाशबीन को बयकवक़्त ख़ुशी और हैरत से भर गया।उसे अँधेरे में उजाले की किरण यानी अपनी खोज का पहला सिरा मिल चुका था।
‘’हज़रात अब हम इस मुशायरे के मक़ते पर आ पहुँचे हैं और अब मैं जिस हस्ती को दावते-सुख़न देना चाहता हूँ  उसके बारे में कुछ भी कहना सूरज को चराग़ दिखाने जैसा होगा।इसलिए मैं कुछ भी न बोलते हुए सिर्फ़ दस्त-बस्ता गुज़ारिश करूँगा अपनी बड़ी बहन, अपनी बाजी, इज़्ज़तमआब मुहतरमा सलमा निगार साहिबा से कि वो आयें और अपने कलाम से नवाज़ें’’।
तमाशबीन ने देखा कि बुढ़िया ने पढ़ने से इनकार कर दिया और उसके बाद सभी मिलकर उससे गुज़ारिश करने लगे।
‘’प्लीज़ आपा एक ग़ज़ल…प्लीज़ आपा’’
बड़ी मान-मनव्वल के बाद वो एक ग़ज़ल पढ़ने को राज़ी हुई। स्टेज पर जाते हुए उसे किसी ने सहारा देने की कोशिश की तो हाथ झटक दिया। तमाशबीन को ख़ुशी थी कि चलो कम से कम बुढ़िया का नाम तो पता चला। उसे हैरत तब हुई जब बुढ़िया ने अपनी कोयल जैसी मधुर आवाज़ में तरन्नुम से ग़ज़ल का मतला पढ़ा-

आसमाँ अपने क़दमों में था एक टुकड़ा ज़मीं अब नहीं
तेरी ख़्वाहिश बहुत थी हमें तेरी ख़्वाहिश नहीं अब नहीं

मदारी!
तमाशबीन ने मन ही मन सोचा कि ये बेवक़ूफ़ सा दिखने वाला आदमी मदारी कैसे हो सकता है? फिर तत्काल ख़ुद को करेक्ट किया ‘’नहीं…नहीं ठीक है मदारी दिखने में बेवक़ूफ़ ही लगना चाहिए’’। तमाशबीन के पास इस शहर में दो दिन ही टिकने का बजट था। वो जान चुका था कि तमाशा मुकम्मल देखने के लिए उसे इस शहर में बार-बार आना पड़ेगा। बार-बार आना यानी ख़ूब सारा पैसा ख़ूब सारे पैसे के लिए ख़ूब सारा काम। ये सब कैसे होगा? तमाशबीन ने सोचा कि ज़ियादा सोचना ठीक नहीं है। अभी दो दिन हैं। पहले दो दिन का भरपूर इस्तेमाल कर लिया जाय। कम अज़ कम  नाज़िम..मुआफ़ कीजियेगा मदारी के बारे में कुछ तो जानकारी जुटाई जाए।

मदारी उस शहर के रसूख़दार  लोगों में था। शहर के कई इलाक़ों में उसके बड़े-बड़े मकान थे जिससे लाखों का किराया आता था। पेशे से वकील था लेकिन क़ानून से ज़ियादा उसे शायरी में दिलचस्पी थी। उसका सबसे बड़ा दुख ये था कि शायरी को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।मदारी का क़द दरमियाना,बदन और चेहरा दोनों गोल,
आधे से ज़ियादा सर के बाल उड़े हुए,रंग गेहुआँ और उम्र लगभग 45 के आसपास रही होगी। वो जब अपना काला कोट पहनकर स्कूटर चलाता हुआ घर से कचहरी की तरफ़ रवाना होता तो तमाम सफ़ेदपोश, ख़ाकीपोश यहाँ तक कि बन्दर भालू नचाने वाले छोटे मदारी भी उसे सलाम ठोकते थे। शायद वो उसे अपना उस्ताद समझते होंगे। मदारी स्वभाव से मीठी छुरी था। वो जिसे चाहता था मुहब्बत से काट लेता था और कटने वाला शख़्स मदारी का शुक्रिया भी अदा करता था।लेकिन सलमा निगार नाम की बुढ़िया से वो हार रहा था। बुढ़िया कटने को ही राज़ी न थी। मदारी दिन में एक बार बुढ़िया के पास चक्कर ज़रूर लगाता और अपनी ज़नाना आवाज़ में गुज़ारिश करता।
‘’बाजी चलिए न! आपको  इस हालत में यहाँ देखना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता’’।
बुढ़िया तुनकमिज़ाज तो थी ही वो बेरुख़ी से कहती
‘’साहबज़ादे अच्छा नहीं लगता तो मत देखो और देखना ही चाहते हो तो तुम्हारे शहर में और भी बेसहारा लोग हैं जिन्हें तुम बरसों से जानते भी हो पहले उन्हें देखो। मुझ अजनबी से ही इतनी हमदर्दी क्यों?’’
‘’बाजी ऐसा न कहिए आप शायद समझती नहीं हैं कि आप हमारे लिए क्या हैं’’।
‘’तो पहले मुझे समझ लेने दीजिये जल्दी क्या है’’?।
बुढ़िया मदारी के लिए चुनौती बनी हुई थी। हिन्दुस्तान में एक जुमला अलग-अलग इलाक़ों में अलग-अलग जातियों के साथ मशहूर है कि फ़लाँ अंग्रेज़ ने कहा था फ़लाँ जाति का व्यक्ति और किंग कोबरा दोनों एक साथ मिल जाएँ तो फ़लाँ जाति के व्यक्ति को पहले मारो क्योंकि किंग कोबरा से बच सकते हैं लेकिन फ़लाँ जाति के व्यक्ति का काटा तो पानी भी नहीं माँगता। पता नहीं इस जुमले में कितनी सच्चाई है। लेकिन तमाशबीन ने महसूस किया कि ये मदारी किसी भी किंग कोबरा को मात दे सकता है इसका काटा सचमुच पानी नहीं माँग पायेगा। तमाशबीन ख़ुश भी हुआ कि मदारी हो तो ऐसा हो और चिन्तित भी हुआ कि इस शहर में बार-बार आना तो बहुत मुश्किल है।

तमाशबीन ने मुझे मदारी का नाम नहीं बताया और न ही ये राज़ बताया कि वो तमाशे की जड़ तक कैसे पहुँचा लेकिन इतना बताया कि कुछ समय बाद उसने उसी शहर में मदारी का ही मकान किराये पर ले लिया और वहाँ के एक लोकल अख़बार में नौकरी ढूँढ ली। तमाशबीन ने एक रोज़ देखा कि पुलिसवाले उस इलाक़े में जहाँ सलमा निगार रहती थीं, सभी को फुटपाथ से हटा रहे हैं। सलमा निगार पिछले दो दिन से बीमार थीं। इसी वजह से वो लाइब्रेरी भी नहीं जा पा रही थीं। वो कुछ समझ नहीं पा रही थीं कि क्या करें? कहाँ जाएँ? और कमबख़्त पुलिसवाले बदतमीज़ी पर उतर आये थे।ऐसे में अचानक मसीहा बनकर मदारी प्रकट होता है और पुलिसवालों को डाँट-फटकार लगाता है पुलिसवाले अपनी मजबूरी बयान करते हैं। मदारी सलमा निगार को हमदर्दी के जाल में उलझाता है और अंततः अपने घर चलने के लिये राज़ी कर लेता है। बीमार  लाचार  सलमा निगार पुलिसवालों की मदद से मदारी  के घर पहुँचा दी जाती हैं।सलमा निगार पुलिस की गाड़ी में भी अपनी गठरी अपने साथ ही लेकर  बैठती हैं। बाक़ी का सामान मदारी तमाशबीन की मदद से घर ले आता है। सारे घटनाक्रम के दरमियान तमाशबीन सलमा निगार की कॉपी पार करने में कामयाब हो जाता है। घर आकर वो कॉपी को उलट-पुलट कर देखता है। उसमें कुछ लिखा हुआ तो था लेकिन उर्दू में।  तमाशबीन ने उर्दू सीखने का निर्णय लिया और कॉपी छुपाकर रख ली। मदारी के बारे में तमाशबीन इतना तो जान चुका था कि वो एक अच्छा वकील बुरा शायर और घटिया इन्सान है। लेकिन उसके सामने कई अन्य प्रश्न मुँह बाए खड़े थे। उसने अपने काम की सूची तैयार की।
नम्बर एक! कि ये सलमा निगार नाम की बुढ़िया आख़िर है कौन?
नम्बर दो ! कि मदारी इस बुढ़िया को इतनी मशक़्क़त करके अपने घर क्यों ले आया है।
नम्बर तीन!कि बुढ़िया की गठरी में क्या है?
सूची लम्बी थी लेकिन तमाशबीन ने इन्हीं तीन कामों को प्राथमिकता दी। और इन्हीं तीन से ही तमाशा पूरी तरह खुल गया।

तमाशा
तमाशा तो उसी रोज़ शुरू हो गया था जिस रोज़ इस्लाम की कोख से एक काफ़िर की पैदाइश हुई। काफ़िर भी ऐसा कि जैसे चोर मरज़ हो। जिस तरह चोर मरज़ अपनी जड़ें जमाने के बाद ही पकड़ में आता है।ठीक उसी तरह ये काफ़िर भी भरपूर जवानी में ज़ाहिर हुआ या यूँ कहें कि पकड़ में आया। पूरा मुआमला यूँ है कि मौलाना रईसुद्दीन के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। मौलाना रईसुदीन ख़ान ख़ानदानी मौलाना थे। उनके ख़ानदान में पिछली कई पीढ़ियों से मौलवी से कम तो कोई था ही नहीं बल्कि मौलाना के वालिद मुईनुद्दीन ख़ान तो मुफ़्ती थे और इलाक़े की जामा मस्जिद में बतौर इमाम अपनी ख़िदमात अन्जाम दे रहे थे। मौलाना का छोटा भाई भी माशाअल्लाह हाफ़िज़ा कर चुका था और अब उसके क़दम भी बड़े भाई के नक़्शे-क़दम का बोसा ले रहे थे। मौलाना यूँ तो रहने वाले लाहौर के थे लेकिन अब बम्बई का ही कहना ज़ियादा मुनासिब है। लाहौर बस ख़तो-किताबत तक ही महदूद रह गया था। मौलाना का तस्बीह और टोपियाँ बनाने का फलता-फूलता कारोबार था। इस मुख़्तसर तअर्रुफ़ के बाद हम फिर उसी बात पर आते हैं कि मौलाना रईसुद्दीन के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ…मौलाना ख़ुश हुए कि चलो इस्लाम का परचम बुलन्द करने वाला एक और मोमिन हमारे घर मेहमान हुआ। वो शुक्राने की नमाज़ अदा करके दोनों हाथ उठा-उठा कर अल्लाह से दुआयें माँग रहे थे। ऐ…अल्लाह मेरे बच्चे को दीनदार बनाना..ऐ अल्लाह इसे इस्लाम का सच्चा ख़िदमतगार बनाना …ऐ अल्लाह इसे ख़ानदान का सबसे बड़ा आलिम बनाना ….. ।
मौलाना ने बेटे का नाम बड़ी अक़ीदत से इमामुद्दीन रखा। लेकिन आगे चलकर उसमें से दीन हट गया बस इमाम रह गया। लोग उसे उसके आधे नाम इमाम से पुकारने लगे आज का दौर होता तो शायद इमाम भी कहने की ज़रूरत न पड़ती ‘’इमु’’ से ही काम चल जाता। एक पुरानी कहावत है कि पूत के पाँव पालने ही में नज़र आ जाते हैं। इमाम साहब में ऐसे कोई लक्षण नहीं दिखे बल्कि वो तो हस्बे-दस्तूर दीनी तालीम हासिल करते रहे और माशाल्लाह बारह बरस की उम्र ही में हाफ़िज़े-क़ुरआन हो गये। मियाँ इमामुद्दीन अपने दादा मुफ़्ती मुईनुद्दीन ख़ान साहब से तालीम हासिल कर रहे थे।
तमाशबीन के बताने के अनुसार इतनी बातें मुझे साफ़-साफ़ समझ में आ गयीं थीं। लेकिन तमाशबीन ने इसकी तफ़सील बयान नहीं की कि इमाम मियाँ कब और कैसे अंग्रेज़ी तालीम की तरफ़ बढ़े।ख़ैर…तमाशबीन की बातों के टुकड़ों को जोड़कर जो नतीजा सामने आया वो यही था कि इमाम मियाँ ने अंग्रेज़ी हिन्दी दोनों ज़बानों में आला तालीम हासिल की  उस आला तालीम की सनद का कोई सिरा नहीं मिल पाया। हाँ एक जो बहुत ख़ास बात सामने आई वो ये कि अपनी तालीम के दरमियान ही उन्हें गायकी का शौक़ पैदा हो गया था और इमाम मियाँ अपने घर वालों से चोरी-छिपे एक हिन्दू उस्ताद से बाक़ायदा गाना सीखने लगे थे। उन हिन्दू उस्ताद का नाम क्या था ये तो  तमाशबीन ने नहीं बताया। लेकिन ये बताया कि लोग उन्हें अदब से पण्डित जी कहा करते थे। इन्हीं पण्डित जी की एक पुरानी शागिर्द थीं जिनको लोग बाई जी कहते थे। बाई जी एक रोज़ पण्डित जी से मिलने आयीं तो इमाम मियाँ की आवाज़ सुनकर मन्त्रमुग्ध हो गयीं। उन्होंने पण्डित जी से गुज़ारिश की कि इमाम मियाँ को अपने साथ ले जाने की इजाज़त दे दें। कुछ ना नुकुर के बाद पण्डित जी ने इजाज़त दे दी। बाई जी की बेटी उस वक़्त फ़िल्मों में काम करती थी। बाई जी इमाम मियाँ को बतौर हीरो पेश करना चाहती थीं। उस ज़माने में हीरो अगर गाना भी जानता हो तो उसकी कामयाबी के आसार ज़ियादा होते थे।अभी इमाम मियाँ बतौर हीरो पेश हो पाते कि एक आफ़त टूट पड़ी। उनके सारे गुनाहों का भेद खुल गया। मौलाना रईसुद्दीन को न जाने किस जासूस के ज़रीये इमाम मियाँ की सारी काफ़िराना कारस्तानी का इल्म हो गया। मौलाना हैरान थे कि उनकी नाक के नीचे ये सबकुछ होता रहा और कैसे उन्हें कानो-कान ख़बर नहीं हुई। उन्होंने इमाम मियाँ की वालिदा से पूछा वालिदा भी बिल्कुल अनजान थीं । बक़ौल मौलाना उनकी नाक कट चुकी थी उनके ख़ानदान में काफ़िर?तौबा…तौबा वो बार-बार अपने कानों को हाथ लगाते और फिर मुँह उठाकर आसमान की तरफ़ देखते हुए कहते।ऐ अल्लाह..मेरे किन गुनाहों की सज़ा दे रहा है तू..ऐ अल्लाह क्या ख़ता हो गयी हमसे… । मौलाना  इस बात से ख़ुद में थोड़ी सी राहत महसूस कर रहे थे कि चलो अच्छा हुआ कि ये सब देखने से पहले अब्बा हुज़ूर चले गये। लेकिन ये सोचकर फिर दुखी हो जाते कि अब भी तो लोग कहेंगे ही जामा मस्जिद के पुराने इमाम का पोता नाच-गाने में मशग़ूल है एक हाफ़िज़े-क़ुरआन ऐसे वाहियात काम में शामिल है।
इमाम मियाँ पर पूरा घर इस तरह टूट पड़ा कि उनका सारा नशा काफ़ूर हो गया। इमाम मियाँ मुँह लटकाए चुपचाप तस्बीह और टोपियों वाले अपने घरेलू कारोबार में जी जान से जुट गये। बात आयी गयी हो गयी। मौलाना ख़ुश थे कि अल्लाह ने उनकी सुन ली और सुबह का भूला शाम को घर लौट आया। इधर इमाम मियाँ के दिल की हालत सिर्फ़ इमाम मियाँ ही जानते थे। उन्हें हीरो न बन पाने का रत्ती भर भी मलाल नहीं था उन्हें अगर दुःख था तो ये कि बाई जी की बेटी से मुलाक़ातें बन्द हो गयी थीं। इमाम मियाँ जब तस्बीह बनाते तो तस्बीह के हर दाने पर बाई जी की बेटी का नाम लिखा हुआ महसूस करते (वैसे बाई जी की बेटी का नाम क्या था ये भी तमाशबीन ने मुझे नहीं बताया था)जब वो टोपियों की पैकिंग करते तो जालियों से झाँकता हुआ बाई जी की बेटी का चेहरा दिखता। उनका जी करता कि वो ज़ोर-ज़ोर से गाना शुरू कर दें तभी उनका ध्यान मौलाना के दाढ़ी वाले चेहरे की तरफ़ चला जाता जहाँ एक नाक थी जो कि उनके गाने से कट सकती थी।
चिलचिलाती धूप और तपती ज़मीन की ज़द में आकर मुहब्बत का ये पौधा मर ही जाता लेकिन तभी भरपूर बरसात हो गयी।टोपी की जालियों से झाँकते चेहरे ने एक ख़त की सूरत दस्तक दी।ख़त क्या मुकम्मल मुहब्बतनामा था। इस मुहब्बतनामे में एक जुमला कुछ यूँ लिखा हुआ था ।
‘इमाम साहब मैं आपकी इमामत में मुहब्बत की सारी नमाज़ें ज़िन्दगी भर पढ़ना चाहती हूँ। क्या आपको ये ज़हमत क़ुबूल है’?
‘क़ुबूल है क़ुबूल है सौ मर्तबा क़ुबूल है’ इमाम मियाँ ख़ुशी में इतनी ज़ोरों से चीख़े कि उनकी आवाज़ कमरे का दरवाज़ा चीरती हुई बाहर उनकी अम्मी के कानों तक पहुँच गयी ।

‘’इमाम …’’ कहती हुई उनकी अम्मी दौड़कर कमरे में आयीं । इमाम मियाँ अपने बिस्तर पर औंधे मुँह गहरी नींद में सोये थे । अम्मी ने एक मुआयना किया और  बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर चली गयीं।
‘’कमबख़्त नींद में ही निकाह पढ़ रहा है आज ही बात करती हूँ मौलाना से ..शादी ब्याह वक़्त पर हो जाए तो ही ठीक है  …..’’
अम्मी की आवाज़ जब दूर चली गयी तो इमाम मियाँ फ़ौरन उठ बैठे और ख़त आगे पढ़ने लगे। ख़त के अगले हिस्से में मिलने का वक़्त और जगह दर्ज थी । जगह बाईजी का घर ही था। अगले रोज़ किसी प्रोड्यूसर से बाई जी की मीटिंग थी सो बाई जी की बेटी घर में अकेली थी। मिलने का वक़्त था ज़ोहर बाद।

अपने होशो-हवास में इमाम मियाँ ने उस रोज़ पहली मर्तबा ज़ोहर की नमाज़ क़ज़ा की थी।हाँ उसके बाद का कुछ होश नहीं कि कितनी नमाज़ें छूटीं ।
कहते हैं कि इश्क़ और मुश्क़ छुपाये नहीं छुपता। मैं कहता हूँ इश्क़ और मुश्क़ मुमकिन है छुप जाए लेकिन हामला(गर्भवती) औरत का पेट छुपाये कैसे छुपे?आप मेरी बात का मतलब समझ गये होंगे?नहीं समझे तो सुनिये।  बाई जी की बेटी और इमाम साहब की मुहब्बत के पेड़ पर, पहला फल लग चुका था मगर इस बार तो मुआमला और सन्जीदा हो चला था क्योंकि इस बात की भनक मौलाना रईसुद्दीन को तो छोड़िये ख़ुद बाई जी को भी नहीं लगी। लेकिन कब तक? कभी तो भनक लगनी ही थी और जब लगी तो क्या कहें? यूँ समझिये आग की तरह लगी। आग भी ऐसी भयंकर कि जैसे जंगल में लगी हो। एक तरफ़ बुझाओ तो दूसरी जानिब लहक उठती थी। इस भीषण आग पर क़ाबू पाने के लिए अंततः इमाम मियाँ ने अपने उस्ताद पण्डित जी का सहारा लिया। पण्डित जी बादल बनकर आये और मूसलाधार बरसे नतीजतन मौलाना रईसुद्दीन ख़ान की आँखें ऐसी  पानी-पानी हुईं कि सारे जज़्बात उमड़ते हुए होंटों के साहिल तक आ पहुँचे।
‘’देखिये पण्डित जी! मैं आपका और आपकी सारी बातों का एहतेराम करता हूँ लेकिन आप मेरी जगह आकर सोचिये तो सही एक बार! बेटे से मुहब्बत ज़ाहिर सी बात है कहने वाली बात नहीं है। वो भी तब जब आपके एक ही बेटा हो। लेकिन ख़ानदान और मज़हब का एहतेराम करना भी तो मेरा फ़र्ज़ है।मैंने उसकी सारी ख़्वाहिशें पूरी कीं। उसकी दीनी तालीम में दिलचस्पी नहीं थी, न सही। उसने अंग्रेज़ी, हिन्दी तालीम हासिल की मैंने ता’ऊन किया। वो मुझे बिना बताये आपसे मौसीक़ी सीखता रहा। जब मुझे इल्म हुआ, बावजूद इसके कि ये हमारे यहाँ मुनासिब नहीं समझी जाती,मैंने नज़रअंदाज़ किया। लेकिन अब उसे फ़िल्मों में जाकर बेहूदगी करने की इजाज़त मैं कैसे दे सकता  था? आप ज़रा मेरे ख़ानदान और दीनो-मज़हब के पहलू से एक बार सोचकर देखिये कि एक बदनाम औरत की बेटी जो कि ख़ुद एक ऐसे कारोबार में है जो हमारे नज़रिये से दुरुस्त नहीं माना जाता उसके साथ मैं अपने बेटे की शादी कैसे कर दूँ? आप मेरी जगह होते तो क्या करते?’’ मौलाना ने पण्डित जी को सोचने पर मजबूर कर दिया। पण्डित जी कुछ देर विचारमग्न रहे फिर विनम्रतापूर्वक बोले-
‘’ मौलाना साहब कृपया मेरी बात को अन्यथा मत लीजियेगा किन्तु यदि मैं आपकी जगह होता तो मैं दोनों का विवाह करवा देता’’।
‘’क्या फ़ुज़ूल बात कर रहे हैं पण्डित जी?कैसे मुमकिन है? शायद आपने मेरे पहलू से बात को समझा ही नहीं’’।
‘’ऐसी बात नहीं है मौलाना साहब मैंने आपके पहलू से आपकी बात को गहनता से समझा किन्तु उस पहलू से भी समझा जहाँ से आप नहीं समझ पा रहे हैं यानी दूसरे पहलू से’’।
‘’कौन सा दूसरा पहलू?’’ मौलाना ने सवाल किया
‘’दूसरा पहलू ये मौलाना साहब कि देखिये तीर अगर तरकश से निकल चुका हो तो वापसी सम्भव है किन्तु तीर यदि कमान से निकल चुका हो तो कोई उपाय नहीं। मेरे कहने का अर्थ ये है कि थोड़ी देर के लिए आप इन दोनो बच्चों के प्रेम को भूल जाइये। किन्तु उस नन्हीं जान को कैसे भूलेंगे जो कुछ ही दिनों में जन्म लेने वाली है? और यदि जबरन आपने भूलने का प्रयास किया तो क्या ये उचित होगा? मौलाना साहब अब आपका बेटा एक व्यक्ति नहीं रहा अब उसमें दो जानें और प्रवेश कर चुकी हैं। तीन जानों को कष्ट में रखकर कौन सा धर्म निभायेंगे आप?’’
‘’चलिए एक पल के लिए मैं आपकी बात मान भी लूँ,तो क्या लोग भी मान जायेंगे?’’मौलाना बोले।
‘’औलाद आपकी है मौलाना साहब लोगों की नहीं।और वैसे भी ये शहर है अगर आप नहीं माने और ये दोनों बच्चे भी अपनी ज़िद पर अड़ गये तो क्या क्या परिणाम हो सकते हैं?इस पर कभी सोचा है आपने!’’
‘’पण्डित जी! गोश्त खाते हैं आप?’’
‘’नहीं लेकिन ये प्रश्न क्यों?’’
‘’अगर कोई आपको मजबूर करके गोश्त खिलाये तो आप क्या करेंगे?’’
पण्डित जी ने क्षणभर सोचा मुस्कुराये फिर बोले-
‘’मौलाना साहब अगर मेरे गोश्त खाने से तीन जानें बचती हों तो अवश्य खा लूँगा’’।
मौलाना सोच में पड़ गये। उनके ज़ेहन में ख़ानदान के बुज़ुर्गों का चेहरा एक एक कर तेज़ी से घूमने लगा फिर क़ुरआन और हदीस के सफ़हात खुलने लगे। अचानक एक उम्मीद की किरन जगमगायी मौलाना बोले-
‘’पण्डित जी एक शर्त पर ये शादी हो सकती है’’।
‘’मौलाना साहब शर्तों पर शादी नहीं होनी चाहिए,फिर भी आप बताइए’’।
‘’अगर लड़की इस्लाम क़ुबूल कर ले तो शादी हो जायेगी’’।
‘’और यदि ये शर्त लड़की पक्ष ने नहीं मानी तो?’’
‘’तो फिर अल्लाह मालिक है’’।
पण्डित जी कुछ सोचते हुए चलने के लिए उठ खड़े हुए। इमाम मियाँ जो अब तक कमरे में ख़ामोशी से बैठे ये सारी बातें सुन रहे थे अचानक उठे और बाहर आकर बोल पड़े-
‘’अब्बू लड़की और उसकी माँ आपकी कोई भी शर्त मान लेंगे और एक बार को उनका जी न भी हो तो भी उनकी पिछली ज़िन्दगी और मौजूदा हालात उन्हें शर्तें मानने पर मजबूर कर देंगे। लेकिन मुझे शर्त मंज़ूर नहीं है’’।
इमाम मियाँ की इस बात पर मौलाना रईसुद्दीन और पण्डित जी दोनों भौंचक्के रह गये। मौलाना को जब यक़ीन हो गया कि ये इमाम मियाँ ही हैं तब वो बोले-
‘’क्या हम बाद में बात कर सकते हैं?’’
‘’जी नहीं! अब कोई बाद वाद नहीं। अभी बात करके टंटा ख़तम कीजिए’’।
इमाम मियाँ के इस जवाब से मौलाना झेंप से गये पण्डित जी मौक़े की नज़ाकत को समझते हुए बोले
‘’बेटा इमाम! धैर्य रखो…’’
‘’अब धैर्य नहीं रखा जा रहा गुरुदेव मुझे मुआफ़ कीजियेगा…अब धैर्य रखा तो ज़िन्दगी भर पछताऊंगा’’।
‘’क्या बेतमीज़ी है ये? दरवाज़े पर कोई मौजूद है और तुम..’’
‘’वो ‘कोई’ नहीं हैं अब्बू! उस्ताद हैं मेरे और आपके ही कहे मुताबिक़ उस्ताद वालिद की हैसियत रखता है।इसलिये आप इनके सामने ही अपना आख़िरी फ़ैसला सुना दीजिये’’।
‘’बेटा …ख़ैर जैसी अल्लाह की मर्ज़ी । मेरा फ़ैसला वही है जो मैं बयान कर चुका हूँ” ।
‘’अब्बू फिर मुआफ़ कीजियेगा मेरा भी फ़ैसला सुन लीजिये मुझे आपका फ़ैसला मंज़ूर नहीं है। और अब अपनी ज़िन्दगी के सारे फ़ैसले मैं ख़ुद करूँगा’’।
‘’इमाम क्यों पागल बन रहे हो …इस्लाम के मुताबिक़….’’ ।
‘’अब्बू मुझे नहीं समझना आपका इस्लाम। मुझे आजतक समझ में आया भी नहीं। क़ुरआन हदीस पढ़ते हुए कन्फ्यूज़ हो जाता हूँ।सहाबाओं ने फ़रिश्तों ने जी होगी क़ुरआनी ज़िन्दगी लेकिन मुझसे नहीं जी जाती। मुझे सिनेमा में,थियेटर में,गाने में मज़ा आता है।क्या करूँ? क्या आप आज के वक़्त में दीन के मुताबिक़ मुकम्मल तौर पर चल रहे हैं?’’
‘’अस्तग़फ़िरुल्लाह …क्या बक रहे हो इमाम? तौबा करो। तुमको शैतान बहका रहा है। दुनिया में रहकर हमें दीन का दामन मज़बूती से पकड़े रहना है। इस तरह का ख़याल तुम्हें दीन से ख़ारिज कर देगा’’।
‘’अब्बू मुझे तक़रीर की ज़रूरत नहीं है। मुझे ऐसे बाप की ज़रूरत है जो अपने दीन के लिए मेरे अरमानों का गला न घोंटे’’।
मौलाना के ज़ेहन में फिर क़ुरआनो-हदीस के सफ़हात फड़फड़ाने लगे। कुछ देर को ख़ामोशी छा गयी। पण्डित जी का दिमाग़ भी शून्य हो गया था। वो विचाराधीन मुद्रा में उठे और मौलाना साहब से हाथ जोड़कर नमस्ते की। मौलाना ने हल्का सा सर हिलाकर उत्तर दिया। पण्डित जी इमाम मियाँ के कन्धे पर सांत्वना भरा हाथ रखकर निकल गये।
मौलाना ने कुछ देर सोचने के बाद तन्ज़ और तल्ख़ लहजे में इमाम मियाँ से कहा-
‘’मियाँ आप जो चाहे कीजिए मेरी तरफ़ से आप आज़ाद हैं। आपने अपने लिए बीवी और वालदैन ढूँढ ही लिए हैं। अब रहने का ठिकाना भी ढूँढ लीजियेगा।‘’
‘’जी बेहतर’’। इमाम मियाँ ने भी उसी लहजे में जवाब दिया।

तमाशबीन ने बताया कि उस रात मौलाना रईसुद्दीन और उनकी अहलिया में इमाम मियाँ को लेकर ख़ूब बहस हुई। बेगम दीन और औलाद में से जब-जब कोई एक चीज़ चुनतीं तो बेदीन हो जातीं। और मौलाना का साफ़ कहना था कि जो शख़्स दीन का नहीं वो हमारा नहीं चाहे वो औलाद ही क्यों न हो। वैसे भी मौलाना के हिसाब से इमाम मियाँ मुर्तद हो चुके थे।
तमाम रात दीन दुनिया और ममता आपस में गुत्थम-गुत्था होते रहे और आख़िर में जीत मौलाना के दीन की हुई।एक औरत की वजह से इमाम मियाँ अपने घर से यूँ निकाल दिये गये जैसे जन्नत से आदम निकाल दिये गये थे। इमाम मियाँ की ज़िन्दगी के सिनेमा का ये इंटरवल था। जिसे कुल मिलाकर सुखद कहना ही ठीक होगा लेकिन ज़िन्दगी कोई भारतीय सिनेमा तो है नहीं कि अन्त में सब कुछ ठीक हो जाये।
तमाशबीन ने आगे बताया कि बाई जी की बेटी को एक बेटी पैदा हुई। इस नयी ज़िन्दगी से उसका फ़िल्मी कैरियर बिल्कुल चौपट हो गया था फिर भी सब ख़ुश थे।इमाम मियाँ ने बेटी का नाम सलमा निगार रखा।बेटी इतनी होनहार निकली कि दस बरस की उम्र में ही अपने गाने से सबको चौंकाने लगी। पण्डित जी जब किसी प्रोग्राम में जाते तो अपने साथ इमाम मियाँ और उस बच्ची को भी ले जाते थे। बाई जी पूरी तरह ख़ुश नहीं थी। उनको दुःख था कि एक ज़रा सी ग़लती से उनकी बेटी और इमाम मियाँ का फ़िल्मी कैरियर बन ही नहीं पाया। पर अब पछताये होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत।

इमाम मियाँ हीरो तो नहीं बने हाँ अपनी टोपी और तस्बीह बनाने का काम उन्होंने जारी रखा। कारोबार से बचा वक़्त वो गाने और अपनी बेटी को पढ़ाने में लगाते। उर्दू,अरबी हिन्दी,अंग्रेज़ी गोया अपना सारा इल्म इमाम मियाँ बच्ची में जल्द से जल्द मुन्तक़िल कर देना चाहते थे। और बच्ची थी भी इतनी होशियार कि जो पढ़ाओ झट से पढ़ लेती थी। इस दरमियान वो कभी-कभी छुप छुपाकर माँ से भी मिल आते थे। उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन ज़रूर मौलाना साहब उन्हें परिवार सहित अपना लेंगे लेकिन मौलाना अपने दीन पर क़ायम रहे। यहाँ तक भी सब ठीक था लेकिन उसी समय एक अनहोनी और हुई और वो ये कि मुल्क आज़ाद हो गया। उस आज़ादी की सज़ा तो ये देश अब भी किसी न किसी तौर पर भुगत ही रहा रहा है किन्तु उस वक़्त ये आज़ादी इमाम मियाँ को खा गयी। बँटवारे के वक़्त दोनों मुल्कों में क्या-क्या हुआ ये तो जगविदित है। लेकिन इमाम मियाँ के साथ क्या हुआ ये तमाशबीन को भी पता नहीं चल पाया। पूरा वाक़या ये है कि बँटवारे के बाद हुए दंगों के दरमियान एक रोज़ इमाम मियाँ को किसी परिचित से मालूम हुआ कि उनके परिवारवाले पाकिस्तान जा रहे हैं। इस ख़बर से वो इस क़दर बेचैन हुए कि फ़ौरन अपनी अम्मी से मिलने घर से निकल पड़े। उनकी बीवी और बाई जी ने बहुत समझाया कि ऐसे ख़राब माहौल में उनका घर से निकलना महफ़ूज़ नहीं है लेकिन वो जल्द लौट आने का वादा करके ऐसे निकले कि फिर उनका कोई सुराग़ न मिल सका।

इतनी दास्तान सुनाने के बाद तमाशबीन लड़खड़ाता हुआ अपने कमरे में गया और काफ़ी देर बाद हाथ में एक डायरी लिए हुए लौटा। डायरी के पन्ने पलटते हुए वो बैठ गया।उसके माथे की शिकन को मैं ग़ौर से देखने लगा। उसने डायरी बन्द करके एक तरफ़ रखी और गिलास में पड़ी शराब का घूँट भरते हुए कहा।
‘’मियाँ क्या बताऊँ तुम्हें इस दुनिया में ऐसे-ऐसे भेन्चो…इनकी माँ का…’’
ओह माफ़ कीजियेगा, मैं अपनी ज़बान में ही तमाशबीन की बात सुनाता हूँ।
तमाशबीन के जबड़े ग़ुस्से से भिंच गये थे और वो धाराप्रवाह किसी फ़िल्म प्रोड्यूसर को गाली दिये जा रहा था। जब गालियों और ग़ुस्से की लपटें कुछ कम हुईं तो बात आगे बढ़ी। बात ये थी कि वो मकान जिसमें बाई जी रहती थीं वो एक प्रोड्यूसर का था। और बाई जी की बेटी भी उसी प्रोड्यूसर की ही थी। प्रोड्यूसर ने बाई जी की बेटी को अपना नाम तो नहीं दिया लेकिन रोटी कपड़ा और मकान की कमी नहीं होने दी। इमाम मियाँ की गुमशुदगी के बाद बाई जी ने प्रोड्यूसर साहब से अपनी बेटी के लिए जब काम की गुज़ारिश की तो प्रोड्यूसर साहब ने कहा कि उसके लिए तो अभी काम नहीं है हाँ वो सलमा निगार को बाल कलाकार के तौर पर ज़रूर काम दिलवा सकते हैं। मरता क्या न करता बाई जी राज़ी हो गयीं।
बतौर बाल कलाकार सलमा निगार की पहली फ़िल्म ‘काठ’ रिलीज़ हुई और उनके काम की बहुत सराहना हुई। फिर क्या था पहली दूसरी तीसरी फ़िल्म सिलसिला चल पड़ा। बच्ची अपने बड़ों को कमाकर खिलाने लगी। गायकी और अभिनय के साथ बच्ची में कुछ और भावनायें भी कुलबुला रही थीं। जिसे वो अक्सर अपनी कॉपी में लिखती रहती थी।
बाई जी बहुत ख़ुश थीं वो प्रोड्यूसर साहब को शुक्रिया कहते नहीं थकती थीं। लेकिन बाई जी की ख़ुशी ज़ियादा वक़्त तक बहाल न रह सकी।बच्ची को एक समय काम मिलना बन्द हो गया और उसका कारण ये था कि अब बच्ची, बच्ची नहीं रह गयी थी वो   बड़ी हो गयी थी। बाई जी ने प्रोड्यूसर साहब से फिर मीटिंग कर गुज़ारिश की कि उन्होंने अपनी बेटी को तो हिरोइन नहीं बनाया लेकिन अब अपनी नातिन को बतौर हिरोइन मौक़ा दें। प्रोड्यूसर साहब मुस्कुराये और बोले कल आता हूँ घर।

कमरे से सलमा निगार के चीख़ने की आवाज़ें आ रही थीं । बाई जी और उनकी बेटी एक साथ घबराई हुई दरवाज़े की तरफ़ दौड़ पड़ीं। दरवाज़ा अन्दर से बन्द था दोनों दरवाज़ा पीटने लगीं। बड़ी देर बाद दरवाज़ा खुला तो प्रोड्यूसर साहब पसीने में नहाये हुए थे और सलमा निगार अर्धनग्न हालत में दौड़कर अपनी माँ से चिपक गयी। बाई जी कुछ देर शून्य रहीं उसके बाद दर्द और बेबसी से चीख़ पड़ीं।
‘’ये क्या किया तूने नीच…अपनी ही नातिन से ये कुकर्म…’’ ।
प्रोड्यूसर साहब इत्मीनान से अपने कपड़े ठीक करते हुए बोले।
‘’चुप कर! रंडियों के एक बाप नहीं होते। काहे की मेरी नातिन? आज के बाद कभी भूल से भी ये बात ज़बान से न निकले ..समझी? चलता हूँ। इसके लिए काम का जल्दी ही कुछ करता हूँ’’।
प्रोड्यूसर साहब ऐसे चलते बने जैसे ये मामूली सी बात हो।उनके लिए शायद मामूली ही थी। लेकिन बाई जी उनकी बेटी और नातिन तीनों के लिए ये ग़ैरमामूली साबित हुई। बाई जी की बेटी को आज पहली बार मालूम हुआ था कि उसका बाप कौन है और कैसा है। सलमा निगार ने पहली बार जाना कि नाना अपनी नातिन का बलात्कार भी कर सकता है। बाई जी ने आज शिद्दत से महसूस किया कि तवायफ़ को शायद कभी किसी एक के प्रति इतना वफ़ादार नहीं होना चाहिए।
अगले दिन बाई जी ने अपनी बेटी और नातिन के साथ मायानगरी को अलविदा कह दिया।और बनारस अपनी पुरानी दुनिया में लौट गयीं। बाई जी को बाहर की शरीफ़ दुनिया से ज़ियादा महफ़ूज़ अपनी ही दुनिया लगी।

पुरानी जान-पहचान के दम पर थोड़े ही दिनों में गाड़ी पटरी पर आ गयी। बाई जी की बेटी ने घुँघरू बाँधे।बाई जी ने सुर साधे। एक अलाप के साथ दर्द में डूबी आवाज़ खनखनाई।
प्रीत के घुँघरू रीत के दर पर
बाँध के नाच रहे हैं हम …
आ ss..जाने  किसकी लिखी ये पोथी
अब तक बाँच रहे हैं हम …..
लफ़्ज़ों के साथ-साथ  सारंगी भी रोती रही।सारंगी की सिसकी थमी तो हारमोनियम ने तबले को उकसाया। तबले का साथ मिलते ही गीत के बोल हवा में बल खाने लगे।

रातों को आये मुहब्बत लुटाए दिन में बलम मोसे दामन बचाए
कैसी विधाता ने किस्मत रची है होकर सभी के भी हम हैं पराये
रातों को आये मुहब्बत लुटाए……..

        अगर हम यूँ नहीं होते तो फिर हर घर में हम होते
यक़ीनन रिश्तों पर हर रोज़ ही ताज़ा ज़ख़म होते
हमने ही रिश्तों की हुरमत बचायी हमको ही ये दुनिया पापी बताये
रातों को आये मुहब्बत लुटाए…..

       ग़रज़ अपनी मिटाने को सभी इस दर पे आते हैं
मगर इलज़ाम दुनिया के हमारे सर पे आते हैं
दिल में हज़ारो ग़मों को छुपाकर महफ़िल में सदियों से हम मुस्कुराये
रातों को आये मुहब्बत लुटाए….

      हमें मालूम है अब तक न कुछ बदला न बदलेगा
यहाँ हर फूल को मौसम बहारों का ही कुचलेगा
उड़ने की कोशिश में फिर भी परिंदा पिंजरे के भीतर बहुत फड़फड़ाए
रातों को आये मुहब्बत लुटाए…..

उस्ताद फ़रहाद ख़ान के लिखे इस गीत को बाई जी जब कभी भी गातीं थीं तो फ़ज़ा में सन्नाटा पसर जाता था। एक रोज़ जब उस्ताद फ़रहाद ख़ान बाई जी से मिलने आये तो बातों-बातों में बाई जी ने अपनी नातिन सलमा निगार की शायरी का उनसे ज़िक्र किया। और ये भी गुज़ारिश की कि अगर सलमा के कलाम में कुछ बात हो तो वो उसे अपनी शागिर्दी में ले लें। उस्ताद ने सलमा को कलाम के साथ बुलवाया और कलाम देखकर संजीदगी से बोले।
‘’चमक तो भरपूर है लड़की में। थोड़ी सी अरूज़ पर मेहनत की ज़रूरत है बस’’।
‘’इसीलिए तो हुज़ूर से इल्तिजा कर रही हूँ’’। बाई जी बोलीं।
‘’तो मँगाओ मिठाई…करो बिस्मिल्लाह’’। उस्ताद ने कहा तो बाई जी के साथ सलमा भी ख़ुशी से झूम उठी।

बाई जी और उनकी बेटी को काशी नसीब हो चुकी थी लेकिन सलमा निगार के हिस्से में शायद मगहर लिखा हुआ था। बाई जी के गाने के दीवाने एक बिजनेसमैन करीम अंसारी  का एक दिन सलमा निगार पर दिल आ गया। उन्होंने बाई जी के सामने सलमा से शादी का प्रस्ताव रखा। बाई जी ने जब उनके पहले ही से शादी शुदा होने की बात कही तो उन्होंने जवाब दिया। ‘’हम मुसलमान हैं हमारे यहाँ तो चार शादियाँ जायज़ हैं मैं तो दूसरी ही करूँगा। इसके बाद करूँगा भी नहीं। अल्लाह के फ़ज़ल से आप मेरा कारोबार देख ही रही हैं। चैन से रहेगी आपकी नातिन’’।
बाई जी ने उनकी और सलमा की उम्र पर बात की तो वो बोले।
‘’उम्र नहीं हैसियत देखी जाती है बाई जी। आप जहाँ हैं वहाँ से समाज में जाने के सारे दरवाज़े बन्द हैं। ऐसे में मैं दिल के दरवाज़े के साथ घर का दरवाज़ा भी खोल रहा हूँ आगे आपकी मर्ज़ी सोच लीजिये’’।
उसके बाद बाई जी ने बहुत सोचा लेकिन ये नहीं सोच पाईं कि करीम अंसारी की हैसियत के आगे सलमा की क्या हैसियत होगी? बाई जी ख़ुद भी प्रोड्यूसर साहब की मुहब्बत का शिकार होकर यातना झेल चुकीं थीं। ये ख़याल उनके ज़ेहन में एक बार आया भी लेकिन दूसरे ख़याल ने इस ख़याल को काट दिया। और दूसरा ख़याल ये था कि कुछ भी हो करीम सलमा से शादी तो कर ही रहा है। ये प्रोड्यूसर जैसा बिल्कुल नहीं होगा। सलमा की ज़िन्दगी संवर जायेगी। मेरा क्या मैं तो अब पका आम हूँ कभी भी टपक सकती हूँ । सलमा के हालात ठीक होंगे तो वो अपनी माँ को भी संभाल लेगी। ये मौक़ा हाथ से जाने नहीं देना चाहिए।क़िस्मत रोज़-रोज़ दरवाज़ा थोड़ी ही खटखटाएगी?
बैठे-बैठे ख़्वाब बुनते हुए बाई जी को मुस्तक़बिल इतना ख़ूबसूरत नज़र आया कि उन्होंने अगले रोज़ करीम अंसारी को बुलाकर शादी के लिए हाँ कह दी।

इतना बताने के बाद तमाशबीन ख़ामोश हो गया।मैंने कुछ देर इन्तिज़ार किया कि वो कुछ बोले। लेकिन जब वो नहीं बोला तो मैंने ही चुप्पी तोड़ी।
‘’तो सर उसके बाद क्या हुआ’’?
‘’क्या करोगे जानकर ..इसके बाद जो हुआ भेन्चो..बहुत ही बुरा हुआ। बस तुम शार्टकट  में इतना  जान लो कि वो करीम अंसारी तो प्रोड्यूसर से बड़ा हरामी निकला। ख़ुद तो ख़ुद दोस्तों को भी…भेन्चो …सलमा निगार को अपने बिजनेस के लिए इस्तेमाल करने लगा कमीना। भेन्चो…दुख तो ये है कि उसने शादी करके बाक़ायदा बीवी बनाकर उसे बेचा… ।जानते हो मियाँ सलमा निगार वकील वाले शहर में कैसे पहुँची?…वहाँ एक बहुत  बड़ी जेल है। उस जेल में उसने करीम अंसारी के क़त्ल के जुर्म में बरसो बिताये हैं’’।
एक औरत वो भी शायरा द्वरा अपने शौहर के क़त्ल की बात सुनकर मैं सकते में आ गया कुछ क्षण बाद मैंने पूछा ।
‘’सर वो बाई जी और उनकी बेटी का क्या हुआ’’।
‘’पता नहीं! मैं बनारस गया था लेकिन उनका कुछ पता नहीं चल पाया’’ तमशबीन बोला।
‘’तो वकील साहब को सलमा निगार की हिस्ट्री पहले से मालूम थी’’।
‘’हिस्ट्री का तो पता नहीं मियाँ लेकिन उस भेन्चो मदारी को ये ज़रूर मालूम था कि सलमा निगार की गठरी ग़ज़लों से भरी पड़ी है। अच्छी बात ये हुई कि उसे ये नहीं मालूम हुआ कि सलमा निगार की कॉपी मेरे हाथ लग चुकी है..चलिए अब रात बहुत हो चुकी है आप भी घर जाकर आराम कीजिए।‘’
‘’सर एक सवाल और?उस वकील के यहाँ जाने के बाद सलमा निगार का क्या हुआ?’’
‘’हुआ क्या मियाँ सलमा निगार बीमार तो थीं ही तीन दिन बाद उनके दुनियावी दुख कट गये…मर गयीं वो’’।
‘’तो उनकी ग़ज़लें वकील साहब …’’ ।
‘’बिल्कुल सही समझ रहे हो मियाँ …इसीलिए तो मेरे मुँह से गाली निकलती है उस मादर चो….के लिए। उसने सलमा निगार की मौत से भी काम ले लिया। उनकी मौत के बाद उनकी याद में उसने लाइब्रेरी में एक प्रोग्राम किया। और उस प्रोग्राम में उसने एक किताब रिलीज़ की। जिसके बारे में उसने ये बताया कि ये सलमा निगार की शायरी है जिसे वो अपने जीते जी नहीं छपवा सकीं। मैंने अपनी जेब से पैसे ख़र्च करके उनकी आख़िरी ख़्वाहिश पूरी की है। मेरी तरफ़ से सलमा निगार आपा को यही ख़िराजे-अक़ीदत है।जानते हो मियाँ.. इसके बाद जमूरों ने ख़ूब ताली पीटी और अगले रोज़ मदारी के बड़प्पन की तस्वीरों से अख़बार रँगे हुए थे’’।

‘’आपके कहने का मतलब कि वो शायरी सलमा निगार की नहीं थी’’।
‘’दो चार ग़ज़लें सलमा निगार की थीं जो वो लाइब्रेरी के मुशायरे में अक्सर पढ़ देती थीं बाक़ी उस मदारी ने अपनी ट्रक के पीछे लिखी जाने वाली थर्ड क्लास शायरी पेल दी थी’’
‘’सर उस वकील का नाम नहीं बतायेंगे आप?’’
‘’किसी दिन नाम भी बताऊँगा अभी के लिए इतना समझ लो कि वो सलमा निगार की कमाई से शायरी के अमीरों में शुमार है।

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3 comments

  1. Tejraj Gehloth

    सच्चाई में रची बसी बेजोड कहानी

  2. कहानी लम्बी है लेकिन इसकदर दिलचस्प अंदाज में लिखी गई है आप इसकी गिरफ्त से छूटना ही नहीं चाहते. कहानी का कैनवास बहुत बड़ा है लेकिन इसके बावजूद कहानी भटकती नहीं… इरशाद भाई ने कमाल किया है …उन्हें ढेरों बधाई.

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