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मिखाइल बुलगाकोव  के उपन्यास ‘मास्टर एंड मार्गारीटा’ का अंश ‘मुर्ग़े की बदौलत’

मिखाइल बुलगाकोव  के उपन्यास ‘मास्टर एंड मार्गारीटा’ का रूसी साहित्य में अलग स्थान रहा है। मूल रूसी से इस उपन्यास का अनुवाद करने वाली आ चारुमति रामदास ने ध्यान दिलाया कि दशकों पहले इन्हीं दिनों एक पत्रिका में इस उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन शुरू हुआ था। इसका एक अंश पढ़िए-

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मानसिक तनाव सहन न कर सका रीम्स्की और ‘शो’ समाप्त होने के बाद की औपचारिकताओं का इंतज़ार न करके अपने ऑफिस की ओर भागा. वह मेज़ पर बैठकर सूजी-सूजी आँखों से अपने सामने पड़े जादुई नोटों की ओर देखने लगा. वित्तीय-डाइरेक्टर की बुद्धि निर्बुद्धि तक पहुँच चुकी थी. बाहर से लगातार शोर सुनाई दे रहा था. लोगों के झुँड वेराइटी थियेटर से बाहर निकल रहे थे. वित्तीय-डाइरेक्टर के तीक्ष्ण कानों में अचानक पुलिस की सीटी की आवाज़ सुनाई दी. यह सीटी कभी भी किसी सुखद घटना की सूचक नहीं होती. मगर जब यह आवाज़ फिर से सुनाई पड़ी और उसकी मदद के लिए एक और ज़ोरदार, ज़्यादा ताकतवर, लम्बी सीटी आ गई, फिर सड़क से अजीब-सा शोर, ताने कसती , छेड़ती हुई आवाज़ें सुनाई पड़ीं तो वित्तीय डाइरेक्टर समझ गया कि फिर से कोई लफ़ड़ा हो गया है. न चाहते हुए भी रीम्स्की के दिमाग में ख़याल कौंध गया कि यह काले जादू के जादूगर और उसके साथियों द्वारा दिखाए गए घृणित कारनामों से ही सम्बन्धित है. तीखे कानों वाला वित्तीय डाइरेक्टर बिल्कुल भी गलत नहीं था.

जैसे ही उसने सादोवाया की ओर खुलती हुई खिड़की से बाहर देखा उसका चेहरा आड़ा-तिरछा हो गया और वह फुसफुसाहट के बदले फुफकार पड़ा, “मुझे मालूम था!”

सड़क की जगमगाती रोशनी में अपने ठीक नीचे फुटपाथ पर उसने एक महिला को देखा. वह केवल बैंगनी रंग के अंतर्वस्त्र पहने थी. बेशक, उसके सिर पर टोप और हाथों में छाता था.

इस महिला को चारों ओर से ठहाके लगाती, ताने कसती भीड़ ने घेर रखा था. महिला अपनी शर्मिन्दगी छुपाने के लिए या तो बैठ जाती, या भागने की कोशिश करती. ठहाके जारी रहे. इन ठहाकों से वित्तीय डाइरेक्टर ने रीढ़ की हड्डी में ठण्डी सिहरन महसूस की. महिला के निकट ही एक और आदमी डोल रहा था जो अपना कोट उतारने की कोशिश कर रहा था, मगर बदहवासी के कारण वह अपना आस्तीन में फँसा हाथ बाहर नहीं निकाल पा रहा था.

कहकहों और चीखों की आवाज़ें एक और जगह से भी आ रही थीं – बाईं ओर के प्रवेश-द्वार से. उधर मुँह घुमाकर देखने पर ग्रिगोरी दानिलोविच ने एक अन्य महिला को देखा – गुलाबी अंतर्वस्त्रों में. वह सड़क से उछलकर फुटपाथ पर आना चाह रही थी ताकि प्रवेशद्वार में शरण ले सके, मगर भीड़ उसका रास्ता रोक रही थी और लालच और फैशन की मारी, गरीब बेचारी…फ़ागोत की फर्म द्वारा ठगी गई महिला के दिल में इस समय सिर्फ एक ही ख़याल था कि धरती फट जाए तो उसमें समा जाऊँ. पुलिस वाला उस अभागी स्त्री के निकट जाने की कोशिश कर रहा था. सीटी बजाते हुए वह आगे बढ़ रहा था और उसके पीछे-पीछे थे कुछ मनचले. यही लोग तो ठहाके लगा रहे थे, सीटियाँ बजा रहे थे.

एक दुबला-पतला मूँछों वाला कोचवान पहली निर्वस्त्र महिला के पास लपकता हुआ आया. उसने झटके से अपने मरियल घोड़े को उसके निकट रोक लिया. मुच्छड़ का चेहरा खुशी से खिल उठा.

रीम्स्की ने अपने सिर पर हाथ मार लिया, घृणा से थूककर वह खिड़की से परे हट गया.

थोड़ी देर टेबुल के पास बैठकर वह सड़क से आती हुई आवाज़ें सुनता रहा. अब अनेक स्थानों से सीटियों की चीखें सुनाई पड़ रही थीं. फिर धीरे-धीरे उनका ज़ोर कम होता गया. रीम्स्की को ताज्जुब हुआ कि यह सब लफ़ड़ा अपेक्षाकृत काफ़ी कम समय में ख़त्म हो गया.

हाथ-पैर हिलाने की, ज़िम्मेदारी का कड़वा घूँट पीने की घड़ी आ पहुँची. तीसरे अंक के दौरान टेलिफोन ठीक कर दिए गए थे; टेलिफोन करना था, इस सारे झँझट की सूचना देनी थी, मदद माँगनी थी, इस झमेले से बाहर निकलना था, लिखादेयेव के सिर पर सारा दोष मढ़कर अपने आपको बचाना था वगैरह, वगैरह…थू…थू…शैतान! बदहवास डाइरेक्टर ने दो बार टेलिफोन के चोंगे की ओर हाथ बढ़ाकर पीछे खींच लिया. तभी ऑफ़िस की इस मृतप्राय ख़ामोशी में वित्तीय डाइरेक्टर के ठीक सामने टेलिफोन ख़ुद ही बजने लगा; वह काँपने लगा और मानो बर्फ हो गया. ‘मेरा दिमाग काफ़ी उलझ गया है,’ उसने सोचा और चोंगा उठा लिया. उठाते ही मानो उसे बिजली का झटका लगा और उसका चेहरा कागज़ से भी सफ़ेद हो गया. चोंगे से किसी महिला की शांत, मगर रहस्यमय, कामासक्त आवाज़ फुसफुसाई:

 “कहीं भी फोन न करना, रीम्स्की! अंजाम बुरा होगा!”

चोंगा ख़ामोश हो गया. रीम्स्की ने महसूस किया की रीढ़ की हड्डी में चींटियाँ रेंग रही हैं; चोंगा रखकर न जाने क्यों उसने अपनी पीछे की खिड़की से बाहर देखा. नन्ही-नन्ही कोपलों से अधढँकी मैपिल वृक्ष की टहनियों की ओट से, बादल के पारदर्शी घूँघट से झाँकता चाँद नज़र आया. न जाने क्यों रीम्स्की इन टहनियों से नज़र न हटा सका और जैसे-जैसे वह उन्हें देखता रहा, एक अनजान भय उसे जकड़ने लगा.

कोशिश करके उसने चाँद की रोशनी से प्रकाशित खिड़की से अपना चेहरा हटाया और कुर्सी पर से उठने लगा. फोन करने का अब सवाल ही नहीं था. इस समय वित्तीय डाइरेक्टर के दिमाग में बस एक ही ख़याल था, जल्दी से जल्दी इस थियेटर से बाहर जाना.

वह बाहर की आहट लेने लगा : थियेटर ख़ामोश था. रीम्स्की समझ गया कि काफ़ी देर से वह दूसरी मंज़िल पर एकदम अकेला है. इस ख़याल से उसे फिर से एक बचकाना, अदम्य भय महसूस हुआ. वह यह सोचकर काँपने लगा कि अब उसे खाली गलियारों से और सीढ़ियों पर से अकेले गुज़रना पड़ेगा. उसने उत्तेजना में टेबुल पर सामने पड़े जादुई नोट उठाकर अपने ब्रीफकेस में ठूँस लिए, खाँसकर अपना गला साफ़ किया, जिससे अपने आपको कुछ तो सँभाल सके, मगर खाँसी भी कमज़ोर-सी, भर्राई-सी निकली.

उसे महसूस हुआ कि ऑफिस के दरवाज़े के नीचे से एक सड़ी हुई, गीली-सी ठण्डक उसकी ओर बढ़ती चली आ रही है. वित्तीय डाइरेक्टर की पीठ पर सिहरन दौड़ गई. तभी अकस्मात् घड़ी ने बारह घण्टे बजाना शुरू कर दिया. घण्टॆ की आवाज़ ने भी वित्तीय डाइरेक्टर को कँपकँपा दिया. जब उसे बन्द दरवाज़े के चाबी के सुराख में विलायती चाबी घूमने की आवाज़ सुनाई दी, तब तो मानो उसके दिल ने भी धड़कना बन्द कर दिया. अपने गीले, ठण्डे हाथों से ब्रीफकेस को थामे रीम्स्की ने महसूस किया कि अगर यह सरसराहट कुछ देर और जारी रही तो वह अपने आप को रोक न पाएगा और चीख़ पड़ेगा.

आखिर दरवाज़ा खुल ही गया और धीमे क़दमों से अन्दर आया वारेनूखा. रीस्म्की जिस तरह खड़ा था, वैसे ही बैठ गया, क्योंकि उसके पैरों ने जवाब दे दिया. एक लम्बी साँस खींचकर वह चापलूसी के अन्दाज़ में मुस्कुराया और हौले से बोला, “हे भगवान, तुमने मुझे कितना डरा दिया!”

हाँ, उसके इस अचानक आ धमकने से कोई भी भयभीत हो सकता था, मगर साथ ही रीम्स्की को इससे बड़ी खुशी हुई. इस उलझन की कम से कम एक गुत्थी तो सुलझती दिखाई दी.

 “बोलो, बोलो, जल्दी बोलो!” रीम्स्की ने इस गुत्थी का सिरा पकड़ते हुए भर्राई आवाज़ में कहा, “इस सबका क्या मतलब है?”

 “माफ़ करना…” आगंतुक ने दरवाज़ा बन्द करते हुए गहरी आवाज़ में कहा, “मैं समझा कि तुम जा चुके हो,” और वारेनूखा टोपी उतारे बिना आकर रीम्स्की के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया.

वारेनूखा के जवाब में कुछ ऐसी लापरवाह विचित्रता थी जो रीम्स्की के संवेदनशील मन में, जो दुनिया के बेहतरीन सेस्मोग्राफ से भी टक्कर ले सकता था, चुभ गई. ऐसा क्यों? जब वारेनूखा यह समझ रहा था कि वित्तीय डाइरेक्टर जा चुका है, तब वह उसके ऑफिस में क्यों आया? उसका अपना कमरा भी तो है? यह हुई पहली बात. दूसरी यह कि चाहे वह किसी भी प्रवेश-द्वार से अन्दर घुसता, किसी न किसी चौकीदार से उसका सामना हो ही जाता, उन्हें तो आदेश दिया गया था कि ग्रिगोरी दानिलोविच कुछ और देर अपने ऑफ़िस में रुकेंगे.

मगर वह और अधिक देर इस विचित्रता के बारे में विचार नहीं कर सका. असल बात यह नहीं थी.

 “तुमने फोन क्यों नहीं किया? यह याल्टा वाली गड़बड़ क्या है?”

 “वही, जो मैं कह रहा था,” हलकी-सी कराह के साथ वारेनूखा ने कहा, मानो उसके दाँत में दर्द हो रहा हो, “उसे पूश्किनो के शराबखाने में पाया गया.”

 “पूश्किनो में? यानी मॉस्को के पास? और टेलिग्राम तो यालटा से आया था!”

”कहाँ का याल्टा? कैसा याल्टा? पूश्किनो के तार मास्टर को शराब पिला दी और दोनों मस्ती करने लगे, ‘याल्टा’ के नाम से तार भेजना भी ऐसी ही हरकत थी.”

 “ओ हो…ओ हो…ठीक है, ठीक है…” रीम्स्की बोल नहीं रहा था – गा रहा था. उसकी आँखें पीली रोशनी में चमक उठीं. आँखों के सामने बेशर्म स्त्योपा को नौकरी से अलग करने की रंगीन तस्वीर नाच उठी. मुक्ति! लिखादेयेव नाम की इस मुसीबत से छुटकारा पाने का सपना न जाने कब से वित्तीय डाइरेक्टर देख रहा था! शायद स्तेपान बोग्दानोविच बर्खास्तगी से भी ज़्यादा सज़ा पाए…

 “खुलकर कहो!” रीम्स्की पेपरवेट से खटखट करते हुए आगे बोला.

वारेनूखा ने खुलकर कहना आरम्भ किया. जैसे ही वह वहाँ पहुँचा, जहाँ उसे वित्तीय डाइरेक्टर ने भेजा था, उसे फ़ौरन बिठाकर उन्होंने ध्यान से उसकी बात सुनना आरम्भ किया. कोई भी, बेशक, यह मानने को तैयार नहीं था कि स्त्योपा याल्टा में हो सकता है. सभी ने वारेनूखा की इस बात को मान लिया कि वह पूश्किनो स्थित ‘याल्टा’ में हो सकता है.

 “मगर अभी वह कहाँ है?” परेशान वित्तीय डाइरेक्टर ने बीच में ही उसे टोकते हुए पूछा.

  “और कहाँ हो सकता है…” व्यवस्थापक ने तिरछा मुँह करके मुस्कुराते हुए कहा, “ज़ाहिर है, नशा उतारने वाले केंद्र में!”

 “अच्छा, अच्छा! ओह, धन्यवाद!”

वारेनूखा कहता रहा. जैसे-जैसे वह कहता गया, रीम्स्की की आँखों के सामने लिखादेयेव की बेतरतीब बेहूदगियों की लड़ी खुलती गई. हर कड़ी पिछली कड़ी से ज़्यादा बदतर. शराब पीकर पूश्किनो के टेलिग्राफ-ऑफिस के लॉन में तार बाबू के साथ डांस करना- फ़ालतू – से हार्मोनियम की धुन पर! और हँगामा भी कैसा किया! भय से काँपती महिलाओं के पीछे भागना! ‘याल्टा’ के वेटर से हाथापाई! ‘याल्टा’ के फर्श पर हरी प्याज़ बिखेर दी! सफ़ेद सूखी ‘आय दानिला’ शराब की आठ बोतलें तोड़ दीं! टैक्सी वाले का मीटर तोड़ दिया, क्योंकि उसने स्त्योपा को अपनी गाड़ी देने से इनकार कर दिया था. जिन नागरिकों ने बीच-बचाव करना चाहा, उन्हें पुलिस के हवाले करने की धमकी दी! सिर्फ शैतानी नाच!

स्त्योपा को मॉस्को में थियेटर से जुड़े सभी लोग जानते थे, और सभी को मालूम था कि वह अच्छा आदमी नहीं था. मगर वह, जो व्यवस्थापक उसके बारे में बता रहा था, वह तो स्त्योपा के लिए भी भयानक था. हाँ, भयानक! बहुत ही भयानक…!

रीम्स्की की चुभती हुई आँखें व्यवस्थापक के चेहरे में चुभने लगीं और जैसे-जैसे वह आगे बोलता गया, ये आँखें और उदास होने लगीं. जैसे-जैसे व्यवस्थापक की कहानी जवान और रंगीन होती गई…वित्तीय डाइरेक्टर का उस पर से विश्वास कम होता गया. जब वारेनूखा ने बताया कि बेहूदगी करते हुए स्त्योपा ने उन लोगों का भी मुकाबला किया जो उसे मॉस्को वापस ले जाने आए थे, तो वित्तीय डाइरेक्टर को पूरा विश्वास हो गया कि आधी रात को वापस आया व्यवस्थापक सरासर झूठ बोल रहा है! सफ़ेद झूठ! शुरू से आख़िर तक सिर्फ झूठ!

न तो वारेनूखा पूश्किनो गया था और न ही स्त्योपा वहाँ था. शराब में बहका तार भेजने वाला क्लर्क भी नहीं था; न तो शराबख़ाने में थीं टूटी बोतलें और न ही स्त्योपा को बाँधा गया रस्सियों से…ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था.

जैसे ही वित्तीय डाइरेक्टर इस नतीजे पर पहुँचा कि व्यवस्थापक झूठ बोल रहा है, उसके शरीर में सिर से पैर तक भय की लहर दौड़ गई. उसे दुबारा महसूस हुआ कि दुर्गन्धयुक्त सीलन कमरे में फैलती जा रही है. उसने व्यवस्थापक के चेहरे से एक पल को भी नज़र नहीं हटाई, जो अपनी ही कुर्सी में टेढ़ा-मेढ़ा हुआ जा रहा था, और लगातार कोशिश कर रहा था कि नीली रोशनी वाले लैम्प की छाया से बाहर न आए. एक अख़बार की सहायता से वह अपने आपको इस रोशनी से बचा रहा था, मानो वह उसे बहुत तंग कर रही हो. वित्तीय डाइरेक्टर सिर्फ यह सोच रहा था कि इस सबका मतलब क्या हो सकता है? सुनसान इमारत में इतनी देर से आकर वह सरासर झूठ क्यों बोल रहा है? एक अनजान दहशत ने वित्तीय डाइरेक्टर को धीरे-धीरे जकड़ लिया. रीम्स्की ने ऐसे दिखाया जैस वारेनूखा की हरकतों पर उसका बिल्कुल ध्यान नहीं है, मगर वह उसकी कहानी का एक भी शब्द सुने बिना सिर्फ उसके चेहरे पर नज़र गड़ाए रहा. कुछ ऐसी अजीब-सी बात थी, जो पूश्किनो वाली झूठी कहानी से भी अधिक अविश्वसनीय थी और यह बात थी व्यवस्थापक के चेहरे और तौर-तरीकों में परिवर्तन.

चाहे कितना ही वह अपनी टोपी का बत्तख जैसा किनारा अपने चेहरे पर खींचता रहे, जिससे चेहरे पर छाया पड़ती रहे, या लैम्प की रोशनी से अपने आप को बचाने की कोशिश करता रहे – मगर वित्तीय डाइरेक्टर को उसके चेहरे के दाहिने हिस्से में नाक के पास बड़ा-सा नीला दाग दिख ही गया. इसके अलावा हमेशा लाल दिखाई देने वाला व्यवस्थापक एकदम सफ़ेद पड़ गया था और न जाने क्यों इस उमस भरी रात में उसकी गर्दन पर एक पुराना धारियों वाला स्कार्फ लिपटा था. साथ ही सिसकारियाँ भरने और चटखारे लेने जैसी घृणित आदतें भी वह अपनी अनुपस्थिति के दौरान सीख गया था; उसकी आवाज़ भी बदल गई थी, पहले से भारी और भर्राई हुई, आँखों में चोरी और भय का अजीब मिश्रण मौजूद था – निश्चय ही इवान सावेल्येविच वारेनूखा बदल गया था.

कुछ और भी बात थी, जो वित्तीय डाइरेक्टर को परेशान कर रही थी. वह क्या बात थी यह अपना सुलगता दिमाग लड़ाने और लगातार वारेनूखा की ओर देखने के बाद भी वह नहीं समझ सका. वह सिर्फ यही समझ सका कि यह कुछ ऐसी अनदेखी, अप्राकृतिक बात थी, जो व्यवस्थापक को जानी-पहचानी जादुई कुर्सी से जोड़ती थी.

“तो उस पर आख़िरकार काबू पा लिया, और उसे गाड़ी में डाल दिया,” वारेनूखा की भिनभिनाहट जारी थी. वह अख़बार की ओट से देख रहा था और अपनी हथेली से नीला निशान छिपा रहा था.

रीम्स्की ने अपना हाथ बढ़ाया और यंत्रवत् उँगलियों को टेबुल पर नचाते हुए विद्युत घण्टी का बटन दबा दिया. उसका दिल धक् से रह गया. उस खाली इमारत में घण्टी की तेज़ आवाज़ सुनाई देनी चाहिए थी, मगर ऐसा नहीं हुआ. घण्टी का बटन निर्जीव-सा टेबुल में धँसता चला गया. बटन निर्जीव था और घण्टी बिगाड़ दी गई थी.

वित्तीय डाइरेक्टर की चालाकी वारेनूखा से छिप न सकी. उसने आँखों से आग बरसाते हुए लरज़कर पूछा, “घण्टी क्यों बजा रहे हो?”

 “यूँ ही बज गई,” दबी आवाज़ में वित्तीय डाइरेक्टर ने जवाब दिया और वहाँ से अपना हाथ हटाते हुए मरियल आवाज़ में पूछ लिया, “तुम्हारे चेहरे पर यह क्या है?”

 “कार फिसल गई, दरवाज़े के हैंडिल से टकरा गया,” वारेनूखा ने आँखें चुराते हुए कहा.

 “झूठ! झूठ बोल रहा है!” अपने ख़यालों में वित्तीय डाइरेक्टर बोला और उसकी आँखें फटी रह गईं, और वह कुर्सी की पीठ से चिपक गया.

कुर्सी के पीछे, फर्श पर एक-दूसरे से उलझी दो परछाइयाँ पड़ी थीं – एक काली और मोटी, दूसरी पतली और भूरी. कुर्सी की पीठ, और उसकी नुकीली टाँगों की परछाई साफ-साफ दिखाई दे रही थी, मगर पीठ के ऊपर वारेनूखा के सिर की परछाई नहीं थी. ठीक उसी तरह जैसे कुर्सी की टाँगों के नीचे व्यवस्थापक के पैर नहीं थे.

 “उसकी परछाईं नहीं पड़ती!” रीम्स्की अपने ख़यालों में मग्न बदहवासी से चिल्ला पड़ा. उसका बदन काँपने लगा.

वारेनूखा ने कनखियों से देखा, रीम्स्की की बदहवासी और कुर्सी के पीछे पड़ी उसकी नज़र देखकर वह समझ गया कि उसकी पोल खुल चुकी है.

वारेनूखा कुर्सी से उठा, वित्तीय डाइरेक्टर ने भी यही किया, और हाथों में ब्रीफकेस कसकर पकड़े हुए मेज़ से एक कदम दूर हटा.

 “पाजी ने पहचान लिया! हमेशा से ज़हीन रहा है,” गुस्से से दाँत भींचते हुए वित्तीय डाइरेक्टर के ठीक मुँह के पास वारेनूखा बड़बड़ाया और अचानक कुर्सी से कूदकर अंग्रेज़ी ताले की चाबी घुमा दी. वित्तीय डाइरेक्टर ने बेबसी से देखा, वह बगीचे की ओर खुलती हुई खिड़की के निकट सरका. चाँद की रोशनी में नहाई इस खिड़की से सटा एक नग्न लड़की का चेहरा और हाथ उसे दिखाई दिया. लड़की खिड़की की निचली सिटकनी खोलने की कोशिश कर रही थी. ऊपरी सिटकनी खुल चुकी थी.

रीम्स्की को महसूस हुआ कि टेबुल लैम्प की रोशनी मद्धिम होती जा रही है और टेबुल झुक रहा है. रीम्स्की को माने बर्फीली लहर ने दबोच लिया. उसने ख़ुद को सम्भाले रखा ताकि वह  गिर न पड़े. बची हुई ताकत से वह चिल्लाने के बजाय फुसफुसाहट के स्वर में बोला, “बचाओ…”

वारेनूखा दरवाज़े की निगरानी करते हुए उसके सामने कूद रहा था, हवा में देर तक झूल रहा था. टेढ़ी-मेढ़ी उँगलियों से वह रीम्स्की की तरफ इशारे कर रहा था, फुफकार रहा था, खिड़की में खड़ी लड़की को आँख मार रहा था.

लड़की ने झट से अपना लाल बालों वाला सिर रोशनदान में घुसा दिया और जितना सम्भव हो सका, अपने हाथ को लम्बा बनाकर खिड़की की निचली चौखट को खुरचने लगी. उसका हाथ रबड़ की तरह लम्बा होता गया और उस पर मुर्दनी हरापन छा गया. आख़िर हरी मुर्दनी उँगलियों ने सिटकनी का ऊपरी सिरा पकड़कर घुमा दिया, खिड़की खुलने लगी. रीम्स्की बड़ी कमज़ोरी से चीखा, दीवार से टिककर उसने ब्रीफकेस को अपने सामने ढाल की भाँति पकड़ लिया. वह समझ गया कि सामने मौत खड़ी है.

 खिड़की पूरी तरह खुल गई, मगर कमरे में रात की ताज़ी हवा और लिण्डन के वृक्षों की ख़ुशबू के स्थान पर तहख़ाने की बदबू घुस गई. मुर्दा औरत खिड़की की सिल पर चढ़ गई. रीम्स्की ने उसके सड़ते हुए वक्ष को साफ देखा.

इसी समय मुर्गे की अकस्मात् खुशगवार बाँग बगीचे से तैरती हुए आई. यह चाँदमारी वाली गैलरी के पीछे वाली उस निचली इमारत से आई थी, जहाँ कार्यक्रमों के लिए पाले गए पंछी रखे थे. कलगी वाला मुर्गा चिल्लाया यह सन्देश देते हुए कि मॉस्को में पूरब से उजाला आने वाला है.

लड़की के चेहरे पर गुस्सा छा गया, वह गुर्राई और वारेनूखा चीखते हुए, दरवाज़े के पास हवा से फर्श पर आ गया.

मुर्गे ने फिर बाँग दी; लड़की ने अपने होंठ काटे और उसके लाल बाल खड़े हो गए. मुर्गे की तीसरी बाँग के साथ ही वह मुड़ी और उड़कर गायब हो गई. उसके पीछे-पीछे वारेनूखा भी कूदकर और हवा में समतल होकर, उड़ते हुए क्यूपिड के समान, हवा में तैरते हुए धीरे-धीरे टेबुल के ऊपर से खिड़की से बाहर निकल गया.

बर्फ से सफ़ेद बालों वाला बूढ़ा, जो कुछ ही देर पहले तक रीम्स्की था, दरवाज़े की ओर भागा, चाबी घुमाकर, दरवाज़ा खोलकर अँधेरे गलियारे में भागने लगा. सीढ़ियों के मोड़ पर भय से कराहते हुए उसने बिजली का बटन टटोला और सीढ़ियाँ रोशनी में नहा गईं. सीढ़ियों पर यह काँपता हुआ बूढ़ा गिर पड़ा, क्योंकि उसे ऐसा लगा कि उस पर पीछे से वारेनूखा ने छलाँग लगाई है.

नीचे आने पर उसने लॉबी में स्टूल पर बैठे-बैठे सो गए चौकीदार के देखा. रीम्स्की दबे पाँव उसके निकट से गुज़रा और मुख्यद्वार से बाहर भागा. सड़क पर आकर उसे कुछे राहत महसूस हुई. वह इतना होश में आ गया कि दोनों हाथों से सिर पकड़ने पर महसूस कर सके कि अपनी टोपी ऑफिस में ही छोड़ आया है.

ज़ाहिर है कि वह टोपी लेने वापस नहीं गया मगर एक गहरी साँस लेकर पास के सिनेमा हॉल के कोने पर दिखाई दे रही लाल रोशनी की तरफ भागा. एक मिनट में ही वहाँ पहुँच गया. कोई भी कार रोक नहीं रहा था.

 “लेनिनग्राद वाली गाड़ी पर चलो, चाय के लिए दूँगा!” भारी-भारी साँस लेते हुए दिल पकड़कर बूढ़ा बोला.

 “गैरेज जा रहा हूँ…” तुच्छाता से ड्राइवर बोला और उसने गाड़ी मोड़ ली.

तब रीम्स्की ने ब्रीफकेस खोलकर पचास रूबल का नोट निकाला और ड्राइवर के सामने वाली खिड़की के पास नचाया.

कुछ ही क्षणों में गरगराहट के साथ कार बिजली की तरह सादोवाया रिंग रोड पर लपक पड़ी. बूढ़ा सीट पर सिर टिकाकर बैठ गया और ड्राइवर के निकट के शीशे में रीम्स्की ने देखी ड्राइवर की प्रसन्न चितवन और अपनी बदहवास नज़र.

स्टेशन की इमारत के सामने कार से कूदकर रीम्स्की ने जो सामने पड़ा उस सफ़ेद ड्रेस वाले आदमी से चिल्लाकर कहा, “फर्स्ट क्लास! एक! तीस दूँगा!” – उसने ब्रीफकेस से नोट निकाले, “प्रथम श्रेणी का, नहीं तो दूसरे दर्जे का दो! वह भी नहीं तो ऑर्डिनरी दो!”

उस आदमी ने चमकती हुई घड़ी पर नज़र दौड़ाकर रीम्स्की के हाथ से नोट खींच लिए.

ठीक पाँच मिनट बाद स्टेशन के शीशा जड़े गुम्बद के नीचे से लेनिनग्राद वाली गाड़ी निकली और अँधेरे में खो गई. उसी के साथ रीम्स्की भी खो गया.

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2 comments

  1. bahut sundar badhai आ चारुमति रामदास ji ko

  2. Charumati Ramdas

    धन्यवाद, सर!

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