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शादियों के दिन महामारियों में बीत गए

युवा लेखक रविंद्र आरोही ने महामारी के इस दौर में इस स्मृति कथा के बहाने हम तमाम लोगों की स्मृतियों को जगा दिया है। आप भी पढ़िए-

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इन खाली और विपद के दिनों में उन भरे हुए दिनों की बहुत यादें हैं। शादियों के दिन महामारियों में बीत रहे हैं। गरमी की छुट्टियों में गांव जाने की बात होती है तो मेरी जिज्ञासा रहती है कि गांव-जवार में कोई शादी-समारोह है कि नहीं। नाते-रिश्तेदारी में किसके यहां शादी है? मैं फोन करके पूछ लेता हूं। जिन लड़को की स्मृति एकदम छुटपन की रही है, उनकी शादी की बात सुनकर सोचने लगता हूं कि समय कैसे तो साबुन की तरह फिसल रहा है।

गांव के लोग जो दिल्ली, कलकत्ता-बंगाला रहते हैं, वे लोग गांव की शादियों में शहरों से हलवाई ले जाने लगे हैं। गांव की उस पूड़ी-सब्जी का युग ही चला गया। गांव के हलवाई, गांव के लड़के उन शहर से आए हलवाइयों को आश्चर्य से देखते हैं। शहर के हलवाइयों के साथ उनके हेल्पर भी आते हैं। अब गांव के लड़कों का मजमा चूल्हे के पास नहीं जमता। गांव के हलवाई होते थे तो गांव के बीसों लड़के वहां हीरे रहते। कोई आटा सान रहा है। कोई आलू काट रहा है। कोई कटहल छिल रहा है। कोई लोइया काट रहा है। कोई कड़ाही में तेल डाल रहा है। कोई खैनी बना रहा होता है। कोई कोने में गांजा लठ रहा है।

उस जलते चुल्हे के इर्द-गिर्द उत्सव बना रहता था। जिसे भी थोड़े से मनोरंजन, थोड़े से आराम की तलब होती, वो वहीं चला जाता। एक से एक काढ़कर मजाक चलते वहां। गांव के हलवाई सारे हीत-नात को पहचनते, प्रणाम-पाती करते और मजाक करते। भोजन में रस-स्वाद तो इन्हीं सबों से बनता था। आलू कटहल की तीखी तेल-मीर्च वाली सब्जी का मजा शहर वाली मटर-पनीर में कहां। आटे की पुरियां बनाकर ड्रामों में रखा जाता। इतना भी सेहदपसंद क्या होना कि एक दिन नहीं खा सकते। हम लोग बचपन में उन रिश्तेदारों को पहचानकर रखते जो बारात में रोटी मांगते थे। जवार जान जाता कि कोई हीत रोटी मांग रहा है। हर आदमी अपनी हैसियत के हिसाब से उस हीत को मन ही मन गालियां देता। लोग उसे पाखंड़ी कहते। बिना लहसून-प्याज वाले लेग भी पहुंचते। उनके लिए दही चूड़ा का इंतजाम हो जाता तो वे भरुआ मरिचा का आंचार मांगते। वे लोग ही बारात के जेवर होते थे। उनसे बारात की शोभा होती थी।

कितनी बातें, कितने फ्लेवर।

नए लेखक पुराने लेखकों की नकल में सबसे पहले शराब-सिरगेट अपनाते हैं। गांव भी सिर्फ शहर की विकृतियां अपनाता है। एक बार के लिए तो लगने लगा था कि सब लोग कितने अकेले हो गए हैं, इकाइयों में जीने वाले, पर जिस तेजी से ये महामारी पूरी दुनिया में फैली और मानव से मानव के द्वारा फैली, इससे लगा कि दुनियाभर के लोग आपस में कितनी मजबूती से जूड़े हैं। हजारों-हजार किलोमीटर पैदल चलकर उस गांव में पहुंचना जहां पहले से गरीबी थी। दुख था। भूखमरी थी। अभाव था। ये बताता है कि गांव की जड़ें कितनी मजबूत हैं। दिल्ली, कलकत्ता और गांव, तीनों जगह जिनके घर थे, वे भी दिल्ली से भाग कर  कलकत्ता नहीं गांव जा रहे थे। कहते हैं कि आदमी की आत्मा की जगह वह नहीं होती जहां वह जीना चाहता है बल्कि वह होती है, जहां वह मरना चाहता है। शहरों से गांव की ओर उन लाखों-लाख लोगों के लौटने का दृश्य इस सदी की सबसे बड़ी मजबूरी का दृश्य था। मैं सोचता हूं कि सरकारें सक्रिय होतीं, गांवों में दवाई, कमाई और पढ़ाई की व्यवस्था हो जाती और शहर में रह रहे लोगों को अचानक ये बात पता चलती और वे पीठ पर अपना अतीत और आंखों में सपने लिए जब ट्रेनों में सवार होते तो वह इस सदी का, अपनी जड़ों की ओर लौटते लोगों का, सबसे सुखद द़ृश्य हो सकता था।

पिछले के पिछले साल एक दोस्त ने आमंत्रण दिया। उसी की शादी थी। उसका कहना था कि कम से कम उसके यहां एक सप्ताह रुकना पड़ेगा। एक सप्ताह अभी कोई कहां रुकता है। अब तो किसी-किसी फंग्शन में ही रिश्तेदारियों में जाना हो पाता है। और शाम को आदमी अपने घर लौट आता है। कहने-करने लायक कुछ होता ही नहीं। सब बातें तो फोन पर हो चुकी होती हैं। गांव से कोई कलकत्ता आता है तो उससे पहले खबरें आ जाती हैं। उसके पास बताने-बतियाने के लिए कुछ बचता ही नहीं। वहीं आदमी बेकार महसूस करने लगाता है।

पहले के लोग बिना किसी ऑकेजन के सिर्फ पहुनाई करने चल देते थे। उनके आने पर हम लोग जितने होते उससे ज्यादा सभ्य दिखने लगते थे। अनदिना हमारे बालों में कंघी नहीं लगती थी पर उनके आने पर तेल-कंघी लगते पर उस समय बाल भी फुटेज खाने लगते। लाख जतन कर लो घूमते ही नहीं थे। हम लोग सच के चम्पू लगते। वे नहाने जाते तो हम लोग कल चलाते। उन्हें नया साबुन दिया जाता। साबुन खुलते ही खूब सुंदर महकता था। उसकी खुशबू अभी भी जेहन में है। हम उसके कवर देर तक महकते। वे मंत्र पढ़ते हुए नहाते थे। उनके आने पर रोटियों में घी लगता और रोटियां औसतन पतली हो जातीं थी। वे खाते-खाते रोटी बनाने वाली बहुओं की तारीफ करते। जब वे आंगन में तारीफ करते तो चुहानी तक सुनाई देता और बहुएं आपस में खिलखिला कर हंसतीं। वे बहुत बातें लेकर आते। वही उनका आकर्षण होता।

वे लोग बीत गए। बातें बीत गईं।

दोस्त ने जैसी व्यवस्था बताई उस हिसाब से सोचकर रुकना वहां अच्छा लगा। कह रहा था कि हमें अलग से एक कमरा मिलेगा। हम चार दोस्त थे। एक की तो शादी ही हो रही थी। एक कमरे में हम तीन को रहना था। एक दोस्त तो गांव साइड का ही था। गांव में सिमेंट-बालू का कारोबार बना रखा था। दूसरा वर्षों से सूरत में था। यही मौका था। गांव साइड का लालबिहारी है। उसने फोन पर तै कर लिया कि वह मेरे गांव आएगा और मुझे अपनी मोटर साइकिल पर बिठा कर ले जाएगा। हमारे गांव से एकसठ किलोमीटर दक्खिन जाना था। लालबिहारी अपने घर से जाता तो उसे सिर्फ चौवालिस किलोमीटर जाना होता। लालबिहारी रात को मेरे यहां आ गया। सुबह हम लोगों को निकलना था। गरमियों के दिन थे। हम लोग तैयार थे। हमारे पास गाड़ी थी, पैसे थे, कपड़े, मोबाइल और इंटरनेट था। रेडी होकर जब मोटर साइकिल निकाले तो दुआर पर चाचा थे और एक जन थे। वे हमें बता रहे थे कि वहां तक जाने का कौन सा रास्ता ठीक है। पंद्रह मिनट के भीतर वहां तेरह-चौदह लोग खड़े हो गए। सभी लोग हमें रास्ते ही बता रहे थे। बताने वाले तीन ग्रुप में हो गए थे और सभी अपने बताए रास्ते को सुगम और जानदार बता रहे थे। एक का कहना था कि उसका वाला रास्ता पांच किलोमीटर ज्यादा लंबा है पर नितिश के आने के बाद ऐसा रास्ता हुआ कि ब्रेक पर कहीं पांव ही नहीं रखना है। दूसरा कह रहा था कि उसका रास्ता मात्र तीन किलोमिटर खराब है, बाद बाकी सब फसकलास। एगारह किलोमीटर शॉट पड़ेगा। तीसरा कह रहा था कि कहीं जाने की जरूरत नहीं है यहीं से खुडुर पकड़ो, गंवे-गांईं निकल जाओ मोती के ससूरारी चनउर, वहां से पीच पार कर जाओ, दो गांव छोड़कर अपने फुआ के गांव होते हुए सीधा सोलिंग है छह किलोमीटर और उसके पार करते ही वही गांव है जहां हमें जाना है। उसे पता नहीं था कि उसका रास्ता कितना लंबा है। पर उसे लगता था कि उसका रास्ता भी बहुत छोटा है।

उन बातों के आगे हमारा गुगल मैप धरा का धरा रह गया था। गुगल हमें रास्ते की स्मृतियां नहीं देता। हम लंबे और ब्रेक न लगाने वाले रास्ते से ही गए थे। वो रास्ता सचमुच अच्छा था। नितिश ने पहले सेशन में आकर ही ये जबरजस्त काम किया था। गांव-गाव में पक्की सड़कें बीछ गई थीं। नौ बजे तक हम वहां पहुंच गए थे।

हमारे रहने की व्यवस्था एक रोते हुए घर के एक बड़े से कमरे में था। उसमे तीन बड़ी खिड़कियां थीं। किसी आदमी ने यह घर बना कर शहर में बसेरा डाल लिया था। ऐसा अब गांवों मे होने लगा है। घर अकेले होने लगे हैं। वैसे ही एक घर का एक मरा था। इन महामारियों में शायद घर का अपना, घर में लौट आया हो। इस विपद में भी घर दालचीनी के सुगंध वाले किसी भाव से भर गया होगा।

यहां जो चीजें मैंने महसूस की वो बड़ा मजेदार थीं। यहां दो तरह के गेस्ट थे। दो जेनेरेशन के। एक फुआ-फुआ, मामा-मामी और दूसरा दीदी-जीजा, साला-सरहज।

जो पहले ग्रुप में थे- फुआ-फुफा, मामा-मामी वाले में, वे रिटायरमेंट की उम्र में या उसी कगार पर खड़े थे। वे धोती कुर्ते में थे, और जो बुशर्ट पेंट में भी थे, उनके कपड़े सादे-सादे थे। इस ग्रुप की औरतें सूती साड़ी पहनती थीं। माथे पर पल्लू रखतीं और नैहर में भी ससूराल की तरह लजाती थीं। औरतों के जीवन में इंटरनेट तो नहीं आया था। हां, स्मार्ट फोन से भी किसी खास का ही नंबर मिला पाती थीं। मिलाती कम उठाती ही ज्यादा थीं। इस ग्रुप के स्त्री-पुरुषों के पास बातें बहुत थीं। पुरुष दुआर पर बैठते थे तो दुआर भर जाता था। स्त्रियों से आंगन भरा-पूरा लगता था। बाहर भीतर का महौल हंसलोन बना रहता। अपनी हजार बीमारियों को धकियाकर जब वे चलतीं तो मन भर जाता था।

पुराने लोग पुराने लोगों को पहचानते थे। पर इनके मन में ये था कि ये पुराने हो गए हैं। इस समारोह में ये किसी काम के नहीं हैं। पॉप गाने इनके कानों में हथौड़े की तरह बजते थे। पर अब इनकी चलती नहीं थी। दुनिया बदल गई थी। वे थोड़े उदास हो जाते। खिन्न।

दूसरे वाले नए थे। ये क्रेडिट कार्ड, डेविट कार्ड, स्मार्ट कार्ड और नेट की भाषा में बातें करते थे। बात-बात में ऑनलाइन शॉपिंग जैसी बातें करते थे। इनके कपड़े और जूते महंगे थे। इनकी पढ़ाई महंगी थी पर ये दुआर की शोभा नहीं बन पाते थे।

पुरानों के पास जहां ठसक थी, इन नयों के पास दिखावा था। नए पुरानों को बेकाम समझते थे और पुराने नयों को ओछा। अजीब एक तनाव सा था माहौल में।

एक तार कहीं बीच का टूट गया था। इंटरनेट के बाद की और पहले की पीढ़ी का द्वंद्व था। पहले की पीढ़ी यदि आउटडेटेड थी तो ये पीढ़ी भी रुटलेस थी। इसे अपनी जड़ों का पता नहीं था। इन्हें सरोकार शब्द का अर्थ नहीं पता था। उन्हें अपने बच्चों की सेहत की जानकारी तक नहीं थी। दूध पीते बच्चों को वे मनाने के लिए मोबाइल पकड़ा देते थे। वे अपने बच्चों को पैकेट के पैकेट चिप्स खिला देते थे। यह सब बड़ा अजीब था। पर उन्हें लगता था कि उन्हें हर बात पता थी। वे प्पजी खेलते थे। सेल्फी लेते थे और वाट्सप पर विडियो शेयर करते थे। उन्हें लगता था कि ये काम ये बूढ़े नहीं कर सकते। और बूढ़ों को लगता था कि वे इसीलिए बूढ़े हैं क्योंकि वे ये सब नहीं कर सकते। कुल मिलाकर स्थिति उतनी चमकदार नहीं थी। बीच में कुछ गैरजरूरी चीजों की पहाड़ बन गया था।

इस महामारी ने जहां करोड़ों लोगों को अपनी ओर लौटा दिया। सब कुछ धरा का धरा रह गया। लोग दहशत झेलते हुए गांव लौट आए। वे सब के सब अब शहर तो नहीं ही लौटेंगे। और जो लौटेंगे उनमें थोड़ी बहुत भी चेतना होगी तो वे इन दिनों को तो नहीं ही भूलेंगे।

इंटरनेट के इस युग ने आदमी को सबसे ज्यादा उच्श्रृंखल बनाया है। उसके पास सूचनाएं हैं, उसका आधार नहीं है। उसे दुनिया का हर ज्ञान पता है। वह विज्ञान से लेकर पुराण तक सब कुछ चार-चार पंक्तियों में पढ़ गया हैं। वह सूचनाओं को सही मानने लगा है।

  अब एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी के पास पहुंची है। उन्हें एक साथ रहना है। ये एक बड़ी समस्या है। सरकारें गांवों में रोजगार मुहैया करा दें तो ये पीढ़ी यहां बसने ही आई है। पर दोनों पीढ़ियों को आपस में सामंजस्य बनाए रखना होगा। उन्हें रिश्तेदारियों में जाना होगा और उन बुजुर्गों को अपने घर बुलाना होगा। उनकी सेवा सत्कार करनी होगी। वे लोग गुजर गए तो फिर नहीं दिखेंगे। दुनिया से बातें करने वाले लोगों की प्रजाति ही खत्म हो जाएगी।

पिछले पचीस तीस वर्षों में गांव का जो ताना-बाना टूट गया है उसे फिर से जोड़ना होगा। गांव की संस्कृति को वापस लानी होगी। शहर में रह कर जिस गांव की आंहें भरते हैं, उस गांव को बसाना होगा। दुनिया की हर संस्कृति खुद पर नाज करती है। फिर गांव क्यों शहर बनना चाहता है। उसे खूद को समृद्ध करना चाहिए और अपनी संस्कृति की जड़ें तलाशनी चाहिए। गांव के लड़के जो इंजिनियर हैं। IIM से हैं। दुनियां चला रहे हैं। कंपनियां उन्हें लाखों-करोड़ों के पैकेज देती हैं। उनमें वो कुबत है कि वे अपनी सोच से शहरों को स्वर्ग बना दें और कंपनियों को चांद पर बिठा दें। एक बार उन्हें अपनी ताकत गांवों में लगानी चाहिए।सरकारें इस ओर एक बार जागरुक हो जाएं तो भारत की बहुत सी समस्याएं यूं ही खत्म हो जाएं। गांव से लेकर शहर तक आदमी छितर जाएं तो प्रदूषण, गंदगी, बीमारी, कालाबाजारी, बेरोजगारी जैसी चीजें स्वत: सुलझ जाएं।

गांव की शादियों में घर में बनाए लड्डू-खजूली का नास्ता आए और रात के खाने में इस बात की चर्चा हो कि बागीचे के किस पेड़ का आम सबसे गुदगर है- तो मजा ही आ जाए।

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One comment

  1. प्रदीप कुमार शर्मा

    युवा लेखक रविन्द्र आरोही की कहानी शादियों के दिन माहामारियों में बीत गए। बहुत अच्छी लगी। गांव के कुछ भली बिसरी यादों को ताजा कर गयी और हां कुछ भुले बिसरे शब्दों ने भी मंत्र मुग्ध कर दिया जैसे ‘चुहानी’, ‘अनदिना’ इत्यादि।
    ये बात भी सच है जीन लोगों को महामारी ने वापस घर लौटाया वे उस भयावहता को याद कर शायद ही कभी वापस जांय लेकिन पापी पेट जो ना करा दे।
    आज के समय में युवा इंजीनियरिंग मैनेजमेंट जैसे उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वे मानवता के प्रति संवेदनशील नहीं रह गया। सिवा कठपुतलों के समान जो अपने आका के इशारों पर नाचते हैं। करोड़ों का पैकेज जो लेते हैं।
    कहानी बहुत अच्छी लगी। बहुत कुछ याद दिला गई। मैं जानकी पुल की कहानियां व लेख खुब चाव से पढ़ता हूं। प्रभात रंजन जी को बोलते सुनना अच्छा लगता है। इसलिए नहीं कि वे प्रख्यात कहानीकार हैं। इसलिए कि वे जो बोलते हैं वह हम जैसों के लिए उसमे से मोती चुनने के समान होता है। वे लिखने का ट्रिक्स बताते हैं।

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