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मातृत्व के अनदेखे पहलू टटोलता उपन्यास ‘इब्नेबतूती’

दिव्य प्रकाश दुबे का नया उपन्यास आया है ‘इब्नेबतूती’। वे नई वाली हिंदी के पहले पोस्टर बॉय रहे हैं। उनके पाठकों की तादाद बड़ी है। उनके इस उपन्यास पर मैं बाद में लिखूँगा। फ़िलहाल युवा लेखक पीयूष द्विवेदी की लिखी समीक्षा पढ़िए-

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 ‘माँ’ एक ऐसा विषय है, जिसे केंद्र में रखकर भारत ही नहीं, पूरे विश्व में प्रचुर साहित्य लिखा गया है। ‘माँ’ पर आधारित कथा और कथेतर दोनों प्रकार का कमोबेश लेखन हिंदी में भी मिलता है। बात कथा साहित्य की करें तो इसमें माँ को लेकर लेखन की एक परम्परागत परिपाटी रही है, जिसका किसी न किसी रूप में लेखक अनुकरण करते आए हैं। परिपाटी ये कि माँ, ममता और त्याग की मूर्ति होनी चाहिए जो बेटे के सुख के लिए, कई बार उसकी उपेक्षा के बावजूद, दुःख उठाने को भी तत्पर और समर्पित रहे। इस परिपाटी पर हुए अधिकांश लेखन में बेटे के संदर्भ में माँ की ममता, त्याग और बलिदान जैसे श्रेष्ठ चारित्रिक गुणों को स्थापित करने पर ही अधिक बल देने का प्रयास दिखाई देता है। चूंकि भारतीय समाज में माँ का व्यक्तित्व और चरित्र कुछ इसी प्रकार का रहा भी है, तो समाज का दर्पण कहे जाने वाले साहित्य में ऐसा होने को अस्वाभाविक नहीं कह सकते। हाँ, यह चरित्र-चित्रण कितना उचित है, इसे लेकर अलग से विमर्श जरूर किया जा सकता है, परन्तु प्रस्तुत संदर्भ में बात यही है कि माँ पर हुए अधिकांश लेखन में, माँ के ममता और त्याग जैसे गुणों को उभारने के उत्साह में उसके भीतर छिपी एक औरत को टटोलने का प्रयास बहुत कम हुआ है। इस साहित्यिक परिदृश्य में दिव्य प्रकाश दुबे का नया उपन्यास ‘इब्नेबतूती’ एक आशाजनक हस्तक्षेप की तरह आया है। इसमें माँ के भीतर की औरत से एक कदम और आगे बढ़ते हुए उसमें छिपी ‘लड़की’ को टटोलने का प्रयास किया गया है।

‘माँ, जो कभी एक बीस बरस की लड़की थी, उस लड़की के नाम।’ ये वाक्य किताब के पहले पन्ने पर समर्पण के रूप में लिखा है। यह समर्पण ही इस उपन्यास का सार भी है। यदि पाठक इस एक पंक्ति में निहित अर्थों की गहराई में उतरकर स्वयं को उसके प्रति सहज कर लें तो आगे के पन्नों में मौजूद कहानी से वे न केवल अधिक बेहतर ढंग से जुड़ सकेंगे बल्कि उसमें अधिक रस भी ले पाएंगे।

कहानी यहाँ भी माँ-बेटे के संबंधों की धुरी पर ही घूमती है, लेकिन उन संबंधों का स्वरूप परम्परागत ढर्रे से अलग है। माँ शालू अवस्थी और बेटे राघव अवस्थी के बीच सम्बन्ध किस तरह के हैं, इसे दोनों के एकदूसरे के प्रति संबोधनों से समझा जा सकता है। राघव, शालू को ‘अम्मा यार’ कहके बुलाता है, तो शालू उसके लिए ‘अब्बे’ का संबोधन रखती है। इन संबोधनों के पीछे लेखक ने परिवेशगत कारण भी बताया है, जिससे इनकी स्वाभाविकता का एक तार्किक स्थापन भी हो जाता है।

शालू, दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी, कृषि विभाग में कार्यरत एक आत्मनिर्भर और अत्याधुनिक आचार-विचार वाली महिला है और अपने बेटे राघव की एकमात्र अभिभावक भी है। ऊपर-ऊपर उसकी छवि परम्परागत माँओं से भिन्न लगती है, परन्तु, भीतर से वो एक आम माँ जैसी ही है। उसके भीतर भी माँ की ममता और त्याग की भावना भरपूर है, लेकिन वो उसे मुखर नहीं होने देती। इधर बेटे राघव की चिंता है कि पढ़ाई के लिए उसके विदेश जाने के बाद माँ अकेली हो जाएगी तो उसका ख्याल कौन रखेगा? राघव को अपनी इस समस्या के समाधान की दिशा शालू की एक निजी संदूक में मौजूद पुरानी चिट्ठियों में मिल जाती है। राघव पाता है कि उसकी माँ कुमार आलोक नामक किसी व्यक्ति को चिट्ठियाँ लिखती रही है। यह जानकारी किसी भी आम बेटे की तरह राघव को भी असहज करती है, लेकिन जब उसकी प्रेमिका निशा उसे समझाती है तो वो जल्दी-ही इस बात को लेकर सहज हो जाता है। यहाँ से कहानी, शालू के अतीत में उसके वर्तमान अकेलेपन को भरने की संभावना तलाशने की एक दिलचस्प यात्रा पर निकल पड़ती है, जिसका समापन एकदम अंतिम पन्ने पर जाकर होता है।

एक माँ के कौमार्य-काल के जीवन को उसके बेटे की दृष्टि से बिना किसी क्रांति का शोर किए अत्यंत सहजतापूर्वक सामने लाना, लेखक का साहसिक प्रयोग ही कहा जाएगा। चूंकि दिव्य प्रकाश दुबे के पास ‘आधुनिक युवाओं की प्रेमकथा’ के रूप में लेखन का अपना एक सुरक्षित घेरा था, जिसमें रहते हुए लिखी गयीं उनकी पिछली किताबें सफल रही हैं। इसके बावजूद उस घेरे से बाहर आकर उन्होंने ऐसा सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने वाला उपन्यास लिखा है, तो इसे उनका साहस नहीं तो और क्या कहा जाए? वैसे यह साहस करते हुए भी लेखक ने सजगता और सावधानी का दामन नहीं छोड़ा है, तभी तलवार की धार पर चलने जैसे इस विषय पर खुलकर लिखते हुए भी वे कहीं माँ-बेटे के संबंधों की शालीनता और मर्यादा से बाहर नहीं हुए हैं। अन्यथा यह विषय ऐसा है कि जरा-सी असावधानी अर्थ का अनर्थ भी कर सकती थी।

चरित्र-चित्रण की बात करें तो शालू अवस्थी इस उपन्यास की नायिका हैं और वो अपने उस ओहदे से एकदम न्याय भी करती हैं। यानी कि उनका चरित्र उपन्यास ख़त्म होने के बाद भी पाठक को लम्बे समय तक याद रहने वाला है। राघव, निशा और प्रोफेसर साहब जैसे पात्र भी अपनी-अपनी भूमिका के अनुरूप ठीक रहे हैं। प्रोफेसर साहब कहीं-कहीं अतिरिक्त रूप से भी ध्यान खींच लेते हैं।

कुमार आलोक के चरित्र-चित्रण में लेखक की कलम जरा-सी फिसली है। ये महोदय कहानी में दो बार आते हैं– एकबार शालू के अतीत में और दुबारा वर्तमान में। वर्तमान कथा में आलोक के आगमन पर उनका जैसा चरित्र-चित्रण किया गया है, वो गहराई से देखने पर लेखक को एक राजनीतिक वैचारिक धड़े के पक्षधर के रूप में प्रस्तुत करता प्रतीत होने लगता है। हो सकता है कि यह चरित्र-चित्रण करते वक्त लेखक की ऐसी कोई मंशा न रही हो, लेकिन जाने-अनजाने उससे यहाँ चूक हो गयी है। अब यह पाठकों पर निर्भर है कि वे इस हिस्से को कितने ध्यान से पढ़ते और इसका कैसा विश्लेषण व मूल्यांकन करते हैं।

चूंकि दिव्य प्रकाश नयी वाली हिंदी के प्रमुख लेखक हैं, तो उससे भी सम्बंधित एक बात यहाँ उल्लेखनीय होगी। दरअसल नयी वाली हिंदी के लेखकों के साथ एक बड़ी समस्या यह रही है कि उनकी रचनाओं में मौलिक घटनाओं का अभाव होता है। इस अभाव को वे अक्सर भाषा की कलाकारी और विचारों का लम्बा-चौड़ा वितान रचकर पूरा करने की कोशिश करते नजर आते हैं। नयी हिंदी के अधिकांश उपन्यासों में यह समस्या दिखाई देती है। स्वयं दिव्य प्रकाश दुबे का पिछला उपन्यास ‘अक्टूबर जंक्शन’ इस समस्या से काफी हद तक ग्रस्त रहा है। लेकिन ‘इब्नेबतूती’ इस मामले में एक नयी लकीर खींचती नजर आती है। इसमें विचारों का वितान और भाषा की कलाकारी के साथ-साथ रोचकता जगाने वाली घटनाएं भी भरपूर हैं। आगे-पीछे होकर चलने वाली कथा-शैली भी इसकी रोचकता में वृद्धि करने वाली साबित होती है।

कुल मिलाकर ‘इब्नेबतूती’ विषय के स्तर पर न केवल नयापन समेटे है, बल्कि प्रस्तुति के स्तर पर रोचक और पठनीय भी है। इस उपन्यास के जरिये दिव्य प्रकाश दुबे ने नयी वाली हिंदी की बिरादरी में एक नयी लकीर खींची है, अब देखना यह है कि इस बिरादरी के बाकी लेखक इस लकीर से कितना आगे बढ़ पाते हैं।

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पुस्तक – इब्नेबतूती (उपन्यास)

लेखक – दिव्य प्रकाश दुबे

प्रकाशक – हिन्द युग्म

मूल्य – 150 रुपये

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2 comments

  1. रोचक लेख। हाँ, ‘मौलिक घटनाओं के आभाव’ को कुछ उदाहरण देकर स्पष्ट किया जाता तो बेहतर रहता। किताब रोचक लग रही है। जल्द ही पढ़ी जायेगी।

  2. अछी कहानी की रचना की है। बधाई के पात्र हैं।

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