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बरेली का झुमका और सुधा-चंदर

युवा लेखक अनुराग अनंत को 2017 में लल्लनटॉप द्वारा आयोजित कहानी लेखन प्रतियोगिता में लखटकिया पुरस्कार मिल चुका है। उनके लेखन में एक ताज़गी दिखाई देती है जैसे इस रचना में-

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ये कोई हँसने की बात नहीं थी पर सबको भरपेट हँसी आ रही थी। सब अपना पेट पकड़ कर हँस रहे थे। और सुधा खड़े खड़े सबका मुंह देख रही थी। जबकि उसे अपने पैर देखने चाहिए थे। उसने एक पैर में अलग और दूसरे पैर में अलग चप्पल पहन रखी थी। अलग अलग चप्पलें दोनों पैरों में पहने हुए देख कर लोग हँस रहे थे। हँस क्या रहे थे, हँसते हुए मर जाना चाहते थे। सुधा को अपने पैर देखने के बाद भी ये बात हँसने वाली बात नहीं लगी और वो लोगों की हँसी पर रो देना चाहती थी। सुधा के लिए हँसी जितनी मंहगी थी, रोना उससे बीस गुना ज़्यादा मँहगा था। मानो एक किलो हँसी अगर एक हज़ार की हो तो एक किलो रोना बीस हज़ार का था। सुधा बचत की पैरोकार थी। इसलिए वो ना हँसी और ना रोई। उसने अपने हज़ारों रुपये बचा लिए और वहाँ हँस रहे लोगों के बारे में सोचती रही कि  ये लोग कितनी फिजूलखर्ची करते हैं। अगर ये लोग ऐसे ही हँसते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इन्हें चौराहों पर कटोरा लेकर भीख मांगना पड़ेगा।

जैसे मौसम आता है। जड़ा, गर्मी, बरसात… वैसे ही दार्शनिक बातों का मौसम आया और पार्टी में सब लोग दार्शनिक बातें करने लगे। कपूर साहब ने सबसे घटिया दार्शनिक सवाल पूछा, “जीवन क्या है?” सबने उससे भी घटिया उत्तर दिया, “जीवन दुःख है”। सबमें सुधा शामिल नहीं थी। इस सवाल पर सुधा दस ग्राम हँस दी। आप दस ग्राम हँसी का हिसाब लगा सकते हैं।फिर मिसेस शुक्ल ने कहा, “मृत्यु के बाद मनुष्य कहाँ जाता है?” इस बार सब शांत थे। सुधा ने कहा, “मृत्यु के बाद मनुष्य छुट्टियों पर चला जाता है और फिर वापस लौटता है, नौजात की तरह एकदम तरो-ताज़ा हो कर”। लोग इस ज़वाब पर फिर से कुंटलों हँस दिए। सुधा ने ना जाने क्या हिसाब किया कि उसे 59 हज़ार से कुछ ज़्यादा की संख्या मिली।

अब सुधा की बारी थी। उसने अपनी बात ऐसे शुरू की जैसे कोई बच्चा पहली बार लिखना शुरू करता है। पर बात खत्म करते करते वो डॉक्टरेट कर चुकी थी। उसकी बात का लब्बोलुआब ये था कि दुनिया में हर कोई बेमेल जोड़ी चप्पलें पहने हुए घूम रहा है। एक पैर में कोई चप्पल, और दूसरे में कोई और चप्पल। किसी की इच्छाएँ पूरी नहीं हैं। कोई तृप्त नहीं हैं। सब अधूरे हैं। सब बेमेल हैं। सब बेढंगे हैं। जैसे आप अपने को ही ले लीजिए। सुधा बत्रा साहब की तरफ मुख़ातिब थी। आप बनना गायक चाहते थे। बन डॉक्टर गये। अब आधा गायक हैं और आधा डॉक्टर। और दुबे जी आप ? कवि बनना था पर सरकारी अफ़सर बन बैठे। अब सबको पकड़ पकड़ कर कविता सुनाते रहते हैं। ना कवि ही तृप्त हुआ ना अफ़सर ही। सुधा के पति प्रोफेसर तिवारी सब सुन रहे थे। वो सबसे आख़री में अंतिम और निर्णायक बात बोलते हैं। ये उनकी आदत है। ये आदत माँ के गर्भ से ही उनके साथ है। वो अपनी माँ की तेरवीं संतान थे। तेरह में से आठ बच्चे मर चुके थे। पाँच बच्चे बचे थे। चार बहनों में एक भाई थे प्रोफेसर तिवारी। वो अपनी माँ की जीर्ण शीर्ण गर्भ से पैदा हुए थे। एक चुक चुकी गर्भ की आख़री संतान। उनकी बातों में ये बात जीवन भर दिखती रही। प्रोफ़ेसर तिवारी ने आख़री बात कही, “सुधा अपनी बेढंगी चप्पलों की उड़ाई हँसी पर अब चप्पल मार रही है। आप सब सुधा से माफ़ी माँग लीजिए नहीं तो ये आप सबके जीवन को अपनी चप्पल की तरह बेढंगा घोषित कर देगी”। सारी पार्टी में हँसी का ठहाका गूँज उठा। और  सुधा को पूरे वातावरण में उड़ते हुए नोट दिखने लगे।

ये घटना जिसमें कोई ख़ास बात नहीं है। ये इतनी भी महत्वहीन नहीं है। ये सुधा का जीवन है। किसी और का हो या ना हो पर सुधा का सारा जीवन बेमेल चप्पलों का जोड़ा ही था। प्रोफेसर तिवारी और सुधा। एक जोड़ी बेमेल चप्पलें थीं। जो जिंदगी भर साथ साथ रहीं। जीवन के पाँवों में पड़ी पड़ी घिसती हुईं।

बात तब शुरू हुई थी, जब उस तरह की कोई बात शुरू हो सकती थी। सुधा सोलह साल की रही होगी। इस पार बचपन, उस पार यौवन। बीच में सुधा और चंदर। बाद के दिनों में “गुनाहों का देवता” पढ़ते हुए दोनों बहुत रोया करते थे। जैसे अपना भविष्य बाँच रहे हों। बिछड़ने की पूर्वसूचना मिलने पर प्रेमी रोने के अलावा क्या ही कर सकते थे। सुधा, जैसा कि पहले भी बहुत सी कहानियों में होता आया है, एक अमीर बाप की बेटी थी। और चंदर जितना ग़रीब हो सकता था, उतना ग़रीब था। और जैसा कि अक्सर कहानियों में होता है। ग़रीब के बेटे के पास ना जाने कहाँ से इतनी प्रतिभा आ जाती है कि वो पृथ्वी अपनी उंगलियों पर नाचने लगता है। चंदर भी पृथ्वी अपनी उँगलियों पर नाचता था। चंदर बीस साल का था। और बारवीं पास करते करते वैज्ञानिकों जैसा दिमाग़ पा चुका था। उसे बीएससी थर्ड ईयर तक की मैथेमेटिक्स आने लगी थी। और वो ट्यूशन पढ़ाने लगा था। चंदर जब ट्यूशन नहीं पढ़ता था तब वो स्कूल जाने से पहले दो घंटे कबाड़ी का काम कर लिया करता था। चंदर के लिए उस समय दुनिया में बस यही एक काम था। जिसे करते हुए दो घंटे में पेट भरने लायक रुपया कमाया जा सकता था। दुनिया में कबाड़ की कमी नहीं थी। चंदर दो घंटे में कबाड़ ही कबाड़ चंदर बीन लिया करता था। और उन्हें बेच कर अपना और अपने नाम मात्र के पिता का पेट भर लेता था। जैसा कि ज़्यादातर कहानियों में पहले से होता रहा है। चंदर का बाप शराबी था और माँ ना जाने किसके साथ भाग गई थी। चंदर माँ के जाने पर बहुत रोया था। और चंदर के बाप ने बहुत दारू पी थी। नशा दोनों को बराबर चढ़ा था। चंदर उस रात अपने बाप को गाली देता रहा, माँ को कोसता रहा और सुबह उठते ही सबकुछ भूल गया। उस समय चंदर के जीवन में सुधा नहीं थी। बाद में जब सुधा के जीवन में चंदर आया तो उसने सुधा को रोते हुए सबकुछ बताया। उसदिन से सुधा के लिए रोना मँहगा हो गया था। हिसाब मैंने आपको पहले ही बताया है कि अगर हँसना एक हज़ार रुपये किलो था तो रोना बीस हज़ार रुपये किलो।

ये कहानी बरेली शहर की कहानी है। इसलिए इसमें झुमकों का आना उतना ही ज़रूरी है। जितना ईश्वर की किसी कहानी में चमत्कार का आना। इस कहानी में झुमका तब आया जब सुधा को ट्यूशन पढ़ते हुए दस महीने हो चुके थे और सुधा सोलह साल दस महीने की हो चुकी थी और चंदर बीस साल दस महीने का। इन दस महीनों के पहले चंदर का जीवन एक कटीली पगडंडी था। जिसमें उसके बाप की अधकचरी गालियों और कच्ची शराब की बदबू के अलावा अगर कुछ था तो उसके गणित में निपुण होने के पर लोगों की चौकती आँखें। सुधा के पिता की भी आँख उन सभी चौंकती आँखों में से एक आँख थी। उसने सोचा कि सुधा इतनी ख़ूबसूरत है कि उसे कहीं ट्यूशन के लिए नहीं भेजा जा सकता और कोई अधेड़ अगर सुधा को पढ़ाने आएगा तो लाख नज़र रखने के बाद भी सुधा को कहीं न कहीं ऐसे छू देगा जिसे दुनिया के किसी भी साबुन से नहीं धुला जा सकेगा। सुधा के पिता ज्ञानचंद्र को दरअसल ये विश्वास अपने चरित्र पर यकीन के चलते हुआ था। ज्ञानचंद्र एक अधेड़ आदमी था। उसके पास ना जाने कहाँ से हर महीने ट्रकों में नोट आते थे और वो जितना अमीर रहता उससे थोड़ा और अमीर हो जाता था। वो किसी भी जवान होती लड़की को ऐसे देखता था कि उसकी आत्मा में छेद हो जाता था। उसकी आँखों में एक विशेष शक्ति का जागरण हो गया था। वो स्त्री देह को जब ध्यान से देखता था तो उसके कपड़े पारदर्शी हो जाते थे और कोई भी लड़की या औरत प्राकृतिक अवस्था में पहुँच जाती थी। ज्ञानचंद्र को कल्पना में बलात्कार करने का वरदान प्राप्त था। वो अपने युवा काल से ही ये काम करता आया था। उसने अपनी कल्पना की अंधेरी कोठरी में अपने दोस्तों की बहनों, अपनी टीचरों, अपनी भाभियों, पड़ोसिनियों और अपनी चचेरी, सगी बहनों तक को नहीं छोड़ा था। सबके नाम पर वीर्य बहाया था। ज्ञानचंद्र को इस बात की अपार ग्लानि है कि उनकी कल्पना की शिकार कई कई बार उसकी अपनी माँ और उसकी बेटी सुधा भी हुई हैं। पर वो सुधा और अपनी माँ की घटना को स्वप्न और कल्पना मान कर भूल जाना चाहता था और माँ को माँ और बेटी को बेटी ही कहता था। उसने जीवन भर पूरी ताकत से अपनी माँ और बेटी की इज्ज़त बचाई थी और माँ-बेटी की गाली देने पर लोगों की गर्दन उतारता आया था।

चंदर को देखने पर ज्ञानचंद्र को ना जाने ऐसा क्यों लगा था कि पूरे बरेली में उससे पवित्र दूसरा कोई लड़का नहीं है। ज्ञानचंद्र के लिए पवित्रता का मतलब नपुंसकता था। चंदर को देख कर ज्ञानचंद्र को लगा था कि वो नपुंसक है। ये उसकी आस्था का प्रश्न था आप इसमें कोई तर्क ना तलाशें। एक बात जो उसने कभी किसी को नहीं बताई थी, वो ये थी कि ज्ञानचंद्र को ना जाने कहाँ से ये विश्वास हो गया था कि अगर चंदर के सामने सुधा निर्वस्त्र भी हो जाये तो भी चंदर उसे द्विघातीय समीकरण और पाइथागोरस का नियम ही पढ़ता रहेगा। उसने इसी विश्वास के चलते सुधा को पढ़ाने के लिए चंदर को चुन लिया। रोज़ चंदर शाम 5 से 7 सुधा को पढ़ाने लगा और बदले में सोलह सौ रुपए हर महीने लेने लगा। दस महीने हो चुके थे और सुधा-चंदर के अलावा भगवान ही जानता है कि उस दौरान चंदर ने सुधा की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा था। पर दसवें महीने की फीस जिसदिन चंदर को मिली उस दिन उसने सुधा को एक कागज़ में “बरेली बाजार के मेले में कल दुपहर 2 बजे मिलो” लिख कर दे दिया। सुधा किसी आज्ञाकारी बच्ची की तरह अगली दोपहर स्कूल के बाद सीधे मेले में पहुँच गई। चंदर पहले से वहाँ उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके हाथ में बरेली के झुमके थे। सुधा झुमके देख कर खिलखिला उठी थी। उसने चंदर से पहली बार मज़ाक करना चाहा और पूछ बैठी, “कहाँ मिले सर ये झुमके ? वो झुमका जो बरेली के बाजार में अनंत काल पहले गिर गया था। आपने ढूंढ लिया है क्या ?” ये बात हँसने की थी पर चंदर इस बात पर उदास हो गया था। सुधा चंदर की उदासी देख कर उदास हो गई थी। उन दोनों की उदासी से सारा मेला उदास हो गया था। उदासी सबकुछ स्लोमोशन में बदल देती है। मेले में सबकुछ रेंगने लगा था। सुधा को अपने अपराध पर दुःख हुआ और इसी दुःख को करते हुए, उसे चंदर से प्रेम हो गया। चंदर ने कभी नहीं बताया कि उसे सुधा से किस क्षण प्रेम हुआ था।

चंदर ने एक झुमका सुधा को दिया और एक अपने पास रख लिया। सुधा ठगी हुई सी चंदर को निहार रही थी। चंदर अब चंदर नहीं था। वो दार्शनिक चंदर बन गया था। उसने कहा कि ये तुम्हारे हिस्से का झुमका है। मेरे हिस्से का झुमका मैंने अपने पास रख लिया है। इसी झुमके के साहरे थोड़ा सा मैं तुम्हारे पास रहूँगा और थोड़ी सी तुम मेरे पास। सुधा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्रेम के पहले ही दिन उसे रोना आ रहा था। प्रेम मँहगा होता है और प्रेम में रोना और भी महंगा (आपको हिसाब तो मालूम ही है, हँसना अगर एक हज़ार का तो रोना बीस हज़ार का)।

सुधा की आँसू भरी आँखों ने पूछा, “अभी हम मिले भी नहीं सर, और आप बिछड़ने की बात कर रहे हैं”।।चंदर ने अपनी आँसू भरी आँखों से सुधा का सवाल सुना और उत्तर में बस इतना ही कह सका, “हमें बिछड़ना ही है, ये जानने के लिए कोई गणित का सूत्र थोड़े लगता है। मैं जो बात कह रहा हूँ वो तो अनादि काल से कही जा रही एक सिद्ध बात है”। इसके बाद सबकुछ शांत हो गया। अब चंदर और सुधा, गुरु-शिष्य होने के साथ, प्रेमी-प्रेमिका भी थे। ट्यूशन जारी था और ट्यूशन के नेपथ्य में पवित्र प्रेम भी। इस प्रेम का ज्ञानचंद्र को पता नहीं चला क्योंकि ये नपुंसक प्रेम था। जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि ज्ञानचंद्र के लिए पवित्रता का मतलब नपुंसकता था।

सुधा को चंदर के साथ बिताया हुआ पल ऐसा लगता था जैसे उसने किसी नौजात ख़रगोश को अपनी बाहों में रख लिया हो। और ख़रगोश निर्विकार भाव से सुधा को देख रहा हो। सुधा ने ही चंदर को “गुनाहों का देवता” खरीद कर दी थी। क़िताब देख कर चंदर डर गया था। दरअसल वो किताब देख कर नहीं बल्कि किताब के शीर्षक में लिखा “गुनाहों” देख कर डरा था। उसे लगता था कि ज्ञानचंद्र किसी दिन उसे कॉलर पकड़ कर उसके “गुनाहों” की सजा देंगे और आसमान में खड़े देवता ताली बजाते हुए पुष्प वर्षा करेंगे। सुधा ने चंदर को समझाया कि ये एक उपन्यास है। और उसकी सहेली पुष्पा ने कहा है कि पहली बार प्रेम में पड़ने पर इसे पढ़ना चाहिए। ये भारतीय संस्कृति है। एक ख़ास तरह की प्रेम परंपरा है। सुधा ने अपनी सहेली की तारीफ़ या बुराई में एक वाक्य और बोला था कि पुष्पा का ये छठवां प्रेम है और वो पाँच बार अलग अलग लड़कों के साथ सेक्स कर चुकी है। सेक्स शब्द चंदर के सीने में गोली की तरह लगा और वहाँ से दूर झोपड़ी में पड़े चंदर के बाप ने चंदर को माँ की गाली दी और झोपड़ी से दूर ना जाने किस शहर में चंदर की माँ ने ना जाने किसके होंठ चूम लिए।

सेक्स शब्द सुधा ने जानबूझ कर कहा था। जब सुधा ने ये शब्द सुना था तभी तय कर लिया था कि वो ये शब्द चंदर के सामने कहेगी और चंदर के चेहरे पर उभरने वाले इंद्रधनुष को निहार कर शर्मा जाएगी। चंदर का चेहरा आसमान नहीं था। उसका चेहरा एक लावारिश ज़मीन का टुकड़ा था। जहाँ हर कोई अपने घर का कूड़ा डाल देना चाहता है। इसीलिए जब सुधा ने सेक्स शब्द बोला तो चंदर के चेहरे पर ऐसा रंग उभरा जिसे याद करके सुधा कई महीनों तक डरती रही। चंदर रात में सुधा का चेहरा याद करता। सुधा का वही चेहरा जो उस दिन से अब तक स्लो मोशन में सेक्स शब्द बोल बोल रहा था। ये इतना बड़ा शब्द था कि ख़त्म ही नहीं हो रहा था। सुधा चंदर की कल्पना में मुँह खोले तब से यह एक शब्द बोल रही थी। समय को ठहरना नहीं आता था। इसलिए समय नहीं ठहरा। चंदर सुधा को पढ़ाता रहा और सुधा चंदर को पड़ती रही। वो अब पार्कों में मिलने लगे थे। प्रेम का पाठ्यक्रम वो दोनों पार्कों में पढ़ते थे। सुधा चंदर साथ साथ गुनाहों का देवता पढ़ते और दोनों घंटों रोते रहते। ये वो समय था जिसमें सुधा रोने की कीमत के बारे में समझ रही थी और उसके लिए रोना क़ीमती होता जा रहा था। सुधा को चंदर ने हर वो कहानी सुनाई जो उसे पता थी। जो उसने भोगी थी, देखी थी या सुनी थी। उसने “मछली जल की रानी है” से लेकर “काला कौवा चोर है” तक सब कहानी सुना डाली। उसने उसे बताया कि उसके बचपन में बस्ती में कैसे-कैसे और किस-किस ने उसे हस्तमैथुन के विकल्प की तरह प्रयोग किया है। सुधा को चंदर ने बताया कि उसने उसकी माँ को उस स्थिति में देखा है जिसके बाद आत्महत्या बच्चों का खेल हो जाती है। चंदर जब सुधा को ये सब बताया था तो सुधा का जी करता था कि वो सुधा की माँ या पिता या पत्नी जैसा कुछ बन जाये और उसे इस तरह गले लागाये कि चंदर जी भर के रो सके और रोते रोते वो एक गहरी नींद सो जाए। जब नींद से उठे तो पिछला कुछ ना याद रहे और वो मुस्कुराते हुए, “मैं कहाँ हूँ?, मेरा नाम क्या है ?” जैसे मासूम सवाल पूछे। सुधा को नहीं पता था कि ये कभी संभव हो पायेगा या नहीं पर उसे इतना ज़रूर पता था कि वो चंदर से इतना प्रेम करने लगी है कि इस जन्म में उसे नहीं भूल पाएगी। जब उसे ये ख़्याल आता कि वो और चंदर एक नहीं हो पाएँगे और वो चंदर को इस जन्म में नहीं भूल पाएगी तो उसका मन करता कि जितनी जल्दी हो सके उसे चंदर के साथ सेक्स कर लेना चाहिए। वो ये सब सोचते हुए अपने हिस्से के झुमके को देर तक निहारती रहती और उसे पहन कर ना जाने आईने के क्या देखती कि आईने उसे कोसते हुए अक्सर चिटक जाते।

ज्ञानचंद्र के घर में अब आये दिन आईने चिटकने लगे थे। वो इस अपशगुन से बहुत परेशान था। उसने इसकी वजह अपने फैमिली ज्योतिषी से पूछी (जैसे फैमिली डॉक्टर होते हैं वैसे ही फैमिली ज्योतिषी भी होते हैं। फैमिली डॉक्टर परिवार के सदस्यों का इलाज़ करते हैं। और फैमिली ज्योतिषी सदस्यों के ग्रहों का इलाज़ करते हैं) और ज्योतिषी ने सबकुछ बता दिया। सबकुछ मतलब सुधा और चंदर के प्रेम के बारे में सबकुछ। हालांकि उसने प्रेम शब्द का प्रयोग नहीं किया था। उसने ज्योतिषियों की पारंपरिक संस्कृतनिष्ठ हिंदी भाषा का अपमान करते हुए। प्रेम की जगह लफड़ा शब्द का प्रयोग किया था और ज्ञानचंद्र से कहा था, “श्री मान आपकी कन्या सुश्री सुधा का उस कबाड़ी के लौंडे के साथ लफड़ा चल रहा है”। आप अगर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि ज्योतिषी की भाषा चंदर का जिक्र आते ही बदल गई थी। उससे पहले सुधा तक तो उसकी भाषा मर्यादित और संस्कृतनिष्ठ ही थी।

सुधा के पिता ज्ञानचंद्र को उसके फ़ैमिली ज्योतिषी ने सुधा और चंदर के बारे में जो बताया था, वो किसी ग्रह की चाल या कुंडली के कमाल के चलते नहीं बल्कि अपनी कुंठा के चलते बताया था। होता ये था कि वो ज्योतिषी शहर भर के पार्क में झाड़ियों में झाँकता हुआ टहलता रहता था। उसने क़रीब 10-12 साल पहले पार्क में टहलते हुए झाड़ी में एक ऐसा दृश्य देखा था जो बाद में उसके एकांत में बहुत काम आया। उसके बाद से वो अपनी स्मृतियों पर रंगीन पन्नी चढ़ाने के लिए शहर भर के पार्कों की झाड़ियाँ तलाशता फिरता था। इसी तलाश के दौरान उसने सुधा और चंदर को “गुनाहों का देवता” पढ़ते और एक दूसरे से गले लग कर रोते देखा था। उसकी नज़र में ये लफड़ा था। जो सुधा और चंदर के बीच चल रहा था। ज्योतिषी ने ज्ञानचंद्र को नहीं बताया कि उसने सुधा के कैसे कैसे चित्र अपनी कल्पना की स्क्रीन पर देखे हैं। ज्योतिषी ने नहीं बताया पर ध्यानचंद्र जान गया था कि ज्योतिषी ने क्या और कैसे देखा होगा। उसने उस ज्योतिषी का कॉलर पकड़ा और भूखे भेड़ियों की तरह उसकी आँखों झाँकते हुए हिदायत दी कि उसने जो कुछ भी देखा हो, वो उसे भूल जाए। ज्योतिषी ने हकलाते हुए ‘हाँ’ बोला और ज्ञानचंद्र को लगा कि ज्योतिषी सबकुछ भूल गया है। ये बात अलग है कि उसी रात ज्योतिषी ने फिर एक बार सुधा का नाम लिया और उसकी रात नीली हो गई।

ज्ञानचंद्र चंदर को रंगे हाथ पकड़ना चाहता था। होली पास आ गई थी। मार्च का महीना था। अमूमन सबके हाथ इस मौसम में रंग जाते हैं। ज्ञानचंद्र को विश्वास था कि वो जल्दी ही चंदर को रंगे हाथ पकड़ लेगा। और जैसा वो सोचता था वैसा ही हुआ।

अगले दिन से होली पर एक सप्ताह की छुट्टी होने वाली थी। चंदर ने सुधा से कहा कि अब हम सात दिन बाद मिलेंगे। सुधा को ये सात दिन सत्तर साल सुनाई दिए और उसने चंदर का हाथ पकड़ कर चूम लिया। उसने ना जाने किस तरह हाथ चूमा था कि चंदर का हाथ गुलाबी पड़ गया। उसी समय ज्ञानचंद्र कमरे में आ गया और उसने चंदर को रंगे हाथ पकड़ लिया। सुधा चीखी हमनें सेक्स नहीं किया। सेक्स शब्द किसी की हत्या भी करा सकता है ये बात सुधा को शायद नहीं मालूम थी। चंदर को सुधा के दस मुंहबोले भाई छत पर उठा ले गए और जब वो चंदर को छत पर ले जा रहे थे तब उन्होंने मुस्कुराते हुए सुधा से कहा था, “बहन एक-एक कप गरमागरम चाय मिल जाये तो मज़ा आ जाये”। सुधा चाय बनाती जा रही थी और रोती जा रही थी। चंदर चीख रहा था और चाय नमकीन होती जा रही थी। चाय के नमकीन होने की वजह चंदर की चीख कम सुधा के आँसू ज़्यादा थे। सुधा ने चाय छत पर पहुँचाई और सीढ़ियों पर खड़ी हो कर छत से आती आवाज़ें सुनने लगी। नमकीन चाय ने दसों भाइयों और एक पिता का दिन बनाने के बजाय मूड ख़राब कर दिया था। उन्होंने शायद इसी ख़राब मूड की वजह से चंदर के सारे कपड़े उतार दिए थे। सुधा ने सुना कि उनमें से कोई एक कह रहा है कि इस कबाड़ी के पिछवाड़े में पेट्रोल डाल दो। तो दूसरा कह रहा था कि पेट्रोल के बाद डंडा भी डाल देना। दसों कुछ ना कुछ डालने की बात कर रहे थे। सुधा सिसक रही थी। चंदर चीख रहा था। ज्ञानचंद्र और सुधा के मुंहबोले भाई हँस रहे थे और इन सबके बीच रात हो रही थी। रात में बस्ती से वही लड़के बुलाये गए जो चंदर को हस्तमैथुन के विकल्प के रूप में प्रयोग करते रहे थे। ज्ञानचंद्र ने सभी से कहा कि वो उनके प्रयोग देखना चाहता है। देखते देखते सभी लड़के वैज्ञानिकों में बदल गये। और चंदर उनकी प्रयोगशाला बन गया। उस रात अगर चंदर के पास उसके हिस्से का बरेली का झुमका नहीं होता तो चंदर मर जाता। बरेली के झुमके के साहरे चंदर सबकुछ सह गया। सुबह होते होते ज्ञानचंद्र के मन का मोम जागा और उसने चंदर को “इस शहर में फिर कभी ना दिखना” कह कर छोड़ दिया। चंदर के लिए सुबह होने के साथ ही बरेली शहर मर गया। ज्ञानचंद्र को लगा वो सही समझता था, चंदर का प्रेम नपुंसक है। ज्ञानचंद्र को उन झुमकों के बारे में कुछ मालूम नहीं था। जो एक सुधा के पास था और एक चंदर के पास।

होली बीतने के बाद सुधा ने बारवीं की परीक्षा दी और पास हो गई। ज्ञानचंद्र ने पढ़ाई के आगे खड़ी पाई खींची और सुधा की शादी प्रोफ़ेसर तिवारी से कर दी गई। मैं आशा करता हूँ कि आप सभी सुधि पाठकों का सामान्य ज्ञान अच्छा होगा और आप जानते होंगे कि कोई आदमी प्रोफेसर पीएचडी करके बनता है और पीएचडी करते करते आदमी की क्या उम्र हो जाती है। प्रोफ़ेसर तिवारी को एक कमसिन जवान लड़की मिली थी और सुधा को एक ढला हुआ अधेड़ आदमी। ये एक बेमेल जोड़ी थी। जैसे किसी ने एक पैर में कोई और चप्पल और दूसरे पैर में कोई और चप्पल पहन ली हो।

सुधा चाहती थी कि वो पहली रात को ही प्रोफ़ेसर तिवारी को बता दे कि इस दुनिया में चंदर नाम का एक लड़का है। जिसके पास उसकी आधी आत्मा है। सुधा को इस बात का विश्वास था कि चंदर जीवित है क्योंकि कोई भी आदमी आधी आत्मा के साथ नहीं मर सकता। चंदर की आधी आत्मा सुधा के पास थी। वो जो झुमका उसके पास था। वो उसे चंदर की आधी आत्मा कहती थी और जो झुमका चंदर के पास था उसे अपनी आधी आत्मा। सुधा को लगता था कि उन दोनों की जान उन्हीं झुमकों में बसी है और जब तक दोनों झुमके एक नहीं होंगे। दोनों चैन से मर नहीं सकते। सुधा चैन से मरना चाहती थी और ये भी चाहती थी कि चंदर भी चैन की मौत मरे।

सुधा प्रोफ़ेसर तिवारी को चंदर के बारे में कुछ नहीं बता सकी। वो चंदर के बारे में कुछ बताती उससे पहले ही प्रोफ़ेसर तिवारी ने सुधा को बता दिया कि उन्हें बहुत भूख लगी है और सुधा का शरीर एक स्वादिष्ट डबलरोटी है। बात उस दिन दबी तो फिर हमेशा के लिए दब गई। सुधा को जब जब ज़ाहिर करना होता कि वो अधूरी है। वो अलग-अलग पैरों में अलग-अलग चप्पलें पहन लेती। प्रोफ़ेसर तिवारी सुधा के भुलक्कड़पने पर तरस खाते और सुधा प्रोफ़ेसर तिवारी की नादानी पर। दोनों की जिंदगी एक दूसरे पर तरस खाते हुए बीत रही थी।

प्रोफेसर तिवारी बहुत अच्छे आदमी थे। सुधा को कभी उनसे कोई शिकायत नहीं रही। प्रोफ़ेसर तिवारी से कभी किसी को कोई शिकायत नहीं रही। उनका स्वभाव तो ऐसा था कि राह चलते अगर कोई पत्थर उनके पौरों से टकरा जाता तो वो उससे भी माफ़ी मांग लिया करते थे। उन्होंने पाँव के नीचे आई चींटियों से लेकर देश के सबसे अमीर आदमी के अकेलेपन तक के लिए प्रार्थनाएं की थी। उनकी प्रार्थनाएं आकाश में बादल बन कर छा गई थीं। और जब जब बारिश होती थी। प्रोफेसर तिवारी समझ जाते थे कि ये उनकी प्रार्थनाओं का असर है। आसमान से ईश्वर का असीस बरस रहा था।

ऐसा क़तई नहीं था कि प्रोफ़ेसर तिवारी को सुधा के बारे कुछ मालूम नहीं था। उन्हें अंदाज़ा पहली रात से ही था कि सुधा की आत्मा में दीमक लगे हैं। वो भीतर भीतर चुक रही है, शायद इसीलिए उन्होंने सुधा से पहली रात ही कहा था कि वो जानते हैं कि वो बहुत जल्दी मर जाएगी। उन्हें अंदाज़ा था कि कोई आधी आत्मा के साथ ज़्यादा दिन जिंदा नहीं रह सकता।

ज़्यादा दिन कितने दिन होते हैं ? और जल्दी कितना जल्दी होता है। प्रोफ़ेसर तिवारी को नहीं मालूम था। सुधा और प्रोफ़ेसर तिवारी अधूरेपन के तीस साल गुजार चुके थे। वो इस तरह अधूरे थे कि निसंतान थे। उनके आँगन में हमेशा उदासी खेलती रही कभी कोई बच्चा नहीं खेला। उन दोनों ने अपनी अपनी उदासियों को अपने बच्चों की तरह प्यार किया। सुधा ने प्रोफेसर तिवारी को कभी चंदर के बारे में नहीं बताया और प्रोफ़ेसर तिवारी ने भी सुधा को उस अनाम लड़की के बारे में कुछ नहीं बताया, जिसके बारे में उनके अलावा और कोई नहीं जानता था।

 

बिना घटनाओं का जीवन जैसा होता है। सुधा और प्रोफेसर तिवारी का जीवन वैसा ही जीवन था। उनके जीवन में जो जैसा था। वो वैसा ही था। मलतब ये कि फूल, फूल की तरह थे, पत्थर, पत्थर की तरह, रात, रात की तरह और दिन, दिन की तरह। इस तरह प्रोफ़ेसर तिवारी और सुधा उस दिन से पहले एक लंबी सीधी सड़क पर निरुद्देश्य ही चलते रहे, जब सुधा अचानक बीमार पड़ गई। अस्पताल में प्रोफेसर तिवारी सुधा का हाथ थामे सुधा से कह रहे थे, “तुमनें आजतक मुझसे कुछ नहीं माँगा। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे कुछ माँगों, मैं अपना सबकुछ लुटा कर भी तुम्हें वो चीज़ देना चाहता हूँ”। सुधा के मुँह से बस एक शब्द फूटा-झुमका। प्रोफ़ेसर तिवारी कुछ समझ नहीं पा रहे थे। मृत्यु की सैंया पर झुमके का मोह। सुधा ने अपनी हथेली आगे की। उसमें एक झुमका था। वही झुमका जो जवानी आते ही चंदर के साथ उसके जीवन में आया था। उसकी एक मात्र स्मृति का सुनहरा प्रतीक। उसकी आत्मा का साथी। उसकी आधी आत्मा। सुधा स्मृति के भंवर में डूब रही थी। डूबती अवाज़ जैसी होती है। सुधा की आवाज़ उस समय वैसी ही थी। मनुष्य इच्छाओं के पाँवों से चलता है। सुधा अब तक का जीवन एक पाँव से चलते हुए यहाँ तक आई थी। एक पाँव से चली गई यात्रा पूरी होने पर भी भीतर से अधूरी होती है।

सुधा ने प्रोफ़ेसर तिवारी के सामने जीवन में पहली बार चंदर का नाम लिया था। सुधा के मुंह से जैसे ही “चंदर” नाम निकला। प्रोफ़ेसर तिवारी आधी बात समझ गए। आधी बात सुधा ने अपनी डूबती अवाज़ में उन्हें बताई। उसने उन्हें बताया कि कैसे चंदर ने बरेली बाजार के मेले में उसे ये झुमका दिया था। एक झुमका उसे दिया और एक झुमका अपने पास रख लिया। उसने प्रोफ़ेसर तिवारी को ये भी बताया कि घर में आज तक जितने भी आईने चटके हैं। वो इन्हीं झुमकों के बदौलत चटके हैं। उसने अपनी आत्मा के आधा होने और उसे पूरा करने की तरक़ीब के बारे में भी बताया। आधी आत्मा के साथ मरना बहुत कठिन होगा उसके लिए और चंदर के लिए भी। उसे और चंदर को मरने से पहले एक बार मिल लेना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दोनों चैन से नहीं मर पाएंगे। वो दोनों भगवान के घर किस मुँह से जाएँगे। अपनी इस चिंता को भी प्रोफ़ेसर तिवारी से सुधा ने बताया। और वो सभी दृश्य जिसमें चंदर पागल कुत्ते की तरह तड़प रहा था और उसके पिता और दसों मुंहबोले भाई उसके साथ क्रूरता का कीर्तिमान रच देने पर आमादा थे सबकुछ सुधा ने प्रोफ़ेसर तिवारी से कह दिया था। प्रोफ़ेसर तिवारी से सबकुछ बताने के बाद सुधा एकदम ख़ामोश हो गई थी। जैसे उसने प्रोफ़ेसर तिवारी से कभी कुछ कहा ही नहीं था। प्रोफ़ेसर तिवारी भी ऐसे हो गए जैसे उन्हें कुछ भी मालूम नहीं चला। उन्हें भीतर भीतर ये समझ आ गया था कि अगर वो सुधा के लिए कुछ कर सकते हैं तो सुधा के झुमकों का जोड़ा पूरा कर सकते हैं। पर ये काम बहुत कठिन था। एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में चंदर को ढूंढना आसान नहीं था। वो जिंदा है या मर गया है। वो किस शहर में हैं, क्या करता है, किस हालत में हैं। उन्हें कुछ भी नहीं पता था। चंदर के पास वो झुमका है भी या नहीं इसका भी कोई अंदाज़ा उन्हें नहीं था। वो एक बंद और अंधेरी गली में थे और उन्हें बस इतना मालूम था कि उन्हें इस गली से बाहर निकलना है। इसी में सुधा और चंदर की मुक्ति थी और शायद प्रोफ़ेसर तिवारी की भी। और जैसा कि अनादि काल से होता आया है। आदमी मुक्ति के लिए कुछ भी करने के लिए हंसते हंसते तैयार हो जाता है। प्रोफ़ेसर तिवारी भी तैयार हो गए थे। पर करना क्या है उन्हें कुछ नहीं मालूम था।।

आप जो भी लोग ये कहानी पढ़ रहे हैं कुछ देर के लिए इसे एक फ़िल्म समझिए और देखिए कि कैसे सुधा के सिरहाने कुर्सी पर बैठे बैठे प्रोफ़ेसर तिवारी की आंखें लग गई हैं। और चूंकि अब ये एक फ़िल्म है इसलिए आप प्रोफ़ेसर तिवारी के सपनों में प्रवेश कर सकते हैं। आप प्रोफ़ेसर तिवारी के सपने में प्रवेश करते हैं और देखते हैं, ना जाने कहाँ से एक जर्जर बूढ़ा जिसकी उम्र उतनी नहीं है जितना वो लग रहा है। वो उतना जर्जर भी नहीं है, जितना दिख रहा है। अस्पताल के उस कमरे में प्रवेश करता है। और सुधा के सिर पर हाथ रख देता है। उसके हाथ रखने से सुधा चौंक कर उठती है। जैसे उसकी देह इसी एक स्पर्श की प्रतीक्षा कर रही थी। दोनों मुस्कुराते हैं जैसे दोनों अब तक इसी एक मुस्कान के लिए जीवित थे। प्रोफ़ेसर तिवारी को अपने आप पता चल जाता है कि यही चंदर है। उसके एक हाथ में “गुनाहों का देवता” है और एक हाथ में वही झुमका जिसके लिए सुधा की जान अटकी हुई थी। चंदर सुधा को वो एक झुमका देता है और सुधा खिलखिला कर हँस पड़ती है। सुधा दोनों झुमके पहन लेती है और अस्पताल के सारे आईने चटक जाते हैं। इस बार खड़कियों के शीशे भी चटकते हैं। दोनों गले मिलते हैं और प्रोफ़ेसर तिवारी उसी अनाम लड़की की स्मृतियों में खो जाते हैं। जिसका नाम सिर्फ और सिर्फ उन्हें मालूम था। चंदर अब सुधा को गुनाहों का देवता पढ़ कर सुना रहा है और धीरे धीरे दोनों साँसों का दामन छोड़ रहे हैं। सुधा के हाथों में चंदर का हाथ है। अब दोनों की आत्मा पूरी है। अब दोनों चैन से मर सकते हैं। दोनों साथ साथ चैन से मर जाते हैं। प्रोफ़ेसर तिवारी का स्वप्न टूटता है और वो चौंक कर स्वप्न से बाहर निकलते हैं। उन्हें ना जाने क्या सूझा है कि उन्हें देख कर ऐसा लगता है कि उन्हें पता चल गया है कि क्या करना है। जो पता चल गया है उसे करने के लिए वो अस्पताल से बाहर निकल जाते हैं। और दृश्य अँधेरे में विलीन जाता है।

वो आनन-फानन में अपना घर बेच रहे हैं। अपने फिक्सड डिपॉजिट तुड़वा रहे हैं। बैंकों से पैसे निकाल रहे हैं। अगले दो दिनों में उन्होंने सारे पैसे इकट्ठा कर लिए हैं। सारे शहर में चर्चा हो गई है कि प्रोफेसर तिवारी पागल हो गए हैं। लोगों को लगता है कि सुधा को कोई बहुत बड़ी बीमारी है और सुधा के इलाज़ के लिये प्रोफ़ेसर तिवारी ख़ुद को भी बेच देंगे। शहर भर की औरतें उनके लिए दुआएँ करतीं हैं और उनके पति प्रोफ़ेसर तिवारी की तरह उन्हें प्रेम नहीं करते, इस बात पर मन ही मन पहले अपने पतियों को फिर अपने दुर्भाग्य को कोसतीं हैं। आसमान में काले बादल छाए हुए हैं और शाम को जोरदार बारिश हो रही है। इसी बारिश में भीगते हुए प्रोफ़ेसर तिवारी अस्पताल पहुँचते हैं। और सुधा से कहते हैं-अब तुम चैन से मर सकोगी। चंदर जल्दी ही झुमके और “गुनाहों का देवता” के साथ यहां इसी कमरे में होगा। तब वो रोते हुए “गुनाहों का देवता” पढ़ेगा। तुम दोनों झुमके पहनोगी। अस्पताल के सारे आईने चटक जाएँगे और इस बार अस्पताल की खिड़कियों के सब शीशे भी टूटेंगे। तुम दोनों रोते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ोगे और एक साथ इस दुनिया से रवाना हो जाओगे। इस बार तुमको कोई नहीं रोक पायेगा। तुम दोनों एक साथ चैन से मर जाओगे।

सुधा ये बात सुन कर ऐसे हँसती हैं जैसे बारवीं में पढ़ने वाली कोई लड़की हो और उसे उसकी मनचाही कोई चीज़ मिलने वाली हो। वो एक साँस में ना जाने कितने सपने, कितने दृश्य, कितनी स्मृतियों से गुजर जाती है। सुधा प्रोफ़ेसर तिवारी को धन्यवाद कहती है और अपनी आँखें मूंद लेती है।

अगली सुबह देश भर के अख़बारों में इश्तिहार छपता है। देश भर के चैनलों में विज्ञापन चलता है। महानगरों में बड़ी बड़ी होर्डिंग लगाई जाती है। जिसमें सुधा के पास जो झुमका है उसकी तस्वीर होती है और बस यही कहा जाता है कि इस झुमके की जोड़ी जिसके पास हैं वो जल्दी से जल्दी इसे लेकर अरबिंदो अस्पताल, इंदौर, कमरा नंबर. 29 में चला आए। सुधा उसका इंतज़ार कर रही है।

सुधा बेहोश है। उसे ये सब जो कुछ हो रहा है उसके बारे में कुछ पता नहीं है। डॉक्टर कहते हैं कि सुधा कोमा में है। उसे अब तक मर जाना चाहिए पर ना जाने क्यों उसकी जान अटकी हुई है। सुधा को बहुत कष्ट हो रहा होगा। सुधा को डॉक्टर नहीं बचा सकते, भगवान क्यों नहीं उसे मुक्ति दे देते। डॉक्टर्स प्रोफेसर तिवारी से ऐसा ही कुछ कहते हैं। प्रोफेसर तिवारी डॉक्टरों से कहते हैं चिंता की कोई बात नहीं है-सुधा को जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी।

इंदौर से मुम्बई जितनी दूर थी। चंदर, सुधा से उतनी ही दूर था। जितनी देर मुम्बई से इंदौर आने में लगती है। उतनी ही देर चंदर को सुधा के पास आने में लगी। चंदर मरा नहीं था। वो जिंदा था। अब उसका नाम चंदर नहीं था। अब उसका नाम गुरु जी था। चंदर का चेहरा किसी बूढ़े शेर का चेहरा हो गया था। लंबी दाढ़ी, जर्जर शरीर। उम्र जितनी थी उससे 20 साल ज़्यादा उम्र लग रही थी। चंदर मुम्बई में रेलवे स्टेशनों पर कूड़ा बीनने वाले बच्चों को पढ़ता है। उसके पढ़ाये लड़के गणित में वैज्ञानिकों की तरह कुशाग्र हैं। उन्हें अपनी उंगलियों पर पृथ्वी नाचने की कला आती है। वो उन बच्चों को “गुनाहों का देवता” पढ़ कर सुनाता है और जब वो उन्हें गुनाहों का देवता पढ़ कर सुनाता है तो बच्चे हंसना-रोना एक साथ करते हैं। गुरु जी के पढ़ाये कई बच्चे अब सरकारी अफ़सर बन गए हैं। कई पत्रकार, कई बिजनेस मैन, कई अभिनेता और कुछ बच्चे राजनीति में भी आ गए हैं। सब गुरु जी को बहुत प्यार करते हैं। फिर भी गुरु जी की जिंदगी में  एक विशेष प्रेम की कमी थी। उसी कमी को पूरा करने के लिए आज गुरु जी मुम्बई से इंदौर के अरबिंदो अस्पताल के कमरा नंबर 29 में चले आये थे।

चंदर जो अब गुरु जी बन गया था। अरबिंदो अस्पताल के कमरा नंबर 29 में खड़ा था। अब सारे शहर में ही नहीं सारे देश में बरेली के झुमकों की चर्चा थी। पत्रकार अस्पताल के बाहर जुटने लगे थे। सब बस यही जानना चाहते थे कि प्रोफ़ेसर तिवारी ने अपना सबकुछ लुटा कर झुमके का ये विज्ञापन क्यों चलवाया। पत्रकार ख़बर को कुत्तों की तरह सूँघ लेते हैं उन्हें पता चल गया था। यहाँ कोई कहानी है। जिसे बेचा जा सकता है। जिसमें एंकर की नाटकीय अवाज़, फिल्मों के गीत-संवाद मिले हुए पैकेज़ और एक बेहूदा सी स्क्रिप्ट के साहरे टीवी पर घंटों काटे जा सकते हैं।

प्रोफ़ेसर तिवारी कमरे में सुधा के सिरहाने बैठे हुए थे। उन्होंने चंदर से उसका परिचय पूछा-

-आप कौन ?

-आपके लिए गुरु जी और सुधा के लिए चंदर।

-मैं कैसे मान लूँ, आप ही चंदर हैं।

-आप को मनाने मैं यहाँ नहीं आया हूँ। जिसे मानना है, वो मान लेगी।

प्रोफ़ेसर तिवारी सुधा के सिरहाने से हट गए। अब वहाँ चंदर बैठा था। हवाओं में ना जाने क्या महकने लगा था। ना जाने कैसा मौसम हो गया था। ना जाने घड़ी कितना समय बता रही थी। ना जाने प्रोफ़ेसर तिवारी क्या सोच रहे थे और ना जाने कैसे सुधा को होश आ गया था। सुधा के सिर पर चंदर ने जैसे ही हाथ रखा प्रोफ़ेसर तिवारी को लगा अब हूबहू उनका देखा हुआ स्वप्न दुहराया जाने वाला है। वो पत्थर की प्रतिमा से एक कोने में खड़े थे। उनकी स्मृति में उनके बचपन के बाद के दिन थे। वे दिन जब जवानी दस्तक दे रही थी। दरवाज़े पर जवानी की दस्तक से वो थोड़े-थोड़े जवान, थोड़े-थोड़े बच्चे थे। उसी समय वो मिली थी। वो जिसका नाम उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।

सुधा की आवाज़ कबूतर की तरह उन तक एक संदेशा लाई। जिसमें कहा गया था कि बाहर चले जाइये। मुझे चंदर के साथ थोड़ा एकांत चाहिए। प्रोफेसर तिवारी कमरे के बाहर चले गए। वो ये मिलन देखना चाहते थे। पर फिर उन्होंने सोचा कि उन्होंने अपने स्वप्न में पहले ही इस मिलन को देख लिया है। फिर से इसे देखना एक देखे हुए दृश्य की पुनरावृत्ति ही होगी। उन्होंने सोचा जब अस्पताल के सब आईने चटकने और शीशे टूटने लगेंगे। और जब सुधा और चंदर हाथों में हाथ थामे मरने ही वाले होंगे तब वो कमरे में प्रवेश करेंगे। इस दुनिया से जाते हुए वो दोनों को हाथ हिलाते हुए विदा करेंगे। वो कमरे के बाहर अस्पताल के आईने चटकने और खिड़कियों के शीशे टूटने का इंतज़ार करने लगे।

भीतर क्या हो रहा था। किसी को कुछ नहीं मालूम था। एक अंदाज़ा था, जो प्रोफ़ेसर तिवारी को स्वप्न के आधार पर हुआ था। उसी के साहरे उनकी कल्पना में एक फ़िल्म सी चल रही थी। चंदर सुधा के गले मिल कर बेतहाशा रो रहा है। सुधा भी सिसक रही है। उन्होंने दृश्य को थोड़ा कम भावुक करते हुए दृश्य में सुधार किया। सुधा की आँखों में आँसू है। चंदर की आँखें भी सजल हैं। दोनों की आवाज़ें घायल हैं। दोनों की पीड़ाएँ संवाद करती हैं। चंदर सुधा को अपने हाथ से दोनों झुमके पहनाता है। और फिर सुधा को “गुनाहों का देवता” पढ़ कर सुनाने लगता है। कुछ देर सुनने के बाद सुधा चंदर के हाथों से किताब ले लेती है और चंदर का हाथ पकड़ कर उसकी आँखों में झाँकते हुए मानो कहती है कि अब हमें रोना चाहिए। दोनों रोने लगते हैं। दोनों एक दूसरे को चूमना चाहते हैं पर कल्पना पर प्रोफ़ेसर तिवारी का नियंत्रण है। इसलिए प्रोफ़ेसर तिवारी चुम्बन घटित नहीं होने देते। कल्पना चुम्बन का दृश्य लाँघ कर वहाँ पहुँचती हैं जहाँ सुधा और चंदर गले मिलते हैं और जैसा कि आपको पता है कि फिर अस्पताल के आईने चटकते हैं और खिड़कियों के शीशे टूट जाते हैं। दोनों की अधूरी आत्माएं पूर्ण हो जाती हैं और दोनों चैन से साथ साथ मर जाते हैं।

प्रोफेसर तिवारी बहुत देर से अस्पताल में कमरे के बाहर खड़े हुए थे। उन्हें आइनों के चटकने और खिड़कियों के टूटने की प्रतीक्षा थी। वो सोच रहे थे कि अभी तक तो ये घटना घट जानी चाहिए थी। एक्का दुक्का पत्रकार अब अस्पताल की सुरक्षा को चकमा देकर ऊपर तक आ पहुँचे थे। सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे। प्रोफ़ेसर तिवारी ख़ुद को घिरा हुआ महसूस कर रहे थे और भीतर कहीं बहुत गहरे में ठगा हुआ सा भी। अब तक तो चंदर और सुधा को उन्हें अंदर बुला लेना चाहिए था। एक घंटे से ज़्यादा समय हो रहा था। अब तक तो अस्पताल के आईनें चटक जाने चाहिए थे। अब तक तो सारी खिड़कियों के शीशे टूट जाने चाहिए थे। कुछ घटित नहीं हो रहा था। सब ठहर सा गया था। जैसे चारो तरफ एक निर्वात सा भर गया हो। अब बर्दाश्त के बाहर था। प्रोफ़ेसर तिवारी दरवाज़े पर दस्तक दे रहे थे। तेज़ तेज़ दस्तक। अब उनकी कल्पना दरवाज़े के उस पार नहीं देख पा रही थी। अस्पताल के कर्मचारियों, पत्रकारों के अलावा तीमारदारों की काफी भीड़ जमा हो चुकी थी। इस विकल्पहीनता की स्थिति में बस एक ही विकल्प शेष था। दरवाज़ा तोड़ दिया जाए। दरवाज़ा तोड़ दिया गया।

अंदर का दृश्य किसी परमाणु बम की तरह फटा। जिसने भी पहली बार वो दृश्य देखा पसीने से भीग गया। अंदर रक्त ही रक्त था। बेड से रिसता हुआ ख़ून फर्श पर फैल गया था। सुधा और चंदर का हाथ एक दूसरे के हाथों में था। सुधा के कानों में दोनों झुमके थे। बरेली में बिछड़े झुमके, इंदौर के अस्पताल के कमरा नंबर. 29 में पूरे तीस साल बाद मिले थे। दोनों की लाशों को देखते ही पता चलता था कि दोनों ने एक दूसरे की कलाई की नसें काट ली हैं। दोनों की आत्माएं पूरी हो गई थीं। दोनों मर गए थे। चैन से इस तरह मरा जाता है। इसका अंदाज़ा नहीं था प्रोफ़ेसर तिवारी को। वो लड़खड़ाते हुए कमरे में घुसे। सुधा के सिरहाने पर एक चिट्ठी पड़ी हुई थी। आधे पत्र में सुधा की हैंड राइटिंग थी। और आधे में बेशक चंदर की। नीचे दोनों का हस्ताक्षर था। हस्ताक्षरों को देख कर पता चलता था कि इन्हें बेहद ख़ुश और पुरसुकून लोगों ने किया है। दोनों को चैन मिल गया था। दोनों ख़ुश थे। दोनों को सुकून था। प्रोफेसर तिवारी ने वो चिट्ठी पढ़नी शुरू की। उसमें लिखा था-

हमें जो बहुत पहले कर लेना चाहिए था। वो हम आज कर रहे हैं। जो घटना आज से 30 साल पहले घट जानी चाहिए थी। आज तक टलती रही। अब इसे और  नहीं टाला जा सकता है। हमारा प्रेम पवित्र था। नपुंसक नहीं। ये दुनिया हमें एक नहीं होने देना चाहती थी। हम इसके मुंह पर कालिख पोत कर एक हो रहे हैं और इसे धिक्कारते हुए यहाँ से जा रहे हैं। साथ जीना संभव नहीं हुआ तो क्या, हम साथ जाना संभव करेंगे। हम साथ साथ जा रहे हैं। प्रोफेसर तिवारी बहुत अच्छे आदमी थे। उनको हम दोनों की तरफ से बहुत सारा प्रेम। उन सबका शुक्रिया जिन्होंने साथ दिया। उन सबका और शुक्रिया जिन्होंने अकेला छोड़ दिया।

अलविदा !

एक दूसरे के

सुधा-चंदर

कमरा अस्पताल के कर्मचारियों, पत्रकारों, पुलिस वालों और तीमारदारों से कुछ देर के लिए भर गया। फिर पुलिस ने कमरा खाली करा कर सील कर दिया। लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गईं। प्रोफ़ेसर तिवारी लाशों के आने तक टीवी पर न्यूज़ देखते रहे। ना जाने कैसी कैसी बातें कैसी कैसी भाषा, भाव और भंगिमाओं के साथ की जा रहीं थी।

बाहर पति करता रहा इंतज़ार: भीतर प्रेमी के साथ पत्नी फरार, प्रेमी-प्रेमिका ने एक दूसरे की नसें काट कर दुनिया के मुँह पर मारा तमाचा, तीस साल पुराने प्रेम ने मार डाला प्रेमी प्रेमिका को, बूढ़ा इश्क़ हत्यारा होता है, कलाइयाँ ख़ून से रंग गए, दुनिया से संग-संग गए… जैसे ना जाने कितने ही अश्लील शीर्षकों से अश्लील खबरें लिखी पढ़ी गईं। ना जाने कैसी कैसी कहानी सुनाई, बताई गई। इंदौर की हवाओं में सुधा-चंदर की कहानी तैरने लगी थी। सड़कों पर लोग सुधा चंदर की बातें करते हुए, उनके बारे में सोचते हुए बिजली के खंभों से टकराने लगे थे। ये शहर अब प्रोफ़ेसर तिवारी के रहने लायक नहीं बचा था। बची तो दुनिया भी रहने लायक नहीं थी। पर प्रोफ़ेसर तिवारी के पास कोई झुमका नहीं था कि उनको सुकून मिलता और वो चैन से मर सकते। उन्हें अभी जीना था।

अगली सुबह दस बजे पोस्टमार्टम हो गया। प्रोफ़ेसर तिवारी ने दोनों लाशों को एक साथ एक ही चिता में रख कर अंतिम संस्कार किया, मुखाग्नि दी। पंडितों ने विरोध किया। धर्म का डर दिखाया। इसे शास्त्र विरूद्ध बताया तो प्रोफ़ेसर तिवारी ने कुछ नोटों के साहरे शास्त्र बदल दिए। धर्म को मना लिया। पंडितों के चेहरों पर हँसी बिखेर दी। सुधा चंदर धू-धू कर जल रहे थे। क़ायदे से यहीं पर कहानी ख़त्म हो जानी चाहिए थी। और सुधा-चंदर की चिता की आग आपके दिल में जलती हुई छोड़ देनी चाहिए थी। पर मैं आप सबको जानता हूँ। मुझे आपसे इतनी संवेदनशीलता की आशा कभी नहीं रही। इसलिए मैं आगे की थोड़ी सी कहानी और सुनाए देता हूँ।

लाशों को जलाने के बाद प्रोफ़ेसर तिवारी ने इंदौर में उगता सूरज नहीं देखा। इस दुनिया में उनका कोई नहीं था। कोई शहर उनका अपना नहीं था। पराई तो पूरी दुनिया ही थी। पर एक शहर का नाम उन्होंने सुन रखा था। जहाँ कुछ बच्चे किसी का इंतज़ार कर रहे थे। वो शहर था मुम्बई। प्रोफ़ेसर तिवारी मुम्बई चले गए। गुरु जी के बच्चों के पास। वही कबाड़ी बच्चे जिनमें चंदर अपना बचपन देखता था। उनके मुस्तक़बिल बनाते हुए, अपने बिगड़े नसीब को भूल जाता था। बच्चे अपने गुरु जी के बारे में पूछ रहे थे। उन्होंने बच्चों से कहा कि उन्हें उनके गुरु जी ने ही उन लोगों के पास भेजा है। गुरु जी अपनी पत्नी के साथ किसी लंबी यात्रा पर निकल गए हैं। बच्चे बच्चे ही थे। उन्होंने मान लिया।

प्रोफ़ेसर तिवारी ने उस लड़की को याद किया जिसका नाम उनके सिवा कोई और नहीं जानता था। उन्होंने उसके नाम को सबको बता दिया और बच्चों की पाठशाला को नाम दिया “सुशीला एजुकेशनल सोसाइटी”। एक छोटा सा कमरा जहाँ वो चंदर के बच्चों को पढ़ाते थे। कमरे के बाहर सुशीला का नाम लिखा था। भीतर ब्लैक बोर्ड के ऊपर सुधा-चंदर की तस्वीर टंगी रहती थी। कोई सुशीला के बारे में पूछता तो प्रोफ़ेसर तिवारी कहते, “सुशीला मेरी पत्नी थी। कोई सुधा के बारे में पूछता तो कहते, “सुधा चंदर उर्फ गुरु जी की पत्नी थी। ये बेमेल चप्पलों के जोड़े को सही और सीधा करने का प्रोफ़ेसर तिवारी का अपना ही तरीका था।

और जैसा कि मैंने आपको कहानी की शुरुवात में ही बताया था। प्रोफ़ेसर तिवारी सबसे आख़री में अंतिम और निर्णायक बात बोलते थे। ये उनकी बचपन की आदत थी। जो उन्हें अपनी माँ की जीर्ण-शीर्ण, चुक चुकी गर्भ से ही लग गई थी। उन्होंने इस कहानी के बारे में भी अंतिम और निर्णायक बात बोली।

सुधा और चंदर की प्रेम कथा, एक श्रापित प्रेम कथा है। इसे मशहूर हो जाने का श्राप है। सुधा-चंदर जब जब प्रेम करेंगे। कहानियों में बदल जाएँगे।

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अनुराग अनंत

 

परिचय: अनुराग अनंत, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ से पत्रकारिता में पीएचडी कर रहे हैं। साहित्य आजतक 2017 की लल्लनटॉप कहानी प्रतियोगिता में एक लाख का प्रथम पुरस्कार मिला था। सदानीरा, असुविधा, पोषम पा, हिंदवी, बुद्धुबाक्सा, अमरउजाला, नवभारतटाइम्स, दैनिक जागरण, समकालीन जनमत आदि में कविताएँ और कहानियां प्रकशित हैं।

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