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शेर, आदमी और ज़ुबान का घाव: मृणाल पाण्डे

बच्चों को न सुनाने लायक बालकथा की यह ग्यारहवीं किस्त है। जानी मानी लेखिका मृणाल पाण्डे लोककथाओं को नए सिरे से लिख रही हैं और वे कथाएँ हमें अपने आसपास की लगने लग रही हैं। आइए इस कथा में जानते हैं कि शेरों ने मनुष्य के ऊपर कब भरोसा करना छोड़ दिया-

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यह बहुत पुराने ज़माने की कहानी है। तब आदमी और शेर-बाघ के बीच एक और ही क़िस्म की मरजाद थी। एक पशु तो दूसरा आदमी की जात, पर फिर भी एक दूसरे को लेकर उनके दिलों में कोई शक या वैर नहीं था। सब अपने काम से काम रखते। आदमी गांव या शहर जहां कहीं बसते, खेती बाड़ी या बनिज व्यापार करते, घर गिरस्ती चलाते। आदमी, औरतें, बच्चे सब घर की गाय भैंसों का ही दूध पीते थे। कभी कभार साग पात के साथ वे माँस भी खा लेते थे। पर सिरफ घर की पाली बकरी या भेड़ का।

शेर बाघ भी जंगल में रहते और सिर्फ वहीं के विचरने वाले जंगली जानवरों को  खाते थे। उस ज़माने में आज की तरह रात को दबे पैर गांव में घुस कर वे मवेशी, बच्चे या घसियारिनों को कभी नहीं उठाते थे। बाढ हो कि सुखाड़, न मनुख शेर-बाघ को तीर-तलवार से मार कर उनकी खाल, नाखून और दांत बेचते, न वे आदमी की ज़ात पर हमले करते थे।

उस ज़माने में भी, जैसा हर ज़माने में होता है, एक बातून आदमी था, काम-काज का निठल्ला पर बातों का धनी। बीबी ही दिन भर खेत में भी खटती और घर में भी, तब जैसे तैसे गिरस्ती की गाड़ी खिंचती थी। खुद आदमी गप मारने बैठ जाता तो घंटों गप ही मारता रहता। इसलिये उसकी अपनी कमाई धमाई कुछ खास नहीं थी। पर इस बातून आदमी की एक सुंदर बेटी थी, जिससे वह बहुत प्रेम करता था। वह ब्याहने लायक हो चली थी। सो उसे और उसकी पत्नी को निस दिन अपनी बेटी के ब्याह की फिकर रहती।

एक दिन उसकी पत्नी बोली, ‘हाथ में पैसा नहीं, ब्याह तय भी करें, तो किस बल पर? ऐसे ही अपनी इकलौती बच्ची को नंगी-बूची कैसे विदा कर दें?

अब आदमी ने तय किया कि धन कमाने को उसे परदेस जाना होगा। और चार रोटी थैले में धर कर वह घर से चल पड़ा। राह में एक बड़ा घना जंगल था। वहाँ पहुंचते उसे रात हो गई। सामने की गुफा दिखी तो उसने गुफा में ही रात काटने की सोची। रात अचानक उसकी नींद खुली। उसने देखा सामने खुद गुफा का मालिक शेर खड़ा था। आदमी घबराया। पर बातों का तो धनी था। हाथ जोड़ कर उसने गिड़गिड़ाते हुए शेर से कहा, ‘वन के राजाजी, आप मुझसे बहुत बडे हैं, अकल में भी. ताकत में भी। इसलिये मुझे आपसे कोई बैर नहीं। मैं तो आपदा का मारा गरीब बाप हूं, घर पर अनब्याही जवान लड़की बैठी है। शहर जा कर चार पैसे कमाने को निकला हूं। राही हूं, सुबह सुबह शहर निकल जाऊंगा। मुझे कुछ हो- हवा गया तो मेरी सयानी बेटी अनब्याही रह जायेगी।’

शेर तो दरियादिल शेर ही हुआ। उसने आदमी से कहा, ‘भाई मेरे, तुम ठहरे गंवई गांव के खेतिहर। बातें ठीकठाक भले कर लो पर तुम्हारे हाथ पैर देख कर लगता नहीं कि शहर में पैसा कमाने लायक कोई हुनर तुम्हारे पास होगा।’

आदमी गिड़गिड़ाया, ’क्या करूं शेर भाई, घर पर बीबी, बाहर गांववाले दिन रात सुनाते हैं कि लड़की को घर में ही बूढी कर दोगे क्या? इसलिये सोचा शहर जा कर कुदाली फावड़ा चला कर या मजूरी कर के कुछ कमा लूं तो शायद ब्याह लायक पैसा जमा हो जाये।’

शेर हँसा, ‘अरे दोस्त, ऐसे जांगर से ज़रूरत लायक पैसे कमाने में तो तुम्हारी बेटी की शादी की उमर बीत जायेगी। चलो मेरे संग!’ वह आदमी को अपनी गुफा में काफी भीतर ले गया। वहाँ एक तरफ शेर के खाये जानवरों के हाड़ों की ढेरी थी, और बगल में सोने चांदी के ज़ेवर और सिक्के भरे जंग खाया एक पुराना बक्सा था जिसे शायद बहुत पहले कभी कोई चोर छुपा कर रख गये थे ।

शेर बोला: ‘ हम शेर-बाघों के हेत सोना क्या, चांदी क्या? तू मेरा दोस्त है। उठा ले जितने ले जा सकता है, और धूमधाम से बेटी का ब्याह कर। बस एक शर्त है, मुझे तुम मनुखों की शादी देखने की बड़ी इच्छा है, शादी में मुझको ज़रूर बुलाना।’

‘सरकार, बुला तो ज़रूर लूंगा। बड़ा मौका है। भारी बारात आ रही है, खूब बोलनेवाले ज्ञानी मेहमानों का झुंड उसमें होगा। खूब बातचीत होयेगी।

‘बस एक बात जरा खटकती है, कि कहीं अचानक जंगल के बाहर आपको देख कर मेरे मेहमान तनिक अचकचा न जायें?’ सकुचाता आदमी बोला।

शेर बोला, ‘मुझे बतकही का तनिक शौक भी नहीं भैया। तुम तो ऐसा करो कि मेरे बैठने का प्रबंध घर के भीतर तनिक अलग थान पर कर देना, जहाँ से मैं बस शादी होती देख सकूं और अतिथियों की बतकही सुन सकूं। किसी को बताना मत, कि तुम्हारा साथी शेर इधर ही कहीं बैठा है।’

आदमी खुश खुश हाथ जोड़ कर झोला भर सोने चांदी सहित घर आ गया। लड़की का रिश्ता तय हुआ और साइत निकाली गई तो उसने सबको हल्दी अच्छत के कागज़ पर न्योते भेजे। फिर वह शेर से मिलने गया और उसे भी बारात से घंटा भर पहले आने को न्योत आया, ताकि उसे चुपचाप किसी सुरक्षित जगह पर बिठा सके।

देखते देखते शादी का दिन भी आ गया। सही समय पर शेर आया। आदमी ने उसको तिलक लगा कर एक खाली ओबरी में बिठा दिया जहाँ कभी उसके जनावर बंधते थे। शेर खिड़की से ताक लगा कर देखने लगा कि आदमियों बारात में क्या क्या होता है?

बारात आई तो द्वाराचार होने लगा। कहाँ के तुम? क्या नात-गोत? कौन वेदाध्यायी, किस प्रवर के? वगैरह। मनुख की जात, बातों और छाछ का क्या ? जितना चाहो बढा लो!

शेर ने मुंह बनाया । कितनी बेमतलब की बकर बकर करते हैं आदमी लोग, उसने सोचा। ब्याहने आये हैं लड़का लड़की, उनकी छोड़ कर हर किसम की बकबक सुन लो! उसने मुंह खोल कर जमुहाई ली।

जमुहाई की बास, वह भी शेर की! एक भभके के साथ बास बाहर आई तो कुछ बारातियों ने नाक चढाई। कहने लगे कि हमको तो कहीं से शेर की जैसी बास आ रही है करके। उनमें से किसी ने पूछा, इतने लिपे पुते घर में यह बास कैसी समधी ज्यू?’

‘वो ऐसा है कि नीचे जानवरों की ओबरी में घास सड़ गई थी। उनको तो मैंने दूसरी साफ जगह बाँध रखा है। यह उसी की गंध होगी। सड़ी घास साली शेर-बाघ के वंशजों जैसी गंधाती है।’ आदमी ने बारातियों को सुना कर कहा।

सभी किसान लोग थे। कहने लगे सही है। घास साली गंधाती है तो शेर-बाघ जैसी बास मारती है। अच्छा किया डंगर हटा दिये।

‘चार दिन धूप लग जाये, फिर हम हाँडी में कोयलों पर लोबान जला के धर देंगी तो एकदम मर जायेगी बास।’ घर की औरतों ने किवाड़ के पीछे से बारातियों को सुना कर कहा, और अपने समधियों की, अपने पुरखों की तारीफ के गीत गाने लगीं, जो साँझ का दियना जगने पर चंद्रमा और तारों की तरह, बादल से गरजते, मेहा से बरसते, बिजली से चमकते उनके अंगने में आज परगट हुए थे।

फिर लोग शादी की रस्मों में लग गये। लेकिन ओबरी में छुपाये गये शेर को अपने साथी की यह बात सुन कर कि सड़ी हुई घास उसके और उसके पुरखों जैसी गंधाती है कर के, अत्ति बुरा लगा, सो लगा ही। एक बार तो उसके मन में आया कि दरवाज़ा धडाम से खोल कर बाहर गरजता हुआ निकले और उस आदमी के टुकड़े कर के सबको बता दे कि उसने मदद न की होती तो यह शादी होनी नामुमकिन थी।

पर शेर को छज्जे में सहेलियों की चुहल से शर्माती कन्या पर दया आ गई। फिर उसने सोचा कि वैसे भी वह इस आदमी को मित्र बना चुका था। कन्यादान के पहले उसे मित्रता की मरजाद त्याग कर कैसे मार सकता है?

उसने अपना गुस्सा भीतर ही भीतर दबा लिया, और दबे पैरों जंगल का रास्ता लिया। नहीं आना उसको आदमियों की बस्ती में जहाँ उसको, उसके पुरखों को नाम धरा जाता है। वापिस जंगल लौटते हुए भी मित्र की वह कड़वी बातें और बारातियों की हंसी उसके मन में शूल बन कर चुभती रहीं।

ब्याह ठीकठाक से हो गया, तो कन्या को विदा करने के बाद आदमी शेर से मिलने कुछ अच्छत चंदन ले कर दोबारा जंगल आया। साथ में एक पंथ दो काज की नीयत से वह घर के लिये लकड़ी काटने को एक कुल्हाड़ी भी लेता आया था। उसने देखा गुफा के बाहर उसका मित्र शेर उदास चेहरा लिये एक चट्टान पर बैठा था। उसका मुख देख कर आदमी ने सहमते हुए पूछा, ‘मीता काहे उदास हो?’ शेर तो शेर। गरज कर बोला, ‘मीता के बच्चे, चल उठा अपनी तलवार और काट दे मेरी गरदन। शादी वाले दिन मेरी गंध को लेकर तुमने जो अपने लोगों के बीच मेरी और मेरे पुरखों की हंसी उडाई। उन बातों को लेकर आज भी मेरे भीतर इतना गुस्सा है कि तुम ने कुल्हाड़ी न चलाई तो मैं ही तुम्हारे टुकड़े टुकड़े कर डालूंगा।’

डर कर आदमी ने कुल्हाडी से वार कर ही तो दिया। पर भला हुआ शेर के गले के गिर्द की अयाल भारी थी, इसलिये घाव गहरा नहीं लगा, लेकिन तर-तर खून काफी टपकने लगा।

‘जा भाग जा’, शेर ने अचकचाये आदमी से कहा, ‘अभी मैं गुस्से में हूं। फिर हफ्ते बाद आना। दोस्त बनाने के बाद तेरा दिया ये घाव मुझे हमेशा तेरे विश्वासघात की याद दिलायेगा। आना ज़रूर, न आया तो तेरे घर आ कर तेरे टुकड़े कर दूंगा।’

हाँ हाँ करता आदमी कुल्हाड़ी कंधे पर धरे घर भाग गया। शेर का अहसान छोटा मोटा तो था नहीं, फिर कहीं सचमुच घर आन पहुंचा तो गज़ब हो जायेगा। यह सोच कर वह हफ्ते घर बाद डरता डरता वह फिर शेर के पास आया, आज न जाने क्या होगा सोचता हुआ।

गुफा के दरवाजे से उसने पुकारा, ‘मित्र शेर महाराज, ओ शेर महाराज!’

शेर उसके स्वागत के लिये गुफा से बाहर आ गया। आदमी ने पूछा, ‘मित्र, इस बार किस लिये बुलाया है?’

‘तुझे तेरा दिया घाव दिखाने के लिये’, शेर बोला। ‘देख उसे।’

आदमी ने हाथ से अयाल हटा कर देखा घाव अब तक काफी भर गया था।

‘मित्र, घाव तो भर गया है।’ उसने कहा।

‘यही तो मैं तुमको बताना चाहता था बेवकूफ,’ शेर बोला। ‘कुल्हाड़ी का दिया घाव तो समय के साथ भर जाता है। लेकिन मित्र सामने हो तो भी और पीछे हो तो भी, सबके बीच उसकी बाबत बोलने की भी एक आन होती है।

‘जिसे अपना जैसा ही और मित्र और सहयोगी माना बरता हो, उससे इतनी कड़वी और अहंकारी बात सुनना कैसा लगता है, तुम जैसे दया के पात्र नहीं समझोगे। बाद को मेंढक जैसी आंखें नचा नचा कर लाख कहोगे भी, कि तुम्हारा मतलब यह नहीं यह था, पर तुम्हारी मित्रघाती ज़ुबान का दिया घाव कभी नहीं भरेगा।  अहंकारी बोली की चोट अभी भी दिल में हमेशा हरी रहती है।

‘आज तो तुमको मैंने बुलाया था तो तुम मेरे अतिथि हुए। इसलिये अपना अतिथि धरम निभाते हुए आज तो तुमको छोड़े देता हूं, पर आज से हम शेर बाघों की तुमसे और तुम्हारी बदज़ुबान और विश्वासघाती जमात से हमारी दोस्ती खतम हुई। अब जब कभी सामने पड़े, तो हम लोग तुम लोगों पर हमला करने से नहीं चूकेंगै। जाओ! भागो!’

उसी के बाद से दुनिया के शेर-बाघों ने इंसान पर भरोसा करना छोड़ दिया और जंगल में सामने पडते ही उन पर घात लगा कर हमला करने लगे हैं।

यही कारण है कि सयाने कहते हैं, कि पहले बात मन में तोलो फिर बोलो। क्योंकि कुल्हाड़ी- फरसे के दिये घाव से कहीं ज़्यादे घातक ज़ुबान का किया घाव होता है।

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